सोमवार, 30 जनवरी 2012

!!इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म.!!

हमारी इच्छा की गहराई ही हमारे विचारों और संकल्पशक्तिकी गहराई होती है। इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म..
इच्छाएं कहां पैदा होती हैं? इनके पैदा होने का आदर्शतमस्थल मन ही है। मन की जमीन पर सबसे पहले इच्छा के बीज पडते हैं। अधिकांशत:ये बीज आसपास के वातावरण से ग्रहण किए जाते हैं। हम जब भी किसी दूसरे को कुछ होता हुआ या करता हुआ देखकर उससे प्रभावित होते हैं, तो हमारे अंदर भी यह इच्छा पैदा होती है कि हम भी वैसा ही करें। जैसे ही इच्छा का यह बीज मन की जमीन पर पडता है, वैसे ही धीरे-धीरे पनपना शुरू कर देता है। इसको पनपाने और बढाने का काम मन नहीं करता। यह काम विचार करता है।
           किसी व्यक्ति के मन में जैसे ही इच्छा होती है कि मैं एक धनी व्यक्ति बनूं, तो इच्छा का बीज पडते ही मन अशांत हो जाता है। यदि वह इस बीज को नष्ट या नियंत्रित नहीं करता, तो जैसे ही इच्छा को उपयुक्त वातावरण मिलता है, वह पनपने लगती है।
          मन केवल इच्छा करता है। इच्छा की पूर्ति करने का काम विचार करता है। यदि कोई धनी बनना चाहता है, तो यह उसके मन के अंदर पैदा हुई एक इच्छा है। अब यह दायित्व विचारों का है कि वह उसे यह बताए कि वह कैसे धनी बन सकेगा। इसके लिए उसे नौकरी करनी चाहिए, दुकान खोलनी चाहिए या कोई उद्योग लगाना चाहिए।लेकिन मन के अंदर जैसे ही कोई इच्छा उठती है, तो उससे जुडी न जाने कितनी इच्छाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसे आप ऐसा वृक्ष मान सकते हैं, जिसकी सैकडों टहनियां, हजारों डंठल और लाखों पत्तियां हैं। ये असंख्य इच्छाएं पैदा तो होती हैं मन में, लेकिन दिखाई देती हैं कल्पना के पर्दे पर। मैं धनी होना चाहता हूं यह मूल इच्छा है, जो मन में पैदा हुई, लेकिन धनी बनने के बाद मैं क्या-क्या करूंगा, इस तरह की छोटी-छोटी इच्छाएं कल्पना की स्क्रीन पर उभरने लगेंगी। एक बडा महल होगा, गाडी होगी, नौकर-चाकर होंगे आदि। कल्पना जगत के इन दृश्य-चित्रों का रंग जितना गाढा होगा, उतना ही अधिक यह इस बात का प्रमाण होगा कि धनी बनने की इच्छा कितनी गहरी है? जितनी गहरी इच्छा होगी, कल्पनाओं के रंग भी उतने ही स्पष्ट और चटख होंगे। कल्पनाओं के रंग जितने अधिक चटखदारहोंगे, उस इच्छा को पूरा करने वाले हमारे विचार भी उतने ही अधिक ठोस और मजबूत होंगे। हमारी इच्छा की गहराई ही हमारे विचारों और संकल्पशक्तिकी गहराई होती है। इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म बनते हैं। जब हम इन कर्र्मोको लगातार करते चले जाते हैं, तो ये ही कर्म हमारी आदत बन जाते हैं, हमारा व्यवहार बन जाते हैं और हमारी ये आदतें और व्यवहार हमारा व्यक्तित्व बन जाते हैं।
इच्छा के अनुकूल ही विचार पैदा होते हैं। यदि किसी में विद्वान बनने की इच्छा है, तो उसके विचार पुस्तकालयों, किताबों और विद्वानों के बारे में होंगे। यदि किसी की इच्छा अभिनेता बनने की है, तो वह अभिनय सीखने के स्कूलों, अभिनेताओंतथा उससे जुडी बातों के बारे में सोचेगा। उसका मस्तिष्क उसी का विचार करेगा, जो उसकी इच्छा होगी। ये इच्छाएं मन में उत्पन्न होती हैं, इसलिए मन ही व्यक्ति का प्रतिरूप होना चाहिए। कह सकते हैं कि मन का ही साकार रूप है मनुष्य।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

!!भवानी सिंह बाघेल (भगवान् सिंह बाघेल )!!

चित्रकूट। आदिकाल से धर्म की ध्वजा को विश्व में फैलाने वाला 'चित्रकूट' खुद में अबूझ पहेली है। तप और वैराग्य के साथ स्वतंत्रता की चाह में अपने प्राण का न्योछावर करने वालों के लिये यह आदर्श भूमि सिद्ध होती है। राम-राम की माला जपने वाले साधुओं ने वैराग्य की राह में रहते हुये मातृभूमि का कर्ज चुकाने के लिये अंग्रेजों की सेना के साथ दो-दो हाथ कर लड़ते-लड़ते मरना पसंद किया। लगभग तीन हजार साधुओं के रक्त के कण आज भी हनुमान धारा के पहाड़ में उस रक्तरंजित क्रांति की गवाह हैं।

बात 1857 की है। पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बज चुका था। यहां पर तो क्रांति की ज्वाला की पहली लपट 57 के 13 साल पहले 6 जून को मऊ कस्बे में छह अंग्रेज अफसरों के खून से आहुति ले चुकी थी।
शहीद ठाकुर  रणमत सिंह बाघेल
एक अप्रैल 1858 को मप्र के रीवा जिले की मनकेहरी रियासत के जागीरदार ठाकुर रणमत सिंह बघेल ने लगभग तीन सौ साथियों को लेकर नागौद में अंग्रेजों की छावनी में आक्रमण कर दिया। मेजर केलिस को मारने के साथ वहां पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद 23 मई को सीधे अंग्रेजों की तत्कालीन बड़ी छावनी नौगांव का रुख किया। पर मेजर कर्क की तगड़ी व्यूह रचना के कारण यहां पर वे सफल न हो सके। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता को झांसी जाना चाहते थे पर उन्हें चित्रकूट का रुख करना पड़ा। यहां पर पिंडरा के जागीरदार ठाकुर दलगंजन सिंह ने भी अपनी 1500 सिपाहियों की सेना को लेकर 11 जून को
1858 को दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर उनका सामान लूटकर चित्रकूट का रुख किया। यहां के हनुमान धारा के पहाड़ पर उन्होंने डेरा डाल रखा था, जहां उनकी सहायता साधु-संत कर रहे थे। लगभग तीन सौ से ज्यादा साधु क्रांतिकारियों के साथ अगली रणनीति पर काम कर रहे थे। तभी नौगांव से वापसी करती ठाकुर रणमत सिंह बघेल भी अपनी सेना लेकर आ गये। इसी समय पन्ना और अजयगढ़ के नरेशों ने अंग्रेजों की फौज के साथ हनुमान धारा पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन रियासतदारों ने भी अंग्रेजों की मदद की। सैकड़ों साधुओं ने क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। तीन दिनों तक चले इस युद्ध में क्रांतिकारियोंको मुंह की खानी पड़ी। ठाकुर दलगंजन सिंह यहां पर वीरगति को प्राप्त हुये जबकि ठाकुर रणमत सिंह बघेल गंभीर रूप से घायल हो गये। करीब तीन सौ साधुओं के साथ क्रांतिकारियों के खून से हनुमानधारा का पहाड़ लाल हो गया।

महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अधिष्ठाता डा. कमलेश थापक कहते हैं कि वास्तव में चित्रकूट में हुई क्रांति असफल क्रांति थी। यहां पर तीन सौ से ज्यादा साधु शहीद हो गये थे। साक्ष्यों में जहां ठाकुर रणमत सिंह बघेल के साथ ही ठाकुर दलगंजन सिंह के अलावा वीर सिंह, राम प्रताप सिंह, श्याम शाह, भवानी सिंह बघेल (भगवान् सिंह बघेल), सहामत खां, लाला लोचन सिंह, भोला बारी, कामता लोहार, तालिब बेग आदि के नामों को उल्लेख मिलता है वहीं साधुओं की मूल पहचान उनके निवास स्थान के नाम से अलग हो जाने के कारण मिलती नहीं है। उन्होंने कहा कि वैसे इस घटना का पूरा जिक्र आनंद पुस्तक भवन कोठी से विक्रमी संवत 1914 में राम प्यारे अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई पुस्तक 'ठाकुर रणमत सिंह बघेल' में मिलता है।


Note---:
मैं यहाँ पर स्पस्ट करना चाहता हूँ  "भवानी सिंह बघेल (भगवान् सिंह बघेल)," हमारे पर दादा (पिता जी के पर पितामह ) थे ओ भी इस युद्ध  में सहीद हो गए थे !!



1857 के क्रांतिकारियों की सूची
1. नाना साहब पेशवा
2. तात्या टोपे
3. बाबु कुंवर सिंह
4. बहादुर शाह जफ़र
... 5. मंगल पाण्डेय
6. मौंलवी अहमद शाह
7. अजीमुल्ला खाँ
8. फ़कीरचंद जैन
9. लाला हुकुमचंद जैन
10. अमरचंद बांठिया
11. झवेर भाई पटेल
12. जोधा माणेक
13. बापू माणेक
14. भोजा माणेक
15. रेवा माणेक
16. रणमल माणेक
17. दीपा माणेक
18. सैयद अली
19. ठाकुर सूरजमल
20. गरबड़दास
21. मगनदास वाणिया
22. जेठा माधव
23. बापू गायकवाड़
24. निहालचंद जवेरी
25. तोरदान खान
26. उदमीराम
27. ठाकुर किशोर सिंह, रघुनाथ राव
28. तिलका माँझी
29. देवी सिंह, सरजू प्रसाद सिंह 
 30. नरपति सिंह
31. वीर नारायण सिंह 32. नाहर सिंह
33. सआदत खाँ
34. सुरेन्द्र साय
35. जगत सेठ राम जी दास गुड वाला
36. ठाकुर रणमतसिंह
37. रंगो बापू जी
38. भास्कर राव बाबा साहब नरगंुदकर
39. वासुदेव बलवंत फड़कें
40. मौलवी अहमदुल्ला
41. लाल जयदयाल
42. ठाकुर कुशाल सिंह
43. लाला मटोलचन्द
44. रिचर्ड विलियम्स
45. पीर अली
46. वलीदाद खाँ
47. वारिस अली
48. अमर सिंह
49. बंसुरिया बाबा
50. गौड़ राजा शंकर शाह
51. जौधारा सिंह
52. राणा बेनी माधोसिंह
53. राजस्थान के क्रांतिकारी
54. वृन्दावन तिवारी
55 महाराणा बख्तावर सिंह
56 ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव

-----------------------------------------------------------------------
1857 में आजादी की पहली लड़ाई में सतना जिले के मनकहरी ग्राम निवासी ठाकुर रणमतसिंह ने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। वे महाराजा रघुराजसिंह के समकालीन थे। महाराजा इन्हें काकू कहा करते थे। उन्हें रीवा की सेना में सरदार का स्थान मिला था।
1857 में बिहार के बाबू कुंवरसिंह और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध भारी मारकाट मचाई। लेकिन दोनों शक्तियां मिल नहीं पाईं क्योंकि बघेलखण्ड में अंग्रेज दोनों शक्तियों को मिलने नहीं देने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। महाराजा रघुराजसिंह पर भी अंग्रेजों की कड़ी नजर थी।
ठाकुर रणमतसिंह रीवा और पन्ना के बीच का क्षेत्र बुंदेलों से मुक्त कराने में उभरकर सामने आए। जब 1857 की क्रांति समाप्त हो चुकी थी। महारानी लक्ष्मीबाई शहीद हो चुकी थी। सेना का रुख पूरब की तरफ कर दिया गया। 1858 में बांदा में एक सैन्य दल ठाकुर रणमत सिंह का पीछा करने लगा।
2000 रुपए का इनाम रखा गया
ठाकुर साहब पर 2000 रु. का इनाम घोषित किया गया। उन्होंने डभौरा के जमींदार रणजीत राय दीक्षित के गढ़ में शरण ली। वहां भी अंग्रेजी सेना ने हमला बोल दिया। वे विवश होकर सोहागपुर गए। वहां भी अंग्रेजों ने पीछा किया जब ठाकुर रणमतसिंह क्योटी की गढ़ी में छिपे हुए थे अंग्रेज सेना की एक टुकड़ी ने रीवा की सेना की सहायता से उन्हें घेर लिया। वे वहां से भाग निकलने में सफल हो गए।
रीवा के महाराज पर डाला गया दबाव
अंग्रेजों ने उनको पकड़ने के लिए अंतिम चाल चली। रीवा के महाराजा पर दबाव डाला गया। उन्होंने पत्र लिखकर ठाकुर रणमतसिंह को बुलवाया। महाराजा के बुलाने पर वे गुप्त मार्ग से राजमहल में प्रविष्ट हुए और महाराजा से भेंट की। महाराजा से भेंट होने पर उन्होंने आत्मसमर्पण का विकल्प रखा।
इसके बाद जब रणमतसिंह अपने मित्र विजय शंकर नाग के घर जलवा देवी मंदिर के तहखाने में विश्राम कर रहे थे, महाराजा के संकेत पर पोलिटिकल एजेंट को यह सूचना दी गई। रणमतसिंह गिरफ्तार कर लिए गए तथा आगरा जेल में 1859 में उन्हें फांसी चढ़ा दिया गया। ठाकुर रणमतसिंह के बलिदान की गाथा लोकगीतों में गाई जाती है।
-(27/06/2015)

!!माँ सरस्वती को विद्या की देवी क्यों कहते है ?

'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभवस्त्रावृता 
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिदैवै सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्यापहा॥'
'जो कुन्द पुष्प, चँद्र, तुषार और मुक्ताहार जैसी धवल है, जो शुभ्र वस्त्रों से आवृत्त है, जिसके हाथ वीणारूपी वरदंड से शोभित हैं, जो श्वेत पद्म के आसन पर विरजित है, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव वंदन करते हैं, ऐसी निःशेष जड़ता को दूर करने वाली भगवती सरस्वती! मेरा रक्षण करे।'

सरस्वती के स्वरूप वर्णन में ही सच्चे सारस्वत के लिए मार्गदर्शन है। सरस्वती कुन्द, इन्दु, तुषार और मुक्तहार जैसी धवल हैं, सच्चा सारस्वत भी वैसा ही होना चाहिए। कुन्द पुष्प सौरभ फैलाता है, चँद्र शीतलता देता है, तुषारबिन्दु, सृष्टिका सौंदर्य बढ़ाता है और मुक्ताहार व्यवस्था का वैभव प्रकट करता है। सच्चे सारस्वत का जीवन सौरभयुक्त होना चाहिए।
पुष्प की सुगंध जिस तरह सहज फैलती है, उसी तरह उसके ज्ञान की सुगंध शांति प्रदान करती है उसी तरह सरस्वती का सच्चा उपासक अनेक लोगों के संतप्त जीवन में शांति का स्त्रोत बहाता है। वृक्ष के पत्ते पर पड़ा हुआ ओसबिन्दु मोती की शोभा धारण करके वृक्ष के सौंदर्य को बढ़ाता है, उसी तरह सरस्वती के सच्चे उपासक के अस्तित्व से संसार वृक्ष की शोभा बढ़ती है। 

ऐसे मानव के लिए कहना पड़ता है कि 'जयति तेऽधिकं जन्मना जगत्‌।' हार याने कुक्ताहार। अकेले मोती से मोतियों का हार ज्यादा सुंदर लगता है। सरस्वती के उपासकों को भी इस तरह एक साथ, एक सूत्र में बँधकर काम करने की तैयारी रखनी चाहिए। विद्वानों की शक्ति का ऐसा योग किसी भी महान कार्य को सुसाध्य बनाता है।


माँ सरस्वती ने धवल वस्त्र धारण किए हैं। सरस्वती का उपासक भी मन, वाणी और कर्म से शुभ्र होना चाहिए। सरस्वती के हाथ वीणा के वरदंड से शोभित हैं। वीणा संगीत का प्रतीक है। संगीत एक कला है। इस दृष्टि से देखने पर सरस्वती का उपासक संगीत का प्रेमी और जीवन का कलाकार होना चाहिए। संगीत यानी सम्यक्‌ गीत। 


वाणी के सुर जिस तरह सुसंवादित होते हैं, उसी तरह हमारे कार्य भी यदि सुसंवादित हों तभी हमारे जीवन में संगीत प्रकटेगा। वीणा को वरदण्ड यानी श्रेष्ण दण्ड कहा है। दंड यदि सजा का प्रतीक हो तो उससे श्रेष्ठ सजा दूसरी क्या हो सकती है? जिसकी सजा में भी संगीत है ऐसा सरस्वत ही दूसरे मानव का हृदय परिवर्तन कर सकता है। मानव को बदलने वाला दंड निश्चित ही श्रेष्ठ है, उसका दर्शन माँ सरस्वती हमें वीणा का वरदण्ड हाथ में रखकर कराती है।


सरस्वती श्वेत पद्म के आसन पर विराजमान है। सरस्वती उपासक श्वेत अर्थात्‌ विशुद्ध चरित्र का होना चाहिए। उसका आसन पद्म का होना चाहिए, यह बात बहुत ही सूचक है। पद्म आसपास के वातावरण से अलिप्त रहता है। कीचड़ में रहकर भी वह भ्रष्ट नहीं होता। सरस्वती के उपासकों को भी अपने आसपास के समाज में प्रवर्तमान भ्रष्टाचार से इसी तरह मुक्त रहना है।


ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव माँ शारदा को वंदन करते हैं, उसमें भी रहस्य है। माँ सरस्वती ज्ञान और भाव का प्रतीक है, यह बात उनके हाथ में की पुस्तक और माला से समझ में आती है। पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है और माला भक्ति प्रतीक है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनुक्रम में सर्जन, पालन और संहार के देव हैं। इन तीनों को ज्ञान और भाव की जरूरत है। 


बिना भाव का सृजन, बिना ज्ञान का पालन और बुद्धिहीन संहार अनर्थ करता है। इसलिए किसी भी कार्य के सृजन में, उस कार्य को टिकाने में और उस कार्य में घुसी हुई बुराई को दूर करने के लिए ज्ञान और भाव दोनों जरूरी है और इसीलिए किसी भी महान कार्य करने वाले महापुरुष को सरस्वती वंदना करनी ही चाहिए।

माँ सरस्वती हमारे जीवन की जड़ता को दूर करती है, सिर्फ हमें उसकी योग्य अर्थ में उपासना करनी चाहिए। सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होना चाहिए। दूसरों की संपत्ति देखकर मन में अस्वस्थता निर्माण नहीं होना चाहिए। उसे निष्ठापूर्वक अपनी ज्ञानसाधना अखंड करते रहना चाहिए।

विद्वान मानव को धन का अभाव कभी भी नहीं सालना चाहिए। धनिक मानव केवल भोग में ही आनंद को खोजने में भटकता रहता है, जब कि विद्वान को वह आनंद निसर्ग-दर्शन से, जीवन के भाव प्रसंगों और साहित्य के सृजन या आस्वादन से सहज प्राप्त होता है।


सरस्वती का वाहन मयूर है। मोर कला का प्रतीक है। सरस्वती काल की भी देवी है। चौदह विद्या और चौसठ कला ये सभी सरस्वती की उपासना में आती है। कला जीविका प्रदान करती है और विद्या जीवन देती है। इस तरह सरस्वती हमारे समग्र अस्तित्व को आवृत्त करती है। सरस्वती के उपासक की प्रतिष्ठा समाज करे या न करें, परन्तु ज्ञान के वाहक के रूप में सम्मान करके भगवान अवश्य उसे अपने मस्तिष्क पर चढ़ाएँगे।

इस बात की प्रतीति भगवान कृष्ण ने मोरपंख को अपने माथे पर चढ़ाकर दी है। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य गोपालकृष्ण को 'सुपिच्छगुच्छ मस्तकम्‌' कहकर उसकी विरुदावली गाते हैं। समाज में मेरा योग्य सम्मान नहीं होता ऐसा जिस विद्वान को लगता हो उसे इस संदर्भ में मोर और मोरपंख के बीच हुए संवाद स्वरूप नीचे का श्लोक हमेशा याद रखना चाहिए-

'अस्मान्विचित्रवपुषस्तव पृष्ठलग्नात्‌
कस्माद्विमुञ्चसि भवान यदि वा विमुञ्च।
रे नीलकण्ठ गुरुहानिरियं ततैव
गोपालसू नु मुकुटे भवति स्थितिर्नः॥'
मोरपंख मोर से कहता है कि, 'दीर्घकाल तक तेरी पीठ पर रहकर मैंने तेरी शोभा बढ़ाई है। मुझे तू अब क्यों झटक देता है? अथवा तू मुझे भले ही छोड़ दें, परन्तु उसमें तेरा ही नुकसान होने वाला है, तेरी शोभा नष्ट होने वाली है, मेरा स्थान तो भगवान गोपालकृष्ण मुकुट में है।'

अपना तिरस्कार करने वाले समाज को कोई भी सच्चा विद्वान उपरोक्त बात कह सकता है। समाज योग्य विद्वानों का सम्मान नहीं करेगा तो उसमें नुकसान समाज का ही है। विद्वानों को तो भगवान अपने सर पर

चढ़ाने के लिए तैयार ही हैं।

इस बात को ध्यान में रखकर सच्चे विद्वान को बड़प्पन प्राप्त करने के लिए कभी भी किसी की भी खुशामत नहीं करनी चाहिए। लाचार या निस्तेज मानव को शारदा के मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता।

जीवन में तेजस्विता लाने के लिए सरस्वती की उपासना करनी चाहिए। सच्चे सारस्वत को माँ शारदा के मंदिर का पावित्र्य टिकाना चाहिए।

शारदा के मंदिर में कला होनी चाहिए, परन्तु कला के स्वागत में विलासिता ने प्रवेश नहीं करना चाहिए। शारदा के मंदिर में विद्या होनी चाहिए, परन्तु विद्या के नाम पर अविद्या नहीं बेचनी चाहिए। शारदा के मंदिर में प्रेम होना चाहिए, परन्तु प्रेम के नाम पर मोह नहीं उत्पन्न होना चाहिए। शारदा के मंदिर में दिव्यता होनी चाहिए, परन्तु उन्मत्तता देखने को नहीं मिलनी चाहिए।


शारदा के मंदिर में नम्रता होनी चाहिए, परन्तु नम्रता का स्वांग धारण करके लाचारी नहीं घुसनी चाहिए। शारदा के मंदिर में प्राणों का प्रस्फुरण होना चाहिए, लेकिन निराशा के निश्वास नहीं निकलने चाहिए।

शारदा नित्य यौवन, स्तन्यदायिनी माता के समान है। वह अपने उपासक को जीवन देती है, उसके जीवन में कवन (काव्य) सर्जती है और उसे अपनी शक्तियों का सच्चा अनुभव समझाती है।
माँ शारदा को सादर नमन वंदन! 

नोट -अपने बिचार से साभार 

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

!!मनु-स्मृति क्या स्त्री बिरोधी है !!

हमारे समाज में कुछ प्रगतिशील महिलाओं और कुछ अन्य कथित प्रगतिशील लोगो का मानना है कि भगवान मनु स्त्री विरोधी थे। क्या जो मनु मनु-स्मृति हम पढ़ते और देखते है वह प्रमाणिक है ,, और अगर है तो कितने प्रतिशत ,, क्या ये वही मनु-स्मृतिहै जो भगवान् मनु ने लिखी थी और पूर्ण शुद्ध रूप में हमारे सामने है ,,,, अगर ऐसा है तो इसके श्लोको में इतना विरोधा भाष कैसे ,,, लिखने वाला एक चतुर्थ श्रेनी का लेखक भी जब अपने विषय के प्रतिकूल नहीं होता तो भगवान् मनु ने अपनी एक ही पुस्तक में इतना विरोध भाष कैसे लिख दिया ,,, एक जगह वो स्त्रियों की पूजा की बात करते है और दूसरी जगह उनकी दासता की ,, कही न कही कोई न कोई घेल मेल तो है,,,, अब वो घेल मेल क्या है उसे देखने के लिए हमें कुछ विद्वानों की ओर ताकना होगा और उनके कई शोध ग्रंथो को खगालना होगा ,,, यहाँ पर ये बहुत महत्व पूर्ण तथ्य है की हमारे जयादातर गर्न्थो का पुनर्मुद्रण और पुनर्संस्करण अग्रेजी शासन में हुआ और जयादातर अंग्रेज विद्वानों के द्बारा ही हुआ ,,, जिनका एक मात्र उद्देश्य भारत को गुलाम बनाना और भारतीय सभ्यता और संस्क्रती को नस्ट करना था,, कहीं कहीं पर उनका आल्प ज्ञान भी अर्थ को अनर्थ करने के लिए काफी था यथा

यत्पुरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते॥ (ऋग्वेद क्0.90.क्क्)


अर्थात बलि देने के लिए पुरुष को कितने भागो मे विभाजित किया गया? उनके मुख को क्या कहा गया, उनके बांह को क्या और इसी तरह उनकी जंघा और पैर को क्या कहा गया? इस श्लोक का अनुवाद राल्फ टी. एच. ग्रिफिथ ने भी कमो-बेश यही किया है।

रह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य कृ त:।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भयां शूद्रो अजायत॥ (ऋग्वेद क्0.90.क्ख्)


इस श्लोक का अनुवाद एचएच विल्सन ने पुरुष का मुख ब्राह्मण बना , बाहु क्षत्रिय एवं जंघा वैश्य बना एवं चरण से शूद्रो की उत्पत्ती हुई किया है। ठीक इसी श्लोक का अनुवाद ग्रिफिथ ने कुछ अलग तरह से ऐसे किया है- पुरुष के मुख मे ब्राह्मण, बाहू मे क्षत्रिय, जंघा मे वैश्य और पैर मे शूद्र का निवास है। इसी बात को आसानी से प्राप्त होने वाली दक्षिणा की मोटी रकम को अनुवांशिक बनाने के लिए कुछ स्वार्थी ब्राह्मणो द्वारा तोड़-मरोड़ कर मनुस्मृति मे लिखा गया कि चूंकि ब्राह्मणो की उत्पत्ती ब्रह्मा के मुख से हुई है, इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ है तथा शूद्रो की उत्पत्ती ब्रह्मा के पैर से हुई है इसलिए वह सबसे निकृष्ट और अपवित्र है।

मनुस्मृति के 5/132 वे श्लोक मे कहा गया है कि शरीर मे नाभि के ऊपर का हिस्सा पवित्र है जबकि नाभि से नीचे का हिस्सा अपवित्र है। जबकि ऋग्वेद मे इस तरह का कोई विभाजन नही है। इतना ही नही इस प्रश्न पर इतिहासकारो के भी अलग-अलग विचार है। संभवत: मनुस्मृति मे पुरुष के शरीर के इस तरह विभाजन करने के पीछे समाज के एक वर्ग को दबाने, बांटने की साजिश रही होगी। मनुस्मृति के श्लोक सं1.31 के अनुसार ब्रह्मा ने लोगो के कल्याण(लोकवृद्धि)के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र का क्रमश: मुख, बाहू, जंघा और पैर से निर्माण किया। जबकि ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के रचयिता नारायण ऋषि के आदेश इसके ठीक उलट है। उन्होने सरल तरीके से (10.90.11-12)यह बताया है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर से मुख, बाहू, जंघा और पैर अलग कर दिया जाए तो वह ब्रह्मा ही क्यो न हो मर जाएगा। अब जब येसा है तो मनु स्मरति के किन श्लोको को प्रमाणिक कहा जाए और किन्हें नहीं इसको ले कर बहुत लम्बी बहस हो सकती है,, परन्तु इसका उत्तर भी
मनु-स्मृति में ही छिपा है ,,,
मनुस्मृति मे श्लोक (II.6) के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। मनुस्मृति (II.13) भी वेदो की सर्वोच्चता को मानते हुए कहती है कि कानून श्रुति अर्थात वेद है। ऐसे मे तार्किक रूप से कहा जा सकता है कि मनुस्मृति की जो बाते वेदो की बातो का खंडन करती है, वह खारिज करने योग्य है। चारों वेदो के संकलनकर्ता/संपादक का ओहदा प्राप्त करने वाले तथा महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता और दूसरे सभी पुराणो के रचयिता महर्षि वेद व्यास ने स्वयं (महाभारत 1-V-4) लिखा है-

श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥


अर्थात जहां कही भी वेदो और दूसरे ग्रंथो मे विरोध दिखता हो, वहां वेद की बात की मान्य होगी। 1899 मे प्रोफेसर ए. मैकडोनेल ने अपनी पुस्तक ''ए हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर'' के पेज 28 पर लिखा है कि वेदो की श्रुतियां संदेह के दायरे से तब बाहर होती है जब स्मृति के मामले मे उनकी तुलना होती है। पेज 31 पर उन्होने लिखा है कि सामान्य रूप मे धर्म सूत्र भारतीय कानून के सर्वाधिक पुराने स्त्रोत है और वेदो से काफी नजदीक से जुड़े है जिसका वे उल्लेख करते है और जिन्हे धर्म का सर्वोच्च स्त्रोत स्थान हासिल है। इस तरह मैकडोनेल बाकी सभी धार्मिक पुस्तको पर वेदो की सर्वोच्चता को स्थापित मानते है। न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्य भी अपनी पुस्तक ''हिंदू लॉ एंड कांस्टीच्यूशन'' के पेज 16 पर लिखा है कि अगर श्रुति और स्मृति मे कही भी अंतर्विरोध हो तो तो श्रुति (वेद) को ही श्रेष्ठ माना जाएगा
,,
ऐसे मे मैकडोनेल सलाह देते है कि अच्छा होगा यदि स्मृति मे किसी बाहरी स्त्रोत के दावे/बयान को जांच लिया जाए। पर ब्रिटिश भारतीय अदालतो ने उनकी इस राय की उपेक्षा कर दी। साथ ही मनुस्मृति के वास्तविक विषय वस्तु के साथ भी खिलवाड़ किया गया जिसे ईस्ट इंडिया के कर्मचारी सर विलियम जोस ने स्वीकार किया है जिन्होने मनु स्मृति को हिंदुओ के कानूनी पुस्तक के रूप में ब्रिटिश भारतीय अदालतो मे पेश और प्रचारित किया था। मनुस्मृति मे ऐसे कई श्लोक है जो एक दूसरे के प्रतिलोम है और ये साबित करते है कि वास्तविक रचना के साथ हेरफेर किया गया है, उसमे बदलाव किया गया है। बरट्रेड रसेल ने अपनी पुस्तक पावर मे लिखा है कि प्राचीन काल मे पुरोहित वर्ग धर्म का प्रयोग धन और शक्ति के संग्रहण के लिए करता था। मध्य काल में यूरोप मे कई ऐसे देश थे जिसका शासक पोप की सहमत के सहारे राज्य पर शासनरत था। मतलब यह कि धर्म के नाम पर समाज के एक तबके द्वारा शक्ति संग्रहण भारत से इतर अन्य जगहो पर भी चल रहा था।

यहाँ पर इतना लम्बा चौडा लिखने और कई लेखको की
सहायता लेने का उद्देश्य यही है की पहले हमें मनु-स्मृति के श्श्लोको की प्रमाणिकता को सिद्ध करना होगा और प्रमाणिक श्लोको में अगर हमें कोई विरोधा भाष मिलता है और वो स्त्री विरोधी या समाज के किसी वर्ग विशेष के विरोधी मिलते है तो हमें निश्चित ही उनका विरोध करना चाहिए ,,, और मनु-स्मृति प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए हमारे पास केवल एक मात्र प्रमाणिक पुस्तक वेद ही है ,,, जिनकी साहयता से हम मनु-स्मृति के श्लोको की प्रमाणिकता जांच सकते है ,,,,, वैसे वैदिक समय में स्त्रियों की स्थिति क्या थी मै यहाँ लिखना चाहूंगा ,,,,,
ऋग्वेद की ऋचाओ मे लगभग 414 ऋषियो के नाम मिलते है जिनमे से लगभग 30 नाम महिला ऋषियो के है। इससे साफ होता है कि उस समय महिलाओ की शिक्षा या उन्हे आगे बढ़ने के मामले मे कोई रोक नही थी, उनके साथ कोई भेदभाव नही था। स्वयं भगवान ने ऋग्वेद की ऋचाओ को ग्रहण करने के लिए महिलाओ को पुरुषो के बराबर योग्य माना था। इसका सीधा आशय है कि वेदो को पढ़ने के मामले मे महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिया गया है। वैदिक रीतियो के तहत वास्तव मे विवाह के दौरान रस्मो मे ब्7 श्लोको के वाचन का विधान है जिसे महिला ऋषि सूर्या सावित्री को भगवान ने बताया था। इसके बगैर विवाह को अपूर्ण माना गया है। पर अज्ञानता के कारण ज्यादातर लोग इन विवाह सूत्र वैदिक ऋचाओं का पाठ सप्तपदी के समय नही करते है और विवाह एक तरह से अपूर्ण ही रह जाता है !



!! रामसेतु मानव निर्मित है या स्वनिर्मित है ??

 जब भी बात होती है भगवान् श्री राम की तो उस समय पर रावन और उनकी  लंका को भी याद करते है ,पर रावन की लंका जो समुद्र के बीचोबीच स्थित वहा तक श्री राम ने कैसे सेना पहुचाया होगा उद्ध के लिए ,तो याद आता है राम सेतु ! अब यहाँ पर कुछ सेकुलरवादी खासकर कांग्रेस पार्टी जो राम सेतु को कहती है की स्वनिर्मित है ,इसी बात कप केन्द्रित करते हुए यह ब्लॉग आप सभी को समर्पित है की राम सेतु स्वनिर्मित है या मानव निर्मित है ,पढ़ लो सेकुलरो जिनको संका हो राम सेतु को लेकर !
हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है। हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्‍‌न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह, नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है। इन खगोलीय स्थितियों की वास्तविक तिथियां 'प्लैनेटेरियम साफ्टवेयर' के माध्यम से जानी जा सकती है। भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' नामक साफ्टवेयर प्राप्त किया, जिससे सूर्य/ चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है। इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर की तारीखें निकाली है। इस प्रकार उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है। इन सबका अत्यंत रोचक एवं विश्वसनीय वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक 'डेटिंग द एरा ऑफ लार्ड राम' में किया है।
महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।
जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।
किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।
अतः सेकुलरो अब यह राग अपलापना बंद करो की राम सेतु स्वनिर्मित है मूर्खो भगवान् श्री राम को याद करो बुधि का विकाश होगा नहीं तो जीवन बहर बोट की राजनीत करते करते एक दिन मर जाओगे और ऊपर जाकर क्या जबाब दोगे ??     बोलो   !!!!जय जय श्री राम !!!!

बुधवार, 25 जनवरी 2012

!! गाली देने वालो फलो फूलो और अपने मिसन में कामयाब हो !!

! गाली की पीड़ा इस मार से भी अधिक घातक  है !
है न विचित्र किन्तु सत्य कि हम सब जानते हैं कि गाली देना बुरी बात है लेकिन गाली है कि मुँह से निकल ही जाती है। हमारा अपनी जुबान पर नियंत्रण ही नहीं रहता। पहले भी ब्याह-बारातों में ज्योनार के समय गाली गायी जाती थी लेकिन वह अधिकतर दूल्हे की माँ बहनो को बारात में नचाने का उपालंभ ही हुआ करता था। हम जब किसी को अपमानित करना चाहते हैं तो हमारा सबसे बड़ा हथियार गाली ही हुआ करता है। बचपन में हम भी कुत्ता, बेबकूफ, उल्लू, बदतमीज जैसी गालियां दिया करते थे और जब बहुत गुस्सा आता था तो मर जा, कट जा और तेरे हाथ पैर टूट जाए जैसी अनिष्टसूचक अथवा कोसने नुमा गाली गालियों का प्रयोग करते थे।
कुछ और समझदार हुए और बाहरी परिवेश से परिचय हुआ तो माँ-बहन की गाली कानों में सुनाई पड़ी। तब तक इन गालियों के गूढ़ार्थ पता नहीं हुआ करते थे। इसलिए बचपना में एक बार इस गाली का प्रयोग किया और माँ से खूब पिटाई भी खाई। सख्त हिदायत दी गई कि अब कभी ऐसे शब्द जुबान पर भी आये तो जुबान खींच ली जायेगी। बस इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप हो गया।जैसे-जैसे बड़े होते गए और समाज का हिस्सा बनते गए, देखा कि  कुछ सज्जनों  की भाषा में गालियां ऐसे सम्मिलित होने लगी जैसे दाल में तड़का। कई सज्जनों की बातें तो इन आलंकारिक शब्दों के बिना पूरी नहीं होती, तब बहुतदुख  होता था  पर हम कर क्या सकते थे, बहुत हुआ तो ऐसे लोगो  के आगे नहीं पड़ते थे, समझदारी आई तब जाना इन गालियों के मूल में स्त्री जाति और उसके पक्षधरों को अपमानित करने की मूल मंशा ही थी।(क्योकि सभी गालिया
स्त्री जाति के लिए ही बनी है ) साला और साली कितने मधुर रिश्ते होते हैं पर ये भी गाली के पर्याय होते चले गए और अब साला तो इतना फैशन में आ गया कि उसे गाली नहीं वरन बातचीत का जरूरी हिस्सा माना जाने लगा। लेकिन इसी रिश्ते का एक पहलू और था पति के भाई और बहन यानी देवर और ननद। ये रिश्ते सदैव पूजनीय रहे कभी गाली की कोटि में नहीं गिने गए। आखिर क्यों ? क्योंकि ये पति परमेश्वर के हिस्से जो थे और साला-साली उस बदनसीब के भाई-बहन। धीरे-धीरे इस साजिश ने एक और रूप अख्तियार कर लिया। पूरी की पूरी शक्ति औरतों के खिलाफ प्रयोग होने लगी। उनकी इज्जत के इतने चीथड़े बिखेरने के लिए एक गाली पर्याप्त होती और वह शर्म से मुंह छिपा बैठी। समय बदला और बराबरी की धुन में औरतों ने भी इसी हथियार का प्रयोग करना शुरू कर दिया पर वह यह भूल बैठी कि ये तो पुरुषों के द्वारा दी जाने वाली गालियां हैं हम अपनी गालियों का शास्त्र अलग बनाएं। कौन मेहनत करता सो उसी कोश से गालियां चुन ली गई ओरतो द्वारा और उनका धड़ल्ले से प्रयोग किया जाने लगा। बिना सोचे समझे कि इन सब गालियों से तो ओरत ही  अपमानित हो रही हैं। मेरा बहुत मन हुआ कि किसी ओरत से पुछु  अरे ये कैसा अनर्थ कर रही हो। भला अपने को भी कभी गाली दी जाती है पर बराबरी की होड़ में किसे ये सब फालतू बकबास सुनने की पड़ी थी। पुलिस का महकमा तो गालियों के बिना अधूरा ही है। और अब तो स्थिति यह है कि वे बच्चे जो इन गालियों की एबीसीडी भी नहीं जानते वे भी इन गालियों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। ऐसे कुछ बच्चों को मैंने जब कुछ समझाने की कोशिश की तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जबाव दिया कि ये खराब बात होती तो सब लोग क्यों देते। दुकान पर, चौराहे पर और घर पर ये गालियां तो उसके कानो में रोज ही पडती है। आखिर किस-किस से बचायेंगे आप। और बस हमने मान लिया है कि किसी को डराने-धमकाने के लिए दो-चार भद्दी गालियों का प्रयोग कर दो। सज्जन तो ऐसा भाग खड़ा होगा जैसे गधे के सिर से सींग और भले घर की लड़कियां तो उस माहौल से बचना ही सुरक्षित मानेगी। और भला मानुष तो बेचारे की तरह अपनी बेचारीपन पर या सीधेपन पर चुपचाप किसी कोने में बैठकर मन की भड़ास निकलने के लिए रो कर मन को हल्का कर लेगा और बेसरम की तरह फिर से समाज में आ जाएगा जैसे की मैं खुद भी यही करता हु ! पर यही दुःख दोगुना हो जाता है जब लोग मुझे और मेरी भावनाओं को नहीं समझते और गाली देने वालो का साथ देते है ! गाली हमेशा से ही कमजोरी की निसानी रही है पर मेरे कुछ मित्र इन गालियों को मजबूती के रूप में देखते है और अपनी मर्दानगी इन गालियों के माध्यम से दिखाते है समाज में और इंटरनेट में ! टीक है भगवान् भला करे उन गाली देने वालो का और कोई अच्छा मर्द मिल जाए गलियों का उस्ताद तब पता चलेगा की शेर के भी सवा शेर होते है !

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

!!खजुराहो के मंदिरों में नग्न मुर्तिया क्यों ?

http://www.bhaskar.com/article/c-58-1881635-NOR.html?seq=2&HF-9=
सदियों  से एक अनसुलझा पहलु है की आखिर अजन्ता एलोरा की गुफाओ में खजुराहो की मंदिरों में इस प्रकार की नग्न कलाकृत का निर्माण क्यों हुआ है ? जबके समाज में इस प्रकार के नग्न चित्र भी देखना पाप और अमर्यादित मना जाता है ,फिर खले आम इस प्रकार के मंदिरों का निर्माण का क्या ओचित्य है ?कलाकरी का उत्क्रिस्ट नमूना है खजुराहो की मुर्तिया!
खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाके कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी जुंबिश नज़र आती है।तंत्र ने सेक्‍स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर सबूत है। कभी आप खजुराहो की मूर्तियों देखी। तो आपको दो बातें अदभुत अनुभव होंगी। पहली तो बात यह है कि नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि उन में जरा भी कुछ गंदा है। जरा भी कुछ अग्‍ली है। नग्‍न मैथुन की प्रतिमाओं को देख कर कहीं भी ऐसा नहीं लगेगा कि कुछ कुरूप है; कुछ गंदा है, कुछ बुरा है। बल्‍कि मैथुन की प्रतिमाओं को देखकर एक शांति, एक पवित्रता का अनुभव होगा जो बड़ी हैरानी की बात है। वे प्रतिमाएं आध्‍यात्‍मिक सेक्‍स को जिन लोगों ने अनुभव किया था, उन शिल्‍पियों से निर्मित करवाई गई है।उन प्रतिमाओं के चेहरों पर……आप एक सेक्‍स से भरे हुए आदमी को देखें, उसकी आंखें देखें,उसका चेहरा देखें, वह घिनौना, घबराने वाला, कुरूप प्रतीत होगा। उसकी आंखों से एक झलक मिलती हुई मालूम होगी। जो घबराने वाली और डराने वाली होगी। प्‍यारे से प्‍यारे आदमी को, अपने निकटतम प्‍यारे से प्‍यारे व्‍यक्‍ति को भी स्‍त्री जब सेक्‍स से भरा हुआ पास आता हुआ देखती है तो उसे दुश्‍मन दिखाई पड़ता है, मित्र नहीं दिखाई पड़ता। प्‍यारी से प्‍यारी स्‍त्री को अगर कोई पुरूष अपने निकट सेक्‍स से भरा हुआ आता हुआ दिखाई देगा तो उसे आसे भीतर नरक दिखाई पड़ेगा, स्‍वर्ग नहीं दिखाई पड़ सकता।लेकिन खजुराहो की प्रतिमाओं को देखें तो उनके चेहरे को देखकर ऐसा लगता है, जैसे बुद्ध का चेहरा हो, महावीर का चेहरा हो, मैथुन की प्रतिमाओं और मैथुन रत जोड़े के चेहरे पर जो भाव है, वे समाधि के है, और सारी प्रतिमाओं को देख लें और पीछे एक हल्‍की-सी शांति की झलक छूट जाएगी और कुछ भी नहीं। और एक आश्‍चर्य आपको अनुभव होगा।आप सोचते होंगे कि नंगी तस्‍वीरें और मूर्तियां देखकर आपके भीतर कामुकता पैदा होगी,तो मैं आपसे कहता हूं, फिर आप देर न करें और सीधे खजुराहो चले जाएं। खजुराहो पृथ्‍वी पर इस समय अनूठी चीज है। आध्यातिमिक  जगत में उस से उत्‍तम इस समय हमारे पास और कोई धरोहर उस के मुकाबले नहीं बची है।लेकिन हमारे बिद्वान पुरष पुरूषोतम दास टंडन और उनके कुछ साथी इस सुझाव के थे कि खजुराहो के मंदिर पर मिटटी छाप कर दीवालें बंद कर देनी चाहिए, क्‍योंकि उनको देखने से वासना पैदा हो सकती है। खजुराहो के मंदिर जिन्‍होंने बनाए थे, उनका ख्‍याल यह था कि इन प्रतिमाओं को अगर कोई बैठकर घंटे भर देखे तो वासना से शून्‍य हो जाएगा। वे प्रतिमाएं आब्‍जेक्‍ट फार मेडि़टेशन रहीं हजारों वर्ष तक वे प्रतिमाएं ध्‍यान के लिए आब्‍जेक्‍ट का काम करती रही। जो लोग अति कामुक थ, उन्‍हें खजुराहो के मंदिर के पास भेजकर उन पर ध्‍यान करवाने के लिए कहा जाता था। कि तुम ध्‍यान करों—इन प्रतिमाओं को देखो और इनमें लीन हाँ जाओ।अगर मैथुन की प्रतिमा को कोई घंटे भर तक शांत बैठ कर ध्‍यानमग्‍न होकर देखे तो उसके भीतर जो मैथुन करने का पागल भाव है, वह विलीन हो जाता है।कुछ बिद्वानो का तो ऐसा मानना है की खजुराहो के मंदिर या कोणार्क और पुरी के मंदिर जैसे मंदिर सारे देश के गांव-गांव में होने चाहिए।बाकी मंदिरों की कोई जरूरत नहीं है। वे बेवकूफी के सबूत है, उनमें कुछ नहीं है। उनमें न कोई वैज्ञानिकता है, न कोई अर्थ, न कोई प्रयोजन है।  लेकिन खजुराहो के मंदिर जरूर अर्थपूर्ण है।जिस आदमी का भी मन सेक्‍स से बहुत भरा हो, वह जाकर इन पर ध्‍यान करे और वह हल्‍का लौटेगा शांत लोटेगा। तंत्रों ने जरूर सेक्‍स को आध्‍यात्‍मिक बनाने की कोशिश की थी।एक गृहस्थ के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना उत्पन्न होती है | संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, यही दो हमारे जीवन के लक्ष्य के सोपान हैं | कोणार्क, पूरी, खजुराहो, तिरुपति आदि के देवालयों मैं मिथुन मूर्तियों का अंकन मानव जीवन के लक्ष्य का प्रथम सोपान है | इसलिए इसे मंदिर के बहिर्द्वार पर ही अंकित/प्रतिष्ठित किया जाता है | द्वितीय सोपान मोक्ष की प्रतिष्ठा देव प्रतिमा के रूप मैं मंदिर के अंतर भाग मैं की जाती है | प्रवेश द्वार और देव प्रतिमा के मध्य जगमोहन बना रहता है, ये मोक्ष की छाया प्रतिक है | मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रिय रस युक्त मिथुन मूर्तियाँ देव दर्शनार्थी को आनंद की अनुभूतियों को आत्मसात कर जीवन की प्रथम सीढ़ी - काम तृप्ति - को पार करने का संकेत कराती है ये मिथुन मूर्तियाँ दर्शनार्थी को ये स्मरण कराती है की जिस व्यक्ती ने जीवन के इस प्रथम सोपान ( काम तृप्ति ) को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन - मोक्ष के द्वितीय सोपान पर पैर रखने का अधिकारी नहीं | दुसरे शब्दों मैं कहें तो देवालयों मैं मिथुन मूर्तियाँ मंदिर मैं प्रवेश करने से पहले दर्शनार्थीयों से एक प्रश्न पूछती हैं - "क्या तुमने काम पे विजय पा लिया?" उत्तर यदि नहीं है, तो तुम सामने रखे मोक्ष ( देव प्रतिमा ) को पाने के अधिकारी नहीं हो | ये मनुष्य को हमेशा इश्वर या मोक्ष को प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है | मंदिर मैं अश्लील भावों की मूर्तियाँ भौतिक सुख, भौतिक कुंठाओं और घिर्णास्पद अश्लील वातावरण मैं भी आशायुक्त आनंदमय लक्ष्य प्रस्तुत करती है | भारतीय कला का यह उद्देश्य समस्त विश्व के कला आदर्शों , उद्देश्यों एवं व्याख्या मानदंड से भिन्न और मौलिक है |

प्रश्न किया जा सकता है की मिथुन चित्र जैसे अश्लील , अशिव तत्वों के स्थान पर अन्य प्रतिक प्रस्तुत किये जा सकते थे/हैं ? - ये समझना नितांत भ्रम है की मिथुन मूर्तियाँ , मान्मथ भाव अशिव परक हैं | वस्तुतः शिवम् और सत्यम की साधना के ये सर्वोताम माध्यम हैं | हमारी संस्कृति और हमारा वाड्मय इसे परम तत्व मान कर इसकी साधना के लिए युग-युगांतर से हमें प्रेरित करता आ रहा है –


मैथुनंग परमं तत्वं सृष्टी स्थित्यंत कारणम्

मैथुनात जायते सिद्धिब्रह्म्ज्ञान सदुर्लाभम |

देव मंदिरों के कमनीय कला प्रस्तरों मैं हम एक ओर जीवन की सच्ची व्याख्या और उच्च कोटि की कला का निर्देशन तो दूसरी ओर पुरुष प्रकृति के मिलन की आध्यात्मिक व्याख्या पाते हैं | इन कला मूर्तियों मैं हमारे जीवन की व्याख्या शिवम् है , कला की कमनीय अभिव्यक्ती सुन्दरम है , रस्यमय मान्मथ भाव सत्यम है | इन्ही भावों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि वात्सयायन मैथुन क्रिया, मान्मथ क्रिया या आसन ना कह कर इसे 'योग' कहा है |लेकिन इस मुल्‍क के नीति शास्त्री और मारल प्रीचर्स है उन दुष्‍टों ने उनकी बात को समाज तक पहुंचने नहीं दिया।मेरा चारों तरफ विरोध को कोई और कारण थोड़े ही है। लेकिन मैं न इन राजनितिगों से डरता हूं और न इन नीतिशास्‍त्रीयों से। जो सच है वो में कहता रहूंगा। उस की चाहे मुझे कुछ भी कीमत क्‍यों न चुकानी पड़े।मुझे पता है की मेरे बहुत से दोस्त यह सोचते होगे की आखिर सर को क्या हो गया जो इस प्रकार बाते अपने ब्लॉग में लिख रहे है पर मन में जो भाव पैदा हुए है वह लिख दिया ....
नोट --आप सभी एक बार खजुराहो के मंदिरों का दर्शन  जरुर करे ,मूर्ति कला का ऐसा संग्रह संसार में सायद ही कही देखने को मिले --!!

!!उफ्फ ! यह जाति की दीवार आखिर कब तक ???

कहते हैं ‘Truth is stranger than Fiction ‘ .इस घटना पर यह उक्ति पूर्णतः खरी उतरती है.
काफी पहले की घटना है,मेरे गाँव से एक छोटे से लड़के को एक उच्च वर्ग वाले अपने शहर नौकर के तौर पर ले गए.उन दिनों ऐसा चलन सा था.पिता खेतों में काम करता और उनके बच्चे शहरों में किसी ना किसी के घर नौकर बन कर जाते.अब तो यह चलन समाप्तप्राय है.नयी पीढ़ी के नौजवान खुद ही पंजाब,असाम जाकर मजदूरी करते हैं. पर बीवी बच्चों को आराम से रखते हैं.
खैर, ऐसे ही हमारे ‘शालिक काका’ का बेटा ‘शिव ज्योति ‘ किसी के साथ शहर गया और दो दिनों बाद ही वहाँ से भाग निकला.उसे ना शहर का नाम पता था,ना अपने घर का पता और वह गुम हो गया.गाँव में जब पता चला तो बहुत हंगामा मचा.उन महाशय के घर के सामने शालिक काकी (हम उन्हें यही,कहते थे) ने जाकर बहुत गालियाँ दीं.उन दिनों ऐसा ही करते थे,जिस से नाराजगी हो उसके घर के सामने जाकर चिल्ला चिल्ला कर खूब गालियाँ दीं जाती थीं.और बाकी पूरा गाँव तमाशा देखता था.’शालिक काका’ ने भी अपने बाल और  दाढ़ी,मूंछ बढा ली थी . लोग कहते , उन्होंने कसम खाई है कि जिस शख्स की वजह से उनका बच्चा गुम हो गया है., उसका क़त्ल करने के बाद ही कटवाएँगे. उन महाशय का, जो ‘शिव ज्योति ‘ को गाँव से लेकर गए थे का गाँव आना बंद हो गया.
इसके बाद तो इतनी अफवाहें उड़ने लगीं, जितनी धूल भी किसी  कच्ची मिटटी पर चलती कोई बस भी क्या उड़ाएगी .रोज नए किस्से.कोई कहता,  शिव ज्योति (वैसे उसके नाम का सही उच्चारण कोई नहीं  करता…कुछ लोग ‘सिजोती’ कहते पर ज्यादातर लोग ‘सिजोतिया’ ही कहते)  को सर्कस में देखा है,कोई कहता किसी बाज़ार में तो कोई कहता किसी प्लेटफ़ॉर्म पर.ढोंगी बाबाओं की भी खूब बन आई.पता बताने के बहाने उस गरीब से खूब रुपये ऐंठते.!ऐसे ही एक बार गाँव में साधुओं का एक दल आया. उसमे से एक किशोर साधू का चेहरा थोडा बहुत शिव ज्योति से मिलता था. फिर क्या पूरा गाँव उसके पीछे.संयोग से मैं भी उन दिनों गाँव गयी हुई थी.बड़े भाई’ राम ज्योति’ ने उस साधू का हाथ कस कर पकड़ रखा था.हमारे गाँव में उस जाति विशेष में कुछ ऐसी ही प्रथा थी.,बड़े बेटे का नाम ‘राम’ पर रखते और छोटे बेटे का ‘शिव’ पर . गाँव के सारे बच्चे, बड़े उसे घेर कर खड़े.सैकड़ों सवाल उस से पूछे जाते.और हर सवाल का मतलब अपनी तरह से लोग निकाल लेते.उस से पूछा “ये पास वाले खेत किसके हैं.?”..उसने कहा,”मालिक के”..और पूरा गाँव अश अश कर उठा क्यूंकि मेरे दादाजी को सबलोग मालिक कह कर बुलाते थे.आस पास के खेत उनके ही थे.ऐसे ही उसके शरीर पर के सारे चिन्ह लोगों को शिव ज्योति से मिलते जुलते लगे,दिन भर यह तमाशा होता रहा.हार कर उसने मान लिया कि वही ‘शिव ज्योति’ है और कहा” ठीक है,चलो घर चलता हूँ”.घर जाकर उसने खाना खाया अच्छे से बातें कीं और जब सब लोग सो गए तो रात के अँधेरे में उठ कर भाग निकला.उस फूस की झोपडी में कोई मजबूत दरवाजे और ताले तो थे नहीं.,सबने शालिक काका को समझाया जाने दो ,वो साधू बन गया है.संसार त्याग दिया है.अब उसे घर बार का मोह नहीं.शालिक काका ने भी अपनी जटा से निजात पा ली.और अब उनके बेटे को यहाँ वहाँ देखने के किस्से भी बंद हो गए.उन ढोंगी बाबाओं को जरूर तकलीफ हुई होगी.
काफी सालों बाद,संयोग से मैं गाँव में ही था .उन्ही दिनों एक १७,१८ साल का एक सुन्दर नवयुवक अच्छे शर्ट पेंट,जूते पहने एक सज्जन के साथ नमूदार हुआ.उस से नाम और परिचय पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ी क्यूंकि वह अपने भाई की कार्बन कॉपी लग रहा था.पूरे गाँव में शोर मच गया.
हमारे घर के बाहर के बरामदे में उसे कुर्सी दी गयी बैठने को,जबकि उसके पिता और भाई जिंदगी भर जमीन पर ही बैठते आए थे.पर वेश भूषा को ही तो इज्जत मिलती है.उस सज्जन ने बताया कि बरसों पहले वह लड़का उन्हें अपनी मिठाई की दुकान के पास बैठा मिला था.जब दो तीन दिन लगातार उसे एक ही जगह पर बैठा देखा तो पूछताछ की पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था.उन्हें दया आ गयी और दुकान पर छोटे मोटे काम के लिए रख लिया.धीरे धीरे उस से अपनापन हो गया और अपने बेटे जैसा मानने लगे.उसे स्कूल भी भेजा.पर उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी.
इन सज्जन की एक बेटी थी…अब ये सोचने लगे कि शिवज्योति की शादी अपनी बेटी से कर दें.पर अपने देश में शादी में सबसे पहले देखी जाती है ‘जाति’.और उन्हें इस लड़के की जाति का कुछ पता नहीं.लड़के को अपना घर तक याद नहीं.उसे सिर्फ इतना याद था कि उसके गाँव के स्टेशन का नाम ‘डभौरा’(मेरे गाव से ११ किलोमीटर दूर है उत्तरप्रदेश के बार्डर पर) है और स्टेशन से थोड़ी ही दूर पर एक बरगद का पेड़ है.और पेड़ के सामने उसके मामा का घर.इतने से सूत्र से वे महाशय ढूंढते हुए सही जगह पहुँच गए.उन्हें लगा बरगद का पेड़ हर जगह तो नहीं होता.और उनका सोचना सही ही था.पर इसके बाद जो कुछ भी हुआ…वह कल्पना से परे है.शालिक काका लड़के वाले बन गए और उन महाशय से जब जाति पूछी तो उनकी जाति शालिक काका की जाति से नीची थी.बस इनके भाई बन्धु सब कहने लगे नीचे घर की लड़की(मतलब उसकी साडी किस जाति में करेगे) कैसे घर में लायेंगे?? मेरे दादाजी प्रगतिशील विचारों वाले थे .उन्होंने समझाने की बहुत कोशिश की.पर "शालिक काका" की बड़ी बड़ी काल्पनिक मूंछे निकल आई थीं.और उसपे ताव देते हुए, वे बेटे के बाप के गुरूर में मदमस्त थे. शिव ज्योति भी अपने आपको इतने लोगों के आकर्षण का केंद्र बना देख, उन सज्जन के किये सारे अहसान भुला बैठा.और बिलकुल श्रवण कुमार बन गया .नीची निगाह किये यही कहता रहता,’जो ये लोग बोलें’.जैसे आजकल के लड़के दहेज़ लेने के नाम पर श्रवण कुमार बन जाते हैं और सर झुकाए कहते हैं,”‘हमें तो कुछ नहीं चाहिए,माता-पिता जानें”.वे सज्जन,आँखों में आंसू भरे वापस लौट गए.
कुछ दिन तो शिव ज्योति गाँव का हीरो बना घूमता रहा.हर बड़े घर वाले लोग उसे अपने घर बुलाते .कुर्सी पर बिठाते,सारी कहानी सुनते.
घर की महिलाएं भी उसे आँगन में बुला उसकी खूब खातिर तवज्जो करतीं. पर कुछ ही दिन चला ये.सब फिर सबलोग अपने काम में मशगूल हो गए.शिवज्योति को गाँव का कठिन जीवन रास नहीं आया और वह बगल के शहर भाग गया और वहाँ अब रिक्शा खींचने लगा.पर क्यों ??
इस जाति की दीवार ने उस से एक अच्छे जीवन का सुख हर लिया.वाह रे जाति की दीवार !!
नोट --सत्य घटना पर आधारित एक कहानी है यह !!

!!हम गणतंत्र दिवस में खुसिया क्यों मनाये ???

आज के माहौल को देखकर, कुछ पंक्तियाँ (शायद “निराला” जी की) साझा कर रहा हूँ |
जाने क्या क्या है छुपा हुआ,
                         सरकार तुम्हारी आँखों में |
झलका करता है, राम-राज्य का. 
                        प्यार तुम्हारी आँखों में |
मनचाही मांगीं जमानते,
                       मन चाहा, तब धावा बोल दिया |
’सी सम-सम” ताला बंद हुआ,
                       ’सी सम-सम” ताला खोल दिया |
चालीस चोर का खेल प्रेस-
                      अखबार तुम्हारी आँखों में |
गहन मंथन के बाद दो वर्ष ग्यारह महीना व अठारह दिन में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े संविधान की रचना की गयी, जिसे 26 जनवरी 1950 को देश में विधिवत लागू कर दिया गया। संविधान का मूल स्वरूप वास्तव में उत्तम ही है, क्योंकि संविधान की रचना के दौरान रचनाकारों के मन में जाति या धर्म नहीं थे। उन्होंने जाति-धर्म दरकिनार कर देश के नागरिकों के लिए एक श्रेष्ठ संविधान की रचना की। तभी नागरिकों को समानता का विशेष अधिकार दिया गया, लेकिन संविधान में आये दिन होने वाले संशोधन मूल संविधान की विशेषता को लगातार कम करते जा रहे हैं। माना जा सकता है कि देश की आजादी के दौरान कुछ जातियों के लोगों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी, तभी डा. भीमराव अंबेडकर ने बेहद कमजोर सामाजिक या आर्थिक स्थिति वाले जाति वर्ग को एक दशक तक आरक्षण देने का सुझाव रखा, जिसे बेहद जरूरी मानते हुए मान लिया गया, लेकिन अब वही आरक्षण व्यवस्था घृणित राजनीति का शिकार होती जा रही है।

संविधान के अनुसार नागरिकों को समानता का अधिकार मिला हुआ है, जिसके अनुसार जाति व वंश के आधार पर कोई श्रेष्ठ या हीन नहीं है। देश या कानून की नजर में सब एक समान ही हैं, लेकिन आरक्षण की व्यवस्था ने इस अधिकार के मायने ही बदल दिये हैं। समानता के अधिकार के बीच स्पष्ट रूप से आरक्षण व्यवस्था आड़े आने लगी है। आरक्षण का मूल उदेद्श्य समाज के दबे-कुचले लोगों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुदृढ़ कर समतामूलक समाज की स्थापना करना ही था, लेकिन अब वही आरक्षण गंभीर समस्या बनती रहती है, वहीं आरक्षण का लाभ आरक्षण के दायरे में आने वाली सभी जातियों के सभी लोगों को भी नहीं मिल पा रहा है। भ्रष्टाचार का राक्षस इतना प्रभावी हो गया है कि आरक्षण का लाभ संबधित जातियों के दस या पन्द्रह प्रतिशत धनाढ्य लोग ही उठा पा रहे हैं, साथ ही आरक्षण विहीन जातियों के लोगों को लगने लगा है कि आरक्षण के चलते उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

आरक्षण से समाज के किसी वर्ग को कोई आपत्ति न थी और न है, पर घृणित राजनीति के चलते किसी न किसी राज्य में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति व पिछड़े वर्ग में एक-दो जाति को और शामिल कर दिये जाने का क्रम चलता ही रहता है, जिससे सामान्य वर्ग में सवर्ण कही जाने वाली कुछेक अंगुलियों पर गिनने लायक ही जातियां बची हैं और जो बची हैं, उनमें भी उनके जातिगत संगठन या राजनीतिक दल आरक्षण के दायरे में लाने की मांग करते देखे जा सकते हैं और हो सकता है, एक दिन बाकी बची जातियों को भी आरक्षण के दायरे में शामिल करा दिया जाये, ऐसे में सिर्फ ब्राह्मण, ठाकुर व वैश्य ही बचेंगे, जबकि आज के आंकड़े बताते हैं कि अब इन तीनों जातियों या सामान्य वर्ग में आने वाली सभी जातियों की भी आर्थिक या सामाजिक स्थिति सुदृढ़ नहीं है।

सवाल यह भी उठता है कि एक ओर केन्द्र व राज्य सरकारें, तमाम राजनीतिक दल, दलित नेता एवं तमाम बुद्धिजीवी वर्ण व्यवस्था के तहत चली आ रही जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं और दूसरी ओर उसी जाति व्यवस्था के तहत आरक्षण दिया जा रहा है, ऐसे में जातिगत आधार पर दूरियां बढऩे के साथ नफरत बढऩी स्वाभाविक ही है। आरक्षणविहीन सामान्य वर्ग में आने वाली जातियों के लोगों को अब यह लगने लगा है कि आरक्षण के चलते उन्हें पीछे धकेलने का प्रयास किया जा रहा है, तभी कई जगह कुछ जातियों के लोगों का आक्रोश आंदोलन के रूप में सामने आ जाता है। राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर चलने वाले आंदोलन का भयावह रूप दिख ही जाता है। इससे केन्द्र सरकार के साथ देश के बाकी राज्यों की सरकारों को भी सबक लेना चाहिए, क्योंकि यह आक्रोश बाकी जातियों के अंदर भी सुलगता देखा जा सकता है, जो कभी भी निकल कर बाहर आ सकता है। गृह युद्ध जैसे हालात उत्पन्न होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए समय रहते केन्द्र व राज्य सरकारों को आरक्षण के मुद्दे पर गहन मंथन कर लेना चाहिए और जाति व्यवस्था के तहत दिये जा रहे आरक्षण को गरीबी के आधार पर तत्काल परिवर्तित कर देना चाहिए, इससे कई अन्य तरह की समस्याओं पर भी स्वत: ही विराम लग जायेगा।

मूल संविधान कहता है कि किसी जाति या वंश में जन्मा व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं है। हर नागरिक भारतीय है और सभी के अधिकार समान हैं, तभी भारतीय हर्ष पूर्वक वर्षगांठ के रूप में प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस मनाते आ रहे हैं और मूल संविधान की वर्षगांठ मनानी भी चाहिए, जबकि संशोधित संविधान किसी-किसी को अहम घोषित करता स्पष्ट नजर आ रहा है। गाली, मारपीट, हत्या या किसी भी तरह की घटना पर दो तरह के कानून स्पष्ट नजर आ रहे हैं। जाति के आधार पर ही अलग-अलग धारायें लगाने का प्रावधान है, इतना ही नहीं जाति के आधार पर ही रोजगार तक के अवसर दिये व छीने जा रहे हैं। लोकतंत्र भी कहने को ही बचा है, क्योंकि जनप्रतिनिधि चुनने की भी आजादी छीन ली गयी है। जाति के आधार पर जनप्रतिनिधि चुनने का भी कानून बना दिया गया है, ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि जाति के आधार पर दिये जा रहे आरक्षण के चलते जिन जातियों के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है, वह गणतंत्र दिवस क्यूं मनायें ?

सोमवार, 23 जनवरी 2012

!! प्रभु ईशू के अज्ञात जीवन का रहस्‍य और भगवान् बुध्ध के उपदेशो का प्रभाव !!

जीसस पूर्णत: संबुद्ध थे किंतु वे ऐसे लोगों में रहते थे जो संबोधि या समाधि के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए जीसस को ऐसी भाषा का प्रयोग करना पडा जिससे यह गलतफहमी हो जाती है कि वे संबुद्ध नहीं थे। प्रबुद्ध नहीं थे। वे दूसरी किसी भाषा का प्रयोग कर भी नहीं सकते। बुद्ध की भाषा इनसे बिलकुल भिन्‍न है। बुद्ध ऐसे शब्‍दों का प्रयोग कभी नहीं कर सकते  कि ‘’मैं परमात्‍मा का पुत्र हूं।’’ वे ‘’पिता’’ और ‘’पुत्र’’ जैस शब्‍दों का प्रयोग नहीं करते क्‍योंकि ये शब्‍द व्‍यर्थ है। परंतु जीसस करते भी क्‍या। जहां वे बोल रहे थ वहां के लोग इसी प्रकार की भाषा को समझते थे । बुद्ध की भाषा अलग है क्‍योंकि वे बिलकुल अलग प्रकार के लोगों से बात कर रहे थे।
जीसस बुद्ध से अनेक प्रकार से संबंधित थे। ईसाइयत इसके बारे में बिलकुल बेखबर है कि जीसस निरंतर तीस वर्ष तक कहां थे? वे अपने तीसवें साल में अचानक प्रकट होते है और तैंतीसवें साल में तो उन्‍हें सूली पर चढ़ा दिया जाता है। उनका केवल तीन साल का लेखा जोखा मिलता है। इसके अतिरिक्‍त एक या दोबार उनकी जीवन-संबंधी घटनाओं का उल्‍लेख मिलता है। पहला तो उस समय जब वे पैदा हुए थे—इस कहानी को सब लोग जानते है। और दूसरा उल्‍लेख है जब सात साल की आयु में वे एक त्‍यौहार के समय बड़े मंदिर में जाते है। बस इन दोनों घटनाओं का ही पता है। इनके अतिरिक्‍त तीन साल तक वे उपदेश देते रहे। उनका शेष जीवन काल अज्ञात है। परंतु भारत के पास उनके जीवन काल से संबंधित अनेक परंपराएं है।
इस अज्ञातवास में वे काश्‍मीर के एक बौद्ध विहार में थे। इसके अनेक रिकार्ड मिलते है। और काश्‍मीर की जनश्रुतियों में भी इसका उल्‍लेख है। इस अज्ञातवास में वे बौद्ध भिक्षु बनकर ध्‍यान कर रहे थे। अपने तीसवें वर्ष में वे जेरूसलेम में प्रकट होते है—इसके बाद इनको सूली पर चढ़ा दिया जाता है। ईसाईयों की कहानी के अनुसार जीसस का पुनर्जन्‍म होता है। परंतु प्रश्‍न यह है कि इस पुनर्जन्‍म के बाद दोबारा वे कहां गायब हो गये। ईसाइयत इसके बारे में बिलकुल मौन है। कि इसके बाद वे कहां चले गए और उनकी स्‍वाभाविक मृत्‍यु कब हुई।
अपनी पुस्‍तक ‘’दि सर्पेंट ऑफ पैराडाइंज’’, में एक फ्रांसीसी लेखक कहता है कि काई नहीं जानता कि जीसस तीस साल तक कहां रहे और क्‍या करते रह? अपने तीसवें साल में उन्‍होंने उपदेश देना आरंभ किया। एक जनश्रुति के अनुसार इस समय वे ‘’काश्‍मीर’’ में थे। काश्‍मीर का मूल नाम है। ‘’का’’ अर्थात ‘’जैसा’’, बराबर, और ‘’शीर’’ का अर्थ है ‘’सीरिया’’।
निकोलस नाटोविच नामक एक रूसी यात्री सन 1887 में भारत आया था। वह लद्दाख भी गया था। और जहां जाकर वह बीमार हो गया था। इसलिए उसे वहां प्रसिद्ध ‘’हूमिस-गुम्‍पा‘’ में ठहराया गया था। और वहां पर उसने बौद्ध साहित्‍य और बौद्ध शस्‍त्रों के अनेक ग्रंथों को पढ़ा। इनमें उसको जीसस के यहां आने के कई उल्‍लेख मिले। इन बौद्ध शास्‍त्रों में जीसस के उपदेशों की भी चर्चा की गई है। बाद में इस फ्रांसीसी यात्री ने ‘’सेंट जीसस’’ नामक एक पुस्‍तक भी प्रकाशित की थी। इसमे उसने उन सब बातों का वर्णन किया है जिससे उसे मालूम हुआ कि जीसस लद्दाख तथा पूर्व के अन्‍य देशों में भी गए थे।
ऐसा लिखित रिकार्ड मिलता है कि जीसस लद्दाख से चलकर, ऊंची बर्फीला पर्वतीय चोटियों को पार करके काश्‍मीर के पहल गाम नामक स्‍थान पर पहुंच। पहल गाम का अर्थ है ‘’गड़रियों का गांव’’ पहल गाव में वे अपने लोगों के साथ लंबे समय तक रहे। यही पर जीसस को ईज़राइल के खोये हुए कबीले के लोग मिले। ऐसा लिखा गया है कि जीसस के इस गांव में रहने के कारण ही इस का नाम ‘’पहल गाव’’ रखा गया। कश्‍मीरी भाषा में ‘’पहल’’ का अर्थ है गड़रिया और गाम का अर्थ गांव। इसके बाद जब जीसस श्रीनगर जा रहे थे तो उन्‍होंने ‘’ईश-मुकाम’’ नामक स्‍थान पर ठहर कर आराम किया था और उपदेश दिये थे। क्‍योंकि जीसस ने इस जगह पर आराम किया इसलिए उन्‍हीं के नाम पर इस स्‍थान का नाम हो गया ‘’ईश मुकाम’’।
जब जीसस सूली पर चढ़े हुए थे तो उस समय एक सिपाही ने उनके शरीर में भाला भोंका तो उसमे से पानी और खून निकला। इस घटना को सेंट जॉन की गॉस्‍पल (अध्‍याय 19 पद्य 34) में इस प्रकार रिकार्ड किया गया है कि ‘’एक सिपाही ने भाले से उनको एक और से भोंका और तत्‍क्षण खून और पानी बाहर निकला।‘’ इस घटना से ही यह माना गया है कि जीसस सूली पर जीवित थे क्‍योंकि मृत शरीर से खून नहीं निकल सकता।
जीसस को दोबारा मरना ही होगा। या तो सूली पूरी तरह से लग गई और वे मर गए या फिर समस्‍त ईसाइयत ही मर जाती। क्‍योंकि समस्‍त ईसाइयत उनके पुनर्जन्‍म पर निर्भर करती है। जीसस पुन जीवित होते है और यही चमत्‍कार बन जाता है। अगर ऐसा न होता तो यहूदियों को यह विश्‍वास ही न होता कि वे पैगंबर है क्‍योंकि भविष्‍यवाणी में यह कहा गया था कि आने वाले क्राइस्‍ट को सूली लगेगी और फिर उसका पुनर्जन्‍म होगा।
इसलिए उन्‍होंने इसका इंतजार किया। उनका शरीर जिस गुफा में रखा गया था वहां से वे तीन दिन के बाद गायब हो गया। इसके बाद वे देखे गए—कम से कम आठ लोगों न उनको नए शरीर में देखा। फिर वे गायब हो गए। और ईसाइयत के पास ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है कि जिससे मालूम हो कह वे कब मरे।
जीसस फिर दोबारा काश्‍मीर आये और वहां पर 112 वर्ष की आयु तक जीवित रहे। और वहां पर अभी भी वह गांव है जहां वे मरे।
अरबी भाषा में जीसस को ‘’ईसस’’ कहा गया है। काश्‍मीर में उनको ‘’यूसा-आसफ़’’ कहा जाता था। उनकी कब्र पर भी लिखा गया है कि ‘’यह यूसा-आसफ़ की कब्र है जो दूर देश से यहां आकर रहा’’ और यहाँ भी संकेत मिलता है कि वह 1900साल पहले आया।
‘’सर्पेंट ऑफ पैराडाइंज’’ के लेखक ने भी इस कब्र का देखा। वह कहता है कि ‘’जब मैं कब्र के पास पहुंचा तो सूर्यास्‍त हो रहा था और उस समय वहां के लोगों और बच्‍चों के चेहरे बड़े पावन दिखाई दे रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वे प्राचीन समय के लोग हों—संभवत: वे ईज़राइल की खोई हुई उस जाति से संबंधित थे जो भारत आ गई थी। जूते उतार कर जब मैं भीतर गया तो मुझे एक बहुत पुरानी कब्र दिखाई दी जिसकी रक्षा के लिए चारों और फिलीग्री की नक्‍काशी किए हुए पत्‍थर की दीवार खड़ी थी। दूसरी और पत्‍थर में एक पदचिह्न बना हुआ था—कहा जाता है कि वह यूसा-आसफ़ का पदचिह्न है। उसकी दीवार से शारदा लिपि में लिखा गया एक शिलालेख लटक रहा थ जिसके नीचे अंग्रेजी अनुवाद में लिखा गया है—‘’यूसा-आसफ़ (खन्‍नयार। श्रीनगर) यह कब्र यहूदी है। भारत में कोई भी कब्र ऐसी नहीं है। उस कब्र की बनावट यहूदी है। और कब्र के ऊपर यहूदी भाषा, हिब्रू में लिखा गया है।
जीसस पूर्णत: संबुद्ध थे। इस पुनर्जन्‍म की घटना को ईसाई मताग्रही ठीक से समझ नहीं सकते किंतु योग द्वारा यह संभव हो सकता है। योग द्वारा बिना मरे शरीर मो मृत अवस्‍था में पहुंचाया जा सकता है। सांस को चलना बंद हो जाता है, ह्रदय की धड़कन और नाड़ी की गति भी बंद की जा सकती है। इस प्रकार की प्रक्रिया के लिए योग की किसी गहन विधि का प्रयोग किया क्‍योंकि अगर वे सचमुच मर जाते तो उनके पुन जीवित होने की कोई संभावना नहीं थी। सूली लगाने वालों ने जब यह समझा कि वे मर गए है तो उन्‍होंने जीसस को उतार कर उनके अनुयायियों का दे दिया। तब एक परंपरागत कर्मकांड के अनुसार शरीर को एक गुफा में तीन दिन के लिए रखा गया। किंतु तीसरे दिन गुफा को खाली पाया गया। जीसस गायब थे।
ईसाइयों के ‘’एसनीज’’ नामक एक संप्रदाय की परंपरागत मान्‍यता है कि जीसस के अनुयायियों ने उनके शरीर के घावों का इलाज किया और उनको होश में ले आए और जब उनके शिष्‍यों ने उनको दोबारा देखा तो वे विश्‍वास ही न कर सके कि ये वही जीसस है जो सूली पर मर गए। उनको विश्‍वास दिलाने के लिए जीसस को उन्‍हें अपने शरीर के घावों को दिखाना पडा। ये घाव उनके एसनीज अनुयायियों ने ठीक किए। गुफा के तीन दिनों में जीसस के घाव भर रहे थे। ठीक हो रहे थे। और जैसे ही वे ठीक हो गए जीसस गायब हो गए। उनको उस देश से गायब होना पडा क्‍योंकि अगर वे वहां पर रह जाते तो इसमे कोई संदेह नहीं कि उनको दोबारा सूली दे दी जाती।
सूली से उतारे जाने के बाद उनके घावों पर एक प्रकार की मलहम लगाई गई। जो आज भी ‘’जीसस की मलहम’’ कही जाती है। और उनके शरीर को मलमल से ढका गया। उनके अनुयायी जौसेफ़ और निकोडीमस ने जीसस के शरीर को एक गुफा में रख दिया। और उसके मुहँ पर एक बड़ा सा पत्‍थर लगा दिया। जीसस तीन दिन इस गुफा में रहे और स्‍वस्‍थ होते रहे। तीसरे दिन जबर्दस्‍त भूकंप आया और उसके बाद तूफान; उस गुफा की रक्षा के लिए तैनात सिपाही वहां से भाग गए। गुफा पर रखा गया बड़ा पत्‍थर वहां से हट कर नीचे गिर गया। और जीसस वहां से गायब हो गये। उनके इस प्रकार गायब हो जाने के कारण ही लोगों ने उनके पुनर्जन्‍म और स्‍वर्ग जाने की कथा को जन्‍म दिया गया।
सूली पर चढ़ाये जाने से जीसस का मन बहुत परिवर्तित हो गया। इसके बाद वे पूर्णत: मौन हो गए। न उन्‍हें पैगंबर बनने में कोई दिलचस्‍पी रही न उपदेशक बनने में। बस वे तो मौन हो गए। इसीलिए इसके बाद उनके बारे में कुछ भी पता नहीं है। तब वे भारत में रहने लगे। भारत में एक परंपरा है कि बाइबल में भी कि यहूदियों का एक कबीला गायब हो गया और उसको खोजने के लिए बहुत लोग भेजे गए थे। वास्‍तव में कश्‍मीरी अपने चेहरे-मोहरे और अपने खून से मूलत: यहूदी ही है।
प्रसिद्ध फ्रांसीसी इतिहासकार, बर्नीयर ने, जो औरंगज़ेब के समय भारत आया था। लिखा है कि ‘’पीर पंजाल पर्वत को पार करने के बाद भारत राज्‍य में प्रवेश करने पर इस सीमा प्रदेश के लोग मुझे यहूदियों जैसे लगे।‘’ अभी भी काश्‍मीर में यात्रा करते समय ऐसा लगता है मानो किसी यहूदी प्रदेश में आ गए हो। इसीलिए ऐसा माना जाता है कि जीसस काश्‍मीर में आए क्‍योंकि यह भारत की यहूदी भूमि थी। वहां पर यहूदी जाति रहती थी। काश्‍मीर में इस प्रकार की कई कहानियां प्रचलित है। जीसस पहल गाव में बहुत वर्षों तक रहे। उनके कारण ही यह जगह गांव बन गया। प्रतीक रूप में उनको गड़रिया कहा जाता है और पहल गाम में आज भी ऐसी अनेक लोककथाएँ प्रचलित है जिनमें बताया गया है कि 1900 वर्ष पहले ‘’यूसा-आसफ़’’ नामक व्यक्ति यहां आकर बस गया था और इस गांव को उसी ने बसाया था।
जीसस सत्‍तर साल तक भारत में थे और सत्‍तर साल तक वे आने लोगों के साथ मौन रहे।
ईसाइयत को जीसस के सारे जीवन के बारे में कुछ नहीं मालूम। कि उन्‍होंने कहां साधना की या कैसे ध्‍यान किया। उनके शिष्‍यों को भी नहीं मालूम कि अपनी मौन-अवधि में जीसस क्‍या कर थे। उन्‍होंने केवल इतना ही रिकार्ड किया कि जीसस पर्वत पर चले गए और वहां वे तीस दिन तक मौन रहे। उसके बाद वे फिर वापस आए और उपदेश देने लगे। परंतु यह किसी को नहीं मालूम कि पर्वत पर वे क्‍या कर रहे थे।
इसके बाद वे धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में उलझते चले गए। जो कि स्‍वाभाविक था क्‍योंकि उनके चारों और जो लोग थे वे न तो आध्‍यात्‍मिक थे न दार्शनिक। इसलिए जीसस जो भी कहते उसे वे गलत समझ लेते थे। जीसस ने कहा, ‘’यहूदियों का राजा हूं’’, अब उनका मतलब इस संसार के राज्‍य से नहीं था—वे तो प्रतीकों और दृष्‍टांत के माध्‍यम से बोल रहे थे जिससे सम्राट बन जाएंगे और यही से मुसीबत आरंभ हो गई। किसी दूसरे देश में जीसस को सूली नहीं लगती किंतु यहूदी उनको समझ ही न सके। यहूदी सदा से पदार्थवादी है। उनके लिए दूसरी दुनिया या परलोक का कोई अर्थ नहीं है। उनकी सोच और विचार धारा ही एक दम से अलग है। वे यथार्थ के ठोस धरातल पर ही जीते रहे है। अब जीसस बुद्ध की भांति बोलने लगे तो दोनों में संवाद कैसे होता? यहूदी उनका निरंतर गलत समझते रहे। बल्‍कि पांटियस पायलट उनको अधिक समझ रहा था बजाएं उनकी अपनी जाति के लोगों के। पायलट जानता था कि एक निर्दोष और भोले-भाले आदमी को अकारण सूली पर चढ़ाया जा रहा है। और उसने जीसस को सूली से बचाने की भरसक कोशिश की। परंतु राजनैतिक हालात ने उसे विवश कर दिया। जीसस को सूली पर चढ़ाते समय—उस अंतिम क्षण में भी वह उनसे पूछता है ‘’सत्‍य क्‍या है?’’ और जीसस चुप रहे। और यही बौद्ध उत्‍तर है। क्‍योंकि सत्‍य के बारे में केवल बुद्ध ही चुप रहे है। और कोई नहीं। औरों ने कुछ न कुछ कहा है। केवल बुद्ध पूर्णत: मौन रहे है। यहूदियों ने समझा कि जीसस कुछ नहीं जानते।   ‘’मुझे सदा ऐसा लगा कि पायलट दृश्‍य से गायब हो जाता है। उसने सारा ‘’चार्ज पुरोहित को दे दिया। क्‍योंकि वह इसमें भागीदार नहीं बनना चाहता। यह सब हुआ दो प्रकार की भाषाओं के कारण। जीसस दूसरी दुनिया की बात कर रहे है और यहूदी उनकी बात को इस दुनिया के प्रसंग में समझ रहे है। भारत में ऐसा नहीं हो सता था क्‍योंकि यहां पर प्रतीकों और दृष्‍टांतों की लंबी परंपरा है। यहूदी इन प्रतीकों को नहीं समझ सकते थे वे शाब्‍दिक अर्थ ही समझ सकते है। उनका दृष्‍टिकोण ही लौकिक है। वे कहते है कि अगर किसी ने तुम्‍हें नुकसान पहुंचाया है तो उसका दुगना नुकसान कर दो। अब जीसस बिलकुल बुद्ध की तरह बात कर रहे है। कि कोई तुम्‍हारे एक गाल पर थप्‍पड़ मारे तो तुम अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो।‘’
एक यहूदी अचानक कैसे इस प्रकार बोलने लगता है—यह बात समझ में नहीं आती। उनकी ऐसी कोई परंपरा नहीं है। जीसस यहूदियों में अचानक घट गए यहूदियों के विगत इतिहास से उनका कोई संबंध नहीं है। उनकी जड़ें भी वहां नहीं है। यहूदियों से उनका कोई साम्‍य भी नहीं है। यहूदियों का तो परमात्‍मा भी बहुत हिंसक, क्रोधी और ईर्ष्‍यालु है। वह एक क्षण में सबका सर्वनाश कर सकता है और इस पृष्‍ठभूमि में जीसस का यह कहना कि ‘’परमात्‍मा प्रेम है, कितना विचित्र हे।‘’
भारत में कभी कोई बुद्ध पुरूष मारा नहीं गया क्‍योंकि वह चाहे कितना ही विद्रोही क्‍यों न हो, वह भारतीय परंपरा की श्रंखला की कड़ी बना रहता है। परंतु जेरूसलेम में जीसस बिलकुल विदेशी जैसे थे—वे ऐसे प्रतीकों और भाषा का प्रयोग करते है जिससे यहूदी जाति बिलकुल अंजान है। उनको तो सूली पर चढ़ाया ही जाता। उन्‍हें सूली लगती ही।
ओशो कहते है कि, ‘’मैं जब जीसस को देखता हूं तो मुझे वे गहरे ध्‍यान में डूबे दिखाई देते है। गहन संबोधि में है वे परंतु उनको ऐसी जाति के लोगों में रहना पडा जो धार्मिक या दार्शनिक नहीं थे; वे बिलकुल राजनीतिक थे। इन यहूदियों का मस्‍तिष्‍क और ही ढंग से काम करता है। इसलिए इनमें कोई दार्शनिक नहीं हुआ। इनके लिए जीसस अजनबी थे। और वे बहुत गड़बड़ कर रहे थे। यहूदियों की जमी-जमायी व्यवस्‍था को बिगाड़ रहे थे जीसस। अंत: उन्‍हें चुप कराने के लिए यहूदियों ने उनको सूली लगा दी। सूली पर वे मरे नहीं। उनके शरीर को सूली से उतार कर जब तीन दिन के लिए गुफा में रखा गया तो मलहम आदि लगाकर उसे ठीक किया गया। और वहीं से जीसस पलायन कर गए। इसके बाद वे मौन हो गए और अपने ग्रुप के साथ अर्थात अपनी शिष्‍य मंडली के साथ वे चुपचाप गुह्म रहस्‍यों की साधना करते रहे।
ओशो कहते है कि ‘’मुझे ऐसा प्रतीत होता है। कि उनकी गुप्‍त परंपरा आज भी चल रही है।‘’
जीसस को समझने के लिए जरूरी है कि ईसाइयत द्वारा की गई उनकी व्‍याख्‍या को बीच में से हटाकर सीधे उनको देखा जाए—तब उनकी आंतरिक संपदा से हम समृद्ध हो सकत है।
जीसस के पद चिन्‍ह
जीसस के पद चिन्‍ह
ओशो की पुस्‍तक
‘’दि सायलेंट एक्‍सप्‍लोजन’’
में संकलित ‘’दि अननोन लाइफ ऑफ जीसस।‘’

Quantcast

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

!! प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला !!

दक्षिण कोसल के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरातत्वीय स्थलों की सूची में सिरपुर का स्थान सर्वोच्च है । पुण्य-सलिला महानदी के तट पर स्थित सिरपुर का अतीत सांस्कृतिक विविधता तथा वस्तुकला के लालित्य से ओतप्रोत रहा है । सिरपुर, प्राचीन काल में 'श्रीपुर' के नाम से विख्यात रहा है तथा सोमवंशी शासकों के काल में इसे दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है । कला के शाश्वत नैतिक मूल्यों एवं मौलिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ धार्मिक सौहार्द्र तथा आध्यत्मिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से आलोकित सिरपुर भारतीय कला के इतिहास में विशिष्ट कला-तीर्थ के रुप में प्रसिद्ध है । लक्ष्मण मंदिर, आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार, तीवरदेरव विहार, बालेश्वर मंदिर समूह, राजप्रासाद, विविध उत्खनित स्मारक-स्थल एवं उपलब्ध कलात्मक शिल्पकृतियां देश-विदेश के पुराविदों के लिए आकर्षण के केन्द्र हैं । सिरपुर के भग्नावशेषों में भागवत, माहेश्वर एवं तथागत के सद्धर्म से शासित अनुयायियों के समवेत घोष अनुगूंजित हैं । यद्यपि सिरपुर की समृद्धि के परिचायक अधिकांश पुरावैभव विलुप्त हो चुके हैं फिर भी विद्यमान अल्पांश अवशेष, अतीत के गौरव के साक्ष्य हैं ।
सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है जिनमें 'श्रीपुर' से भूमिदान दिया गया था । सोमवंशी शासकों के काल में सिरपुर दक्षिण कोसल का महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं सांस्कृतिक केंन्द्र के रुप में प्रतिष्ठित हुआ । इस वंश के महाप्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के 58 वर्षीय सुदीर्घ शासन काल (595 से 653 ईसवी) में यहां अनेकानेक मंदिर, मठ, बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया । सातवीं सदी ईस्वी में चीन के महान पर्यटक तथा विद्वान ह्वेनसांग ने दक्षिण कोसल की 639 ईसवी में यात्रा की थी । उनके अनुसार सिरपुर में उस समय लगभग 100 संघाराम और मंदिर थे जिनमें महायान संप्रदाय के कई भिक्षु निवास करते थे । राजनैतिक सुस्थिरता तथा धार्मिक सहिष्णुता के फलस्वरुप सिरपुर दीर्घकाल तक ज्ञान-विज्ञान तथा कला का केंद्र बना रहा । महाशिवगुप्त बालार्जुन के पश्चात सिरपुर का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक महत्व क्रमशः क्षीण होने लगा तथा दक्षिण कोसल के इतिहास के स्वर्णयुग का पटाक्षेप हो गया ।
सिरपुर के पुरावैभव की ओर तत्कालीन ब्रिटिश विद्वान बेगलर (1873-74 ईस्वी) एवं सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1881-82 ईस्वी) के द्वारा सर्वप्रथम प्रकाश डालते हुये आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्टस ऑफ इंडिया खंड 7 तथा 17 में संबंधित प्रारंभिक विवरण प्रकाशित किये गये हैं । सिरपुर के गर्भ में छिपे पुरातत्वीय रहस्यों को उजागर करने के उद्देश्य से समय-समय पर उत्खनन के प्रयास किये गये । जिनसे सिरपुर के पुरातत्व वैभव और सांस्कृतिक इतिहास पर प्रचुर प्रकाश पड़ा है ।
माननीय श्री बृजमोहन अग्रवाल, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री के विशेष प्रयासों से सिरपुर के उत्खनन का कार्य संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन की ओर से प्रख्यात पुरातत्वविद् अरुण कुमार शर्मा के निदेशन में वर्ष 2005 में प्रारंभ हुआ जिससे सिरपुर की पुरातत्वीय महत्व को अधिकाधिक उजागर करने, अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने तथा उपलब्ध सांस्कृतिक निधि को विश्व धरोहर के रुप में स्थापित करने की दिशा में सफलता अर्जित हुई है । इन वर्षो में 06 बौद्ध विहार, 01 बौद्ध स्तूप, 01 बेद पाठशाला, 01 जैन विहार, 07 आवासीय भवन, 08 शिव मंदिर तथा विशाल औद्योगिक स्थल जहाँ चौड़े-चौड़े रास्ते 48 अन्नागार तथा कई आयुर्वेदिक स्नान कुण्ड प्रकाश में आये हैं । उत्खनन में प्रथम बार विहार की संरचना के अंगभूत बौद्ध देवी हारिति की उपलब्धि उल्लेखनीय है । इसी अवधि में महानदी के तट पर स्थित भव्य राजमहल की भग्नावशेष रेस्ट हाऊस के निकट स्थित भव्य तोरणद्वार वाला विशाल बड़े-बड़े प्रस्तरों से निर्मित विशाल पंचायतन शिवमंदिर प्राप्त हुआ है । इस प्रस्तर की चाहरदीवारी वाले मंदिर परिसर के दक्षिण में तांत्रिक मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं । इसके तीन गर्भग्रह में पूर्व में विष्णु की प्रतिमा तथा पश्चिम में 16 कोणीय धारा लिंग एवं धारा योनिपीठ मूलस्थिति में प्राप्त हुए हैं । आकार एवं प्रकार तथा ऊँचाई में सुरंगटीला शिवमंदिर छत्तीसगढ़ का विशाल और विलक्षण स्मारक है । इस मंदिर का अधिष्ठान भारत का सबसे ऊँचा है ।
स्तूप तथा औद्योगिक क्षेत्र के प्रकाश में आने से सिरपुर का इतिहास ई.पू. 6वीं शताब्दी तक चला गया है । राजधानी बनने से पहले सिरपुर एक बहुत बड़ी औद्योगिक नगरी थी । सिरपुर की असीम पुरासंपदा ऐतिहासिक महत्व पर्यटनात्मक आकर्षण को ध्यान में रखते हुए उत्खनित स्मारकों की मूलरुप में सुव्यवस्थित अंतर्राष्ट्रीय पुरातत्वीय संरक्षण विधियों के अनुसार अनुरक्षण कार्य प्रगति पर है ।
सिरपुर में वर्ष 1953 से 1956 के मध्य सागर विश्वविद्यालय एवं मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग के द्वारा संयुक्त रुप से डॉ.एम.जी.दीक्षित के निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया गया । इस उत्खनन से यहां पर टीले के भीतर दबे हुए दो बौद्ध विहार अनावृत हुए । इनका अभिज्ञान आनंदप्रभ कुटी बिहार तथा स्वास्तिक विहार के रुप में किया गया है । उत्खनन क्षेत्र से धातु प्रतिमा, प्रतिमा फलक, आभूषण बनाने के विविध उपकरण, लोहे के अनेक प्रकार के बर्तन, कीलें-ताले, जंजीर, सिलबट्टा, दीपक, पूजा के पात्र, घड़े, मिट्टी के मनके, चुड़ियां, पकी मिट्टी की मुहरें एवं खिलौने आदि प्राप्त हुए तथा तीन महत्वपूर्ण सिक्के भी उपलब्ध हुए थे । इनमें से एक सिक्का शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का है तथा दूसरा कलचुरि शासक रत्नदेव के समय का है । तीसरा विशेष उल्लेखनीय सिक्का चीनी राजा काई युवान् (713 से 741 ईस्वी) के समय का है ।
वर्ष 2000 से 2004 के मध्य नार्गाजुन बोधिसत्व संस्थान मनसर (महाराष्ट्र) के द्वारा वरिष्ठ पुरातत्वविद् श्री अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में उत्खनन कार्य सम्पन्न किया गया । इस अवधि में बौद्ध विहार तथा आवासीय भवन प्रमुख रुप से अनावृत्त किए गए । राज्य पुरातत्व सलाहकार के रुप में श्री अरुण कुमार शर्मा के द्वारा वर्तमान में यहाँ किये जा रहे उत्खनन से प्रमुख रुप से बौद्ध स्तूप, सुरंग टीला मंदिर, सड़के एवं दुकानें, शिव मंदिर, आवासीय संरचना, भूमिगत अन्नागार, आयुर्वेदिक स्नानकुण्ड तथा विभिन्न धातुओ की मूर्तियाँ खुदाई में प्राप्त हुई हैं, जिनकी भव्यता, कलात्मकता तथा अलंकरण अभिप्राय अद्वितीय हैं ।
दर्शनीय स्थल -
पुरातत्वीय वैभव से संपन्न सिरपुर के प्राकृतिक सौंदर्य में महानदी के सुरम्य प्रवाह तथा हरितिमा से सजे-संवरे वन्य-पादपों की भी भागीदारी है । यहां के मुख्य दर्शनीय स्मारक स्थलों में लक्ष्मण मंदिर तथा गंधेश्वर मंदिर प्रारंभ से अस्तित्व में रहे हैं । आनंद प्रभु कुटी विहार, स्वस्तिक विहार, तीवरदेव महाविहार, बालेश्वर मंदिर समूह, शिव मंदिर, राज प्रासाद, सुरंगटीला आदि समय-समय पर उत्खनन से अनावृत्त किये गये हैं । ये सभी स्मारक पुरातत्वीय, धार्मिक तथा पर्यटन अभिरुचि से जुड़े हुये हैं । यहां से उत्खनित संरचनाओं में शैव, वैष्णव तथा बौद्ध धर्म से संबंधित स्थापत्य कला का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है । महत्वपूर्ण स्मारक स्थलों का संक्षिप्त परिचय क्रमशः प्रस्तुत है -
लक्ष्मण मंदिर -
यह ईंटों से निर्मित भारत के सर्वोत्तम प्राचीन मंदिरों में से एक है । अलंकरण सौंदर्य, मौलिक अभिप्राय तथा निर्माण कौशल की दृष्टि से यह अपूर्व है । लगभग 7 फुट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर स्थित पर मंदिर अत्यंत भव्य है । पंचरथ प्रकार का यह मंदिर गर्भगृह, अंतराल तथा मंडप से संयुक्त है । मंदिर के बाह्य भित्तियों पर कूट-द्वार, वातयान आकृति, चैत्य गवाक्ष, भारवाहक गण, गज कीर्तिमुख एवं कर्ण आमलक आदि अभिप्राय दर्शनीय हैं । मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत सुन्दर है । सिरदल पर शेषशायी विष्णु, प्रदर्शित हैं । उभय द्वारशाखाओं पर विष्णु के प्रमुख अवतार, कृष्ण लीला के दृश्य, अलंकरणात्मक प्रतीक, मिथुन दृश्य और वैष्णव द्वारपालों का अंकन है । गर्भगृह में नागराज अनंत शेष की बैठी हुई सौम्य प्रतिमा स्थापित है । लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा ने अपने दिवंगत पति की स्मृति में करवाया था । वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मन की पुत्री थी । अभिलेखीय साक्ष्य के आधार पर लक्ष्मण मंदिर का निर्माण काल ईस्वी 650 के लगभग मान्य है ।
राम मंदिर -
लक्ष्मण मंदिर से कुछ दूरी पर पूर्व की ओर ईंटों से निर्मित एक भग्न तथा जीर्ण-शीर्ण मंदिर स्थित है, जो राममंदिर के नाम से प्रसिद्ध है । इस मंदिर के ऊर्ध्व विन्यास में कोण तथा भुजाओं के संयोजन द्वारा प्रतिरथों से ताराकृति तल विन्यास की रचना की गई । इस कलात्मक मंदिर का संपूर्ण शिखर नष्ट हो चुका है तथा भग्न प्रायः भित्तियां कुछ अंशों में शेष हैं । लक्ष्मण मंदिर तथा राम मंदिर के निर्माण में मात्र कुछ दशकों का अंतराल है । मंदिर परिसर में टीले में परिवर्तित तत्कालीन आवासीय भवन को भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण, रायपुर द्वारा उत्खनन से प्रकाश में लाया गया है, जिससे स्थानीय, भवन निर्माण शैली की विशेषता दृष्टव्य है ।
गंधेश्वर मंदिर -
महानदी के तट पर स्थित इस मंदिर का प्राचीन नाम गंधेश्वर था । यह सतत् पूजित पूजित शिव मंदिर है । इस मंदिर का प्रवेश द्वार मूल रुप से विद्यमान है तथा उभय द्वारशाखाओं पर शिवलीला के अनेक दृश्य प्रदर्शित हैं । मंदिर के मंडप का निर्माण प्राचीन मंदिरों एवं विहारों से प्राप्त स्तंभों से किया गया है । मराठा काल में जीर्णोद्धार के कारण इस मंदिर का मौलिक स्वरुप विलुप्त हो चुका है । मंदिर परिसर में विभिन्न भग्नावशेषों से प्राप्त - बुद्ध, नटराज, उमा-महेश्वर, वराह, विष्णु, वामन, महिषासुरमर्दिनी, नदी देवियां आदि की कलात्मक प्रिमायें और खंडित अभिलेख सुरक्षित रखी गई हैं । गंधेश्वर मंदिर में प्रस्थापित शिवलिंग का प्रतिदिन नियमित रुप से पुष्पों द्वारा आकर्षक श्रृंगार किया जाता है ।

आनंद प्रभ कुटी एवं स्वस्तिक विहार-
बौद्धधर्म से संबंधित अवशेषों की दृष्टि से सिरपुर विशेष महत्वपूर्ण है । सर्वप्रथम वर्ष 1956-57 के उत्खनन कार्य से यहां ईंटों से निर्मित दो बौद्ध विहारों के अवशेष प्रकाश में आये हैं । उत्खनित विहारों की वास्तु योजना में गुप्तकालीन मंदिर तथा आवासीय भवन निर्माण कला का सुंदर समन्वय है । इन विहारों के मुख्य कक्ष (गर्भगृह) में भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े 6 फुट ऊंची कलात्मक प्रतिमा प्रस्थापित है । विहार में प्रमुख स्थविर तथा अन्य भिक्षुओं के ध्यान, अध्ययन-अध्यापन और निवास की सुविधा थी । आधार तल में निवास के लिए मण्डल के दोनों ओर अनेक कक्ष निर्मित है तथा इन कक्षों में दीपक रखने के लिए आले बने हुए हैं । इसके सम्मुख भाग में तोरण था जिसके दोनो ओर द्वारपाल तथा अर्ध मंडप में बौद्ध देवताओं की प्रतिमायें भित्ति से संलग्न प्रस्थापित रही हैं । अभिलेख के आधार पर इस विहार का नामकरण आनंदप्रभु कुटी विहार किया गया है । इसी के सन्निकट एक अन्य ध्वस्त विहार भी उत्खनन से प्रकाश में आया है । तल योजना के आधार पर इसे स्वस्तिक विहार के नाम से जाना जाता है सिरपुर के उत्खनन में प्राप्त समस्त बौद्ध विहार द्वितल (भू-तल एवं प्रथम तल ) स्थापत्य योजना के अनुरुप निर्मित हैं । इन विहारों का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन के समय में करवाया गया था । 
धातु प्रतिमायें –
सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी में सिरपुर महायान धर्म का सुप्रसिद्ध केन्द्र था तथा धातु प्रतिमाओं के निर्माण में अग्रगण्य रहा है । सिरपुर में सर्वप्रथम 1939 में धातु प्रतिमाओं का भंडार प्राप्त हुआ था । यहां से प्राप्त धातु प्रतिमायें रायपुर, नागपुर, नई दिल्ली स्थित संग्रहालय तता मुम्बाई के भारतीय विद्या भवन में संरक्षित हैं । सिरपुर की धातु प्रतिमाओं में ‘श्री’ एवं ‘शील’ का अद्भुत संतुलन है । उपलब्ध धातु प्रतिमाओं में बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पदमपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा आदि के अतिरिक्त ऋषभनाथ तथा विष्णु आदि उल्लेखनीय हैं । इन प्रतिमाओं के प्रदीप्त मुख, अर्ध निमीलत नेत्र, केशविन्यास, वरद मुद्रा युक्त हथेली की अंगुलियों एवं परिधान के तरंगवत् सिलवटों में आध्यात्मिक सौंदर्य के सथा कला का चरमोत्कर्ष व्याप्त है । सिरपुर की धातु प्रतिमायें, दक्षिण कोसल की धातु शिल्पियों के अद्भुत कौशल को प्रकट करती है तथा इनकी गणना भारतीय कला के उत्कृष्टम कलाकृतियों में की जाती है । भारत महोत्सव के अन्तर्गत सिरपुर से प्राप्त धातु प्रतिमाएं पेरिस, जापान तथा अमेरिका में प्रदर्शित की जाती हैं । सिरपुर की धातु प्रतिमाओं से भारतीय ललित कला के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय जुड़ा है ।  

स्थानीय संग्रहालय-
लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा नियंत्रित स्थानीय संग्रहालय में सिरपुर से प्राप्त अनेक दुर्भल प्रतिमाएं और स्थापत्य खण्ड संरक्षित कर रखी गई हैं । ये कलाकृतियां शैव, वैष्णव, बौद्ध तता जैन धर्म से संबंधिक हैं । संग्रहालय में प्रदर्शित प्रतिमाएं अत्यंत कलात्मक हैं जिनमें गुप्तकालीन कला की मौलिकता, प्रतिमा विज्ञान की मान्यताएं और परंपराओं का समन्वय है । अंग-संरचना, आभूषण, केश विन्यास तथा परिधान में स्थानीय विशेषताएं प्रत्यक्ष हैं । यहां पर प्रदर्शित अंगड़ाई लेती हुई एक नायिका की प्रतिमा में सौंदर्य, अनुराग तथा चपलता का अद्भुत सामंजस्य है । काले पाषाण से निर्मित चतुर्मुख लिंग के रुपांकित मुख मंडल पर ध्यान, योग, लास्य और उग्र भाव क्रमशः परिलक्षित है । महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा में देवी के अनुग्रह के साथ-साथ संहारक शक्ति की व्यंजना है । इसी प्रकार की अनेक कलात्मक प्रतिमायें यहां प्रदर्शित हैं जिनमें नृसिंह, अम्बिका, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, हारिति, दुर्गा, नाग पुरुष, बुद्ध, तीर्थंकर पार्श्वनाथ, नदी देवियां आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं । 
बौद्ध स्तूप-
सन् 639 में चीनी यात्री व्हेनसांग जी सिरपुर आये थे तब उन्हें बताया गया थी कि वहाँ पर राजा अशोक द्वारा निर्मित बौद्ध स्तूप है । चीनी यात्री द्वारा बतायी दिशा में यह स्तूप भग्नावस्था में जनवरी 2009 में प्राप्त हुआ । बड़े-बड़े पत्थरों निर्मित यह स्तूप एक 13.20 x 12.80 मीटर के प्रस्तर निर्मित अधिष्ठान पर स्थित है । अंड 4.30 मी. ऊँचा है तथा जिसके दो छत्र मौजूद है छत्र का व्यास 45 से.मी. है । दूसरी शाताब्दी में अधिष्ठान के पश्चिम भाग में विस्तार किया गया जिसका प्रमाण है सीढ़ियों पर ब्राम्हूी में अंकित 'हे्ल' । यह स्तूप सिरपुर में बौद्ध धर्म के आगमन का प्रमाण है । समय - ईसा पूर्व तीसरी शाताब्दी  

सुरंग टीला मंदिर-
वर्तमान गाँव के मध्य में स्थित सुरंग टीला मंदिर एक विशाल पहाड़ी नुमा स्थल के उत्खनन से प्रकाश में आया । बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित यह पंचयातन शैली का शिव मंदिर 4.65 मीटर ऊँचे अधिष्ठान पर स्थित है । संरचना के ऊपर चार मंदिर हैं जिसमें से चार में शिवलिंग तथा पाँचवे में गणेश की मूर्ति स्थापित है । इनके सामने 32 स्तम्भों का मंडप है । पश्चिम में 43 सीढ़ियाँ है । एक स्तम्भ में मंदिरों का प्रारुप अंकित है । मंदिर 12 वीं शताब्दी में भूकंप से ध्वस्त हो गया । मंदिर के दक्षिण में पुजारी का आवास है तथा दक्षिण-पश्चिम में तांत्रिक मंदिर है जिसमें एक ही अधिष्ठान पर तीन गर्भ गृह है जिनमें विष्णु, बृह्मा तथा शिवलिंग स्थापित है । श्वेत धारालिंग तथा योनिपीठ सोलहकोणीय हैं । सुरंग टीला तथा परिसर के मंदिरों का निर्माण यहाँ से प्राप्त शिलालेख के अनुसार महाशिवगुप्त बालर्जुन ने सातवीं शताब्दी में करवाया था ।
बौद्ध विहार-
प्रस्तर तथा ईटों से निर्मित पश्चिमाभिमुखी बौद्ध विहार का निर्माण सातवीं शताब्दी में हूआ था इसमें पाँच गर्भगृह है जिनमें से मध्य में महात्मा बुद्ध की भूस्पर्श मुद्रा में मूर्ति स्थापित है तथा चार अन्य गर्भगृह में हैं । भवन के मध्य में कुंड है तथा अर्ध मंडप में नाग कन्याओं आदि की मूर्तियाँ लगी है । प्रवेश द्वार के सामने फर्श पर चक्र बना है । गर्भगृहों के द्वारों के ऊपर प्रस्तर निर्मित सिरदल शिला है जिनमें बुद्ध की जीवन कथा अंकित है ।  
ईसा पूर्व दूसरी तीसरी शताब्दी का मार्ग तथा दुकानें-
गंधेश्वर मंदिर के पूर्व में स्थित टीले के उत्खनन से विशाल शिवमंदिर प्राप्त हूआ है । इस मंदिर के तोरण द्वार के पूर्व में 30 फीट चौड़ी सड़क है जो शहर के मध्य में आरम्भ होकर नदी तट तक जाती है । इस सड़क के दोनों ओर मंदिर में पूजा अर्चना की की सामग्रियों के विक्रम के लिये छोटी-छोटी दुकानों है । सारी दुकानें एक ही लंबाई-चौड़ाई की है । प्रत्येक के पीछे भंडार गृह हैं । मार्ग के दोनों ओर आठ-आठ दुकानें हैं । शिव मंदिर-
गंधेश्वर मंदिर के पूर्व में एक विशाल शिव मंदिर प्रकाश में आया है पूर्वाभिमुखी मंदिर में 12 प्रस्तर स्तम्भों वाला तोरण द्वार के पूर्वी सीढियों के दोनों तरफ मंदिर के हाथी बांधने के पत्थर हैं। अंदर विशाल प्रांगण हैं . इस पंचायतन मंदिर के मुख्य मंदिर में उत्तर तथा दक्षिण में स्थित सीढ़ियों द्वारा प्रवेश किया जा सकता है . मंदिर 1.60 मीटर ऊँचे प्रस्तर निर्मित जगती पर स्थित है । चार स्तम्भों वाला मंडप है तथा गर्भगृह में श्वेत रंग का धारा लिंग एवं योनिपीठ स्थापित है । मंदिर में दो परकोटा है । भीतरी परकोटा ईंटों से तथा बाहरी प्रस्तर से निर्मित है । मंदिर के दक्षिण में पुजारी का आवास है तथा भीतरी परकोटा में यात्रियों के निवास के लिये कमरे बने हैं । दोनों परकोटे के बीच में रंगशाला या सभामंडप है । 
आवासीय संरचना-
गंधेश्वर मंदिर के पूर्व में एक वृहत आवासीय संरचना तथा शिल्प निर्माण केन्द्र प्रकाश में आये है । ये सभी निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार किये गये है । बीच में रास्ते है । कमरों में प्रवेश दो पल्लों वाले द्वार से होता था तथा भवन प्राय: दो मंजिले होते थे । प्रथम मंजिल प्रस्तर से तथा दूसरी मंजिले ईंटों से निर्मित थे दूसरे मंजिल पर चढ़ने के लिये सीढ़ियाँ बनी हैं । ऊपरी मंजिल की छत पर कवेलू की जगह प्रस्तर के छप्पर बनाये गये थे । प्राय: हर कमरे में धान कूटने की ओखली बने हैं । प्रत्येक समूह के मकान के समीप एक कुआँ भी निर्मित है । ये निर्माण ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी से लेकर ईसा के बाद चौदहवीं शताब्दी तक के है ।  

भूमिगत अन्नागार-
गंधेश्वर मंदिर के उत्तर पूर्व में महानदी के किनारे विशाल क्षेत्र में फैले व्यापारिक स्थल पर कतार से समान आकार के तराशे गये प्रस्तर से निर्मित अन्नागार प्राप्त हुये है । ये अन्नागार 2.20x 0.80x2.20 मीटर आकार के हैं . अन्नागार को ढकने के लिये बड़े-बड़े प्रस्तर खंडों का उपयोग किया गया है । ये स्लाइडिंग है । एक अन्नागार में कम से कम 34 क्विंटल अनाज समा सकता है । अब तक 48 अन्नागार मिल चुके हैं । यह व्यवस्था विश्व में पहली बार मिली है । 
आयुर्वेदिक स्नानकुंड-
प्रत्येक अन्नागार समूह के सामने प्रस्तर निर्मित आर्युवेदिक स्नान कुंड प्रकाश में आये है । खुले बरामदों वाले ये स्नानकुंड अंदर से 1.80x1.80x0.60 मीटर आकार के हैं । इन कुडों में विभिन्न व्याधियों की चिक्तसा होती थी । प्रत्येक कुंड में पानी के निकास के लिये भूमिगत नालियाँ है । कुंडों के ऊपर छतें होती थीं
राजा की मूर्ति एवं कांसे की बौद्ध मूर्ति-
सफेद पत्थर से निर्मित राजा की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है । जैसी कटार उनके कटि में लटकी है वैसी कटारें उत्खनन में प्राप्त हुई हैं ।
सिरपुर में धातु मूर्तियों का निर्माण होता था । उत्खनन में अब तक 80 धातु मूर्तियाँ, निर्माण के लिये आवश्यक सामग्री के साथ एक बौद्ध विहार से प्राप्त हुई है । सिरपुर में उत्खनन से तत्कालीन प्रतिमा विज्ञान, भवन निर्माण कला, जल प्रणालिका, नगर सन्निवेश तथा अन्य भौगोलिक जानकारियों पर प्रकाश पड़ा है । 
लक्ष्मण मंदिर

राम मंदिर

आनंद प्रभ कुटी एवं स्वस्तिक विहार

धातु प्रतिमायें

बौद्ध स्तूप-

सुरंग टीला मंदिर

बौद्ध विहार-अवशेष 

ईसा पूर्व दूसरी तीसरी शताब्दी का मार्ग तथा दुकानें-

आवासीय संरचना

भूमिगत अन्नागार-

आयुर्वेदिक स्नानकुंड

राजा की मूर्ति एवं कांसे की बौद्ध मूर्ति
छत्तीसगढ़ राज्य शासन एवं भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण, सिरपुर के पुरातत्वीय, महत्व को अधिकाधिक उजागार करने, अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने तथा उपलब्ध सांस्कृतिक निधि को विश्व धरोहर के रुप में स्थापित करने की दिशा में सतत् प्रयासरत् है  ..............