शनिवार, 28 जनवरी 2012

!!भवानी सिंह बाघेल (भगवान् सिंह बाघेल )!!

चित्रकूट। आदिकाल से धर्म की ध्वजा को विश्व में फैलाने वाला 'चित्रकूट' खुद में अबूझ पहेली है। तप और वैराग्य के साथ स्वतंत्रता की चाह में अपने प्राण का न्योछावर करने वालों के लिये यह आदर्श भूमि सिद्ध होती है। राम-राम की माला जपने वाले साधुओं ने वैराग्य की राह में रहते हुये मातृभूमि का कर्ज चुकाने के लिये अंग्रेजों की सेना के साथ दो-दो हाथ कर लड़ते-लड़ते मरना पसंद किया। लगभग तीन हजार साधुओं के रक्त के कण आज भी हनुमान धारा के पहाड़ में उस रक्तरंजित क्रांति की गवाह हैं।

बात 1857 की है। पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बज चुका था। यहां पर तो क्रांति की ज्वाला की पहली लपट 57 के 13 साल पहले 6 जून को मऊ कस्बे में छह अंग्रेज अफसरों के खून से आहुति ले चुकी थी।
शहीद ठाकुर  रणमत सिंह बाघेल
एक अप्रैल 1858 को मप्र के रीवा जिले की मनकेहरी रियासत के जागीरदार ठाकुर रणमत सिंह बघेल ने लगभग तीन सौ साथियों को लेकर नागौद में अंग्रेजों की छावनी में आक्रमण कर दिया। मेजर केलिस को मारने के साथ वहां पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद 23 मई को सीधे अंग्रेजों की तत्कालीन बड़ी छावनी नौगांव का रुख किया। पर मेजर कर्क की तगड़ी व्यूह रचना के कारण यहां पर वे सफल न हो सके। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता को झांसी जाना चाहते थे पर उन्हें चित्रकूट का रुख करना पड़ा। यहां पर पिंडरा के जागीरदार ठाकुर दलगंजन सिंह ने भी अपनी 1500 सिपाहियों की सेना को लेकर 11 जून को
1858 को दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर उनका सामान लूटकर चित्रकूट का रुख किया। यहां के हनुमान धारा के पहाड़ पर उन्होंने डेरा डाल रखा था, जहां उनकी सहायता साधु-संत कर रहे थे। लगभग तीन सौ से ज्यादा साधु क्रांतिकारियों के साथ अगली रणनीति पर काम कर रहे थे। तभी नौगांव से वापसी करती ठाकुर रणमत सिंह बघेल भी अपनी सेना लेकर आ गये। इसी समय पन्ना और अजयगढ़ के नरेशों ने अंग्रेजों की फौज के साथ हनुमान धारा पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन रियासतदारों ने भी अंग्रेजों की मदद की। सैकड़ों साधुओं ने क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। तीन दिनों तक चले इस युद्ध में क्रांतिकारियोंको मुंह की खानी पड़ी। ठाकुर दलगंजन सिंह यहां पर वीरगति को प्राप्त हुये जबकि ठाकुर रणमत सिंह बघेल गंभीर रूप से घायल हो गये। करीब तीन सौ साधुओं के साथ क्रांतिकारियों के खून से हनुमानधारा का पहाड़ लाल हो गया।

महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अधिष्ठाता डा. कमलेश थापक कहते हैं कि वास्तव में चित्रकूट में हुई क्रांति असफल क्रांति थी। यहां पर तीन सौ से ज्यादा साधु शहीद हो गये थे। साक्ष्यों में जहां ठाकुर रणमत सिंह बघेल के साथ ही ठाकुर दलगंजन सिंह के अलावा वीर सिंह, राम प्रताप सिंह, श्याम शाह, भवानी सिंह बघेल (भगवान् सिंह बघेल), सहामत खां, लाला लोचन सिंह, भोला बारी, कामता लोहार, तालिब बेग आदि के नामों को उल्लेख मिलता है वहीं साधुओं की मूल पहचान उनके निवास स्थान के नाम से अलग हो जाने के कारण मिलती नहीं है। उन्होंने कहा कि वैसे इस घटना का पूरा जिक्र आनंद पुस्तक भवन कोठी से विक्रमी संवत 1914 में राम प्यारे अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई पुस्तक 'ठाकुर रणमत सिंह बघेल' में मिलता है।


Note---:
मैं यहाँ पर स्पस्ट करना चाहता हूँ  "भवानी सिंह बघेल (भगवान् सिंह बघेल)," हमारे पर दादा (पिता जी के पर पितामह ) थे ओ भी इस युद्ध  में सहीद हो गए थे !!



1857 के क्रांतिकारियों की सूची
1. नाना साहब पेशवा
2. तात्या टोपे
3. बाबु कुंवर सिंह
4. बहादुर शाह जफ़र
... 5. मंगल पाण्डेय
6. मौंलवी अहमद शाह
7. अजीमुल्ला खाँ
8. फ़कीरचंद जैन
9. लाला हुकुमचंद जैन
10. अमरचंद बांठिया
11. झवेर भाई पटेल
12. जोधा माणेक
13. बापू माणेक
14. भोजा माणेक
15. रेवा माणेक
16. रणमल माणेक
17. दीपा माणेक
18. सैयद अली
19. ठाकुर सूरजमल
20. गरबड़दास
21. मगनदास वाणिया
22. जेठा माधव
23. बापू गायकवाड़
24. निहालचंद जवेरी
25. तोरदान खान
26. उदमीराम
27. ठाकुर किशोर सिंह, रघुनाथ राव
28. तिलका माँझी
29. देवी सिंह, सरजू प्रसाद सिंह 
 30. नरपति सिंह
31. वीर नारायण सिंह 32. नाहर सिंह
33. सआदत खाँ
34. सुरेन्द्र साय
35. जगत सेठ राम जी दास गुड वाला
36. ठाकुर रणमतसिंह
37. रंगो बापू जी
38. भास्कर राव बाबा साहब नरगंुदकर
39. वासुदेव बलवंत फड़कें
40. मौलवी अहमदुल्ला
41. लाल जयदयाल
42. ठाकुर कुशाल सिंह
43. लाला मटोलचन्द
44. रिचर्ड विलियम्स
45. पीर अली
46. वलीदाद खाँ
47. वारिस अली
48. अमर सिंह
49. बंसुरिया बाबा
50. गौड़ राजा शंकर शाह
51. जौधारा सिंह
52. राणा बेनी माधोसिंह
53. राजस्थान के क्रांतिकारी
54. वृन्दावन तिवारी
55 महाराणा बख्तावर सिंह
56 ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव

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1857 में आजादी की पहली लड़ाई में सतना जिले के मनकहरी ग्राम निवासी ठाकुर रणमतसिंह ने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। वे महाराजा रघुराजसिंह के समकालीन थे। महाराजा इन्हें काकू कहा करते थे। उन्हें रीवा की सेना में सरदार का स्थान मिला था।
1857 में बिहार के बाबू कुंवरसिंह और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध भारी मारकाट मचाई। लेकिन दोनों शक्तियां मिल नहीं पाईं क्योंकि बघेलखण्ड में अंग्रेज दोनों शक्तियों को मिलने नहीं देने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। महाराजा रघुराजसिंह पर भी अंग्रेजों की कड़ी नजर थी।
ठाकुर रणमतसिंह रीवा और पन्ना के बीच का क्षेत्र बुंदेलों से मुक्त कराने में उभरकर सामने आए। जब 1857 की क्रांति समाप्त हो चुकी थी। महारानी लक्ष्मीबाई शहीद हो चुकी थी। सेना का रुख पूरब की तरफ कर दिया गया। 1858 में बांदा में एक सैन्य दल ठाकुर रणमत सिंह का पीछा करने लगा।
2000 रुपए का इनाम रखा गया
ठाकुर साहब पर 2000 रु. का इनाम घोषित किया गया। उन्होंने डभौरा के जमींदार रणजीत राय दीक्षित के गढ़ में शरण ली। वहां भी अंग्रेजी सेना ने हमला बोल दिया। वे विवश होकर सोहागपुर गए। वहां भी अंग्रेजों ने पीछा किया जब ठाकुर रणमतसिंह क्योटी की गढ़ी में छिपे हुए थे अंग्रेज सेना की एक टुकड़ी ने रीवा की सेना की सहायता से उन्हें घेर लिया। वे वहां से भाग निकलने में सफल हो गए।
रीवा के महाराज पर डाला गया दबाव
अंग्रेजों ने उनको पकड़ने के लिए अंतिम चाल चली। रीवा के महाराजा पर दबाव डाला गया। उन्होंने पत्र लिखकर ठाकुर रणमतसिंह को बुलवाया। महाराजा के बुलाने पर वे गुप्त मार्ग से राजमहल में प्रविष्ट हुए और महाराजा से भेंट की। महाराजा से भेंट होने पर उन्होंने आत्मसमर्पण का विकल्प रखा।
इसके बाद जब रणमतसिंह अपने मित्र विजय शंकर नाग के घर जलवा देवी मंदिर के तहखाने में विश्राम कर रहे थे, महाराजा के संकेत पर पोलिटिकल एजेंट को यह सूचना दी गई। रणमतसिंह गिरफ्तार कर लिए गए तथा आगरा जेल में 1859 में उन्हें फांसी चढ़ा दिया गया। ठाकुर रणमतसिंह के बलिदान की गाथा लोकगीतों में गाई जाती है।
-(27/06/2015)

8 टिप्‍पणियां:

  1. ठाकुर रणमतसिंह बघेल

    उनकी रगों में शुद्ध क्षत्रिय रक्त उबाल खा रहा था। मातृभूमि के शत्रुओं से दो-दो हाथ करने के लिए उनकी भुजाएँ फड़क रही थी। सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम प्रारंभ होकर अपने अंत की ओर बढ़ रहा था। ब्रितानियों ने अपनी स्थिति सँभाल ली थी और उनका विजय अभियान तेज़ी के साथ चल रहा था। ठाकुर रणमतसिंह ने ब्रितानियों से टक्कर लेने का संकल्प कर डाला।

    रणमत सिंह बघेल रीवा नरेश महाराज रधुराजसिंह बघेल की सेना में सरदार के उच्च पद पर आसीन थे। उन दिनों देशी रियासत में रणमत सिंह ने पॉलिटिकल एजेंट ओसवान के विरुद्ध बग़ावत कर दी। इनके साथियों ने ओसवान के बग़लें पर आक्रमण कर दिया। ओसवान अपने प्राण बचाने में सफल हो गया।

    ठाकुर रणमत सिंह बघेल का शिकार उनके हाथों से निकल गया। एक ब्रितानी न सही तो दूसरा सही। उन्होंने नागोद राज्य के रेज़िडेंट पर हमला बोल दिया। वह रेजीडेंट भी भागकर अजयगढ़ राज्य की शरण में पहुँच गया। अजयगढ़ नरेश ने अपनी शरण में आए हुए ब्रितानी की रक्षा करने के लिए केशरीसिंह बुदेला के नेतृत्व में एक सेना भेज दी भाजसाँय स्थान पर भंयकर युद्ध हुआ। ठाकुर रणमत सिंह बघेल शत्रु सेना को काटते हुए केशरीसिंह के सामने जा पहुँचे। दो दिग्गजों की तलवारबाज़ी देखने ही बनती थी। आख़िर ठाकुर रणमतसिंह बघेल ने अपनी तलवार के एक वार से केशरीसिंह के दो टुकड़े कर डाले ।

    इस विजय से प्रोत्साहित होकर ठाकुर रणमतसिंह बघेल ने नौगाँव की ब्रितानी छावनी पर हमला बोल दिया। वे पीरवर तात्या टोपे से अपने संबंध स्थापित करना चाहते थे। अपने इस मनसूबे को वे पूरा कर सके। उन्होंने बरौंधा नामक स्थान पर ब्रितानी सेना का मुक़ाबला करके इसको तहस-नहस कर दिया।

    कई बार जाल डालने पर भी ब्रितानी ठाकुर रणमतसिंह बघेल को गिरफ़्तार करने में सफल नहीं हो रहे थे। आख़िर उन्होंने वही नीच चाल चली, जो वे हमेशा चलाते आए थे। ठाकुर रणमतसिंह बघेल एक दिन जब अपने एक मित्र विजय शंकर नाग के धर जलपा देवी के मंदिर के तहखाने में विश्राम कर रहे थे, तो धोखे से उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और सन् 1859 में अनंत चतुर्दशी के दिन आगरा जेल में उन्हें फाँसी पर झुला दिया गया। उनका जन्म सन 1825 में हुआ था ||

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  2. अनिल माधव दवे जिस रीवा राय के प्रति अपनी वफादारी के लिए रणमत सिंह ने अपनी सवा लाख रूपये सालाना की जागीर छोड़ दी थी, उसी रीवा राजा के संकेत पर उनके एक अधिकारी ने रणमत सिंह को स्वागत के बहाने बुलाया और पकड़कर अंग्रेजों के हवाले कर दिया। रीवा राय की एक बड़ी विशेषता है, जो पूरे भारत से अलग है। वह यह कि देश की तमाम राजनैतिक उथल-पुथल का इस राय पर कोई असर नहीं पड़ा। भारत की केंद्रीय सत्ता पर अंग्रेज रहे हों, मुगल रहे हों, लोदी, तुगलक या गुलाम वंश रहा किन्तु रीवा के राय परिवार ने अपनी सत्ता को हमेशा सलामत रखा। इसके लिए भले ही नर्तकियां भेंट करना पड़ी, अथवा अपने ही किसी प्रियजन को पकड़कर अंग्रेजों के हवाले करना पड़ा। रणमत सिंह की गिरफ्तारी भी इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा थी। यह बात 1857 की है। पन्ना और रीवा अलग-अलग रियासतें रही हैं, तब भी थी और आज भी दोनों राजघराने के वंशज मौजूद है। रणमत सिंह की जागीर पन्ना रियासत के अंतर्गत आती थी। रणमत सिंह मूलत: बघेल क्षत्रिय थे। इतिहास में बघेले अपने शौर्य और वफादारी के लिए मशहूर रहे हैं। इसी वफादारी के कारण पन्ना रियासत ने रणमत सिंह के पूर्वजों को सवा लाख सालाना की कोठी जागीर में मिली थी। इसी जागीर के अंतर्गत ग्राम मनकहरी रणमत सिंह के पिता को दिया गया था। रणमत सिंह का जन्म इसी ग्राम में हुआ। पन्ना का राज परिवार बघेल नहीं था जबकि रीवा राज परिवार बघेल था। कहते है रणमत सिंह और रीवा राज परिवार के साथ हमेशा रहा। इसी बीच पन्ना और रीवा रियासतों के बीच मन मुटाव हो गया। दोनों रियासतों ने युध्द की तैयारियाँ शुरू की। यह घटना 1850 के आसपास की है। यह बात अलग है कि अंग्रेजों की मध्यस्थता के कारण युध्द नहीं हो पाया। लेकिन युध्द की तैयारियों के बीच रणमत सिंह को यह बात अच्छी नहीं लगी कि वे अपने ही पूर्वजों के वंशज रीवा के बघेलों के विरूध्द हथियार उठाएँ। रणमत सिंह जागीर छोड़कर पन्ना रियासत से चले गए। पन्ना रियासत ने उनकी जागीर जब्त कर ली। बाद में दोनों रियासतों के समझौते के बाद पन्ना राजा के आग्रह पर रणमत सिंह रीवा रियासत में जगह नहीं मिली। वे अपने कुछ साथियों के साथ सागर आ गए। जहाँ वे अंग्रेजी सेना में लेफ्टिनेंट हो गए। कुछ दिनों बाद उन्हें पदोन्नति देकर नौगाँव भेज दिया गया। जहाँ उन्होंने केप्टन के रूप में पदभार संभाल लिया। तभी 1857 का दौर शुरू हुआ। अंग्रेजों के विरूध्द गुस्सा फूटा और क्रांति ने जोर पकड़ा। क्रांति का सर्वाधिक प्रभाव बुन्देलखण्ड में देखा गया। केप्टन रणमत सिंह की पलटन को आदेश मिला कि वे क्रांतिकारी बख्तबली और मर्दन सिंह को पकड़ने का अभियान चलाएँ। रणमत सिंह ने यह अभियान नहीं चलाया बल्कि वे दिखावे के लिए यहाँ-वहाँ डोलते रहे। यह बात अंग्रेजों को पता चल गई। उन्होंने रणमत सिंह और उनके साथियों को बर्खास्त कर दिया और गिरफ्तारी आदेश जारी कर दिए। अंग्रेज फौज में रहते हुए रणमत सिंह ने लगभग 300 लोगों की एक टुकड़ी बना ली थी, बर्खास्त होने के बाद यह टोली खुलकर क्रांति में शामिल हो गई। वह इलाका रणमत सिंह का देखा हुआ था। लिहाजा उन्हें पकड़ना नामुमकिन हो गया था। अंग्रेज यह बात जानते थे कि रणमत सिंह और रीवा राज परिवार एक वंश के हैं। लिहाजा उन्होंने रीवा राजा से सीधी बात नहीं की। उनके दरबार में संपर्क निकाला। रीवा फोर्स में कंपनी कमान्डेन्ट बलदेव सिंह का भाई हीरा सिंह रीवा राजा का अति विश्वास पात्र था। अंग्रेजों ने इसी सूत्र को पकड़ा। बलदेव सिंह के मार्फत हीरा सिंह से बात की गई। अंग्रेजों के प्रलोभन में हीरा सिंह आ गया। उसने पहले राजा से बात की। उनकी सहमति लेकर रणमत सिंह ने संपर्क साधा। रणमत सिंह को बताया गया कि रीवा राजा ने अंग्रेजों से बात कर ली है। तुम्हारा रीवा में स्वागत होगा तथा जागीर मिलेगी। रणमत सिंह झांसे में आ गए। रात भर इस कोठी के आसपास तगड़ा पहरा रहा। सबेरे गिरफ्तार करके बांदा भेज दिया गया। बांदा में 1 अगस्त 1859 को उन्हें फाँसी दे दी गई। रणमत सिंह का कार्य क्षेत्र अकेला बुन्देलखण्ड तक नहीं रहा। उन्होंने झाँसी से जबलपुर, रायपुर, नागपुर तक धावा किया। उनके साथ सैनिक जुड़ते रहे, टूटते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। हालाँकि क्रांति के दमन के बाद वर्ष 1859 में रणमत सिंह को कुछ करने के लिए यादा नहीं रह गया था फिर भी अंग्रेज उन्हें पकड़कर खत्म करना चाहते थे। अंग्रेजों का मंशा केवल गद्दारी के कारण पूरी हो सकी। वीरता के कारण नहीं।
    (दृष्टिकोण ब्लॉग से साभार)

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  3. Thakur ranmat Singh ji ki mritu ka sahi place kya hai agara ki banda

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  4. Rewa ke 84 गाँव की जमींदार कौन thae or unka naam kya tha

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    1. इसी ब्लाग में सर्च करिये मिल जाएगा ।

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  5. बहुत ही उम्दा लेख ..शत शत नमन

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