रविवार, 25 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 08)


सो कर उठा, और बाहर गेट के सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर खड़े थे बाकी चार पुलिस वाले घर के एक एक कोने में खड़े थे । चूंकि मैंने कोई अपराध नही किया था इस लिए बिना डरे इंस्पेक्टर से बात किया,और अंदर आने को बोला तो इंस्पेक्टर अंदर आ गए । 
इस तरह के घेराबंदी का कारण पूछा तो बोले "ये हमारी कार्यशैली है" । इसके बाद मूल मुद्दे पर आते हुए बोले "तुम्हारी  शिकायत मिली है, तुम ब्याज पर अवैध रूप से रू देते हो और सोना चांदी,जेवर गिरवी रखते हो और जबरन ब्याज वसूलते हो गुंडागर्दी करके" ।
मैने उन्हे बताया "ऐसा कुछ नही है साहब,आपको गलत सूचना मिली है" । 
तो बोले "तलासी लेना है घर की" । मैने बोला "बिलकुल ले लीजिए साहब" । इंस्पेक्टर ने दो पुलिस वालो को आवाज दिया और घर की,अलमारी, बाक्स आदि की तलासी लिया, श्रीमती जी के जेवर के सिवा कुछ नही मिला ।  किचेन के डिब्बों को भी उलट पलट के देखा कुछ नही मिला । चूंकि श्री मती जी के जेवर ज्यादा नही थे तो सवाल नही उठाया ।
फिर इंस्पेक्टर ने पूछा "नूतन सोसायटी क्या है" ? 
     तो उन्हे सोसायटी के बारे में विस्तृत जानकारी सभी रिकार्ड सहित बता दिया । संतुष्ट होकर चले गए । जाते जाते निर्देश दिया "कल इंड्रस्ट्रियल एरिया के पुलिस थाने में जाकर TI से मिल लेना" । 
अगले दिन TI से मिला,TI ने नेक सलाह दिया "सोसायटी को मध्यप्रदेश सहकारिता विभाग में रजिस्टर्ड करवा लो, क्योंकि इस तरह से पब्लिक से रू इकठ्ठे करना फिर ब्याज पर देना कानून गलत है" । बात समझ आ गई, मैने जानकारी निकाला और रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया । 13/2/1998 को हमारी सोसायटी सहकारिता विभाग में विधिवत रजिस्टर्ड जो गई । 

जिसने शिकायत किया था उसकी जानकारी निकाल लिया और सामने आए बिना ही उसे तीन महीने करीब हॉस्पिटल में आराम करवा दिया । 
  धीरे धीरे सोसायटी में सदस्य संख्या बढ़ती गई । कलेक्शन बढ़ गया । इसी दौरान मैंने अक्टूबर 1998 में "हीरो होंडा SS" बाइक खरीद लिया क्योंकि सायकल से ट्यूसन कवर नही हो रहे थे । मेरे बाइक खरीदते ही किसी ने अफवाह फैला दिया "सोसायटी के रुपया से बाघेल साहब  ने बाइक खरीद लिया" । सहकारिता विभाग में लिखित शिकायत के कारण MP Govt. का सहकारिता विभाग द्वारा सोसायटी की जांच हुई जिसमे मैं बेदाग निकला । अब मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ गई की सदस्य बनने की होड़ लग गई । करीब 500 सदस्य हो गए । एक महीने में रू का कलेक्कसन एक लाख से ऊपर तक पहुंच गया ।  मुझे एक मिनट का भी समय नही मिलता,ट्यूसन,सोसायटी से इतना व्यस्त हुआ की सुबह 7 बजे घर से निकलता तो रात के 11:30 पर घर आता । 9वी, 10वी, 11वी, 12वी के PCM रटा गई । मुंहमांगा ट्यूसन फीस मिलती । खूब कमाई हो गई । फेक्ट्री में जहां खड़ा हो जाऊं वही पर पांच सात लोग खड़े हो जाए, स्मोकिंग रूम में जाऊ तो वहा भी भीड़ लग जाए । फेक्ट्री के मैनेजर तक टोकने की हिम्मत नही करते । पर मैं मेरे काम में कोई लापरवाही नही करता, जो काम मिलता उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ करता ।
फेक्ट्री में बघेल एक ब्रांड नेम बन गया । सोसायटी में FD/RD (फिक्स/रेकरिंग डिपोजिट) लेने लगा, मकान बनाने के लिए रजिस्ट्री गिरवी कर  लोन देने लगा, तीन तीन लाख तक लोन देने लगा । एक एक रु के लिए तरसने वाला व्यक्ति नोट गिन गिन कर थकने लगा । 
पर मेरा ट्यूसन पढ़ाना बंद नही किया । लोगो को बड़ा आश्चर्य लगता, लोग मुझे कहने लगे "तू सोता कब है यार" । इसी दौरान घर में खाली पड़े प्लाट पर पूरा मकान बनवा लिया दो कमरे खाली पड़े थे तो एक में सोसायटी की आफिस और एक खाली ही पड़ा था ।  1998 से 2003 कैसे आ गया पता ही नही चला । मार्च 2003 में एक सेलरान 1.7Ghz कंप्यूटर और Epson एक प्रिंटर खरीदा और सोसायटी के अकाउंटिंग के लिए साफ्टवेयर बनवा लिया । 
          नवंबर 2003 में मेरे जीवन में एक बार फिर एक टर्निंग प्वाइंट आया । कालोनी में ही श्याम घारगे की किराने की दुकान थी, वहा सिगरेट पीने अधिकांसतह रुकता था । (सिगरेट 1984 से ही पी रहा था) । उन्होंने बताया की कालोनी के "बसरा साहब" अपना कंप्यूटर सेंटर बेच रहे है । अगले दिन उनके घर गया और उनके कंप्यूटर सेंटर में सिर्फ तीन कंप्यूटर थे तीनो कंप्यूटर सहित खरीद लिया और घर में आरंभ कर दिया । मुझे तो Computer का C भी नही पता था । जो लड़की बसरा के यहां पढ़ाती थी वही मेरे यहां भी पढ़ाने लगी, सिर्फ दो स्टूडेंट्स थे । अब दूर वाले ट्यूसन छोड़ने लगा और कंप्यूटर सेंटर के प्रचार प्रसार में लग गया नाम रखा ....
"High Tech Copmuter Education" । बड़े बड़े पोस्टर पैंपलेट छपवाया और रात में खुद ही पोस्टर लगाता दीवारों में । खुद ही पैंपलेट बाटता । रिस्पांस मिलने लगा तो और कंप्यूटर खरीदने लगा, इस तरह धीरे धीरे घर में ही 10 कंप्यूटर रख लिया  और जो लड़की पढ़ाती थी उसी से कंप्यूटर सीखने भी लगा । 
सोसायटी का सुरु से लेकर तो अभी तक मैं ही अध्यक्ष रहा क्योंकि मेरे सामने कोई चुनाव ( सहकारिता विभाग प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव करवाता है) जीत ही नही सका । 
(शेष अगले भाग में)

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 06) ।


अब मेरा जीवन इतना व्यस्त हो गया कि लाइब्रेरी जाना छूट गया । औलिया जी के यहां आना जाना बंद हो गया क्योंकि ड्यूटी, छोटा सा बिजनेस व,सोसायटी में व्यस्त हो गया । 
मकान मालिक का 9 बाय 8 फिट के कमरे से निकल कर फ्रंट का दो दो रूम ले लिया क्योंकि साड़ी के ग्राहक और सोसायटी के सदस्य अब रूम पर आने लगे तो जगह कम  पड़ने लगी ।।
सोसायटी से थोक में किराने का समान लाते और सभी सदस्यों को थोक भाव में ही 6% वार्षिक ब्याज में लोन पर देते और किस्तों में वापस लेते।  सोसायटी हम सभी सदस्यों के लिया वरदान साबित हो रही थी । इस तरह समय बीतता गया ।  सूरत से साड़ी लाता और सीधे 75% मुनाफे तक बेचता । आर्थिक समस्या पूर्णतः खत्म हो गई । व्यस्तता ऐसी हुई की दिन रात सिर्फ काम ही काम ही काम ।

        नवंबर 1995 में फिर मेरे जीवन का तीसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे यहां 20/11/95 को बालक का जन्म हुआ,  जिसे देखने के लिए, मेरे गांव के पास बरहुला गांव के प्रेमनाथ तिवारी जी प्रथम बार आए जो हायर सेकंडरी स्कूल चलते है । उन्होंने मुझे दो कमरे छोटे छोटे कमरे में रहते देख बोले.... "आपको मकान दिला देता हूं", और  इस तरह 9/12/95 को 70K लोन सेंसन हो गया और बाकी के 95K रू की व्यवस्था कर के मकान बन गया । 12/6/ 1996 को अपने मकान में रहने आ गया । कुछ कारणों से  यहां आकर साड़ी का बिजनेस बंद कर दिया ।  प्रेमनाथ तिवारी जी ने ट्यूसन पढ़ाने की सलाह दिया और कई जगह पर ट्यूसन दिला दिया । घर घर सायकल से घूम कर  ट्यूसन पढ़ाने लगा । एक साल में ही इतने ट्यूसन मिले को सेलरी से अधिक कमाई होने लगी ।  
नई नई जगह मकान लिया,  अपने काम से मतलब रखता, मुंडी नीचे किए सायकल से आता जाता, कालोनी में सिर्फ प्रेमनाथ जी से और गांव के पास के भीमसेन सिंह जी बैस संपर्क था ।

कालोनी वाले बुजुर्ग/लड़के नवरात्रि में कालोनी के चौराहे पर माता जी को बैठाते है । 2 अक्टूबर 1997 को करीब 30 लोग माता जी के लिए शाम को 7 बजे चंदा मागने आए, उस समय मैं व मेरे दोस्त स्व. मुद्रिका प्रसाद तिवारी और जयपाल दुबे के साथ खाना खा रहे थे । श्री मती जी किचेन की खिड़की से ही बोली "मेरे घर मेहमान आए हुए और अभी खाना खा रहे है, आप लोग बाद में आ जाइएगा" । कुछ लोग वापस होने के लिए मुड़े पर एक लड़के ने सभी को रोक लिया और बोला "अरे इसकी तो ऐसी की तैसी चंदा देने से मना कर रहा है,इससे तो चंदा ले कर ही जाएंगे" । ये बात श्री मती जी सुनकर बोली "भैया चंदा के लिए मना नहीं कर रहे, पर अभी खाना खा रहे है,इस लिए बाद में आने के लिए कह रही हूं" । इतने में ओ लडका जोर से चिल्लाया "अरे हम इतने फुरसत नहीं है की बार बार आऊ, और अधिक जोर से  चिल्ला कर बोला, ओय बाहर निकल" । चूंकि हम तीनो आगे के ही रूम में खाना खा रहे थे, इस लिए सारी बात सुनाई दे रही थी और समझ भी भी आ रही थी । उस लड़के की इस तरह की बदतमीजी से भरी आवाज से मुझे बहुत गुस्सा आया, पर गुस्से को कंट्रोल किया और जूठे हाथ ही बाहर निकला तो 30 के करीब अनजान लोगो की भीड़ खड़ी थी, उसी भीड़ में  ओ लडका बोला "क्यों बे क्या दिक्कत है तेरे को, चंदा देने में"। उसकी इस बदतमीजी पर मेरा खून खौल उठा, क्योंकि 11 साल हो गया था देवास में, किसी ने इस लहजे में मेरे से बात नही किया था,फिर भी कंट्रोल किया और उसे जूठा हाथ उठाकर दिखाया और बोला "खाने के बाद दूंगा, तब से आप लोग और घरों से लेकर आ जाइए" । भीड़ में से कुछ लोग बोले "टीक है" । पर उस लड़के ने मेरी बात को इग्नोर किया और अकड़ के साथ बोला "चंदा तो लेकर ही जायेंगे" । उसकी इस बात को इग्नोर करते हुए मैं वापस आने लगा तो उसने मेरा बाया हाथ पकड़ लिया । मैं तो पहले से ही गुस्सा कंट्रोल किए हुए था पर अब कंट्रोल नही हुआ गुस्सा । मैं घुमा और पूरी ताकत से एक घुसा उसके नाक पर मार दिया, ओ कटे पेड़ की तरह भर भरा का गिर पड़ा, और फिर मैं चढ़ गया उसके ऊपर और मारना सुरु कर दिया । भीड़ में भगदड़ मच गई, एक भी नही बचा, सभी भाग गए बस एक महेश मिश्रा मुझे पकड़ने लगा, इतने में स्व. मुद्रिका तिवारी जी ने महेश मिश्रा को मारना सुरु कर दिया तो ओ जान छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ । फिर मैं और मुद्रिका भाई उस लड़के को रोड में घसीट घसीट कर इतना मारा की उसकी पूरी पीठ लहूलुहान हो गई । उसके कुर्ता पायजामा फाड़ दिया । इतने में  कालोनी में रहने वाले  मेरे गांव के पास के स्व.भीमसेन सिंह जी बैस जो  पुलिस में थे, आए और हम दोनो को छुड़ाया ओ लडका चढ्ढी बनियान में जान बचाकर भाग गया ।
मारपीट के बाद जब क्रोध कम हुआ तो लगा की ये तो गलत हो गया, पर परिस्थितियां ऐसी बनी की होनी को कौन टाल सकता है । पूरे कालोनी में तहलका मच गया "दरबार (दरबार यानी राजपूत) को मारा, दरबार को मारा,रोड में घसीट घसीट कर मारा" । ये चर्चा का विषय बन गया ।         अगले दिन सुबह ड्यूटी चला गया, शाम को ट्यूशन पढ़ाकर 9 बजे रात वापस आया, चौराहे पर ओ लडका खड़ा था अपने दोस्तो के साथ,मुझे देखा......
(शेष अगले भाग में)

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 05)

भूली बिसरी यादें (भाग 05)
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मेरी प्रगति कैसे सुरु हुई ?

मनु के वे 59 रू मेरे जीवन का पहला टर्निंग प्वाइंट बना । मेरी आर्थिक समस्या तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए लगभग खत्म हो गई । मेरा हाथ जब काम के लायक हो गया तो मनु से खाना बनाने के लिए मना कर दिया । दिसंबर 1987 के आखिरी सप्ताह में मेरे रूम पार्टनर जगन्नाथ पटेल वापस देवास आ गए । अब मेरी दिनचर्या ठीक से चलने लगी । कंपनी में 500 रू महीने मिलने लगे । 6 माह बाद परमानेंट हो गया ।।

धीरे धीरे कम्पनी में दोस्ती हुई, मेरे सीनियर आपरेटर अशोक कुमार मिस्त्री ने मधुकर पाटिल से जान पहचान करवाया और हम तीनो ने मिलकर मार्च 1988 में एक सोसायटी बनाया "नूतन मित्र मंडल" । और एक महीने में ही 10 लोग जुड़ गए ।सोसायटी में  हर महीने 20 रू जमा करने लगे । जो राशि एकत्रित होती वह जिसे जरूरत पड़ती लोन के रूप में दे देते और बदले में 1% मासिक ब्याज लेते और मासिक किस्त में वापस लेते । सोसायटी का कैश व लेनदेन का पूरा हिसाब मेरे पास ही रहता । जो रू आते ओ मनु के पास रख देता क्योंकि मेरे रूम का दरवाजा ओपन मैदान तरफ था, चोरी का भय था ।जब जरूरत पड़ती मनु से वापस ले लेता । 
              कुछ महीने में मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ी की सोसायटी में 30 लोग सामिल हो गए । मैं किसी समय दस रुपए के लिए तरसता था,अब मेरे पास हजार रु रहने लगे । जब जिम्मेदारी बढ़ी तो मनु के पास ज्यादा रू रखना रिस्की हो गया,क्योंकि मनु और अनिल स्कूल चले जाते, औलिया जी ड्यूटी चले जाते, मैं भी ड्यूटी चला जाता, इस लिए तीन लोगो के नाम से ज्वाइंट खाता खोल लिया और खाते में बैंक खाते में रू जमा करने लगे ।

मई 1989 में मेरी शादी हो गई  । शादी में अनिल भी चला था मेरे साथ ।  पत्नी को ले आने के पहले ही औलिया जी के यहां से रूम खाली करके पास ही में ठाकुर भवन में रहने लगा । क्योंकि फेमिली के लिए सुरक्षित मकान था । 16 मार्च 1990 को श्रीमती जी को देवास लाया तब मेरा मासिक वेतन 800/ रू के लगभग था । खर्च टीक से नही चलता था तब मेरे अजीज दोस्त रामेश्वर भार्गव से उधार रू लेता था । 
कुछ महीने बाद ठाकुर भवन छोड़कर "सुक्रवरिया हाट" के दरबार निवास में रहने लगा । सोसायटी को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करता रहा, खुद के आर्थिक विकास के लिए कुछ नही करता । इसी दौरान बेटी भी आ गई । खर्चे बढ़ते गए पर इनकम नही बढ़ रही थी । कुल मिलाकर परेशानी में ही दिन निकल रहे थे । 8 घंटा ड्यूटी और बचा समय लाइब्रेरी में बीतता, क्योंकि पुस्तके पढ़ने का बहुत सौख था । नई सायकल भी खरीद लिया कुछ बचत से । जब किसी को सायकल में LPG गैस का सिलेंडर बांधकर जाता देखता तो मुझे भी सोख लगता । मैं सोचता "क्या मेरे पास एलपीजी का सिलेंडर, चूल्हा होगा" । 1991 में कंपनी से 3200 रू एरियल मिला तो गैस कनेक्शन लिया ब्लैक में ।

       फिर मेरे जीवन का दूसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे दोस्त बृंदावन साहू जो मेरे साथ मेरी ही फेक्ट्री में थे, वे सूरत से साड़ी लाते और बेचते । उन्होंने मुझे भी इस व्यवसाय के लिए उत्साहित किया । सोसायटी के तीन मित्रो से उनके नाम का और मेरे नाम का लोन लिया और मैं भी साहू जी के साथ सूरत गया और साड़ी लाकर बेचने लगा ।  ड्यूटी टाइम के बाद सायकल के केरियर में साड़ी रखकर देवास के आसपास के गावों में साड़ी, फाल,ब्लाउज,के कपड़े बेचने लगा । शुक्रवार के दिन रूम के सामने ही बाजार लगता  तो ड्यूटी नही जाता और घर के सामने ही बाजार में जमीन पर प्लास्टिक बिछाकर उसी पर साड़ी आदि बेचता । साड़ी के बिजनेस में अच्छी कमाई होने लगी । मेहनत मेरी, मैनेजमेंट मेरी पत्नी का । हमारे खर्चे फेक्ट्री के वेतन से ही चलता, बिजनेस का एक रु भी खर्च के लिए नही निकालता । 6-6 /7-7  घंटे तक 15-20 kn दूर दूर गांवों में जाकर साड़ी बेचता, फिर ड्यूटी भी करता । पैसा आने लगा तो मेहनत करने का मन भी पड़ने लगा । जब कुछ रू बचा लिया तो मैं और मेरे दोस्त रामेश्वर भार्गव ने 1992 में 30 बाय 50 फिट का प्लाट 12000 रू में खरीदा और आधा आधा (15 बाय 50) प्लाट की रजिस्ट्री करवा लिया ।
शेष अगले भाग में ।।

सोमवार, 19 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 04)

भूली बिसरी यादें (भाग 04)
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ग्वालियर में रहते हुए मेरा हाथ करीब 80% टीक हो गया था,पर घाव पूरी तरह से नही भरा था,हाथ को कंधे के सहारे एक पट्टे में लटका रखता था । एक दिन एक पत्र मिला जिसमे मुझे वापस देवास जाने/आने का निर्देश था (यहां विस्मृत हो रहा है की पत्र गांव से आया था या देवास से मकान मालिक औलिया जी ने भेजा था,आते समय औलिया जी को घर का व ग्वालियर का पता देकर आया था) । भाई साहब ने टिकट कटवाकर ट्रेन में बैठा दिया,कुछ रू भी दिया थे पर याद नही कितना दिया था । 

देवास आकर मकान मालिक ने GBGL कंपनी का ज्वाइनिंग लेटर दिखाया और बोले ज्वाइन कर लो । (कंपनी में इंटरव्यू देते समय ओलिया जी का पता दिया था) । मकान मालिक के लडके अनिल ने मेरी सायकल टीक करवा दिया, शाम का खाना मकान मालिक के यहां खाया, सुबह 10 बजे कंपनी गया और ज्वाइन करने किए एक माह का समय मागा,हाथ के कारण । तब कंपनी का HR श्री बादशाह जी (मुस्लिम) बोले "तू तो ज्वाइन कर ले, कोई काम मत करना जब तक हाथ टीक नही हो जाए,मैं बोल दूंगा एम. सिंह (मेरे सुपरवाइजर) को । फिर भी मैं तैयार नहीं हो रहा था, हाथ के कारण तो बादशाह जी फिर बोले "फिर ये नौकरी दुबारा नही मिलेगी" । उस समय जीबीएलएल देवास की टॉप कंपनी में से एक थी । मैने ज्वाइन कर  लिया और एक हाथ से ड्यूटी करने लगा । ड्यूटी के नाम पर दिन भर बैठा रहता मशीन की आड़ में । जो मेहनत थी तो बस एक हाथ से कुल 16 km सायकल चलाने की । 

इस दौरान मकान मालिक की लडकी मनु सुबह,शाम दोनो टाइम मेरा खाना बना दिया करती, बर्तन धो दिया करती, यहां तक की मेरे कपड़े भी धोकर प्रेस कर देती । (आज भी उसके लिए ढेर सारी दुआए निकलती है दिल से) । 
भाई साहब के दिए रुपए कुछ दिन तो चले फिर राशन खत्म हो गया,तो मनु अपने घर से आटा लाकर रोटी,सब्जी बना कर दे देती । 
एक दिन सायकल पंचर हो गई, तो मनु से बोला " तेरे पास 2 रू हो तो दे मुझे" । तो बोली "क्या करोगे भैया" । उसे बताया कि मेरे पास दो रुपए भी नही है की पंचर बना लूं । तो तुरंत 05 रू लाकर दे दिया । 
 फेक्ट्री की केंटीन में कूपन इसू हो गया तो दोपहर में फेक्ट्री में ही खा लेता और सिक्योर्टी वालों की नजर बचा कर चार, पांच रोटी और सब्जी पॉलिथीन में रखकर  सायकल के केरियर में रूमाल में लपेटकर रख लेता और रूम पर ले आता, क्योंकि मुझे रोज रोज मनु द्वारा लाई गई रोटी खाना अच्छा नही लगता था । पर चोरी ज्यादा दिन नहीं चली, एक दिन सिक्योर्टि गार्ड ने पकड़ लिया रोटी लाते हुए 😭 और सिक्योरिटी आफिसर नितिन गौर जी के पास ले गया । उन्होंने रोटी रखवा लिया और बोले "अब ऐसा मत करना,कंपनी के नियम के खिलाफ है" । 
मेरा स्वाभिमानी मन विद्रोह पर उतर आया । उस दिन पहली बार मेरे मन में नौकरी छोड़कर गांव जाने का ख्याल आया । पर किराए के लिए भी रू नही थे 😭 ,कैसे आता । (मैं बहुत ही अंतर्मुखी स्वभाव का हूं, जल्दी से मेरी परेशानी किसी को नही बताता) । अगले दिन कंपनी में अग्रिम सेलरी के लिए एप्लीकेशन दिया पर मंजूर नहीं हुई । GBGL से ड्यूटी से बाहर निकला और फ्लूडोमेट कंपनी गया और 8 दिन की सेलरी मागा पर नही मिली । बहुत निराश होकर रूम  लौट कर आया । आते ही बाहर मनु खड़ी थी, मेरा उदास चेहरा देख कर पूछी "क्या हुआ भैया,आज बहुत उदास लग रहे हो" । उसे कुछ नही बोला । जब ओ बार बार पूछने लगी तो परेशानी बताया तो बहुत ही मासूमियत से बोली "बस इत्ती सी बात के लिए मुंह लटका लिए" और हंसने लगी । मैं रूम के अंदर आ गया, कुछ देर बाद मनु आई, दरवाजे से आवाज लगाया, मैंने दरवाजा खोला तो  एक पॉलिथीन मुझे पकड़ा दिया, मैने पूछा "इसमें क्या है री" । तो बोली "सिक्के है रख लो" ,और मेरी  प्रतिक्रिया जाने बिना ही चली गई । मैने पॉलिथीन खोला और सिक्के गिने तो 59 रू निकले । पहली बार मुझे उस लड़की के लिए स्नेह जगा ।। 

मनु लक्ष्मी थी,उसके दिए रू के बाद मेरी परेशानी खत्म हो गई । फिर मुझे GBGL की पहली पेमेंट मिल गई और रोटेशन बन गया । पेमेंट मिलते ही मनु के 59 रू की जगह 65 रू  लौटा दिया तो 6 रू मुझे वापस कर दिया ।
(इस भाग में कुछ बाते ऐसी है जिसे आज तक किसी को नही बताया । जैसे रोटी की चोरी वाली बात, मनु के दिए 59 रू वाली बात।)  
(शेष भाग 05 में)

रविवार, 18 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 03)

भूली-बिसरी यादें भाग 02 से आगे....

हम तीनो रूम पार्टनर जो कपड़े पहनकर आए थे वही थे हमारे पास । छुट्टी के दिन कपड़े धोते और फिर छः दिन पहनते,पर फेक्ट्री में मशीन चलाते समय कपड़े दो,तीन दिन में ही गंदे हो जाते । मेरे पास एक कुर्ता पायजामा था पर कुर्ता पायजामा फेक्ट्री में येलाऊ नही था । एक बार शाम को कपड़े धोए पर सुबह तक सूखे नही तो गीले कपड़े ही पहनकर ड्यूटी किया कांबले जी गीले कपड़े देख समझ गए । तब उन्होंने ही बताया शुक्रवार को सुकरवारिया हाट लगता है,वहां पुराने कपड़े भी मिलते है । बस फिर क्या था,अंधेरे में रोशनी मिल गई । शुक्रवार को हम तीनो गए और गुदड़ी बाजार (पुराने कपड़े की बाजार)  किसी के पहने हुए 02 पुराने पैंट,शर्ट खरीद लाए और टेलर से अल्टर करवा लिया और खूब बढ़िया धोकर साफ कर लिया और पहनने लगे । अब हमारी कपड़े वाली समस्या हल हो गई ।

इसी दौरान बीच में 750 km दूर गांव गया और कुछ और जरूरी समान ले आया,जिसमे एक सायकल भी थी । 

एक कमरे में विष्णु चौधरी पत्नी,एक बच्चा और एक भतीजा के साथ रहते थे,पीछे कमरे में हम तीन रहते थे । विष्णु चौधरी ने एक दिन मेरे से बोले " मेरे बच्चे और भतीजे को पढ़ा दिया करो शाम को" । मै मन ही मन खुस हुआ,चलो 20,25 रू महीने का इंतजाम जो गया । पर एक माह बाद तो क्या तीन माह बाद भी चौधरी ने दस रुपए भी नही दिया, और मैं संकोच के कारण माग भी नही सका । 

एक दिन चौधरी मुझे अपने रूम में बुलाया और बोले "यार बघेल साहब, (साहब क्यों लगाया मेरे साथ क्योंकि मैं भी उन्हें चौधरी साहब ही कहता था) । आपके साथ ओ काला लडका है, ओ मेहतर है क्या" ? मैं गर्दन नीचे कर लिया, वे समझ गए की बात सही है । उन्होंने आर्डर दे दिया । "महीना पूरा हो जाए तो खाली कर देना" । और उसी दिन से रामनाथ का बाथरूम यूज करना बंद कर दिया । रामनाथ बाहर लोटा लेकर पास के मैदान में जाने लगे, मै भी कभी कभी  उनके साथ चला जाता । कमरे के सामने ही बाहर नहाने लगे । 

नहाने के बाद अपने चढ्ढी बनियान बाहर नहीं टांगते क्योंकि चौधराइन ने मना कर दिया  बोली "हम छू लेंगे तो नहाना पड़ेगा" । एक दिन रामनाथ का छोट भाई फेक्ट्री के गेट पर आया और एनटीपीसी में सलेक्सन होने की खबर बताया और उसी दिन शाम को इंदौर-बिलासपुर ट्रेन से रीवा चले गए । बस रामनाथ करीब पांच माह साथ रहे । 

13 अक्टूबर 1987 को किर्लोस्कर में हमारी  एक साल की अप्रेंटीसशिप पूरी हुई । सभी 13 लडके बेरोजगार हो गए, मैं भी उन्ही में सामिल था । देवास की कई फैक्ट्रियों के गेट पर जाते नौकरी की आस में पर कही नही मिली, 15 दिन से घर बैठे बैठे रोटी खाते । अगले महीने के मकान मालिक के किराए की चिंता होने नही देती थी रात भर । मजबूर होकर एक वर्कशाप में लेथ मशीन पर काम करने लगा  05 रू रोज में । 

इसी दौरान घर मे दाऊ साहब को पत्र लिखा कि नौकरी छूट गई है ,कुछ खर्चे के लिए भेज दीजिए तो यही पर नौकरी तलास लूं । करीब 20 दिन बाद घर से बड़े भाई साहब का लिखा हुआ पत्र आया जिसमे घर वापस आने की बात कही । पर मैं वापस नही गया और देवास में ही स्ट्रगल करने लगा । 
एक दिन चौधरी जी बोले "मेरा छोटा भाई आ रहा है,ओ भी देवास में नौकरी करेगा इस लिए रूम खाली कर दो" । तब पास में ही हनुमंत सिंह ओलिया (काछी) के यहां रूम ले लिया । ओलियां जी किर्लोस्कर में ही थे । सज्जन व्यक्ति थे । 

वर्कशॉप में करीब दस दिन काम किया होगा, इस दौरान काशीप्रसाद विश्वकर्मा जो हमारे रीवा के थे, उनसे जान पहचान हुई तो उन्होंने "फ्लूफोमेट" नाम की कंपनी में अपने साथ लगवा लिया । इस कंपनी में हवाई जहाज की कपलिंग बनती थी । 

इस कंपनी रात की पाली में ड्यूटी मिली । 8 दिन तक तो आराम से ड्यूटी चलती रही, किर्लोस्कर का अनुभव यहां खूब काम आ रहा था । पर एक दिन अचानक 9 वे दिन "जाब" को लेथ मासीन के चक में सीधा लगाते समय बाएं हाथ की हथेली लेथ मासीन के चक और जाब के बीच में फस गई और ब्लेड जैसे तेज धार वाले टूल से कट गई, खून की धार बह चली । बगल के आपरेटर को आवाज दिया तो उसने हाथ को निकाला और केबिन में बैठे सुपरवाइजर के पास ले गया ।।

UP में मानिकपुर के एक सुपरवाइजर थे "चंदेल जी" उन्होंने हाथ में दवाई लगाया, ड्रेसिंग किया और बोले "आप MG हॉस्पिटल चले जाओ, वहा टांका लगवा लेना और घर चले जाना" । उस समय रात के 2 बज रहे थे ।   कंपनी बहुत छोटी थी, कोई सुविधा नही थी तब । टूटी हुई सायकल टूटी फूटी रोड पर घसीटते हुए चल दिए, चूकि घाव गहरा था तो खून रिस रिस कर ड्रेसिंग पट्टी को लाल कर दिया, तो हाथ को सीने से चिपका लिया । दर्द के मारे हाथ अकड़ रहा था,फिर भी चलना तो था । जब NH3 पर आया तो रोड थोड़ी अच्छी थी, एक ऊंची जगह देखकर सायकल पर चढ़ गए,और चलने लगा, मुस्किल से एक km ही गया होगा की सामने से एक ट्रक आया और सायकल सकरी रोड से नीचे उतारते ही  सम्हाल नही पाया और गिर गया, जमीन से वही बाया हाथ टकराया और उफ....😥😥 खूब की धार बह चली । दर्द के मारे हाल बेहाल हो गया । खैर...इंसान हूं,हिम्मत किया और बाबडिया चौराहे से तो MG हॉस्पिटल तक पैदल चलने लगा,वर्तमान विकास नगर चौराहे पर (तब यहां इतना विकास नही हुआ था) । किसी की रूमाल गिरी थी, उसे उठाया और दाए हाथ से घुमा घुमा कर कस कर बांध लिया तो खून का बहना बंद हो गया 
            
           रात के करीब 3 बजे MG हॉस्पिटल पहुंचा, और आपातकालीन वार्ड में गया, सोते हुए कंपाउंडर को उठाया, डाक्टर या नर्स कोई था नहीं, बड़ी मुस्किल से कंपाउंडर उठा,और बिना आंख खोले ही झल्लाते हुए बोला "जाओ सुबह आना" । मैने फिर से निवेदन किया और बोला "साहब जी, मेरे हाथ में चोट लगी है,खून बह रहा है, ड्रेसिंग कर दीजिए" ।  तब उसने आंख खोला और मेरे हाथ से टपकते खून को देखा, तो शायद उसे दया आ गई,सामने ड्रेसिंग टेबल की तरफ इसारा किया "वहा बैठ जाओ" । ड्रेसिंग टेबल पर बैठ गया, फेक्ट्री में बांधी गई ड्रेसिंग पट्टी को खोला तो देखा, घाव ऐसा लग रहा था जैसे "देशी ककड़ी पक कर फूट जाती हो" उसी तरह से पट्टी खोलते ही दोनो तरफ की चमड़ी विपरीत दिशा में फैल गई । कंपाउंडर बोला "ये तो चाकू का घाव है,पुलिस केस है,पहले पुलिस को सूचना देनी पड़ेगी, फिर ड्रेसिंग होगा"।  मैने बोला " भाई साहब पहले ड्रेसिंग कर दीजिए,खून बंद हो जाए फिर पुलिस् को सूचना दे देना" । उसने मेरी बात मान लिया,और टांका लगाने की सुई ले आया, घाव को आधा अधूरा साफ किया और फिर एक एक करके टांका लगाना सुरु किया, तो मैंने बोला "सुन्न का इनजेक्सन लगा दीजिए, नही तो बहुत दर्द होगा" तब कंपाउंडर बोला "शून्य का इंजेक्शन तो डाक्टर ही लगाते हैं,जो है नही अभी" । मैं निरुत्तर हो गया । कंपाउंडर ने टांका लगाना सुरु किया, एक टांका मुझे एक एक युग के बराबर लग रहा था, क्योंकि कंपाउंडर घाव के एक तरफ की चमड़ी को चिमटी से पकड़कर उठाता खींचता फिर सुई चुभोता धागा खींचता, फिर दूसरी तरफ की चमड़ी चिमटी से पकड़ कर उठाता, खींचता और सुई चुभोता और धागा खींचता फिर दोनो तरफ के धागे को खीच कर गठान लगाता और फिर कैंची से काटता । फिर दूसरा टांका लगाता, इस तरह से 6 टांका लगाया और दर्द की टेबलेट्स दिया,टेबलेट्स तुरंत ही खा लिया । OMG उतना दर्द मैने जीवन में पहली और आखिरी बार सहन किया था । टांका लगने के बाद करीब 25 मिनट तक बैठा रहा बेंच पर । अबतक डाक्टर साहब आ गए थे,कंपाउंडर बोले "डाक्टर साहब आ गए है,दिखा दो" । डाक्टर साहब को दिखाया,जो दवाइयां लिखा था,मेडिकल स्टोर से ले लिया । अब दर्द कम हुआ तब सायकल उठाया और सुबह के 04:30 बजे रूम पहुंचा, अंधेरे में बड़ी मुस्किल से ताला खोला, क्योंकि रूम पार्टनर पटेल जी गांव गए हुए थे । 
    दर्द कम हुआ तो नींद लग गई तो सुबह 9 बजे नींद खुली ओ भी भूख के कारण । अकेला इंसान,हाथ में चोट लगी,क्या बनाए,कैसे बनाए । पर पेट की ज्वाला शांत तो करना ही था । एक हाथ से स्टोव तो जला नही सकता, पास ही किराने की दुकान गया और 2 पैकेट बिस्कुट ले आया, एक बार में ही दोनो पैकेट बिस्कुट खत्म कर लिया, दवाई खाया और पेट भर पानी पिया और फिर आंख बंद करके लेट गया । 

कास आज मेरे पास मेरे परिजन होते,मेरी मां होती, मेरे दाऊ होते तुझे इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती । बरबस ही आंखों से आसू छलक पड़े । 

दो घंटे बाद फिर से भूख लग गई, अब बिस्कुट से काम चलने वाला नही था । वापस किराने की दुकान गया और चना ले आया,उसे पानी में गला दिया । जब आधा अधूरा गल गया तो नमक छिड़क कर चबा लेता । क्योंकि जेब में इतने रुपए तो थे,नही की होटल में जाकर कुछ खा आता । 

मकान मालिक आगे के दो कमरे में रहते थे,सबसे पीछे के रूम में मैं रहता था । बिधुर मकान मालिक के परिवार में तीन लोग थे,खुद मकान मालिक, एक 15 -16 साल का बेटा और 14-15 साल की लड़की । दो एक ही क्लास में थे । सामन्यातौर पर मकान मालिक या उनका परिवार मेरे कमरे तरफ कभी झांकते भी नही थे, इस लिए उन्हें पता नही चला । 

दो दिन चना खा कर काम निकाल लिया,कई दिन हो गया थे नहाए  हुए,तो बाथरूम में नहाने जाने लगा तब मकान मालिक की नजर मेरे उपर पड़ी तो पास आए और देखकर पूछा, उन्हे सारी बात बताया । जब उन्हें पता चला की मैं दो दिन से चना खाकर रह रहा हूं तो बहुत दुखी हुए और बोले "अब मेरे वहा खाना,भूखे मत रहना" । बरबस ही मेरे आंखो से आसू छलक पड़े उनके स्नेह के कारण ।
उस दिन रविवार था, बच्चे घर पर ही थे, मकान मालिक औलिया साहब ने लड़की को आवाज दिया "मनु,मनु" तब मनु आई तो उसे बोला "आज से बघेल भैया के लिए भी खाना बना लेना" । और सारी बात बताया तो  मनु भी बहुत स्नेह से बोली "ठीक है" और मेरी तरफ देखकर लगभग डाटते बोली "कितने बड़े पागल हो आप, हम सब के रहते हुए आप चने खाकर रह रहे हो" ।
उस दिन से मकान मालिक के यहां खाने लगा,मनु बहुत प्रेम से खिलाती,उनका लड़का अनिल भी बहुत प्रेम से बोलता । कुल मिलाकर औलिया साहब का पूरा परिवार बहुत ही अच्छा है ।।
दो दिन बाद घाव में बहुत दर्द होने लगा,मैं समझ गया, घाव पक रहा है,मेरे पास न तो इलाज के लिए पैसे है, और कब तक मकान मालिक पर बोझ बनूगा । ये सोचकर ग्वालियर चला गया जहा मेरे आर्मी वाले बड़े भाई रहते थे । 
ग्वालियर में करीब करीब एक माह रहा, बड़े भाई ने भाभी जी ने पूरा ख्याल रखा,दोनो का स्नेह आज भी मुझे उनका ऋणी बनाए हुए है ।।
(शेष अगले भाग में)

शनिवार, 17 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 02)

देवास के मोती बंगला कालोनी  में रेलवे पटरी के किनारे ही रूम मिला (वर्तमान में ओवरब्रिज भी है) । हम तीनो ने अपने अपने बोरिया बिस्तर रखने के बाद घर से लाई पूड़ी,गुड खाकर सो गए ।  अगले दिन 15 अक्टूबर 1986 को हमे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी । लंबे सफर की थकावट, मानसिक कष्ट झेलने के कारण सुबह नींद लेट खुली । लैट्रिन, बाथरूम इंगेज ।  क्योंकि मकान मालिक के तीन लड़के, दो वे खुद,सुबह एक लैट्रीन, एक  बाथरूम कैसे खाली रहेगा भला, मैने तो लोटा उठाया और हल्के अंधेरे का फायदा उठाते हुए ट्रेन की पटरी के किनारे हल्के होकर आ गए । पर हाथ धोने के लिए जगह नहीं, क्योंकि बाथरूम में मकाल मालकिन जो घुसी तो निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी, मजबूर होकर नल से बाल्टी भरे और रोड पर ही अपना कुल्ला,मुखारी,स्नान सब हो गया । हम तीनो इसी तरह फ्रेश हुए ।

सोचा था गुड रोटी खाकर काम चला लेंगे आज, मुझे मीठा बहुत पसंद है, इस लिए माता जी ने आधा किलो गुड़ दे दिया था । रोटी बनाने के लिए  मैं स्टोव जलाने लगा, तो पिन स्टोव के बर्नर में ही टूट गई । रोटी बनाने का प्लान चौपट हो गया । 

जब घर से देवास के लिए निकले थे तब पूज्य माता जी ने थोड़ी,थोड़ी खाद्य सामग्री की पोटली बांधकर दे दिया था, बोली "जाते से नई नई जगह में कहा तलासोगे" । 

बचपन से ही मेरी ऐसी आदत बनी है की सुबह बहुत तेज भूख लगती है । पर अब क्या करू, भूख जमकर लगी थी, जिस पोटली में पूड़ी बांधकर लाए थे, ओ रूम के किनारे कोने में पड़ी थी,उसे टटोला तो देखा एक पूड़ी रही थी,पर चीटियां आ गई थी ढेर सारी, पूड़ी को उठाया, चीटियां को झटकार कर, खाने के लिए निकाला तो रामनाथ टोक दिए "दादा लास्ट में मैने पूड़ी खाया था, ओ छुतीही हो गई मत खाइए आप" । मैने बोला "अरे छोड़ो,भूख से बढ़कर कुछ नही" पर रामनाथ नही माने और पूड़ी मेरे हाथ से ले लिया ।  भूख ऐसी लगी थी की खड़े होते नही बन रहा था, फिर भी वही सफर वाले पैंट, सर्ट पहन कर तैयार हुए । पर बार पेट गुहार लगाए, तो एक कटोरी में लगभग 100 ग्राम आटा को घोला और जैसे तैसे करके पी गया 😥। क्योंकि इतने पैसे नही थे पास कि, बाहर जाकर समोसा, कचोरी आदि खा सकूं । 
6:45 पर फेक्ट्री का सायरन बजा तो हम तीनो ड्यूटी के लिए निकल पड़े । किर्लोस्कर फेक्ट्री के NW शॉप में श्री  श्याम कांबले जी (मराठा क्षत्रिय) के साथ हम तीनो को सुपरवाइजर "साइबा"  ने मसीन चलाने को सीखने के लिए खड़ा कर दिया । श्याम कांबले जी भी सज्जन इंसान है, जान पहचान हुई । रामनाथ बहुत निश्छल स्वभाव के थे उन्होंने  अपनी जाति भी उन्हे बता दिया । हालाकि कोई नकारात्मक भाव नही आए उनके चेहरे पर ।।

लंच का सायरन बजा,हम लंच में नही जा रहे थे,तो श्याम कांबले जी पूछे "भूख नही लगी है क्या" । मैने बताया "कुछ लाए ही नही तो खाऊंगा क्या केंटीन में जाकर,इस लिए यही स्मोकिंग रूम में बैठेंगे" । 
श्याम कांबले जी सज्जन इंसान है, बोले "चलो तो सही" । सुबह की पिया हुआ आटे का घोल पच चुका था, भूख  की हालत सुबह जैसे फिर से हो गई थी । मारता क्या न करता, तीनों किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह पीछे पीछे चल दिए । 
जीवन में पहली बार किसी फेक्ट्री की कैंटीन देखा । घुसते ही तरह तरह के खाने के आयटम (सभी वर्कर अपनी अपनी टिफिन खोलकर बैठे थे) ने भूख और बढ़ा दिया ।
श्याम कांबले जी ने 15-15 पैसे के तीन कूपन दिए और बोले "जाकर एक एक कटोरी कढ़ी लाओ" । हम तीनो चले गए काउंटर पर,5 मिनट बाद जब लौट कर आया तो देखा की टेबल पर करीब 25-30 रोटी रखी थी, उसमे कुछ पराठा, कुछ पूड़ी भी थी । दरअसल हमारे जाने के बाद कांबले जी ने सभी से एक एक,दो,दो,रोटी हमारे लिए माग लिया । कसम से रोटी देखकर पलक के कोने नाम  पड़ गए । वाह री मालवा की मिट्टी, वाह री मालवा के लोग । केंटीन में बैठे सभी को तरफ नज़र उठा कर देखा और बरबस ही दिल से आवाज निकली "आप सभी में देवताओं का अंश है" । 
("तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करू" । यदि ये गाना उस समय होता तो मुंह से यही निकलता ।)  किसी ने सच ही कहा है "दाने दाने में लिखा है खाने वाले का नाम" ।। सच कहूं उन रोटियों जैसा स्वाद मुझे आज तक नही मिला ।

इस तरह ड्यूटी आराम से होने लगी,मसीन सीखते सीखते 7 नवंबर आ गया,पहली सेलरी मिली शायद 147 रू थी (टीक से याद नही) तीन रू ESI के कट गए थे ।  
एक दिन अचानक बज्रपात हुआ, हम जैसे चार बजे ड्यूटी से आए, घर में घुसने लगे तो मकान मालिक आग बबूला हो गए और जोर से चिल्लाए "तुम ठाकुर हो ? कैसे के ठाकुर हो ? जो भंगी को साथ में रखे हो, ये (रामनाथ की तरफ इशारा किया) मेरे यहां नही रहेगा,तुम दोनो रहो कोई दिक्कत नही" ।
मैने बहुत अनुनय,विनय किया पर मकान मालिक नही पिघले । 
दरअसल मकान मालिक व उनके बेटे ओमप्रकाश ठाकुर (शिवपुरी एमपी के लोधी हैं)  दोनो किर्लोस्कर में थे । कही से पता चल गया था । हालांकि मकान मालिक के लडके ओमप्रकाश ठाकुर ने हमारा पक्ष रखा पर उनकी एक न चली, उनकी माता जी फंगनाते हुई बोली "खबरदार, तू (रामनाथ की तरफ इशारा)  घर में घुसना मत" । मैने बोला "माता जी सिर्फ आज रात इन्हे रहने दीजिए, कल सुबह इनके लिए अलग कमरा देख लूंगा" । पर वे जिद पर अड़ गई । 

हम तीनो वापस गौतम जी के पास "भोषले कालोनी" पहुंचे और अपनी व्यथा बताया, तो गौतम जी तुरंत उठे वही पास में कालोनी में एक विष्णु चौधरी जी (खाती पटेल) जो गजरा गियर में उनके ही साथ थे,उनके यहां रूम दिला दिया, 85 रू महीने में । एक झटके में हमारा 10 रू खर्चा बढ़ गया । पर कोई विकल्प नहीं था ।
        वापस गए और पहले वाले मकान मालिक लोधी जी के यहां से समान उठाने तो मैं और पटेल जी हम तीनो की गृहस्थी उठा लाए,रामनाथ को घुसने नही दिया । हम तीनो आराम से विष्णु चौधरी जी के यहां रहने लगे...पर यहां भी रामनाथ भाई के जाति ने पीछा नहीं छोड़ा...😭😭 ।
(बस अब लिखा नही जा रहा, फिर कभी लिखूंगा) ।
श्री श्याम राव कांबले जी मेरे कालोनी ही रहते हैं । 
#NSB

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 01)

13 अक्टूबर 1986 में जब हम 13 युवक इंदौर,बिलासपुर ट्रेन से नौकरी करने देवास आये थे । जिसमे  07 ब्राह्मण, 03 कुर्मी, एक काछी, एक ठाकुर (मैं खुद) एक बसोर (मेहतर)  । दोपहर 2 बजे से  रेलवे स्टेशन में मायूस होकर खड़े थे, क्योंकि हम देवास में किसी को नही जानते थे,देवास पहली बार आए थे, किर्लोस्कर कंपनी का ज्वाइनिंग लेटर लेकर  । हमारे रीवा में कंपनी से इंटरव्यू लेने वालों ने वादा किया था "कंपनी गेट पर आ जाना, रहने,खाने, नहाने,धोने की  सारी व्यवस्था हो जायेगी" । पर जब हम सभी अपना बोरिया, बिस्तर लेकर कंपनी की गेट पर गए तो कंपनी ने सभी के ज्वाइनिंग लेटर रखवा लिया और बोले " कल सुबह से ड्यूटी पर आ जाना" । जब हमने वादा को याद दिलाया तो साफ नकर गए, बोले "ये सब व्यवस्था खुद करिए" । हमने बहुत विनती किया पर हमारी एक न चली ।  हम सभी पुनः अपना बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर वापस रेलवे स्टेशन आ गए ।
      तब यही इंदौर बिलासपुर वापस 4 बजे आती है । हम सभी ने वापसी का प्लान बना लिए । 13 लडको में से 7 बहुत ही गरीब घर से थे, वे वापस नही जाना चाहते थे, वे रोने लगे । पर एक तरफ कुआं,एक तरफ खाई वाली बात थी । हम सभी रुआसे मन से मुंह लटकाए खड़े थे,हम सभी आपस में हमारी स्थानीय भाषा "बघेलखंड़ी" में बाते कर रहे थे । 
हमारी बाते सुनकर,हम लोगो के उदास चेहरे देखकर श्री महेंद्र गौतम जी (जो पहले से देवास में गजरा गियर में थे) हमारे पास साक्षात देवदूत बनकर आए और हम सभी की पूरी बात सुनकर बोले "कोई वापस मत जाओ, सभी की व्यवस्था हो जायेगी" । फिर अपने पिता जी को ट्रेन में बैठाकर  हम लोगो को अपने साथ ले कर चल पड़े । हम 13 लड़के अपने अपने बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर कर प्रवासी मजदूर की तरह पीछे पीछे चल पड़े । 

बोरिया बिस्तर इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि हम सभी पूरी व्यवस्था से आए थे, स्टोव, कुकर, लोटा,गिलास,थाली, कटोरी,बाल्टी Etc....

श्री महेंद्र गौतम जी का किराए का सिर्फ एक कमरा 9×10 फिट का था, (पर दिल बहुत बिसाल था ) जिसमे एक बच्चा व पत्नी के सात रहते थे ।  हम सभी के समान मकान की गैलरी में रखवा दिया, सभी का परिचय पूछा,जलपान करवाया  और रात के 9 बजे तक 
सभी के लिए  रूम की व्यवस्था करवा दिया । हम सभी 13 लडके दो,दो-तीन, तीन लोग एडजेस्ट हो गए एक एक रूम में । मैं  एक पटेल जी (कुर्मी)  के साथ रूम पार्टनर बन गया । जब सभी गौतम जी के यहां से बोरिया बिस्तर लेकर चल पड़े तो  रामनाथ बसोर जिन्हे कोई अपना रूम पार्टनर नही बनाना चाहता था । रामनाथ, अनाथ जैसे फफक फफक कर रोने लगे और वापस गांव लौटने की तैयारी करने लगे । 

क्योंकि 300/ रू वेतन में 100रू -75 रू,किराया दे कि जीवन यापन कैसे करे ? 

मुझे उनकी रुलाई नही देखी गई तो मैंने उन्हें भी मेरा रूम पार्टनर बना लिया । मेरे रूम पार्टनर पटेल जी थोड़ा नाराज हुए पर उनकी नाराजगी के बाद भी  मैं मेरे निर्णय पर अडिग रहा ।

रामनाथ जी जब तक हमारे साथ रहे,पांव की तरफ बिस्तर लगा कर सोए, कई बार बोला, "बगल में बिस्तर लगा लो" तो उनका एक ही जबाब विनम्रता के साथ रहता था "दादा अपने आश्रय दे दिया,तो क्या आपके सिर पर बैठू, कभी नही दादा, मैं आपकी प्रजा हूं, प्रजा की तरह ही रहूंगा" । 
जब मैं बोलता "यहां काहे का राजा,प्रजा,हम सभी फेक्ट्री मजदूर हैं" । वे मुस्कुरा कर चुप रह जाते । 

हम दोनो खाना निकाल लेते  तभी रामनाथ बर्तन से खाना निकालते, दूर बैठकर खाते, बर्तन धोते और रख देते ।

5 माह बाद रामनाथ का एनटीपीसी सिंगरौली (शक्ति नगर) में सलेक्सन हो गया, चले गए,जाते समय पहली बार मेरे गले लगकर लिपट कर खूब रोये, बार बार मेरा पांव छुए और यही बोले "दादा आप मेरे लिए देवता समान है" । 

एक बार रामनाथ रीवा में मिल गए,मिलते ही रोड में ही दंडवत हो गए । इतना मान,सम्मान मुझे कभी किसी ने नही दिया । 

उसी तरह मैं भी पूज्य महेंद्र गौतम जी को सम्मान देता हूं ।उनका एहसान, आज तक नही भुला हूं । गौतम जी का बाद में CAT (इंदौर) में सलेक्सन हो गया था,अब तो रिटायर्ड हो गए  । 
(ये सब लिखते लिखते कई बार मेरी पलके गीली हुई)
देवास आने के बाद की जिंदगी की सच्चाई फिर कभी लिखूंगा ...।

#NSB

शनिवार, 3 सितंबर 2022

देश के संस्थानों को बेचने की शुरुआत...

आज जो निजी क्षेत्र के 03 सबसे बड़े बैंक है, यानी ICICI बैंक,  HDFC बैंक, और AXIS बैंक - यह तीनों कभी सरकारी बैंक हुआ करती थी, लेकिन पी.वी नरसिम्हा राव सरकार में महान वित्त मंत्री रहे डॉ.मनमोहन सिंह ने इन्हें बेच दिया!

ICICI का पूरा नाम था इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया! यह भारत सरकार की ऐसी संस्था थी, जो बड़े उद्योगों को ऋण देती थी!

एक झटके में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसका डिसइनवेस्टमेंट करके, इसे प्राइवेट बना दिया, और इसका नाम और ICICI बैंक हो गया!

आज जो HDFC बैंक है, उसका पूरा नाम हाउसिंग डेवलपमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया था! यह भारत सरकार की एक ऐसी संस्था हुआ करती थी, जो मध्यम वर्ग के नागरिकों को सस्ते ब्याज पर होम लोन देने का काम करती थी!

नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, "सरकार का काम केवल गवर्नेंस करना है, होम लोन बेचना नहीं है!"

डॉ. मनमोहन सिंह  इसे आवश्यक कदम बताते हैं, और कहते हैं, "सरकार का काम केवल सरकार चलाना है, बैंक चलाना, या लोन देना नहीं है!"

और एक झटके में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने HDFC बैंक को बेच दिया! और यह निजी क्षेत्र का बैंक बन गया!

इसी तरह की बेहद दिलचस्प कहानी AXIS बैंक की है!

भारत सरकार की एक संस्था हुआ करती थी, उसका नाम था यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया! यह संस्था लघु बचत को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई थी! यानी आप इसमें छोटी-छोटी रकम जमा कर सकते थे!

नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, "सरकार का काम चिटफंड की स्कीम चलाना नहीं है!"

और एक झटके में इसे बेच दिया गया! पहले इसका नाम UTI बैंक हुआ, और बाद में इसका नाम AXIS बैंक हो गया!

इसी तरह आज IDBI बैंक है, जो एक प्राइवेट बैंक है! एक समय में यह भारत सरकार की संस्था हुआ करती थी, जिसका नाम था इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया! इसका भी काम उद्योगों को ऋण देना था! 

लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे भी बेच दिया! और आज यह निजी बैंक बन गया है!

अपनी याददाश्त को कमजोर न होने दें कभी!

डिसइनवेस्टमेंट पॉलिसी को भारत में कौन लाया था? जरा सर्च कर लो!

जब नरसिम्हा राव के समय में डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था, "मैक्सिमम गवर्नमेंट, लेस गवर्नेंस!"

उन्होंने कहा था, कि "सरकार का काम व्यवसाय (धंधा) करना नहीं, सरकार का काम गवर्नेंस देना है! ऐसा वातावरण देना है, कि देश के नागरिक यह सब काम कर सकें!"

डॉ. मनमोहन सिंह ने ही सबसे पहले "टोल टैक्स पॉलिसी" लाई थी! यानी "निजी कंपनियों द्वारा सड़क बनाओ, और उन कंपनियों को टोल टैक्स वसूलने की अनुमति दो!"

डॉ. मनमोहन सिंह ने "सबसे पहले एयरपोर्ट के निजी करण" को आरंभ करवाया था, और सबसे पहला दिल्ली का "इंदिरा गांधी एयरपोर्ट" को जी.एम.आर ग्रुप को व्यवसायिक स्वरूप से चलाने के लिए दिया गया!

आज चम्पक उछल-उछल कर नाच-नाच कर, बेसुर राग गाता फिर रहा है, "मोदी ने अपने मित्रों में बेच दिया!"
डॉ. मनमोहन सिंह करें तो - विनिवेश!और मोदी करें तो - देश को बेचा!!

 २००९-१० में डॉ. मनमोहन सिंह ने ५ सरकारी कंपनियां बेचीं!
१. HPC Ltd.;
२. OIL 
३. NTPC 
४. REC 
५. NMDC 

 २०१०-११ में डॉ. मनमोहन सिंह ने ६ सरकारी कंपनियाँ और बेचीं!
१. SJVN 
२. EIL 
३. CIL 
४. PGCIL 
५. MOIL 
६. SCI - 
२०११-१२ मे
१. PFC 
२. ONGC 

२०१२-१३ में डॉ. मनमोहन सिंह ने बेचीं और ८ सरकारी कंपनियां!
१. SAIL 
२. NALCO 
३. RCF 
४. NTPC 
५. OIL 
६. NMDC 
७. HCL 
 ८.  एनबीसीसी!

 २०१३-१४ में डॉ. मनमोहन सिंह ने १२ और सरकारी कंपनियां बेचीं!
१. NHPC 
२. BHEL 
३. EIL 
४. NMDC 
५. CPSE 
६. PGCI 
७. NFL 
८. MMTC 
९. HCL 
१०. ITDC 
११. STC 
१२. NLC

कामीयो वामियो का तो मोदी विरोध में ये हाल हो चुका है , कोई बोले मोदी तुम्हारा कान ले गया, तो ये फोरन लठ ले कर मोदी  के पिछे भागेगे,अपना कान नहीं देखेंगे...

भीम राव अम्बेडकर के बारे में फैलाये गये मिथक और उनकी सच्चाई ?



1- मिथक- अंबेडकर बहुत मेधावी थे । 
सच्चाई - अंबेडकर ने अपनी सारी शैक्षणिक डिग्रीयां तीसरी श्रेणी में पास की ।
2- मिथक - अंबेडकर बहुत गरीब थे ! 
सच्चाई -जिस जमानें में लोग  फोटो नहीं खींचा पाते थे उस जमानें में अंबेडकर की बचपन की बहुत सी फोटो है , वह भी कोट पैंट और टाई में !
3 - मिथक- अंबेडकर ने शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया !
सच्चाई -अंबेडकर के पिता जी खुद उस ज़माने में आर्मी में सूबेदार मेजर थे ! इसके अलावा सविंधान बनाने वाली सविंधान सभा में 26sc और 33st के सदस्य शामिल थे !
4- मिथक- अंबेडकर को पढ़ने नहीं दिया गया ।
सच्चाई -उस जमानें में अंबेडकर को गुजरात बडोदरा के क्षत्रिय राजा सियाजी गायकवाड़ नें स्कॉलरशिप दी और विदेश पढ़ने तक भेजा और ब्राह्मण गुरु जी ने अपना नाम अंबेडकर दिया ।
5- मिथक- अंबेडकर नें नारियों को पढ़ने का अधिकार दिया !
सच्चाई- अंबेडकर के समय ही 15 पढ़ी लिखी औरतों ने संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया !
6- मिथक- अंबेडकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे !
सच्चाई -अंबेडकर नें सदैव अंग्रेजों का साथ दिया भारत छोड़ो आंदोलन की जम कर खिलाफत की अंग्रेजों को पत्र लिखकर बोला कि आप और दिन तक देश में राज करिए उन्होंने जीवन भर हर जगह आजादी की लड़ाई का विरोध किया ।
7- मिथक - अम्बेडकर बड़े शक्तिशाली थे ! 
सच्चाई- 1946 के चुनाव में पूरे भारत भर में अंबेडकर की पार्टी की जमानत जप्त हुई थी ।
8- मिथक अंबेडकर नें अकेले आरक्षण दिया !
सच्चाई- आरक्षण संविधान सभा में दिया जिसमें कुल 299 लोग थे , अंबेडकर का उसमें सिर्फ एक वोट था आरक्षण सब के वोट से दिया गया था और भारत में कई दलित जातियों को आरक्षण 1909 में ही दे दिया गया था !
9- मिथक- अंबेडकर ने सविंधान बनाया । 
सच्चाई- अंबेडकर केवल संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे जबकि पूरी संविधान सभा के अध्यक्ष परम् विद्वान डाक्टर राजेंद्र प्रसाद जी थे और सविंधान का मसौदा , ढांचा बी एन राव ने बनाया था ! 
10- मिथक- अंबेडकर राष्ट्रवादी थे
सच्चाई -1931 में गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी से भारत के टुकड़े करने की बात कर दलितों के लिए अलग दलिस्तान की मांग की थी ।
11 मिथक- आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत थे ।
सच्चाई- इसी आरक्षण को लेकर सरदार पटेल से अंबेडकर की कहा सुनी हो गई थी । पटेल जी संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गये थे , बाद में नेहरू के कहने पर पटेल जी वापस आये थे । सरदार पटेल ने कहा कि जिस भारत को अखण्ड भारत बनानें के लिए भारतीय देशी राजाओं , महराजाओं , रियासतदारों , तालुकेदारों ने अपनी 546 रियासतों को भारत में विलय कर दिया जिसमें 513 रियासतें क्षत्रिय राजाओं की थी । इस आरक्षण के विष से भारत भविष्य में खण्डित होने के कगार पर पहुंच जाएगा ।
12- मिथक- अंबेडकर स्वेदशी थे ।
सच्चाई - देश के सभी नेताओं का तत्कालीन पहनावा भारतीय पोशाक धोती - कुर्ता , पैजामा - कुर्ता , सदरी व टोपी , पगड़ी , साफा आदि हुआ करता था । गांधी जी नें विदेशी पहनावा व वस्तुओं की होली जलवाई थी । यद्यपि कि नेहरू , गाधीं व अन्य नेता विदेशी विश्वविद्यालय व विदेशों में रहे भी थे फिर भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे।अंबेडकर की कोई भी तस्वीर भारतीय पहनावा में नहीं है । अंबेडकर अंग्रेजियत के हिमायती थे । अंत में चाहता हूँ कि अंग्रेज जब भारत छोड़ कर जा रहे थे तो अपने नापाक इरादों को जिससे भविष्य में भारत खंडित हो सके के रुप में अंग्रेजियत शख्सियत अंबेडकर की खोज कर लिए थे ।

बुधवार, 27 जुलाई 2022

कौन किस नंबर का नागरिक है

पद से हटने के बाद किस नंबर के नागरिक बन जाते हैं पूर्व राष्ट्रपति..!
              राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को खत्म हो  गया  है।
क्या आपको मालूम है कि जो राष्ट्रपति पद पर रहते हुए देश के पहले नागरिक होते हैं, वो रिटायर होने के बाद किस नंबर के नागरिक बन जाते हैं. प्रधानमंत्री किस नंबर के नागरिक होते हैं..और हमारे सांसद, विधायक इस कड़ी में कहां आते हैं.
     वैसे आपको बता दें आम जनता को 27वें नंबर का नागरिक माना जाता है.।

देश को द्रौपदी मुर्मू के रूप में नया राष्ट्रपति मिल चुका है. उन्होंने चुनावों में यशवंत सिन्हा को हराया. 25 अगस्त को वह कार्यभार ग्रहण कर लिया है . इसके बाद निवर्तमान हो रहे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद दिल्ली में उन्हें सरकार से मिले बंगले में चले जाएंगे. क्या आपको मालूम है कि पद से हटने के बाद पूर्व राष्ट्रपति देश में किस नंबर के नागरिक बन जाते हैं.

प्रोटोकॉल के अनुसार देश में 26 तरह के नागरिक होते हैं. ये सभी खास पद पर आसीन लोग होते हैं । गृह मंत्रालय में इसकी सूची बनी हुई है कि देश में किन बड़े पदों पर आसीन लोग किस नंबर के नागरिक हैं. ये हम सभी को मालूम है कि देश का राष्ट्रपति राष्ट्र का पहला नागरिक होता है. लेकिन रिटायर होते ही स्थितियां बदल जाती हैं.।

वैसे आपको ये भी बता दें कि देश के आम नागरिक 27वें नंबर पर हैं. उनसे ऊपर देश के उच्च पदासीन या रिटायर हुए लोग होते हैं.। इसमें राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यपाल सभी शामिल होते हैं. रिटायर होने के बाद पूर्व राष्ट्रपति प्रोटोकॉल में 5वें नंबर के नागरिक होते हैं.।
 
देश के पहले नागरिक– राष्ट्रपति, जो अब द्रौपदी मुर्मू होंगी..!
दूसरा नागरिक – देश के उप राष्ट्रपति
तीसरा नागरिक – प्रधानमंत्री, यहां नरेंद्र मोदी देश के तीसरे नंबर के नागरिक हैं
चौथे नागरिक – राज्यपाल (संबंधित राज्यों के)
पांचवें नागरिक– देश के पूर्व राष्ट्रपति (फिलहाल इस स्थिति में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल हैं और रिटायर होने के बाद रामनाथ कोविंद होंगे)
पांचवें नागरिक (A) – देश के उप प्रधानमंत्री
छठे नागरिक – भारत के मुख्य न्यायधीश और लोकसभा के अध्यक्ष.
सातवें नागरिक – केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री ( संबंधित राज्यों के), योजना आयोग के उपाध्यक्ष (वर्तमान में नीति आयोग), पूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता
सातवां (A) – भारत रत्न पुरस्कार विजेता
08वें नागरिक – भारत में मान्यता प्राप्त राजदूत, मुख्यमंत्री (संबंधित राज्यों से बाहर के) गवर्नर्स (अपने संबंधित राज्यों से बाहर के)
09वें नागरिक – सुप्रीम कोर्ट के जज, 9 A – यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) के चेयरपर्सन, चीफ इलेक्शन कमिश्नर, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक
10वें नागरिक – राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन, उप मुख्यमंत्री, लोकसभा के डिप्टी स्पीकर, योजना आयोग के सदस्य (वर्तमान में नीति आयोग), राज्यों के मंत्री (सुरक्षा से जुड़े मंत्रालयों के अन्य मंत्री)
11वें नागरिक – अटार्नी जनरल (एजी), कैबिनेट सचिव, उप राज्यपाल (केंद्र शासित प्रदेशों के भी शामिल)
12 वें नागरिक– पूर्ण जनरल या समकक्ष रैंक वाले कर्मचारियों के चीफ
13वें नागरिक – राजदूत
14वें नागरिक – राज्यों के चेयरमैन और राज्य विधानसभा के स्पीकर (सभी राज्य शामिल), हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस (सभी राज्यों की पीठ के जज शामिल)
15वें नागरिक – राज्यों के कैबिनेट मिनिस्टर्स (सभी राज्यों के शामिल), केंद्र शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य कार्यकारी काउंसिलर (सभी केंद्र शासित राज्य) केंद्र के उपमंत्री
16वें नागरिक – लेफ्टिनेंट जनरल या समकक्ष रैंक का पद धारण करने वाले स्टाफ के प्रमुख अधिकारी
17वें नागरिक – अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, अनुसूचित जाति के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश (उनके संबंधित न्यायालय के बाहर), उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश (उनके संबंधित अधिकार क्षेत्र में)
18वें नागरिक– राज्यों (उनके संबंधित राज्यों के बाहर) में कैबिनेट मंत्री, राज्य विधान मंडलों के सभापति और अध्यक्ष (उनके संबंधित राज्यों के बाहर), एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग के अध्यक्ष, उप अध्यक्ष और राज्य विधान मंडलों के उपाध्यक्ष (उनके संबंधित राज्यों में), मंत्री राज्य सरकारों (राज्यों में उनके संबंधित राज्यों), केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्री और कार्यकारी परिषद, दिल्ली (उनके संबंधित संघ शासित प्रदेशों के भीतर) संघ शासित प्रदेशों में विधान सभा के अध्यक्ष और दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष, उनके संबंधित केंद्र शासित प्रदेशों में।
19वें नागरिक – संघ शासित प्रदेशों के मुख्य आयुक्त, उनके संबंधित केंद्र शासित प्रदेशों में राज्यों के उपमंत्री (उनके संबंधित राज्यों में), केंद्र शासित प्रदेशों में विधान सभा के उपाध्यक्ष और मेट्रोपॉलिटन परिषद दिल्ली के उपाध्यक्ष
20वां नागरिक– राज्य विधानसभा के चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन (उनके संबंधित राज्यों के बाहर)
21वां नागरिक – सांसद
22वां नागरिक– राज्यों के डिप्टी मिनिस्टर्स (उनके संबंधित राज्यों के बाहर)
23वां नागरिक– आर्मी कमांडर, वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ और इन्हीं की रैंक के बराबर के अधिकारी, राज्य सरकारों के मुख्य सचिव, (उनके संबंधित राज्यों के बाहर), भाषाई अल्पसंख्यकों के आयुक्त, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आयुक्त, अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, अनुसूचित जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के सदस्य, अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग के सदस्य
24वां नागरिक – उप राज्यपाल रैंक के अधिकारी या इन्हीं के समक्ष अधिकारी
25वें नागरिक – भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव
26वें नागरिक – भारत सरकार के संयुक्त सचिव और समकक्ष रैंक के अधिकारी, मेजर जनरल या समकक्ष रैंक के रैंक के अधिकारी
27वें नागरिक – आम लोग ।।

बुधवार, 22 जून 2022

देश नकली गांधी परिवार की बपौती है क्या ??

पूरे देश की रजिस्ट्री अपने नाम। 
शर्म भी नहीं आई?

स्टेडियम :

 1. इंदिरा गांधी खेल परिसर, दिल्ली
 2. इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, नई दिल्ली
 3. जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली
 4. राजीव गांधी स्पोर्ट्स स्टेडियम, बवाना
 5. राजीव गांधी राष्ट्रीय फुटबॉल अकादमी, हरियाणा
 6. राजीव गांधी एसी स्टेडियम, विशाखापत्तनम
 7. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, पांडिचेरी
 8. राजीव गांधी स्टेडियम, नाहरगुन, ईटानगर
 9. राजीव गांधी बैडमिंटन इंडोर स्टेडियम, कोचीन
 10. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, कदवंतरा, एर्नाकुलम
 11. राजीव गांधी खेल परिसर, सिंघू
 12. राजीव गांधी मेमोरियल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, गुवाहाटी
 13. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम, हैदराबाद
 14. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, कोचीन
 15. इंदिरा गांधी स्टेडियम, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश
 16. इंदिरा गांधी स्टेडियम, ऊना, हिमाचल प्रदेश
 17. इंदिरा प्रियदर्शनी स्टेडियम, विशाखापत्तनम
 18. इंदिरा गांधी स्टेडियम, देवगढ़, राजस्थान
 19. गांधी स्टेडियम, बोलंगीर, उड़ीसा
 20. जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, कोयंबटूर
 21. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, देहरादून
 22. जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, चेन्नई
 23. नेहरू स्टेडियम (क्रिकेट), पुणे
                                                      हवाई अड्डे / बंदरगाह:
 1. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, शमशाबाद, हैदराबाद, तेलंगाना
 2. राजीव गांधी कंटेनर टर्मिनल, कोचीन
 3. इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली
 4. इंदिरा गांधी डॉक, मुंबई
 5. जवाहरलाल नेहरू नवीन शेवा पोर्ट ट्रस्ट, मुंबई
 विश्वविद्यालय / शिक्षा संस्थान:
 1. राजीव गांधी भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग
 2. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एरोनॉटिक्स, रांची, झारखंड
 3. राजीव गांधी तकनीकी विश्वविद्यालय, गांधी नगर, भोपाल, म.प्र।
 4. राजीव गांधी स्कूल ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉ, खड़गपुर, कोलकाता
 5. राजीव गांधी विमानन अकादमी, सिकंदराबाद
 6. राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, पटियाला, पंजाब
 7. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान, तमिलनाडु युवा मामले और खेल मंत्रालय
 बजटीय आवंटन 2008-09 - 1.50 करोड़
 बजटीय आवंटन 2009-10 - 3.00 करोड़
 8. राजीव गांधी विमानन अकादमी, बेगमपेट, हैदराबाद, ए.पी.
 9. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, कोट्टायम, केरल
 10. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी, चंद्रपुर, महाराष्ट्र
 11. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, ऐरोली, नवी मुंबई, महाराष्ट्र
 12. राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश
 13. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, चोल नगर, बैंगलोर, कर्नाटक
 14. राजीव गांधी प्राउडियोगी विश्व विद्यालय, गांधी नगर, भोपाल, म.प्र।
 15. राजीव गांधी D.e.d.  कॉलेज, लातूर, महाराष्ट्र
 16. राजीव गांधी कॉलेज, शाहपुरा, भोपाल
 17. राजीव गांधी फाउंडेशन, राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली
 18. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी, रायबरेली, यू.पी.
 19. राजीव गांधी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, भोपाल, म.प्र।
 20. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज, पूर्वी गोदावरी जिला, ए.पी.
 21. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, ठाकुर, कर्नाटक
 22. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेस, पांडिचेरी, तमिलनाडु
 23. राजीव गांधी आईटी और जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय विद्यापीठ
 24. राजीव गांधी हाई स्कूल, मुंबई, महाराष्ट्र
 25. राजीव गांधी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, सतना, म.प्र।
 26. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, श्रीपेरंबुदूर, तमिलनाडु
 27. राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र, नागपुर विश्वविद्यालय के आर.टी.एम.
 28. राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी, तिरुवनंतपुरम, केरल
 29. राजीव गांधी महाविद्यालय, मध्य प्रदेश
 30. राजीव गांधी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, इलाहाबाद, यू.पी.
 31. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, बैंगलोर, कर्नाटक
 32. राजीव गांधी सरकार।  पीजी आयुर्वेदिक कॉलेज, पपरोला, हिमाचल प्रदेश
 33. राजीव गांधी कॉलेज, सतना, म.प्र।
 34. राजीव गांधी अकादमी फॉर एविएशन टेक्नोलॉजी, तिरुवनंतपुरम, HB GB HDD gv gv c dc fc केरल
 35. राजीव गांधी मध्य विद्यालय, महाराष्ट्र
 36. राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली
 37. राजीव गांधी सेंटर फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप
 38. राजीव गांधी औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र, गांधीनगर
 39. राजीव गांधी ज्ञान प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश
 40. राजीव गांधी दूरस्थ शिक्षा संस्थान, कोयम्बटूर, तमिलनाडु
 41. राजीव गांधी सेंटर फॉर एक्वाकल्चर, तमिलनाडु
 42. राजीव गांधी विश्वविद्यालय (अरुणाचल विश्वविद्यालय), ए.पी.
 43. राजीव गांधी स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर (RGSMC), केरल
 44. राजीव गांधी विज्ञान केंद्र, मॉरिटस
 45. राजीव गांधी कला मंदिर, पोंडा, गोवा
 46. ​​राजीव गांधी विद्यालय, मुलुंड, मुंबई
 47. राजीव गांधी मेमोरियल पॉलिटेक्निक, बैंगलोर, कर्नाटक
 48. राजीव गांधी मेमोरियल सर्कल दूरसंचार प्रशिक्षण केंद्र (भारत), चेन्नई
 49. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी, कासगोड, केरल
 50. राजीव गांधी मेमोरियल कॉलेज ऑफ एरोनॉटिक्स, जयपुर
 51. राजीव गांधी मेमोरियल फर्स्ट ग्रेड कॉलेज, शिमोगा
 52. राजीव गांधी मेमोरियल कॉलेज ऑफ एजुकेशन, जम्मू और कश्मीर
 53. राजीव गांधी साउथ कैंपस, बरकछा, वाराणसी
 54. राजीव गांधी मेमोरियल टीचर ट्रेनिंग कॉलेज, झारखंड
 55. राजीव गांधी डिग्री कॉलेज, राजमुंदरी, ए.पी.
 56. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), नई दिल्ली
 57. इंदिरा गांधी विकास और अनुसंधान संस्थान, मुंबई, महाराष्ट्र
 58. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून
 59. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय अकादेमी, फुर्सतगंज एयरफील्ड, रायबरेली, उत्तर प्रदेश
 60. इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान, मुंबई
 61. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, उड़ीसा
 62. इंदिरा गांधी बी.एड.  कॉलेज, मैंगलोर
 63. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, नांदेड़, महाराष्ट्र
 64. इंदिरा गांधी बालिका निकेतन बी.एड.  कॉलेज, झुंझुनू, राजस्थान
 65. इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़
 66. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, नवी मुंबई, महाराष्ट्र
 67. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कोलज, तिरुचिरापल्ली
 68. इंदिरा गांधी इंजीनियरिंग कॉलेज, सागर, मध्य प्रदेश
 69. इंदिरा गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, कश्मीरी गेट, दिल्ली
 70. इंदिरा गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, सारंग, जिला।  धेनकनाल, उड़ीसा
 71. इंदिरा गांधी एयरोनॉटिक्स संस्थान, पुणे, महाराष्ट्र
 72. इंदिरा गांधी इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर, नई दिल्ली
 73. इंदिरा गांधी शारीरिक शिक्षा और खेल विज्ञान संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
 74. इंदिरा गांधी हाई स्कूल, हिमाचल
 75. इंदिरा कला संघ विश्व विद्यालय, छत्तीसगढ़
 76. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला
 77. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुकटपल्ली, आंध्र प्रदेश
 78. नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग, उत्तरकाशी
 79. पंडित जवाहरलाल नेहरू व्यावसायिक प्रबंधन संस्थान, विक्रम विश्वविद्यालय
 80. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
 81. जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बैंगलोर
 82. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुकटपल्ली, एपी
 83. जवाहरलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज औरंगाबाद, महाराष्ट्र में
 84. जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंटिफिक रिसर्च, एक डीम्ड यूनिवर्सिटी, जक्कुर, पी.ओ.  बैंगलोर
 85. जवाहरलाल नेहरू सामाजिक अध्ययन संस्थान, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ (पुणे, महाराष्ट्र) से संबद्ध
 86. जवाहरलाल नेहरू कॉलेज ऑफ एरोनॉटिक्स एंड एप्लाइड साइंसेज, कोयंबटूर, (ईएसडी 1968)
 87. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, कतरास, धनकवड़ी, पुणे, महाराष्ट्र
 88. कमल किशोर कदम, जवाहरलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज औरंगाबाद, महाराष्ट्र
 89. जवाहरलाल नेहरू शिक्षा और तकनीकी अनुसंधान संस्थान, नांदेड़, महाराष्ट्र
 90. जवाहरलाल नेहरू कॉलेज, अलीगढ़
 91. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हैदराबाद
 92. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर
 93. जवाहरलाल नेहरू बी.एड.  कॉलेज, कोटा, राजस्थान
 94. जवाहरलाल नेहरू पी.जी.  कॉलेज, भोपाल
 95. जवाहरलाल नेहरू सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज, सुंदरनगर, जिला मंडी, एच.पी.
 96. जवाहरलाल नेहरू पब्लिक स्कूल, कोलार रोड, भोपाल
 97. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, काकीनाडा, ए.पी.
 98. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, इब्राहिमपट्टी, आंध्र प्रदेश
 99. जवाहर नवोदय विद्यालय

 2015-16 तक पूरे भारत में 598 जेएनवी

 696. जवाहर नवोदय विद्यालय
 697. इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च, कल्पक्कम
 698. इंदिरा गाँधी विश्वविद्यालय हरियाणा 

पुरस्कार: 

 1. राजीव गांधी अवार्ड फॉर आउटस्टैंडिंग अचीवमेंट
 2. राजीव गांधी शिरोमणि पुरस्कार
 3. राजीव गांधी श्रमिक पुरस्कार, दिल्ली श्रम कल्याण बोर्ड
 4. राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार
 5. राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार
 6. राजीव गांधी वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार
 7. ज्ञान विज्ञान पर मूल पुस्तक लेखन के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार योजना
 8. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार
 9. राजीव गांधी राष्ट्रीय गुणवत्ता पुरस्कार, 1991 में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा स्थापित
 10. स्वच्छ गांधी, पर्यावरण और वन मंत्रालय, सरकार के लिए राजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार।  भारत की
 11. राजीव गांधी ट्रैवलिंग स्कॉलरशिप
 12. राजीव गांधी (यूके) फाउंडेशन छात्रवृत्ति
 13. राजीव गांधी फिल्म अवार्ड्स (मुंबई)
 14. राजीव गांधी खेलरत्न पुरस्कार
 15. राजीव गांधी पेरिस प्रशस्ति, कर्नाटक
 16. राजीवगांधी व्यावसायिक उत्कृष्टता पुरस्कार
 17. राजीव गांधी उत्कृष्टता पुरस्कार
 18. इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार
 19. राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
 20. इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी पुरस्कार
 21. इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार, पर्यावरण और वन मंत्रालय
 22. इंदिरा गांधी मेमोरियल नेशनल अवार्ड फॉरबीस्ट एनवायर्नमेंटल एंड इकोलॉजिकल
 23. इंदिरा गांधी पीरवरन पुरशकर
 24. इंदिरा गांधी एनएसएस अवार्ड
 25. राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
 26. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना
 27. सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
 28. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार द टाउन राजभाषा के लिए
 29. इंदिरा गांधी पुरस्कार ”शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए
 30. विज्ञान कार्यान्वयन को लोकप्रिय बनाने के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
 31. इंदिरा गांधी शिरोमणि पुरस्कार
 32. इंदिरा गांधी एनएसएस पुरस्कार / राष्ट्रीय युवा
 33. इंदिरा गांधी पीरवरन पुशर पुरस्कार - खोज n सही
 34. इंदिरा गांधी N.S.S पुरस्कार
 35. सामाजिक सेवा के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार, एमपी सरकार।
 36. पोस्ट ग्रेजुएट इंदिरा गांधी छात्रवृत्ति योजना
 37. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना
 38. इंदिरा गांधी राजभाषा शील्ड योजना
 39. इंदिरा गांधी वन्यजीव संरक्षण चिड़ियाघर के विजन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी।
 40. जवाहरलाल नेहरू को हर साल कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों को दी जाने वाली 15 लाख रुपये की अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए पुरस्कार दिया जाता है, जिसमें 1988 में फिलिस्तीन लिबरेशन फ्रंट के यासर अराफात और 1965 में यू थान्ट शामिल हैं।
 41. सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, रु। का नकद पुरस्कार।  उपरोक्त फिल्म की मान्यता में, श्याम बेनेगल को दिसम्बर 89 में दिया गया 20,000।
 42. जवाहरलाल नेहरू बालकल्याण सरकार द्वारा प्रत्येक 10 जोड़े को 10,000 रुपये का पुरस्कार।  महाराष्ट्र का (TOI-28-4-89)।
 43. शैक्षणिक उपलब्धि के लिए जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, नई दिल्ली
 44. ऊर्जा के लिए जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी अनुसंधान पुरस्कार
 45. इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार
 46. ​​नेहरू बाल समिति बहादुरी पुरस्कार
 47. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडल
 48. जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार “1998-99 से, विज्ञान के लोकप्रियकरण के लिए संगठनों (अधिमानतः गैर सरकारी संगठनों) को दिया जाना।
 49. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय विज्ञान प्रतियोगिता
 50. डीएनए के विकास की अनुसंधान परियोजना के लिए जवाहरलाल नेहरू छात्र पुरस्कार
 
 छात्रवृत्ति / फैलोशिप: 

 1. विकलांग छात्रों के लिए राजीव गांधी छात्रवृत्ति योजना
 2. एससी / एसटी उम्मीदवारों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
 3. एसटी उम्मीदवारों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना
 4. राजीव गांधी फैलोशिप, इग्नू
 5. राजीव गांधी विज्ञान प्रतिभा अनुसंधान अध्येता
 6. राजीव गांधी फैलोशिप, जनजातीय मामलों का मंत्रालय
 7. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दी गई राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना
 8. राजीव गांधी फेलोशिप को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के साथ मिलकर राष्ट्रमंडल शिक्षण द्वारा प्रायोजित किया गया
 9. राजीव गांधी विज्ञान प्रतिभा अनुसंधान फैलोशिप जवाहरलाल नेहरू सेंटर द्वारा उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान (नवोदित वैज्ञानिकों को बढ़ावा देने के लिए) विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और राजीव गांधी फाउंडेशन के साथ मिलकर किया गया।
 10. हैबिटेट सेक्टर में राजीव गांधी हुडको फैलोशिप
 11. इंदिरा गांधी मेमोरियल फैलोशिप की जाँच
 12. फुलब्राइट स्कॉलरशिप का नाम अब फुलब्राइट- जवाहरलाल नेहरू स्कॉलरशिप रखा गया है
 13. कैम्ब्रिज नेहरू छात्रवृत्ति, संख्या में 10, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन में अनुसंधान के लिए, 3 वर्षों के लिए पीएचडी के लिए अग्रणी, जिसमें शुल्क, रखरखाव भत्ता, ब्रिटेन की यात्रा और वापस शामिल हैं।
 14. स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप की योजना, सरकार।  भारत की।
 15. नेहरू शताब्दी (ब्रिटिश) फैलोशिप / पुरस्कार
 
 राष्ट्रीय उद्यान / अभयारण्य / संग्रहालय :

 1. राजीव गांधी (नागरहोल) वन्यजीव अभयारण्य, कर्नाटक
 2. राजीव गांधी वन्यजीव अभयारण्य, आंध्र प्रदेश
 3. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान, तमिलनाडु
 4. इंदिरा गांधी प्राणि उद्यान, नई दिल्ली
 5. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिमी घाट पर अनामलाई हिल्स
 6. इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान, विशाखापत्तनम
 7. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संघालय (IGRMS)
 8. इंदिरा गांधी वन्यजीव अभयारण्य, पोलाची
 9. राजीव गांधी स्वास्थ्य संग्रहालय
 10. राजीव गांधी प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय
 11. इंदिरा गांधी मेमोरियल संग्रहालय, नई दिल्ली
 12. राज्य सरकार द्वारा औरंगाबाद, महाराष्ट्र में जवाहरलाल नेहरू संग्रहालय खोला गया।
 13. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल गैलरी, लंदन
 14. जवाहरलाल नेहरू तारामंडल, वर्ली, मुंबई।
 15. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी बच्चों के लिए
                                             
अस्पताल / चिकित्सा संस्थान :

 1. राजीव गांधी स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, बैंगलोर, कर्नाटक
 2. राजीव गांधी कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, दिल्ली
 3. राजीव गांधी होम फॉर हैंडीकैप्ड, पांडिचेरी
 4. श्री राजीव गांधी कॉलेज ऑफ डेंटल ... साइंस एंड हॉस्पिटल, बैंगलोर, कर्नाटक
 5. राजीव गांधी सेंटर फॉर बायो टेक्नोलॉजी, तिरुवंतपुरम, केरल
 6. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, बैंगलोर, कर्नाटक
 7. राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, रायचूर
 8. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट डिजीज, बैंगलोर, कर्नाटक
 9. राजीव गांधी पैरामेडिकल कॉलेज, जोधपुर
 10. राजीव गांधी मेडिकल कॉलेज, ठाणे, मुंबई
 11. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी, कर्नाटक
 12. राजीव गांधी अस्पताल, गोवा
 13. राजीव गांधी मिशन ऑन कम्युनिटी हेल्थ, मध्य प्रदेश
 14. राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दिल्ली
 15. राजीव गांधी होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज, चिनार पार्क, भोपाल, म.प्र
 16. उत्तर पूर्वी इंदिरा गांधी क्षेत्रीय स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान संस्थान, शिलांग, मेघालय
 17. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला
 18. इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य संस्थान, बैंगलोर
 19. इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, शेखपुरा, पटना
 20. इंदिरा गांधी बाल चिकित्सालय, अफगानिस्तान
 21. इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य अस्पताल, धर्माराम कॉलेज, बैंगलोर
 22. इंदिरा गांधी बाल संस्थान, बैंगलोर
 23. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला
 24. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंस, केरल
 25. इंदिरा गांधी मेमोरियल आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भुवनेश्वर
 26. इंदिरा गांधी गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नागपुर
 27. इंदिरा गांधी आई हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, कोलकाता
 28. इंदिरा गांधी अस्पताल, शिमला
 29. इंदिरा गांधी महिला एवं बाल अस्पताल, भोपला
 30. इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल, भोपाल
 31. कमला नेहरू अस्पताल, शिमला
 32. चाचा नेहरू बाल चिकत्सालय
 33. जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (JIPMER), पुदुचेरी
 34. जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, भोपाल
 35. रायपुर में जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज।
 36. नेहरू होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नई दिल्ली
 37. नेहरू विज्ञान केंद्र, मुंबई
 38. जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, भोपाल
 39. पंडित जवाहरलाल नेहरू होम्योपैथिक चिकित्सा विज्ञान संस्थान, महाराष्ट्र
 40. इंदिरा गांधी अस्पताल द्वारका, दिल्ली
 
 संस्थान / अध्यक्ष / त्यौहार :

 1. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान।  (RGNIYD), युवा और खेल मंत्रालय
 2. राजीव गांधी नेशनल ग्राउंड वाटर ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, फरीदाबाद, हरियाणा
 3. आदिवासी क्षेत्रों में राजीव गांधी खाद्य सुरक्षा मिशन
 4. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान
 5. राजीव गांधी शिक्षा मिशन, छत्तीसगढ़
 6. राजीव चेयर एंडोमेंट की स्थापना 1998 में साउथ एशियन इकोनॉमिक्स का चेयर बनाने के लिए की गई
 7. राजीव गांधी परियोजना - जमीनी स्तर तक शिक्षा को व्यापक उपग्रह संपर्क प्रदान करने के लिए एक पायलट
 8. राजीव गांधी ग्रामीण आवास निगम लिमिटेड (कर्नाटक उद्यम सरकार)
 9. राजीव गांधी सूचना और प्रौद्योगिकी आयोग
 10. राजीव गांधी शांति और निरस्त्रीकरण के लिए अध्यक्ष
 11. राजीव गांधी संगीत समारोह
 12. राजीव गांधी मेमोरियल लेक्चर
 13. राजीव गांधी अक्षय उर्जा दिवस
 14. राजीव गांधी एजुकेशन फाउंडेशन, केरल
 15. राजीव गांधी पंचायती राज सम्मेलन
 16. राजीव गांधी मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल सोसाइटी, कासगोड, केरल
 17. राजीव गांधी मेमोरियल ट्रॉफी इकनिका स्पर्धा, प्रेरणा फाउंडेशन, कारी रोड
 18. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जनपथ, नई दिल्ली
 19. इंदिरा गांधी पंचायती राज और ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर, राजस्थान
 20. इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR), कल्पक्कम
 21. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड रिसर्च, मुंबई
 22. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी (IGIC), पटना
 23. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
 24. इंदिरा गांधी नेशनल फाउंडेशन, तिरुवनंतपुरम, केरल
 25. इंदिरा गांधी महिला सहकारी सौत गिरानी लिमिटेड, महाराष्ट्र
 26. इंदिरा गांधी संरक्षण निगरानी केंद्र, पर्यावरण और वन मंत्रालय
 27. सिंगल गर्ल चाइल्ड के लिए पोस्ट-ग्रेजुएट इंदिरा गांधी छात्रवृत्ति
 28. जवाहर शतकरी सहकारी सखार लिमिटेड
 29. नेहरू युवा केंद्र संगठन
 30. जवाहरलाल नेहरू शताब्दी समारोह
 31. जवाहरलाल नेहरू की स्मृति में विभिन्न संप्रदायों के डाक टिकट और एक रुपये के सिक्के।
 32. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल ट्रस्ट (U.K.) छात्रवृत्ति
 33. जवाहरलाल नेहरू कस्टम हाउस न्हावा शेवा, महाराष्ट्र
 34. जवाहरलाल नेहरू केंद्र के लिए।  उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान, बैंगलोर
 35. जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारत का दूतावास, मास्को
 36. किशोरियों के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू उद्योग केंद्र, पुणे, महाराष्ट्र
 37. पंडित जवाहरलाल नेहरू कृषि और अनुसंधान संस्थान, पांडिचेरी
 

 सड़कों / भवन / स्थानों: 

 1. राजीव चौक, दिल्ली
 2. राजीव गांधी भवन, सफदरजंग, नई दिल्ली
 3. राजीव गांधी हस्तशिल्प भवन, नई दिल्ली
 4. राजीव गांधी पार्क, कालकाजी, दिल्ली
 5. इंदिरा चौक, नई दिल्ली
 6. नेहरू तारामंडल, नई दिल्ली
 7. नेहरू युवा केंद्र, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली
 8. नेहरू नगर, नई दिल्ली
 9. नेहरू प्लेस, नई दिल्ली
 10. नेहरू पार्क, नई दिल्ली नेहरू हाउस, बीएसजेड मार्ग, नई दिल्ली
 11. जवाहरलाल नेहरू सरकार हाउस नई दिल्ली
 12. राजीव गांधी अक्षय ऊर्जा पार्क, गुड़गांव, हरियाणा
 13. राजीव गांधी चौक, अंधेरी, मुंबई
 14. इंदिरा गांधी रोड, मुंबई
 15. इंदिरा गांधी नगर, वडाला, मुंबई
 16. इंदिरा गांधी खेल परिसर, मुलुंड, मुंबई
 17. नेहरू नगर, कुर्ला, मुंबई
 18. मुंबई के ठाणे में जवाहरलाल नेहरू उद्यान
 19. राजीव गांधी मेमोरियल हॉल, चेन्नई
 20. जवाहरलाल नेहरू रोड, वाडापलानी, चेन्नई, तमिलनाडु
 21. राजीव गांधी सलाई (राजीव गांधी के नाम पर पुरानी महाबलीपुरम सड़क)
 22. राजीव गांधी शिक्षा शहर, हरियाणा
 23. पर्वत राजीव, हिमालय की एक चोटी
 24. राजीव गांधी आईटी हैबिटेट, गोवा
 25. राजीव गांधी नगर, चेन्नई
 26. राजीव गांधी पार्क, विजयवाड़ा
 27. तमिलनाडु के कोयम्बटूर में राजीव गांधी नगर
 28. राजीव गांधी नगर, त्रिची, तमिलनाडु
 29. राजीव गांधी आईटी पार्क, हिंजेवाड़ी, पुणे
 30. राजीव गांधी पंचायत भव, पालनपुर बनासकांठा
 31. राजीव गांधी चंडीगढ़ प्रौद्योगिकी पार्क, चंडीगढ़
 32. राजीव गांधी स्मृति वन, झारखंड
 33. राजीव गांधी की प्रतिमा, पणजी, गोवा
 34. राजीव गांधी रोड, चित्तूर
 35. श्रीपेरंबुदूर में राजीव गांधी स्मारक
 36. इंदिरा गांधी मेमोरियल लाइब्रेरी, हैदराबाद विश्वविद्यालय
 37. इंदिरा गांधी म्यूजिकल फाउंटेन, बैंगलोर
 38. इंदिरा गांधी तारामंडल, लखनऊ
 39. इंदिरा गांधी भारतीय संस्कृति केंद्र (IGCIC), भारतीय उच्चायोग, मौरिटस
 40. इंदिरा गांधी प्राणि उद्यान, भारत के पूर्वी घाट
 41. इंदिरा गांधी नहर, रामनगर, जैसलमेर
 42. इंदिरा गांधी औद्योगिक परिसर, रानीपेट, वेल्लोर जिला
 43. इंदिरा गांधी पार्क, ईटानगर
 44. इंदिरा गांधी स्क्वीयर, पांडिचेरी
 45. इंदिरा गांधी रोड, विलिंगडन द्वीप, कोचीन
 46. ​​इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन, कश्मीर
 47. इंदिरा गांधी सागर बांध, नागपुर
 48. इंदिरा गांधी पुल, रामेश्वर, तमिलनाडु
 49. इंदिरा गांधी अस्पताल, भिवंडी निजामपुर नगर निगम
 50. इंदिरा गांधी स्मारक सांस्कृतिक परिसर, यूपी सरकार।
 51. इंदिरा गांधी खेल स्टेडियम, रोहड़ू जिला, शिमला
 52. इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान, भोपाल
 53. इंदिरा गांधी नगर, राजस्थान
 54. इंदिरा नगर, लखनऊ
 55. सड़कें कई शहरों में जवाहरलाल नेहरू के नाम पर हैं उदा।  जयपुर, नागपुर, विले पार्ले, घाटकोपर, मुलुंड आदि में।
 56. नेहरू नगर, गाजियाबाद
 57. जवाहरलाल नेहरू गार्डन, अमरनाथ
 58. जवाहरलाल नेहरू गार्डन, पन्हाला
 59. जवाहरलाल नेहरू बाजार, जम्मू।
 60. जम्मू श्रीनगर राजमार्ग पर जवाहरलाल नेहरू सुरंग
 61. नेहरू चौक, उल्हास नगर, महाराष्ट्र।
 62. मांडवी, पणजी, गोवा में नेहरू पुल
 63. नेहरू नगर गाजियाबाद
 64. जवाहरलाल नेहरू रोड, धर्मताल, कोलकाता
 65. नेहरू रोड, गुवाहाटी
 66. जवाहर नगर, जयपुर
 67. नेहरू विहार कॉलोनी, कल्याणपुर, लखनऊ
 68. नेहरू नगर, पटना
 69. जवाहरलाल नेहरू स्ट्रीट, पांडिचेरी
 70. नेहरू बाज़ार, मदनपल्ली, तिरुपति
 71. नेहरू चौक, बिलासपुर।  एमपी
 72. नेहरू स्ट्रीट, पोनमालिपट्टी, तिरुचिरापल्ली
 73. नेहरू नगर, एस.एम.  रोड, अहमदाबाद
 74. नेहरू प्राणि उद्यान, हैदराबाद
 75. राजीव गांधी प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर), पुणे
 76. राजीव गांधी इन्फोटेक पार्क, हिंजेवाड़ी, पुणे।
 77. नेहरू नगर, नासिक पुणे।  सड़क।  और बहुत सारे।

 इसके अतिरिक्त, नेहरू-इंदिरा-राजीव के नाम पर 100+ राज्य और केंद्र सरकार की योजनाएं हैं।
 यदि आप 2014 में कांग्रेस को वोट दे देते तो आप भारत में राहुल गांधी के नाम से भी 50-100 भवनों के नाम व योजनायें और देख लेते। यह आपकी वजह से होगा कि गांधी का नाम लेने की पुरानी भारतीय परंपरा खत्म हो जाएगी।
संपादित करें:
 
टिप्पणियों में अनुरोधों के आधार पर, हमारे पास संजय गांधी के नाम की चीजों की सूची है।
 संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई।
 संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल, नई दिल्ली।
 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ।
 संजय गांधी पशु देखभाल केंद्र, नई दिल्ली।
 संजय गांधी संस्थान यदि ट्रामा और आर्थोपेडिक्स (SGITO), बैंगलोर।
 संजय गांधी अस्पताल, जयनगर, बैंगलोर।
 संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल, रीवा, मप्र।
 पर्यावरण और पारिस्थितिकी में संजय गांधी पुरस्कार
 संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, पटना।
 संजय गांधी जैविक उद्यान, पटना।
 संजय गांधी पॉलिटेक्निक कॉलेज, बेल्लारी
 संजय गांधी पॉलिटेक्निक कॉलेज, जगदीश पुर, अमेठी
 संजय गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, बैंगलोर।
 संजय गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, बैंगलोर।
 संजय गांधी मेमोरियल कॉलेज, रांची।
 संजय गांधी महिला कॉलेज, गया
 संजय गांधी सरकार।  स्वायत्त पीजी कॉलेज, सीधी, मप्र।
 संजय गांधी कॉलेज, शिमला।
 संजय गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, सुल्तानपुर, दिल्ली।
 संजय गांधी कॉलेज और अनुसंधान केंद्र, विदिशा, मप्र।
 संजय गांधी बीएड कॉलेज, विदिशा, मप्र।
 संजय गांधी सर्वोदय साइंस कॉलेज, जबलपुर।
 संजय गांधी इंटर कॉलेज, सारण, बिहार।
 संजय गांधी कॉलेज ऑफ लॉ, जयपुर।
 संजय गांधी मेमोरियल गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज, हैदराबाद।
 संजय गांधी पीजी कॉलेज, सुरपुर, मेरठ, यूपी।
 संजय गांधी स्टेडियम, पटना।
 संजय गांधी स्टेडियम, नरसिंहगढ़, म.प्र।
 संजय गांधी मार्केट, जालंधर।
 संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर, दिल्ली 

कृपया इसे साझा करें और देश को बड़े पैमाने पर बताएं
गांधी-नेहरू परिवार के पक्ष में कांग्रेस द्वारा सत्ता का दुरुपयोग।

पूरे देश की रजिस्ट्री गांधी नेहरू परिवार के नाम ।।
(इसे सहेज कर रख लीजिए, जब कोई कुत्ता भोंके तो फेंक मारिये उसके ऊपर)
#NSB

बुधवार, 18 मई 2022

मोहम्मद पैगंबर हिंदू सनातनी थे ।

मुहम्मद स्वयं हिन्दू ही जन्मे थे, होती थी महादेव की पूजा, इसके तथ्य भी हैं मौजूद
इराक का एक पुस्तक है जिसे इराकी सरकार ने खुद छपवाया था। इस किताब में 622 ई से पहले के अरब जगत का जिक्र है। आपको बता दें कि ईस्लाम धर्म की स्थापना इसी साल हुई थी। किताब में बताया गया है कि मक्का में पहले शिवजी का एक विशाल मंदिर था जिसके अंदर एक शिवलिंग थी जो आज भी मक्का के काबा में एक काले पत्थर के रूप में मौजूद है। पुस्तक में लिखा है कि मंदिर में कविता पाठ और भजन हुआ करता था।
प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
“अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।”
अर्थात-.
(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझ को चुना।
(2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ।
(3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनकेअनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।
(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया
और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े।
उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था।
‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहां इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियों के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहां बने कुएं में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते है।
जबकि इस्लाम में मूर्ति पूजा या अल्लाह के अलावा किसी की भी स्तुति हराम है
प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारत वर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों कात्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है। ‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नई दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है –
” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् –
(1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो।
(2) यदि अन्त में उसको पश्चाताप हो, और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्चपद को पा सकता है।
(4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहां पहुंचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।
(5) वहां की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है।
साभार पोस्ट:

रविवार, 15 मई 2022

बाँसी (उ.प.) का श्रीनेत राजवंश का इतिहास


(सूर्यवंश : अयोध्या से बाँसी तक)
अयोध्या के सूर्यवंशी-नरेशों की गौरवशाली परम्परा में 130वें शासक महाराज सुमित्र थे। महाराज सुमित्र की 57वीं एवं अयोध्या के प्रथम सम्राट् वैवस्वत मनु की 186वीं पीढ़ी में महाराज शंखदेव पैदा हुए। महाराज शंखदेव के ज्येष्ठ पुत्र महाराज अजबाहुदेव पिता के पश्चात् राज्य के उत्तराधिकारी हुए और कनिष्ठ पुत्र महाराज दीर्घबाहुदेव के पुत्र महाराज बृजभानुदेव उपाख्य वसिष्ठसेन ने 332 ई. पू. में अयोध्या के सुदूर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अचिरावती नदी के अंचल में रुद्रपुर नामक राज्य की स्थापना करने के साथ ही 'श्रीनेत' पदवी धारण की। इस सम्बन्ध एक प्राचीन श्लोक प्रचलित है-
तस्य पुत्रो दयासिन्धु बृजभानुः प्रतापवान्।
श्रीनेत पदवीकेन लब्धा भुमिरनुत्तमा।।
इस ऐतिहासिक सन्दर्भ का उल्लेख करते हुए महामहिमोपाध्याय डॉ. हीरालाल पाण्डेय लिखते हैं-
अयोध्याया नृपः ख्यातः सुमित्र इति नामभाक्।
पौरुषे सप्तपञ्चासे शङ्खदेवो नृपोभवत्।।
शङ्खदेवस्य पुत्रौ द्वौ विख्यातौ क्षितिमण्डले।
अजबाहुः नृपः श्रेष्ठ दीर्घबाहुः प्रतापवान्।।
दीर्घबाहुः सुतः श्रीमान् बृजभानुः नृपोत्तमः।
स एव हि वसिष्ठोऽपि प्रख्यां विन्दति भारते।।
येन रुद्रपुरं नाम राज्यं संस्थापितं महत्।
श्रीनेत पदवीकेन वंशो विस्तारतां गतः।।
'श्रीनेत' पदवी की व्याख्या करते हुए डॉ. राजबली पाण्डेय लिखते हैं- 'श्रीनेत विरुद (उपाधि) की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती है : (1) श्री + न + इति = श्रीनेति (अपभ्रंश श्रीनेत) अर्थात् वह क्षत्रिय वंश, जिसकी श्री (समृद्धि और यश) का अन्त न हो और (2) श्री + नेतृ = श्रीनेतृ अर्थात् शोभायमान नेता अथवा सुन्दर और कुशल नेतृत्व करनेवाला क्षत्रिय वंश।'[1] श्रीनेत पदवी धारण करनेवाले महाराज बृजभानुदेव के वंशज कालान्तर में श्रीनेत क्षत्रिय के नाम से विख्यात हुए।
महाराज बृजभानुदेव उपाख्य वसिष्ठसेन द्वारा स्थापित रुद्रपुर राज्य कालान्तर में तीन भागों में विभक्त होकर सतासी, उनवल और बाँसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वर्तमान में बाँसी का श्रीनेत राजवंश सर्वाधिक उन्नतिशील है। रुद्रपुर से बाँसी तक की राजावली[2] निम्नांकित है-
187. महाराज दीर्घबाहुदेव 360-332 ई. पू.
188. महाराज बृजभानुदेव (वसिष्ठसेन) 332-312 ई. पू.
189. महाराज हरनाथदेव 312-293 ई. पू.
190. महाराज योषदेव 293-273 ई. पू.
191. महाराज धर्मशीलदेव 273-255 ई. पू.
192. महाराज सुन्दरलालदेव 255-235 ई. पू.
193. महाराज अग्निवर्णदेव 235-216 ई. पू.
194. महाराज महावर्णदेव 216-198 ई. पू.
195. महाराज वीरपुरुषदेव 198-180 ई. पू.
196. महाराज देवजित्देव 180-162 ई. पू.
197. महाराज बालर्षिदेव 162-144 ई. पू.
198. महाराज महिपालदेव 144-125 ई. पू.
199. महाराज भद्ररणदेव 125-105 ई. पू.
200. महाराज भानुदेव 105-85 ई. पू.
201. महाराज विष्णुदेव 85-67 ई. पू.
202. महाराज परुषदेव 67-49 ई. पू.
203. महाराज वनदेव 49-31 ई. पू.
204. महाराज प्रकटदेव 31-13 ई. पू.
205. महाराज शिववर्तदेव 13 ई. पू.-05 ई.
206. महाराज वानदेव 05-23 ई.
207. महाराज स्वर्णचित्रदेव 23-42 ई.
208. महाराज मर्दराजदेव 42-62 ई.
209. महाराज कृतदेव 62-81 ई.
210. महाराज रणजीतदेव 81-100 ई.
211. महाराज शतयुद्धदेव 100-119 ई.
212. महाराज शकुनदेव 119-138 ई.
213. महाराज अमरजीतदेव 138-158 ई.
214. महाराज बृजभानुदेव द्वितीय 158-178 ई.
215. महाराज सत्यदेव 178-198 ई.
216. महाराज देवमणिदेव 198-218 ई.
217. महाराज रामदेव 218-236 ई.
218. महाराज सुखमणिदेव 236-254 ई.
219. महाराज महामणिदेव 254-274 ई.
220. महाराज विजयदेव 274-294 ई.
221. महाराज कर्णमणिदेव 294-314 ई.
222. महाराज सिद्धमणिदेव 314-334 ई.
223. महाराज कृष्णमणिदेव 334-356 ई.
224. महाराज मणिदीपदेव 356-379 ई.
225. महाराज अग्रसेनदेव 379-399 ई.
226. महाराज सुखवृत्तदेव 399-419 ई.
227. महाराज कृपिलदेव 419-439 ई.
228. महाराज देवमणि 439-456 ई.
229.  महाराज यशमणिदेव 456-479 ई.
230. महाराज शैलमणिदेव 479-499 ई.
231. महाराज सावन्तदेव 499-519 ई.
232. महाराज सर्वदेव 519-539 ई.
233. महाराज गंगदेव 539-562 ई.
234. महाराज महिमददेव 562-585 ई.
235. महाराज राजदेव 585-608 ई.
236. महाराज जयदेव 608-631 ई.
237. महाराज श्यामदेव 631-656 ई.
238. महाराज लवंगदेव 656-685 ई.
239. महाराज महिलोचन सिंह 685-710 ई.
240. महाराज कामदेव सिंह 710-730 ई.
241. महाराज मान सिंह प्रथम 730-750 ई.
242. महाराज धीर सिंह 750-768 ई.
243. महाराज विजयपाल सिंह 768-788 ई.
244. महाराज हमीर सिंह 788-808 ई.
245. महाराज प्रेम सिंह 808-828 ई.
246. महाराज मधुवर्ण सिंह 828-847 ई.
247. महाराज बिन्दुपाल सिंह 847-865 ई.
248. महाराज मान सिंह द्वितीय 865-883 ई.
249. महाराज बालपति सिंह 883-901 ई.
250. महाराज भद्र सिंह प्रथम 901-921 ई.
251. महाराज उदितवर्ण सिंह 921-941 ई.
252. महाराज राम सिंह 941-961 ई.
253. महाराज भद्र सिंह द्वितीय 961-979 ई.
254. महाराज मान सिंह तृतीय 979-998 ई.
255. महाराज कान्ध सिंह 998-1018 ई.
256. महाराज चतुर्भुज सिंह 1018-1038 ई.
257. महाराज भोज सिंह 1038-1058 ई.
258. महाराज भगवन्त सिंह प्रथम 1058-1076 ई.
259. राजा जय सिंह प्रथम 1076-1094 ई.
260. राजा प्रताप सिंह 1094-1114 ई.
261. राजा महिपति सिंह प्रथम 1114-1134 ई.
262. राजा भगवन्त सिंह द्वितीय 1134-1153 ई.
263. राजा मकरन्द सिंह 1153-1172 ई.
264. राजा मूरत सिंह 1172-1192 ई.
265. राजा सूरत सिंह 1192-1210 ई.
266. राजा मदन सिंह 1210-1225 ई.
267. राजा आनन्द सिंह 1225-1240 ई.
268. राजा अनन्त सिंह 1240-1255 ई.
269. राजा गोपाल सिंह 1255-1270 ई.
270. राजा वसन्त सिंह 1270-1285 ई.
271. राजा देव सिंह 1285-1300 ई.
272. राजा उदित सिंह 1300-1318 ई.
273. राजा अमर सिंह 1318-1333 ई.
274. राजा विक्रम सिंह 1333-1348 ई.
275. राजा महिपति सिंह द्वितीय 1348-1364 ई.
276. राजा उदय सिंह 1364-1382 ई.
277. राजा जय सिंह द्वितीय 1382-1400 ई.
278. राजा चन्द्रवर्ण सिंह 1400-1415 ई.
279. राजा लक्ष्मण सिंह 1415-1430 ई.
280. राजा राय सिंह 1430-1446 ई.
281. राजा अनुस्वार सिंह 1446-1456 ई.
282. राजा राघव सिंह 1456-1461 ई.
283. राजा माधव सिंह 1461-1471 ई.
284. राजा वंशदेव सिंह 1471-1484 ई.
285. राजा रतनसेन प्रथम 1484-1514 ई.
286. राजा तेज सिंह प्रथम 1514-1560 ई.
287. राजा संग्राम सिंह 1560-1583 ई.
288. राजा शक्ति सिंह 1583-1611 ई.
289. राजा रामप्रताप सिंह 1611-1649 ई.
290. राजा गजेन्द्र सिंह 1649-1678 ई.
291. राजा राम सिंह द्वितीय 1678-1716 ई.
292. राजा माधव सिंह द्वितीय 1716-1732 ई.
293. राजा तेज सिंह द्वितीय 1732-1743 ई.
294. राजा रणजीत सिंह 1743-1748 ई.
295. राजा बहादुर सिंह 1748-1777 ई.
296. राजा सर्वजीत सिंह 1777-1808 ई.
297. रानी रणजीत कुँवरि 1808-1813 ई.
298. राजा श्रीप्रकाश सिंह 1813-1840 ई.
299. राजा महिपति सिंह तृतीय 1840-1863 ई.
300. राजा बहादुर महेन्द्र सिंह 1863-1868 ई.
301. राजा बहादुर राम सिंह तृतीय 1868-1913 ई.
302. राजा बहादुर रतनसेन सिंह तृतीय 1913-1918 ई.
303. राजा बहादुर पशुपतिप्रताप सिंह 1918-1980 ई.
304. राजा बहादुर रुद्रप्रताप सिंह 1980-2018 ई.
305. राजा बहादुर जयप्रताप सिंह 2018 ई. से अद्यतन 
306. युवराज अधिराजप्रताप सिंह एवं राजकुमार अभयप्रताप सिंह। 
वस्तुतः अयोध्या के प्रतापी सूर्यवंशी सम्राटों की परम्परा में सम्राट् कुश की वंश-वेलि से निष्पन्न हुआ श्रीनेत राजवंश अपनी श्रेष्ठता और स्वतन्त्रता के कारण जगद्विख्यात है। सरयू और अचिरावती के मध्य की उर्वरा भूमि सतासी, बाँसी और उनवल के श्रीनेत राजवंश की गौरवगाथा से अलंकृत है। सतासी-नरेश राजा मंगल सिंह ने नाथपन्थ के आदिगुरु गोरखनाथ जी की समाधि के दक्षिण में एक छोटा-सा क़स्बा बसाया और उसका नाम गोरखपुर रखा। एक महल भी यहीं बना और सतासी राज्य की राजधानी उठकर यहीं चली आयी। राजा राय सिंह के समय में गुरु नानकदेव गोरखपुर आये थे और उन्होंने राजा राय सिंह का आतिथ्य ग्रहण किया था।श्रीनेत राजवंश अपनी स्वातन्त्र्यव्रती चेतना के कारण मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के समतुल्य है। डॉ. राजबली पाण्डेय लिखते हैं- 'मुग़ल कई बार के आक्रमण से भी श्रीनेतों का विनाश नहीं कर सके और न तो उनसे अपनी अधीनता स्वीकार करा सके। सतासी के राजाओं का दिल्ली दरबार में जाना किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होता है। राजस्थान के इतिहास में जिस प्रकार चित्तौड़ के राणावंश (सिसोदिया) ने मुग़लों के सामने शिर नहीं झुकाया, उसी प्रकार गोरखपुर जनपद में सतासी के श्रीनेतों ने भी मुग़लों के सामने कभी शिर नहीं टेका। जनपद में इनके आदर का यह एक बहुत बड़ा कारण था।'
बाँसी-नरेश राजा बहादुर पशुपतिप्रताप सिंह हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, फ़ारसी, अरबी आदि भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण लोग उन्हें चलता-फिरता पुस्तकालय कहते थे। राजा पशुपतिप्रताप सिंह के पुत्र राजा बहादुर रुद्रप्रताप सिंह भारतीय सैन्य सेवा में रहते हुए प्राणप्रण से राष्ट्ररक्षा में संलग्न रहे हैं। राजा बहादुर रुद्रप्रताप सिंह का 2018 ई. में नयी दिल्ली में स्वर्गवास हुआ। वर्तमान राजा बहादुर श्री जयप्रताप सिंह बाँसी विधानसभा का छह बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं तथा सातवीं बार विधायक बनने के बाद उत्तर प्रदेश के योगी मन्त्रिमण्डल में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्री हैं।
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1. डॉ. राजबली पाण्डेय : गोरखपुर जनपद और उसकी क्षत्रिय जातियों का इतिहास : प्रकाशक - ठाकुर महातम राव ओमप्रकाश, रेती चौक, गोरखपुर, द्वितीय संस्करण 2015 ई., पृ. 155-156
2. (क) सुरेन्द्र सिंह : रुद्रपुर राजवंश-दर्पण : नीलकमल प्रकाशन, गोरखपुर, प्रथम संस्करण 2014 ई., पृ. 17-31
(ख) डॉ. योगेन्द्र पाल : श्रीनेत क्षत्रिय राजवंश का इतिहास : विजयबहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय की पी-एच.डी. उपाधि हेतु लिखित शोधप्रबन्ध (अप्रकाशित), पृ. 106-160
(ग) http://members.iinet.net.au/~royalty/ips/b/bansi_taluq.html
3. डॉ. राजबली पाण्डेय : गोरखपुर जनपद और उसकी क्षत्रिय जातियों का इतिहास, पृ. 244 
4. डॉ. राजबली पाण्डेय : उपर्युक्त, पृ. 246
 

सोमवार, 24 जनवरी 2022

मुस्लिम आक्रमण और राजपूत....

ध्यान से देखो इस मानचित्र को, लाल घेरे में सऊदी अरब का क्षेत्र हैं,जहां इस्लाम का उदय हुआ, और इस हरे क्षेत्र को देखो, जो इस्लामिक देश हैं, आप चित्र में देख सकते हैं, कि बायीं तरफ के सभी देश इस्लामिक हो गए और दायीं तरफ का देश भारत इस्लामिकरण से बचा रहा.

अब बड़ा सवाल ?  सिर्फ 90 साल में 45 देशों का इस्लामिकरण करने वाली इस्लाम की तलवार, भारत आकर क्यों दम तोड़ गयी ?

मौहम्मद साहब की मृत्यु के एक दशक के भीतर ही अरब हमलावरो ने तलवार के दम पर ईरान, ईराक, सीरिया, मिस्र और पुरे मध्य पूर्व एशिया का इस्लामीकरण कर दिया और जीतते हुए वो स्पेन तक जा पहुंचे,

आज से करीब 1400 साल पहले जब मक्का से इंसानी खून की प्यासी इस्लाम की तलवार लपलपाते हुए निकली तो …
एक झटके में ही ईरान..इराक सीरिया ..मिश्र ..दमिश्क ..अफगानिस्तान, कतर .. बलूचिस्तान से ले कर मंगोलिया और रूस तक ध्वस्त होते चले गए ..!

और ये बात बिल्कुल सही भी साबित होती है कि जब इन #
मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सिर्फ 90 वर्षों में विश्व के 40 से ज्यादा देशों पर पूरा कब्जा कर लिया था . और उसके बाद जब वो सिंध के रास्ते भारत की तरफ बढ़े तो अगले 500 साल तक वो भारत मे घुस नही पाए और जब घुसे भी तो भी अंत समय तक उन्हें क्षत्रियों (राजपूतों)  के विरोध का सामना करना पड़ा . और इसका फल ये है रहा कि 1400 वर्ष बाद भी 1947 के समय में भी भारत मे 85% हिन्दू आबादी थी..

इस्लाम के प्रवेश के समय पूरे विश्व मे स्थानीय धर्मों परम्पराओं का लोप हो गया । शान से इस्लाम का झंडा आसमान चूमता हुआ अफगानिस्तान होते हुए सिंध के रास्ते हिंदुस्तान पहुंचा ..!

पर यहां पहुंचते ही इस्लाम की लगाम आगे बढ़ के क्षत्रियों ने थाम ली ..। भीषण रक्तपात हुआ ..! 800 साल तक क्षत्रिय राजपूत  राजवंशों से ले के आम क्षत्रियों ने इस्लाम की नकेल ढीली न पड़ने दी ..!
भारत ही ऐसा अकेला देश था जिसने उनका सफल प्रतिरोध किया.

सम्राट हर्षवर्धन बैस (राजपूत)ब की मृत्यु के बाद से ही अरब हमलावर भारत आने लगे थे,
640 ईसवी के आसपास पहली बार खलीफा के आदेश पर ठाणे , भरूच और देवल में उनकी टुकड़ियां आई पर विफल रही।
तब से लेकर सन् 1192 तक भारत के वीरों ने इस्लामिक हमलावरो का लगातार 500 वर्ष से अधिक समय तक सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।
वीर बप्पा रावल, नागभट्ट परिहार , नागवंशी कर्कोटक ललितादित्य आदि राजपूत राजाओं ने अरबों को दूर तक मार लगाई।इस 500 -600 साल के कड़े संघर्ष को इतिहासकारों ने राजपूत काल भी कहा है .

बाद में तुर्को के समय आपसी मतभेदों के कारण भारत में इस्लामिक सत्ता स्थापित तो हुई मगर वो निरन्तर प्रतिरोध के कारण अंग्रेजो के आने तक भारत का 10% भी इस्लामीकरण नही कर पाए थे।
इस बात को खुद मुस्लिम इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि भारतवर्ष अकेला देश है जिसने सफलतापूर्वक अपनी संस्कृति की रक्षा की।
मौलाना “हाली” के शब्दों में इसकी पीड़ा देखिये—–
“वह दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा,
निशां जिसका अक्साए-आलम में पहुँचा.
मजाहम हुआ कोई खतरा न जिसका,
न अम्मां में ठिठका, न कुल्जम में झिझका..
किये पै सिपर जिसने सातों समंदर
वह डूबा दहाने में गंगा के आकर”….

यानी मौलाना हाली दुःख प्रकट करते हुए कहते हैं कि इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा,
वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां के वीरो से हुआ तो वह इस्लामी बेड़ा गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया!!

ठीक ऐसा ही दर्द अल्लामा इकबाल की शायरी “शिकवा” में भी मिलता है।।
मुस्लिम इतिहासकार अचरज करते हैं कि जो इस्लाम का बेबाक बेड़ा जिब्राल्टर को पार करता हुआ स्पेन तक जा पहुंचा था और जिस मजहब ने अपने जन्म लेते ही 50 वर्ष के भीतर पूरे अरब, पश्चिम-मध्य एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से का इस्लामीकरण तलवार के जोर पर कर दिया वो भारत मे क्यों सफल नही हो पाया ??

जौहर, शाका जैसी बलिदानी क्षत्रिय परम्पराओं ने इस देश में सनातनी संस्कृति को जीवित रखा।
मुस्लिम इतिहासकार ऐसा लिखते है कि इस्लाम द्वारा भारत विजय का प्रारंभ मुहम्मद बिन कासिम के 712 AD में सिंध पर आक्रमण से हुआ और महमूद गजनवी के आक्रमणों से स्थापित, तथा मुहम्मद गौरी के द्वारा दिल्ली के प्रथ्वीराज चौहान को 1192 A.D. में हराने से पूर्ण हुआ !

फिर दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश के सुल्तान और मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान के शासक बताये गए !
यह इतिहास का सच नहीं हैं सच यह है कि य़ह 600 वर्षोँ तक चलने वाला राजपूत मुस्लिम युद्ध था !

जिसमे अंतिम विजय मराठा साम्राज्य, राजपूत और सिख साम्राज्य के रूप में हुयी और अब सच की विवेचना के लिए इनके बारे में कुछ तथ्य !
मुहम्मद बिन कासिम 712 AD में जब वह सिंध के राजा दाहिर को हराकर आगे बढ़ा उसे गहलोत वंश के राजा कालभोज ने बुरी तरह हराकर वापस भेजा !

अब अगले 250 वर्ष तक मुस्लिम प्रयास तो बहुत हुए पर पीछे धकेल दिए गए इस बीच भारत में राजपूत राज्य ही प्रभावी रहे !
1000 AD से महमूद गजनवी के कथित सत्रह आक्रमणों में पांच हारे, और पांच मन्दिरों की लूट की,

सबसे महत्वपूर्ण सोमनाथ की लूट की दौलत भी गजनी तक वापस नहीं ले जा पाया, जिसे सिन्ध मे लूट लिया गया था वह कही भी सत्ता स्थापित नहीं कर पाया !

इसके बाद अगले 150 वर्ष तक फिर कोई मुसलमान राजपूत सत्ता को चुनौती देने को नहीं आया और भारत में राजपूत राज्य प्रभावी बने रहे !
1178 में मुहम्मद गौरी का गुजरात पर आक्रमण हुआ, चालुक्य राजा ने गौरी को बुरी तरह हराया !

1191 में गौरी ने पृथ्वीराज को हराया फिर गौरी ने पंजाब, सिंध, दिल्ली, और कन्नौज जीते !पर ये विजयें अस्थायी रहीं क्योंकि 1192 में पृथ्वीराज ने भी गौरी को मार गिराए !

उसके बाद सत्ता में आया कुतुबुद्दीन ऐबक भी 1210 में लाहौर में ही मर गया और गौरी का जीता हुआ क्षेत्र बिखर गया !

उसके बाद इल्तुतमिश ने अजमेर, रणथम्मौर, ग्वालियर कालिंजर और महोबा जीते !
मगर कुछ समय में ही कालिंजर चंदेलों ने, ग्वालियर को प्रतिहारों ने, बूंदी को चौहानो ने मालवा को परमारों ने वापस ले लिया, रणथम्मौर, मथुरा पर राजपूत कब्ज़ा कर चुके थे !
गहलोत वंशी जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश से चित्तौड़ वापस ले लिया इस प्रकार सत्ता राजपूतों के हाथ में ही रही थी !

उसके बाद बलबन ने राज्य बिखराव और राजपूत ज्वार रोकने में असफल रहा और सल्तनत सिमटकर दिल्ली के आसपास रह गयी थी !
गुलाम वंश को हटाकर खिलजी वंश आया, इस वंश के अलाउद्दीन खिलजी ने 1298 में गुजरात और 1303 मे चित्तौड़ जीत लिया !
पर 1316 में राजपूतों ने पुनः चित्तौड़ वापस जीत लिया, रणथम्मौर में भी खिलजी को हार का मुंह देखना पड़ा था !

खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरी, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुराई पर अभियान किया और जीता !

पर उसके वापस जाते ही इन राजाओं ने अपने को स्वतत्र घोषित कर दिया !
1316 में खिलजी के मरने के बाद उसका राज्य ध्वस्त हो गया !

इसके बाद तुगलक वंश आया 1325 में मुहम्मद तुगलक ने देवगिरी और काम्पिली राज्य पर विजय और द्वारसमुद्र और मदुराई को शासन के अन्तर्गत लाया ! राजधानी दिल्ली से हटाकर देवगिरी ले गया !

पर मेवाड़ के महाराणा हम्मीर सिंह ने मुहम्मद तुगलक को बुरी तरह हराया और कैद कर लिया था !
फिर अजमेर, रणथम्मौर और नागौर पर आधिपत्य के साथ 50 लाख रुपये देने पर छोड़ा जिससे तुगलक राज्य दिल्ली तक सीमित रह गया और 1399 में तैमूर के आक्रमण से तुगलक राज्य पूरी तरह बिखर गया !

मुहम्मद तुगलक पर विजय के उपलक्ष्य में हम्मीर ने “महाराणा“ की उपाधि धारण की !
उसके बाद महाराणा कुम्भा द्वारा गुजरात के राजा कुतुबुद्दीन और मालवा के सुल्तान पर विजय !
इन विजयों के उपलक्ष्य में चित्तौड़ गढ़ मे विजय स्तम्भ और पूरे राजस्थान में 32 किले भी बनवाये !
महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने मालवा के शासक को पराजित कर बंदी बनाया और छह महीने बाद छोड़ा !

1519 में इब्राहीम लोदी को हराया !
इस प्रकार महाराणा हम्मीर से राणा सांगा तक 1326 से 1527 (200 वर्ष तक) उत्तर भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राजपूत साम्राज्य छा रहा था और इन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था !
इसी बीच दक्षिण में विजय नगर साम्राज्य क्षत्रिय शक्ति के रूप में केन्द्रित हो चूका था और कृष्ण देव राय (1505-1530) के समय चरम उत्कर्ष पर था और उड़ीसा ने भी क्षत्रिय स्वातंत्र्य पा लिया था !
तुगलकों के बाद सैयद वंश 1414 से 1451 तक और लोदी वंश 1451 से 1526 तक रहा जो दिल्ली के आस पास तक ही रह गया था !
इसके बाद फिर इब्राहीम लोदी को राणा सांगा ने हराया !
प्रमुख इतिहासकार आर सी मजूमदार लिखते है कि दिल्ली सल्तनत अलाउद्दीन खिलजी राज्य के 20 साल (1300-1320)और
मुहम्मद तुगलक के 10 साल इन दो समय को छोड़कर भारत पर तुर्की का कोई साम्राज्य नहीं रहा था !
फिर मुग़ल वंश आया मुग़ल बाबर ने कुछ विजयें अपने नाम की पर कोई स्थायी साम्राज्य बनाने में असफल रहा,
उसका बेटा हुमायु भी शेरशाह से हार कर भारत से बाहर भाग गया था !
शेर शाह (1540-1545) तक रणथम्मौर और अजमेर को जीता पर कालिंजर युद्ध के दौरान उसकी मौत हो गयी और उसका राज्य अस्थायी ही रहा !
फिर एक बार राजपूत राज्य सगठित हुए और दिल्ली की गद्दी पर राजा हेम चन्द्र ने 1556 में विक्रमादित्य की उपाधि धारण की !
1556 में ही अकबर ने हेमचन्द्र (हेमू ) को हराकर मुग़ल साम्राज्य का स्थायी राज्य स्थापित किया जो 150 वर्ष तक चला जिसमे सभी दिशाओं राज्य विस्तार हुआ !
ये अधिकांश विजयें राजपूत सेनापतियों और उनकी सेनाओं द्वारा हासिल की गयीं जिनका श्रेय अकबर ने अकेले लिया !
अकबर ने इस्लामिक कट्टरता छोड़ राजपूतों की शक्ति को समझा और उन्हें सहयोगी बनाया !
जहाँगीर और शाहजहाँ के समय तक यही नीति चली, इन 100 वर्षों में मुसलमानों और राजपूत का संयुक्त और राजपूत शक्ति पर आश्रित राज्य था इस्लामी राज्य नहीं |
पूरे मुग़ल राज्य के बीच भी मेवाड़ में राजपूतों की सत्ता कायम रही !
औरंगजेब ने जैसे ही अकबर की नीतियों के विपरीत इस्लामी नीतियां लागू करनी आरम्भ की राजपूतों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया !
उधर शिवा जी ने मुग़ल साम्राज्य की नीव खोद दी और 1707 तक मुग़ल राज्य का समापन हो गया उसके बाद के दिल्ली के बादशाह दयनीय स्थिति में कभी राजपूतों के, कभी अंग्रेजों के आश्रित रहे !
1674 से 1818 तक मराठा साम्राज्य भारत थोड़ा छाया था,
राजस्थान में राजपूत राज्य और पंजाब में सिख साम्राज्य राज्य के रूप में विजयी हुए |
इन शक्तियों के द्वारा मुस्लिम सत्ता की पूर्ण पराजय और अंत हुआ !

इस पूरे विषम काल मे राजपूतों ने 712 ईसवी से ,बप्पा रावल के रूप से संघर्ष शुरू किया और 1000 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद 1600ईसवी में महाराणा प्रताप तक रक्तसंचित संघर्ष किया...1600 के बाद मराठा,सिख, व और साम्रज्यों की नींव पड़ी....जिन्होंने भी इस्लामिक शक्तियों से लोहा लिया......

इस प्रकार जिसे मुस्लिम साम्राज्य कहा जाता है वह वस्तुतः भारतीय राजाओं और मुसलमान आक्रमण कारियों के बीच एक लम्बे समय (1200 वर्ष) तक चलने वाला युद्ध था।
केवल तलवार के दम पर हम अपना धर्म बचा पाए नही तो  छेद वाली टोपी हम भी लगाकर घूमते , अतः मार्शल जातियों खासकर राजपूतों का सम्मान करिये जिनके कारण आज भी हम सभी हिन्दू हैं ।।
जय जय श्री राम 🚩🚩
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