बुधवार, 27 मई 2026

त्योंथर की कोल गढ़ी का इतिहास ..

मध्यप्रदेश के त्योंथर क्षेत्र में तमसा (टोंस) नदी के किनारे स्थित कोल गढ़ी बघेलखंड के उन ऐतिहासिक स्थलों में से एक है, जिनका इतिहास आज भी लोककथाओं, जनश्रुतियों और टूटे हुए अवशेषों में जीवित है। यह स्थान कभी कोल राजाओं और स्थानीय जनजातीय शासकों की सत्ता का केंद्र माना जाता था।

कोल गढ़ी का भौगोलिक महत्व
कोल गढ़ी त्योंथर क्षेत्र में एक ऊँचे टीले पर स्थित बताई जाती है। इसके पश्चिम में बहती तमसा नदी इस स्थान को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थी। ऊँचाई पर होने के कारण यहां से दूर तक निगरानी संभव थी, इसलिए इसे एक सामरिक चौकी या गढ़ी के रूप में विकसित किया गया होगा। कोल राजाओं का शासन
स्थानीय इतिहास और लोक परंपराओं के अनुसार त्योंथर क्षेत्र पर कभी कोल वंश अथवा कोल जनजातीय शासकों का प्रभाव था। “कोल” शब्द भारत की प्राचीन आदिवासी समुदायों में से एक समुदाय से जुड़ा माना जाता है, जिनका उल्लेख मध्यभारत और पूर्वी भारत के इतिहास में मिलता है। 

त्योंथर के इतिहास से जुड़े उल्लेख बताते हैं कि यहां कोल तथा भुरटिया राजाओं की छोटी-छोटी रियासतें थीं और उनकी प्रशासनिक व्यवस्था कोल गढ़ी से संचालित होती थी। बाद में सिंगरौली के वेनवंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया। इतिहासकार रामसागर शास्त्री की पुस्तक “क्योती की गढ़ी” का उल्लेख कई स्थानीय स्रोतों में मिलता है, जिसमें बताया गया है कि नौवीं शताब्दी के आसपास सिंगरौली के महाराजा कोट सिंह ने उत्तर दिशा में विस्तार करते हुए छोटे कोल और भुरटिया शासकों को पराजित किया था। इसके बाद त्योंथर उत्तर-पूर्वी सीमा की एक महत्वपूर्ण सैन्य चौकी बन गया। 

स्थानीय लोगों के अनुसार कोल गढ़ी में कभी विशाल दीवारें और प्रहरी मीनारें थीं। आज वहां केवल अवशेष दिखाई देते हैं। इस गढ़ी का निर्माण विशेष “खजुरा ईंटों” तथा बेल, कत्था, चूना और सुरखी से बने मिश्रण से किया गया था। कहा जाता है कि गढ़ी के पश्चिमी हिस्से में प्रहरी टॉवर था, जहां से तमसा नदी का विस्तृत दृश्य दिखाई देता था। 

प्राचीन सभ्यता और बौद्ध प्रभाव
त्योंथर क्षेत्र केवल कोल गढ़ी के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित देउर कोठार के बौद्ध स्तूप मौर्यकालीन इतिहास की याद दिलाते हैं। माना जाता है कि सम्राट अशोक के काल में यह क्षेत्र बौद्ध गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि तमसा नदी के आसपास का इलाका प्राचीन काल से ही आबाद और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा होगा। संभव है कि कोल गढ़ी भी उसी ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा रही हो।

लोककथाएं और जनविश्वास
कोल गढ़ी के बारे में ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे “कोल राजा का किला” कहते हैं, तो कुछ इसे गुप्त खजानों और सुरंगों से जोड़कर देखते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार यहां कभी सैनिक चौकियां थीं और नदी के किनारे से होकर गुप्त मार्ग निकलते थे। हालांकि इन बातों के पुख्ता पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन लोकस्मृति में यह स्थान आज भी गौरव और रहस्य का प्रतीक बना हुआ है।

आज कोल गढ़ी उपेक्षा का शिकार है। यहां पुरातात्विक संरक्षण का अभाव दिखाई देता है। यदि इस स्थल का व्यवस्थित सर्वेक्षण और उत्खनन किया जाए, तो संभव है कि बघेलखंड और त्योंथर क्षेत्र के प्राचीन इतिहास के कई नए तथ्य सामने आएं। यह स्थल इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।

मंगलवार, 26 मई 2026

आल्हा ऊदल बनाफर क्षत्रिय हैं


कुषाणौ का तीसरा काल , भारत की राजधानी पेशावर । राजा कनिष्क , राज्य विस्तार ,मध्य एशिया में तजैकिस्तान से लेकर भारत में उडीसा तक, अफगानिस्तान से लेकर चीन में कांशू तक । शांति व्यवस्था के लिये जो प्रमुख राजपाल उत्ररदाई था उसका नाम था….वनाफर ।

इसी वनाफर का वंसज सैकडौ वर्षो के बाद महोवा मे देवतुल्य साधू के रूप में मनियां देव नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस मनीदेव का वंसज हंसराज चंदेल वंसीय कालिंजर के राजा कीरतदेव की सेना में बडे पद पर पहुँच गया । शकसंवत 1068 में हंसराज के दोनौ बेटा दक्षराज व बक्षराज कीरत देव की सेना में भर्ती हो गये । जब कीरत देव ने अपनी राजधानी चंदेरी को बनाया तब दक्षराज और बक्षराज को सेनापति का औहदा दे दिया ।

कीरत देव का बेटा परिमारदेव (परिमाल) जब राजा बना तब उसने अपनी राजधानी महोवा को बनाया ।

हंसराज के दो बेटा— दक्षराज और बक्षराज

दक्षराज के तीन बेटा- आल्हा , ऊदल और दासीपुत्र धांदू

बक्षराज के दो बेटा — मलिखान और सुलिखान

आल्हा का बेटा - इंदल

मलिखान का बेटा - वहोरन ( इल्तुतमिश)

उस समय दक्षराज ने महोबा के बनाफर क्षत्रिय आल्हा ऊदल की सेना का नाम भी वनाफर रख दिया था। आल्हा ऊदल की सेना में कुछ अन्य जातियों ने भी उनका साथ दिया था। इसके कारण भारत में कई अन्य जातियों के लोग भी जो वर्तमान में खुद को राजपूत नहीं मानते लेकिन, उन्होंने अपने आपको बनाफर लिखना या कहना शुरू कर दिया था। इसलिए आल्हा ऊदल के साथ-साथ महोबा के सभी सैनिक वनाफर कहलाने लगे।

माँ शारदा के अनन्य भक्त महापराक्रमी वीर शिरोमणि राजपूत योद्धा आल्हा जी की जयंती पर कोटिशः नमन।🙏
 बड़े लडैया महोबा बाले इनकी मार सही न जाए। एक को मारे दुई मर जाए तीसरा ख़ौफ़ खाय मर जाए ".