शुक्रवार, 30 जून 2023

भारत का सड़क नेटवर्क...

दिन रात बिलखते रहने वाले खांगरेसियों की जली हुई गेंद पर नमक छिड़कने के पवित्र उद्देश्य से एक जानकारी दे रहा हूँ ---
2013 - 14 में सड़क नेटवर्क 91287 किलोमीटर था , केवल नौ साल में बढ़ कर  145240 किलोमीटर हो गया है ।
2013-14में चार लेन राष्ट्रीय राजमार्ग  18371 किलोमीटर थे  अब यह 44657 किलोमीटर हो गए हैं ।
वैश्विक दृष्टि से देखें तो सड़क नेटवर्क के मामले में भारत ने चीन को पछाड़ कर दूसरा स्थान प्राप्त कर लिया है ।
तीन प्रमुख देशों में सड़क नेटवर्क 
1. अमेरिका -- 6830479 किलोमीटर 
2. भारत -- 6372613 किलोमीटर 
3. चीन -- 5198000 किलोमीटर

गुरुवार, 29 जून 2023

सैन्य कमांडरसंताजी & बादशाह औरंगजेब

Lसितंबर 1689 से 1696 वर्ष अर्थात सात वर्ष के भीतर मराठा सैन्य कमांडर संताजी घोरपड़े का बर्बर मुगलिया बादशाह औरंगजेब के साथ 11 बार घनघोर संघर्ष हुआ और इसमें से 9 बार औरंगजेब की सेना का जनाजा निकाला था सत्रहवीं सदी के सबसे महानतम सैन्य जनरल संता जी ने।

लेकिन इतिहास की पुस्तकें, मुख्यधारा के वामपंथी इतिहासकारों के इतिहास लेखन से एकदम गायब अध्याय !

ऐसा ही किया गया है !

कुत्सित, भ्रष्ट, विकृत और अर्द्धसत्यों का तम्बू खड़ा किए ये मक्कार इतिहास के इस सर्वाधिक रोमांचक व प्रेरक अध्याय को इग्नोर करके चलते हैं !

लेकिन सत्य तो तदयुगीन कृतियों में, ऐतिहासिक वृत्तांतों के भीतर मुकम्मल तस्वीर लेकर प्रस्तुत हुआ है।

आज 363 वीं जयंती है इस अतुलनीय जनरल की।

देखिए उस महासूरमा के कारनामे -----

1) सितंबर 1689 --- औरंगजेब के जनरल शेख निजाम को रौंदा।

2) 25 मई 1690 को सरजाखान उर्फ रुस्तम खान को सतारा के पास घसीट घसीट कर मारा।

3) 16 दिसंबर 1692 को औरंगजेब के जनरल अली मर्दान खान को पराजित करके जिंजी के दुर्ग में बंधक बना दिया।

4) 27 दिसंबर 1692 में मुगल सेनापति जुल्फिकार अली खान को जमकर रगड़ा संताजी ने और 5 वर्ष से जिन्जी दुर्ग की घेराबंदी करने वाले इस मुगलिया सेनापति को उसकी औकात दिखाई।

5) 5 जनवरी 1693 ईस्वी में देसूर स्थित औरंगजेब की विशाल सैन्यवाहिनी को 2000 चपल मराठा घुड़सवारों के साथ लैस होकर संताजी ने पूरी तरह ध्वस्त कर डाला था।
बादशाह किस्मत के संयोग और ईश्वरीय दुआ से उस रात अपने शिविर में मौजूद न होकर अपनी बेटी के तम्बूखाने में आराम फरमा रहा था, नहीं तो उसी दिन मुगलों का तबेला निकल जाता पूरे देश से !

6) 21 नवम्बर 1693 ईस्वी को मुगल जनरल हिम्मत खान को विक्रमहल्ली, कर्नाटक में बुरी तरह रौंदा संताजी घोरपड़े ने...

7) जुलाई 1695 में खटाव के पास घेरा डाले उछल रही मुगल सेना का कचमूर निकाला इस महान जनरल ने।

8) 20 नवम्बर 1695 ईस्वी को कर्नाटक में तैनात औरंगज़ेब के शक्तिशाली जनरल कासिमखान को चित्रदुर्ग के पास डाडेरी में घेरकर उसका सिर उतार लिया। मुगल राजकोष के 60 लाख रुपए संताजी ने हथियाए।

9) 20 जनवरी 1696 को कासिम खान के सहायतार्थ तैनात किए गए मुगल सैन्य कमांडर हिम्मत खान बहादुर को बसवपाटन(डाडेरी से 40 मील पश्चिम) के युद्ध में अभिभूत करते हुए जन्नत प्रदान किया।

10) 26 फरवरी 1696 को मुगल जनरल हामिद-उद्दीन खान ने संता जी को हराने में सफलता पाई थी।

11) अप्रैल 1696 में जुल्फिकार खान ने अरनी, कर्नाटक के पास एक बार युद्ध मैदान में संताजी को हराने में सफलता प्राप्त की थी।

आजीवन हिन्दू पद पादशाही और मराठा स्वाधीनता आन्दोलन के अपराजेय स्वर को ऊंचाई देने वाले इस अप्रतिम मराठा सेनानी से मुगल कितना भय और खौफ खाते थे तथा उनके मन में एशिया के इस सर्वोच्च सैन्य जनरल के प्रति कितनी नफरत भरी थी, इसका प्रमाण मुगलों के दरबारी इतिहासकार खाफी खान के शब्दों में पढ़िए :

         [ "...... जिस किसी ने भी संताजी का सामना किया, उन्हें या तो मार दिया गया या घायल कर दिया गया या बंदी बना लिया गया, या यदि कोई भाग निकला तो अपनी सेना और जान माल की हानि के साथ केवल अपनी जान बचा पाने में सफल हो पाया।

     ......यह शापित कुत्ता(संताजी घोरपड़े) जहां भी गया, किसी भी शाही अमीर में इतनी हिम्मत व साहस नहीं हुआ कि इसका मुकाबला कर सकें। किसी के करते कुछ न हो सका। मुगल सेना उसकी शक्ति व प्रतिष्ठा को अकेले इसने जितनी क्षति पहुंचाई है, शायद किसी भारतीय शक्ति ने कभी पहुंचाई हो।
स्थिति यह है कि मुगल खेमे का बड़े से बड़ा साहसी सूरमा दक्कन की जमीन पर भय व खौफ के साए में जी रहा है !

बादशाह द्वारा इस कुत्ते को नेस्तनाबूद करने के लिए जब अपने सबसे बडे़ जनरल फिरोज जंग को तैनात किया गया और उसे खबर मिली कि संताजी उससे सिर्फ 16 से 18 मील की दूरी पर आ खड़ा हुआ है घेरने, उस मुगल सैन्य कमांडर का चेहरा खौफ से बदरंग हो उठा। मुगल कमांडर के पास कोई रास्ता नहीं था, लिहाजा उसने सैन्य शिविर में घोषणा की कि वह संताजी से मुकाबला करने जा रहा है, लेकिन सेना को आगे भेजते हुए यह बड़का मुगल तोप गोल चक्कर वाले रास्ते से कल्टी मार बीजापुर की तरफ भाग गया।"

                (मुंतखुब-उल-लुआब, खाफी खान.)]

मुगलों के दरबारी इतिहासकारों द्वारा तथा फारसी स्रोतों में इस दुर्दांत सूरमा के बारे में जिस तरह के विशेषण प्रयुक्त हुए हैं, वे सबसे बडे़ व वास्तविक प्रमाण हैं कि औरंगजेब और मुगल साम्राज्य के गुरूर व दर्प को कितना अभिभूत कर डाला था इस मराठा रक्त ने !

प्रसिद्ध इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक "भारत के सैन्य इतिहास" में संताजी के बारे में लिखते हुए इसी बात को रेखांकित करते हैं :

       ("संताजी की ख्याति व प्रसिद्धि का सबसे बड़ा स्मारक मुगल सेना के सभी सैन्य कमांडरों के मन में उनके द्वारा संचारित भय व खौफ है, और यह सब फारसी स्रोतों में संताजी के नाम के साथ विशेषण के रूप में उपयोग किए जाने वाले शाप और गालियों में ईमानदारी के साथ परिलक्षित होता हुआ दिखता है।")

संताजी के नेतृत्व में हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ प्रतिबद्ध मराठा स्वराज और हिन्दू पद पादशाही की भयानक मुठभेड़ का सिलसिलेवार विवरण इतालवी यात्री तथा मुगल दरबार में तैनात तोपची निकोलाओ मनूची की शानदार कृति "स्टोरिया द मोगोर"(मुगल कथाएं) में अंकित है। सर्वाधिक रोमांच व जीवन्त अहसास पाने के लिए अध्येताओं को इन अंशों को इसी पुस्तक से पढ़ना चाहिए।

"इतिहास के पृष्ठों में एक जनरल तथा सैन्य कमांडर के रूप में प्रतिष्ठित संताजी की तुलना तैमूर और चंगेज खान जैसे महान एशियाई जनरलों से की गई। यह वास्तविक तुलना और हकीकत भी है। संताजी हमेशा 20 से 25 हजार तीव्रगामी अश्वों से लैस घुड़सवार सेना का नेतृत्व करते थे। गुरिल्ला रणनीति के साथ पार्थियन युद्ध सैन्यकला से उनके कौशल की तुलना की जा सकती है। कारण, वह रात्रि में न केवल मार्च करते थे बल्कि तीव्र गति से लंबी दूरी भी तय करते थे। व्यापक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को अंजाम देते हुए शत्रु खेमे में आतंक की सृष्टि कर देते थे। सटीकता तथा समय की पाबन्दी के साथ प्रचंड आक्रामक कार्यवाही जो चंगेज खान व तैमूरलंग के अलावा किसी भी एशियाई सेना के लिए नामुमकिन थी, संताजी के सैनिक कारनामों में यह सर्वत्र दिखती है। दुश्मन की योजना और परिस्थितियों के भीतर हर बदलाव का तुरन्त फायदा उठाने के लिए अपनी रणनीति को बदलते हुए लम्बी दूरी तक फैली बड़ी संख्या में सैनिकों को संभालने और विफलता के जोखिम के बिना संयुक्त सैन्य प्रहार को अंजाम देने की जन्मजात प्रतिभा संताजी में थी।" 

                     (मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इण्डिया; सर यदुनाथ सरकार.)

अपनी इस असाधारण सैन्य रणनीति के चलते संताजी मराठा सेनापतियों में छत्रपति शिवाजी के बाद सर्वोच्च घुड़सवार सेनापति के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनकी इस विरासत का विस्तार और क्रियान्वयन आगे पेशवाओं के शासनकाल में बाजीराव प्रथम और रघुजी भोंसले द्वारा सफलतापूर्वक किया गया। मराठों की सैन्य सर्वोच्चता के प्रवर्तक संताजी ही थे जिन्हें इतिहास के भीतर वह गौरव और महत्ता मिली नहीं, जिसके वास्तविक हकदार वे थे !

मराठा इतिहास के भीतर सर्वोच्च कमांडर तीन ही गिने गए ---- छत्रपति शिवाजी महाराज, संताजी घोरपड़े और बाजीराव।

इतिहास के चमकदार पृष्ठों में छत्रपति राजे और बाजीराव का नाम तो फिर भी हिन्दू जनसमुदाय जानता है। काफी हद तक बूझता गुनता है ! लेकिन संताजी घोरपड़े के बारे में अध्येताओं से चर्चा कीजिए तो....??

बुधवार, 28 जून 2023

धान की रुपाई.....पुरानी यादें

जेठ के महीने में  ही इंजन (ट्यूबबेल) के पास वाली डेबरी ( छोटे खेत)  में इंजन से पानी भर दिया गया है। तीन-चार दिन बाद ओंठि हो गई है यानि खेत अब  जोतने योग्य हो गया है। 

आज बड़े वाले बैल की गोई (जोड़ी) से खेत की जुताई हो रही है।  खेत के कोनों को फरुहा( फ़ावड़ा)  से गोंड़ (खुदाई)  दिया गया है।  सरावनि (लकड़ी का मोटा पटरा) से खेत को बराबर कर दिया गया है।खेत की जितनी खरपतवार,  घास-दूब है उसे  निकाल लिया गया है।

 अब खेत में पानी भर दिया गया है।  पानी भरे हुए खेत में दो-तीन बार अमिला (जुताई और पटाई) दे  दिया गया है। अब खेत की मिट्टी  बिल्कुल मुलायम, भुरभुरी हो गई है। खेत धान बोने के लिए बिल्कुल तैयार है।

 आज आषाढ़ का पहला दिन है।  भाई बाबा ने दो-तीन दिन पहले  से घर में फूल रहे धान को खेत में ले आए हैं। धान बोने से पहले पूरे खेत के पानी को खूब गंदा कर दिया गया है ताकि जब धान बो दिए जाएं तो इस गंदे पानी की परत धान के बीज के ऊपर चढ़ जाए और पक्षियों को ऊपर से धान न दिखे और वह इसे चुग न सके।

अब बाबा धान को एक बड़ी टोकरी में लेकर पहले खेत को झुक कर प्रणाम करते हैं , भगवान का नाम लेते हैं और फिर धान को दाहिने हाथ से पूरे खेत में बिथराते  चले जा रहे हैं। धान की बुआई हो रही है।

खेत का पानी गंदा करने के बावजूद शुरुआत के 1 हफ्ते   पक्षियों से धान की निगरानी करनी ही पड़ती है।  यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि नीलगाय, गाय या भैंस खेत में पानी पीने के लिए या गर्मी से राहत पाने के लिए घुस न जाएं।  नहीं तो उनके खुर के निशान जहां पड़ जाएंगे उस स्थान पर बेंड़ न उगेगी।

 आज धान बोए हुए पूरा एक हफ्ता हो गया है । धान  से छोटी-छोटी हरी मुलायम कोंपले बाहर निकलने लगी हैं।   अब पक्षियों का डर नहीं रहा, बस जानवरों का ध्यान रखना है। आज पूरे 25 दिन हो गए हैं । अब बेंड़  पूरी तरह रोपने के लिए तैयार है। 

 भाई बाबा पासिन टोला, गुड़ियन का पुरवा,  अहिरन का पुरवा में 15 मजूरों (मजदूरों) की गिनती कल और परसों के लिए कर आए हैं। आज सुबह से घर के लोग, सुंदर बाबा, हिरऊ बाबा सरावनि में बैठकर बेंड़ उखाड़ने लगे हैं।   बेंड़ के एक-एक पौधे को जड़ से उखाड़ कर  मूठी (मुट्ठी) भर जाने पर उसकी जोरई  (जूरी)बनाकर पीछे रखते जा रहे हैं।  

जैसे-जैसे बेंड़ उखड़ती  जा रही है, खेत खाली होता जा रहा है और सरावनि आगे बढ़ती जा रही है।   अब एक झौआ से अधिक बेंड़ की जूरी तैयार हो गई है । उसे लेकर चाचा धान रोपने के लिए तैयार बड़े वाले खेत 'बीजर'  में पहुंच गए हैं।  एक छोटे छीटा(टोकरी) में बेंड़ लेकर मैं भी उनके पीछे-पीछे पहुंच गया हूं। चाचा बेंड़ को पूरे खेत में  कुछ कुछ फासले पर फैलाते  जा रहे हैं ताकि मजूरों को बेंड़ लगाते समय इधर उधर न भागना पड़े ।

 अब बेंड़ लगाने वाली  मजूरों की टोली आ चुकी है । सभी महिलाएं हैं। हंसी मजाक करती महिलाएं अपनी धोती को घुटनो तक समेट कर पानी भरे खेत में प्रवेश कर चुकी हैं । राम का नाम लेकर उन्होंने बेंड़ की जूरी खोली और अब एक-एक धान का पौधा सधे हाथों से बराबर दूरी पर रोपना शुरू  कर दिया है । मैं महिलाओं के पीछे-पीछे उन्हें बेंड़ देते जा रहा हूँ।  जहां बेंड़ ज्यादा हो जाती  या बच जाती, वहां से हटाते जा रहा हूँ और जहां कम होती वहां पर बेंड़ रखते जा रहा हूँ। 

अब महिलाओं ने सावन का  गीत सामूहिक स्वर में गाना शुरू कर दिया है-

"चला सखी रोपि आई खेतवन में धान, बरसि जाई पानी रे हारी..'',

एक महिला गीत की पहली पंक्ति गाती है और बाकी महिलाएं उसके पीछे दुहराती जा रही हैं। उनके गीतों में देसी पन है,  स्वरलय भी कभी गड़बड़  हो जाता  है लेकिन भाव बिल्कुल शुद्ध, सात्विक हैं। भगवान इंद्र भी शायद ही उनकी इस निर्दोष जन हितकारी मांग को ठुकरा पाएं। बीच-बीच में वे एक दूसरे से चुहलबाजी भी करती जा रही हैं।

 अरे यह क्या ? मैंने जोर से बेंड़ उठा कर महिलाओं के पीछे फेंक दी।  पानी का छिट्टा  दो महिलाओं पर गिरा,  वे मुझे घूरने लगी। चाचा ने मुझे जोर से डांटा।   बेंड़ ऐसे  दूर से नहीं फेंकनी है,  वहां  पास जाकर रखना होता है। इनके कपड़े गीले हो गए तो  यह लोग दिनभर इन्हीं गीले कपड़ों में कैसे काम करेंगी?  यह उनका रोज का काम है। बीमार हो जाएंगी। खैर महिलाओं ने ज्यादा बुरा नहीं माना। बच्चा समझकर मुझे माफ कर दिया और फिर से अपने काम में जुट गई  हैं। 

अब दोपहर होने को है । बाबा खुद घर की तरफ जा रहे हैं और मुझे अपने साथ ले गए हैं।  वहां  गेंहू और चना  उबालकर और उसमें थोड़ा लोन (नमक) डालकर  बनाई हुई घुघरी अजिया ने बनाकर पहले से  तैयार रखी हुई है । उसके साथ  हरी धनिया, हरी मिर्च  को मिलाकर सिलवट (सिलबट्टे)  में पीसा हुआ नमक भी तैयार है ।

अब बाबा एक बड़ी डलिया में  कपड़े के ऊपर घुघुरी डालकर,  डलिया को पूरा भर दिए हैं और फिर  उसी कपड़े से घुघुरी को पूरा ढककर  खेत की ओर चल पड़े हैं।  उनके वहां पहुंचते ही महिलाएं हाथ- पैर धोकर मेंड़ पर बैठ गई हैं।  बाबा उन्हें अपनी अजूरे (दोनों हाथों)  से भर- भर कर घुघुरी देते जा रहे हैं। महिलाएं अपने आंचल में इसे लेती जा रही हैं। दोबारा मांगने पर भी बाबा मना नहीं करते,  हंस-हंसकर देते जा रहे हैं।

 हाथ से नमक देने और लेने से लड़ाई होती है,  मनमुटाव होता है इसलिए महिलाएं  कागज में या किसी साफ पत्ते में चम्मच से  नमक  ले रही हैं। अरे यह क्या मैंने रूपा को हाथ से नमक दे दिया,  अब उसे चुटकी काटनी पड़ेगी।  नहीं तो लड़ाई हो जाएगी ।  

 दुनिया में बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन होंगे।  लेकिन  बदरी (बादल)  वाले मौसम में आषाढ़ के महीने  में खूब तेज भूख लगने पर  खेत की मेड़ पर बैठकर घुघुरी खाने  का जो स्वाद है वह अकल्पनीय है, अद्भुत, दैवीय है।

अब  बाबा ने कुछ देर के लिए इंजन  चला दिया है।  सब महिलाएं इंजन की हौदी से  ताज़ा पानी पीकर  पुनः बेंड़ रोपने  लगी है। उनका गाना भी बदस्तूर जारी है - 

" हरी हरी काशी रे , हरी हरी जवा के खेत। 
हरी हरी पगड़ी रे बांधे बीरन भैया,
चले हैं बहिनिया के देस।
केकरे दुआरे घन बँसवारी,
केकरे दुआरे फुलवारी, नैन रतनारी हो।
बाबा दुआरे घन बंसवारी,
सैंया दुआरे फुलवारी, नैन रतनारी हो।”---------------

अब  सूरज ढलने को है।  खेत भी थोड़ा ही बचा हुआ है।  बाबा खेत में आ गए हैं । संयोग देखिए कि शाम होने से पहले ही पूरे खेत में बेंड़ लग गई है । अब महिलाएं  हाथ -पैर धोकर बाबा को घेर कर खड़ी हो गई हैं।  बाबा उन्हें 7- 7 रुपए देते जा रहे हैं।   रूपा की अम्मा , उसकी बहन और वह खुद भी आई है  इसलिए रूपा की अम्मा को पूरे 21/- रुपये मिले हैं, सबसे ज्यादा।

 सबका हिसाब करने के बाद बाबा ने याद दिला दिया है कि  कल भी सब लोगों को आना है, बलदुआ  खेत में बेड़ लगाने के लिए। थकी -हारी लेकिन संतुष्ट महिलाएं अपने घर जा रही हैं। रूपा भी मुझे कनखियों से एक बार और देखकर अपनी अम्मा के साथ  घर जा रही है, कल फिर से आने के लिए।
(विनय सिंह बैस.. बैसवारा वाले)
(गांव-बरी लालगंज रायबरेली UP)
 

मंगलवार, 20 जून 2023

यहूदी धर्म का वैदिक इतिहास

विश्व के केवल दो समुदाय ऐसे है,
जो पुनर्जन्म को मानते है,
एक तो हमारे यदुवंशी यहूदी भाई,
ओर एक हिन्दू ....

यहूदी पंथ को Judaism कहा जाता है । 
वह Yeduism का अपभ्रंश है ।
सौराष्ट्र यह यदु लोगों का प्रदेश था ।
श्रीकृष्ण की द्वारिका उसी प्रदेश में है ।

वहाँ के शासक जाडेजा कहलाते हैं ।
जाडेजा यह " यदु-ज " शब्द का वैसा ही अपभ्रंश है 
जैसे Judaism है । 

जाडेजा और Judaism दोनों का अर्थ है यदु उर्फ जदुकुलवंशी । 
उसी पंथ का दूसरा नाम है Xionism | 
उसका उच्चार है "जायोनिज्म् " जो " देवनिज्म् " का अपभ्रंश है ।
भगवान कृष्ण देव थे अत : उनका यदुपंथ देवपंथ कहलाने लगा ।
 द या ध का अन्य देशों में " ज " उच्चार होने लगा ।
जैसे ध्यान वौद्धपंथ का उच्चार चीन - जापान में " जेन् " बौद्ध पंथ किया जाता है , 
उसी प्रकार " देवनिजम् " का उच्चार ज्ञायोनिजम हुआ ।

यहूदी परम्परा के प्रथम नेता अब्रह्म माने गए हैं ।
यह " ब्रह्म"शब्द का अपभ्रंश है ।
उनके दूसरे नेता " मोजेस् " कहलाते हैं ,
जो महेश शब्द का विकृत उच्चार है ।
मोझेस् की जन्मकथा कृष्ण की जन्मकथा से मेल खाती है , अत : वह महा-ईश भगवान कृष्ण ही हैं , इसके सम्बन्ध में किसी को शंका नहीं रहनी चाहिए ।

महाभारतीय युद्ध के पश्चात् द्वारिकाप्रदेश में शासकों के अभाव से लूटपाट , दंगे आदि आरम्भ हुए ।
धरती कम्पन आदि से सागर तटवर्ती प्रदेश जलमग्न होने लगा । 
अत : यादव लोग टोलियाँ बनाकर अन्यत्र जा बसने के लिए निकल पड़े ।
कुल २२ टोलियों में वे निकले ।
उनमें से १० टोलियां उत्तर की ओर कश्मीर की दिशा में चल पड़ी और कश्मीर , रूस आदि प्रदेशों में जा बसीं । अन्य १२ टोलियां इराक , सीरिया , पॅलेस्टाईन , जेरूसलेम , ईजिप्त , ग्रीम आदि देशों में जा बसीं ।

मध्य एशिया के १२ देशों में यदुवंशियों की वही १२ टोलियाँ हैं । वही यहूदियों की १२ टोलियां कहलाती हैं । भगवान कृष्ण के अवतार समाप्ति के पश्चात् यहूदी लोगों को जब कठिन और भीषण अवस्था में द्वारिका प्रदेश त्यागना पड़ा तभी से यहूदी लोगों ने मातृभूमि से बिछड़ने के दिन गिनने शुरू किए । उसी को यहूदियों का passover गक कहा जाता है । उसका अर्थ है मातृभूमि त्यागने के समय से आरम्भ की गई कालगणना ।
अब कोई बताएं की यहूदियो की मातृभूमि कौनसी थी ?

यहूदी बायबल में कृष्ण का बाल नाम स्पष्ठतः उल्लेखित है ।

हिब्रू भाषा यानी " हरिबूते इति हब्रू 

यहूदियों की भाषा का नाम “ हिब्रू " है । यहूदियों के आंग्ल ज्ञानकोष का नाम है Encyclopaedia Judaica | 
उसमें "हब्रु" शब्द का विवरण देते हुए कहा है कि
उस शब्द का पहला अक्षर जो " ह " है वह परमात्मा के नाम का संक्षिप्त रूप है । 
अब देखिए कि ऊपरले विवरण में दो न्यून हैं । 
एक न्यून तो यह है कि " ह " से निर्देशित होने वाला यहूदियों के भगवान का पूरा नाम क्या है ? यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया । करेंगे भी कैसे , जब ज्ञानकोषकारों का ही ज्ञान अधूरा है । 

हम वैदिक संस्कृति के आधार पर उस कमी को दूर करते हैं । " हरि " यह कृष्ण का नाम है , उसी का " ह " अद्याक्षर है । अब दूसरा न्यून यह है कि यहूदी ज्ञानकोष वालों ने हब्रू शब्द में ब्रू अक्षर क्यों लगा है ? यह कहा ही नहीं । उस महत्त्वपूर्ण बात का उन्हें ज्ञान न होने से वे उसे टाल गए । ब्रु अक्षर का तो बड़ा महत्त्व है । "ब्रूते " यानी बोलता है इस संस्कृत शब्द का वह अद्याक्षर है । अतः हब्रू का अर्थ है " हरि ( यानी कृष्ण ) बोलता था वह भाषा " । ठीक इसी व्याख्यानुसार संस्कृत और हब्रू में बड़ी समानता है ।

यहूदी लोगों वा धर्मचिह्न यहूदी लोगों के मन्दिर को Synagogue कहते हैं ।

उसका वर्तमान उच्चार “ सिनेगॉग " मूल संस्कृत " संगम " शब्द है ।

" संगम " शब्द का अर्थ है " सारे मिलकर प्रार्थना करना " ।
संकीर्तन , संतसमागम आदि शब्दों का जो अर्थ है वही सिनेगॉग उर्फ संगम शब्द का अर्थ है ।

यहूदी मन्दिरों पर षट्कोण चिह्न खींचा जाता है ।
वह वैदिक संस्कृति का शक्तिचक्र है ।

देवीभक्त उस चिह्न को देवी का प्रतीक मानकर उसे पूजते हैं ।
वह एक तांत्रिक चिह्न है ।
घर के प्रवेश द्वार के अगले आँगन में हिन्दु महिलाएं रंगोली में वह चिह्न खींचती हैं ।

दिल्ली में हुमायूं की कब्र कही जाने वाली जो विशाल इमारत है वह देवीभवानी का मन्दिर था । उसके ऊपरले भाग में चारों तरफ बीसों शक्तिचक्र संगमरमर प्रस्तर पट्टियों से जड़ दिए गए हैं ।

यहूदी लोगों में David नाम होता है वह " देवि + द " यानी देवी का दिया पुत्र इस अर्थ से डेविदु उर्फ डेविड कहलाता है । अरबों में उसी का अपभ्रंश दाऊद हुआ है । अतः हब्रू और अरबी दोनों संस्कृतोद्भव भाषाएँ हैं ।

भारत में यादव का उच्चार जाधव और जाडेजा जैसे बना वैसे ही यदु लोग यहूदी , ज्यूडेइस्टस् , ज्यू और झायोनिटस् कहलाते हैं ।
निर्देशित देश ज्यू लोग जब द्वारिका से निकल पड़े तो उन्हें साक्षात्कार हुआ जिसमें उन्हें कहा गया कि " Canaan प्रदेश तुम्हारा होगा " |

"कानान " यह कृष्ण कन्हैया जैसा ही कृष्ण प्रदेश का द्योतक था ।
यहूदी लोगों को भविष्यवाणी के अनुमार भटकते - भटकते सन् १९४६ में उनकी अपनी भूमि प्राप्त हो ही गई जिसका नाम उन्होंने Isreal रखा जो Isr=ईश्वर और ael = आलय इस प्रकार का " ईश्वरालय " संस्कृत शब्द है ।

यह एक और प्रमाण है कि यहूदी लोगों की परम्परा वैदिक संस्कृति और संस्कृत भाषा से निकली है ।
हिटलर उनसे टकराकर नामशेष हो गया । मुसलमान भी यहूदियों से टकराने के लिए आतुर हैं तो उनका भी हिटलर जैसा ही अन्त होगा ।

यहूदी ग्रन्थ की भविष्यवाणी कृस्ती बायबल का Testament नाम का जो पूर्व खण्ड है उससे समय समय पर ईश्वर का अवतरण होता है ऐसी भविष्यवाणी है । वह भगवद्गीता से ही यहूदी धर्मग्रन्थ में उतर आई है । भगवद्गीता में भगवान कहते हैं
 
यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् " ।

यहूदी नेता Moses की जन्मकथा श्रीकृष्ण की जन्मकथा जैसी ही है । और तो और श्रीकृष्ण का जैसा विराट रूप कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने देखा वैसा ही विराट रूप यहूदी लोगों ने रेगिस्तान में मोझेस का देखा , ऐसी यहूदियों की दन्तकथा है ।

पूर्ववर्ती पर्वत यदुईशालयम् उर्फ जेरूसलेम नगरी में दो पहाड़ियाँ हैं ।
उनमें से पूर्व वी पहाड़ी पर #Dome_on_the_Rock और #अलअक्सा नाम के दो प्राचीन वैदिक मन्दिर हैं , जो सातवीं शताब्दी से मुसलमानों के कब्जे में होने के कारण मस्जिदें कहलाती हैं ।
Dome on the Rock स्वयम्भू महादेव का मन्दिर है और अल्अक्सा अक्षय्य भगवान कृष्ण का मन्दिर है, एवं शक्तिपीठ भी  ।पूर्ववर्ती पहाड़ी पर ये मन्दिर बनाए जाना उनकी वैदिक विशेषता का द्योतक है ।

जिस प्रकार भारत में दो कुटुम्बों के बुजुर्गों से विवाह प्रस्ताव सम्मत होने पर युवक - युवतियों के विवाह होते हैं वैसी ही प्रथा - यहूदियों में भी है ।
वे भी भारतीयों की तरह प्रेम - विवाह को अच्छा नहीं समझते ।
वैदिक विवाहों के लिए मण्डप बनाए जाते हैं ।
यहूदियों को भी वही प्रथा है ।

वे भी मण्डपों में विवाह - संस्कार कराना शुभ समझते हैं।

यहूदियों में भी अनेक दीप लगाकर वैसा ही एक त्यौहार मनाया जाता है जैसे भारतीय लोग दीपावली मनाते हैं । वृक्ष - पूजन वैदिक संस्कृति में जिस प्रकार तुलसी , पीपल , बड़ आदि वृक्षों का पूजन किया जाता है ,
उन्हें पानी दिया जाता है और उनकी परिक्रमा की जाती है , वैसे ही यहूदी भी वृक्षों को पूज्य मानते हैं ।

यही शत्रु मुसलमान लोग यहूदियों को उतना ही कट्टर शत्रु मानते हैं जितना वे भारत के हिन्दू लोगों को मानते हैं ।

यहूदियों में वेदों का उल्लेख मार्कोपोलो के प्रवास वर्णन के ग्रन्थ में पृष्ठ ३४६ पर एक टिप्पणी इस प्रकार है- " Much has been written about the ancient settlement of Jews at Kaifungfu ( in China ) . One of the most interesting papers on the subject is in Chinese Reposi tory , Vol . XX . It gives the translation of a Chinese Jewish inscription ... Here is a passage " with respect to the Israeli tish religion we find an inquiry that its first ancestor , Adam came originally from India and that during the ( period of the ) Chau State the sacred writings were already in existence . . The sacred writings embodying eternal reason consist of 53 sections . The principles therein contained are very abstruse and the external reason therein revealed is very mysterious being treated with the same veneration as Heaven . The founder of the religion is Abraham , who is considered the first teacher of it . Then came Moses , who established the law , and handed down the sacred writings . After his time this religion entered China . " " इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार होगा

" चीन के कायपुंगफू नगर में यहूदियों की एक बस्ती थी जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है । उसमें एक बड़ा ही रोचक लेख #Chinese_Repository नाम के ग्रन्थ के बीसवें खण्ड में सम्मिलित है । चीन में प्राप्त एक यहूदी शिलालेख का वह अनुवाद है । उसमें ऐसा उल्लेख है कि " यहूदियों के मूल धर्मसंस्थापक अँडम् ( यह " आदिम " ऐसा संस्कृत शब्द है । उसी से इस्लामी भाषा में आदमी यह शब्द बना है ) भारत - निवासी था । #चौ शासन के पूर्व ही उनके पवित्र ग्रन्थ उपलब्ध हो गए थे । उन ग्रन्थों में अनादि , अनन्त तत्स्व का विवरण ५३ भागों में प्रस्तुत है ।उसके तत्त्व बड़े गूढ़ हैं और उसमें दिया अनादि - अनन्त का वर्णन बड़ा रहस्यमय है । प्रत्यक्ष परमात्मा के जितना ही उनका महत्त्व माना गया है ।

वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास💐
शोभना राष्ट्रवादी 💐
जयति सनातन💐
जयतु भारतं💐
ॐ नमो नारायणाय💐

शनिवार, 17 जून 2023

हिंदु राजा और मुस्लिम रानी...

अक्सर हिंदू राजाओ को नीचा दिखाने के लिए जोधा अकबर का झूठा वैवाहिक संबंध इतिहास बता दिया जाता है..

तो आज हम बताते हैं हिन्दू राजा और मुस्लिम लड़कियो के वैवाहिक संबंध बनाने का इतिहास..

1-अकबर की बेटी शहज़ादी खानूम से महाराजा अमर सिंह जी का विवाह।

2-कुँवर जगत सिंह ने उड़ीसा के अफगान नवाब कुतुल खा कि बेटी मरियम से विवाह।

3-महाराणा सांगा मुस्लिम सेनापति की बेटी मेरूनीसा से ओर तीन मुस्लिम लड़किया से विवाह ।

4 -विजयनगर के सम्राट कृष्ण देव राय का गुजरात के नवाब सुल्तान महमूदशाह की बेटी मिहिरिमा सुल्तान से विवाह।

5-महाराणा कुंभा (अपराजित योद्धा) का जागीरदार वजीर खा की बेटी से विवाह।

6-बप्पा रावल (फादर ऑफ रावलपिंडी) गजनी के मुस्लिम शासक की पुत्री से और 30 से अधिक मुस्लिम राजकुमारीयो से विवाह ।

7-विक्रमजीत सिंह गोतम का आज़मगढ़ की मुस्लिम लड़की से विवाह।

8-जोधपुर के राजा राजा हनुमंत सिंह का मुस्लिम लड़की ज़ुबेदा से विवाह।

9-चंद्रगुप्त मौर्य का सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर की बेटी हेलेना से विवाह ।

10- कश्मीर के राजा सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ का  तुर्की के खालीफा मुहम्मद बिन क़ासिम की बेटी जैनम से विवाह इसके अलावा उनकी 8 मुस्लिम बीबीया भी थी ।

11-महाराणा उदय सिंह ने एक मुस्लिम लड़की लाला बाई से विवाह ।

12-राजा मान सिंह मुस्लिम लड़की मुबारक से विवाह।

13-अमरकोट के राजा वीरसाल का हामिदा बानो से विवाह।

14-राजा छत्रसाल का हैदराबाद के निजाम की बेटी रूहानी बाई से विवाह।

15-मीर खुरासन की बेटी नूर खुरासन का राजपूत राजा बिन्दुसार से विवाह।

ये तो वैवाहिक संबंध की बात हुई अब हिंदू राजाओ की मुस्लिम प्रेमिकाओ पर बात करते हैं ।

1-अल्लाउदीन खिलजी की बेटी "फिरोजा"" जो जालोर के राजकुमार विरमदेव की दीवानी थी वीरमदेव की युद्ध मै वीरगति प्राप्त होने पर फिरोजा सती हो गयी थी ।

2-औरंगजेब की एक बेटी ज़ेबुनिशा जो कुँवर छत्रसाल के पीछे दीवानी थी ओर प्रेम पत्र लिखा करती थी ओर छत्रसाल के अलावा किसी ओर से शादी करने से इंकार कर दिया था ।


3-औरंगजेब की पोती ओर मोहम्मद अकबर की बेटी सफियत्नीशा जो राजकुमार अजीत सिंह के प्रेम की दीवानी थी ।

4-इल्तुतमिश की बेटी रजिया सुल्तान जो राजपूत जागीरदार कर्म चंद्र से प्रेम करती थी ।

5-औरंगजेब की बहन भी छत्रपति शिवाजी की दीवानी थी शिवाजी से मिलने आया करती थी ।

हिन्दू राजाओ की और भी बहुत सी मुस्लिम बीवीया थी लेकिन वो राज परिवार और कुलीन वर्ग से नहीं थी।
लेकिन उस समय की किताबो में ब्रिटिश और उस समय के कवियों के रचनाओ मैं जिक्र स्पष्ट है ।

और ब्रिटिश रिकॉर्ड में भी औऱ ज्यादातर हिन्दू राजाओ की एक से ज्यादा मुस्लिम बीवीया थी लेकिन रक्त शुध्दता की वजह से इनके बच्चो को अपनाया नहीं जाता ओर उन बच्चों को वर्णशंकर मान के जागिर दे दी जाती थी ।

तो ये ऐतिहासिक प्रक्षेप चप्पल की तरह फेंक कर उनके मुह पर अवश्य मारिए जो हिन्दुओ को जोधा अकबर जैसे झूठे ऐतिहासिक तथ्यों पर बहस करते हैं
कभी इनपर भी "बॉलीवुड" फिल्म बनाए ।


गुरुवार, 15 जून 2023

सरयूपारीण ब्राहमणों के गांव...

सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव : 

गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|

(१) मामखोर (२) खखाइज खोर  (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|

उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल     बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

गौतम (मिश्र-वंश)

गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

उप गौतम (मिश्र-वंश)

उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१)  कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े  (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति  मानी जाति है|

वत्स गोत्र  ( मिश्र- वंश)

वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

कौशिक गोत्र  (मिश्र-वंश)

तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी

बशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश)

इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|

(१) बट्टूपुर  मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी

शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|

(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ  (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच