रविवार, 25 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 08)


सो कर उठा, और बाहर गेट के सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर खड़े थे बाकी चार पुलिस वाले घर के एक एक कोने में खड़े थे । चूंकि मैंने कोई अपराध नही किया था इस लिए बिना डरे इंस्पेक्टर से बात किया,और अंदर आने को बोला तो इंस्पेक्टर अंदर आ गए । 
इस तरह के घेराबंदी का कारण पूछा तो बोले "ये हमारी कार्यशैली है" । इसके बाद मूल मुद्दे पर आते हुए बोले "तुम्हारी  शिकायत मिली है, तुम ब्याज पर अवैध रूप से रू देते हो और सोना चांदी,जेवर गिरवी रखते हो और जबरन ब्याज वसूलते हो गुंडागर्दी करके" ।
मैने उन्हे बताया "ऐसा कुछ नही है साहब,आपको गलत सूचना मिली है" । 
तो बोले "तलासी लेना है घर की" । मैने बोला "बिलकुल ले लीजिए साहब" । इंस्पेक्टर ने दो पुलिस वालो को आवाज दिया और घर की,अलमारी, बाक्स आदि की तलासी लिया, श्रीमती जी के जेवर के सिवा कुछ नही मिला ।  किचेन के डिब्बों को भी उलट पलट के देखा कुछ नही मिला । चूंकि श्री मती जी के जेवर ज्यादा नही थे तो सवाल नही उठाया ।
फिर इंस्पेक्टर ने पूछा "नूतन सोसायटी क्या है" ? 
     तो उन्हे सोसायटी के बारे में विस्तृत जानकारी सभी रिकार्ड सहित बता दिया । संतुष्ट होकर चले गए । जाते जाते निर्देश दिया "कल इंड्रस्ट्रियल एरिया के पुलिस थाने में जाकर TI से मिल लेना" । 
अगले दिन TI से मिला,TI ने नेक सलाह दिया "सोसायटी को मध्यप्रदेश सहकारिता विभाग में रजिस्टर्ड करवा लो, क्योंकि इस तरह से पब्लिक से रू इकठ्ठे करना फिर ब्याज पर देना कानून गलत है" । बात समझ आ गई, मैने जानकारी निकाला और रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया । 13/2/1998 को हमारी सोसायटी सहकारिता विभाग में विधिवत रजिस्टर्ड जो गई । 

जिसने शिकायत किया था उसकी जानकारी निकाल लिया और सामने आए बिना ही उसे तीन महीने करीब हॉस्पिटल में आराम करवा दिया । 
  धीरे धीरे सोसायटी में सदस्य संख्या बढ़ती गई । कलेक्शन बढ़ गया । इसी दौरान मैंने अक्टूबर 1998 में "हीरो होंडा SS" बाइक खरीद लिया क्योंकि सायकल से ट्यूसन कवर नही हो रहे थे । मेरे बाइक खरीदते ही किसी ने अफवाह फैला दिया "सोसायटी के रुपया से बाघेल साहब  ने बाइक खरीद लिया" । सहकारिता विभाग में लिखित शिकायत के कारण MP Govt. का सहकारिता विभाग द्वारा सोसायटी की जांच हुई जिसमे मैं बेदाग निकला । अब मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ गई की सदस्य बनने की होड़ लग गई । करीब 500 सदस्य हो गए । एक महीने में रू का कलेक्कसन एक लाख से ऊपर तक पहुंच गया ।  मुझे एक मिनट का भी समय नही मिलता,ट्यूसन,सोसायटी से इतना व्यस्त हुआ की सुबह 7 बजे घर से निकलता तो रात के 11:30 पर घर आता । 9वी, 10वी, 11वी, 12वी के PCM रटा गई । मुंहमांगा ट्यूसन फीस मिलती । खूब कमाई हो गई । फेक्ट्री में जहां खड़ा हो जाऊं वही पर पांच सात लोग खड़े हो जाए, स्मोकिंग रूम में जाऊ तो वहा भी भीड़ लग जाए । फेक्ट्री के मैनेजर तक टोकने की हिम्मत नही करते । पर मैं मेरे काम में कोई लापरवाही नही करता, जो काम मिलता उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ करता ।
फेक्ट्री में बघेल एक ब्रांड नेम बन गया । सोसायटी में FD/RD (फिक्स/रेकरिंग डिपोजिट) लेने लगा, मकान बनाने के लिए रजिस्ट्री गिरवी कर  लोन देने लगा, तीन तीन लाख तक लोन देने लगा । एक एक रु के लिए तरसने वाला व्यक्ति नोट गिन गिन कर थकने लगा । 
पर मेरा ट्यूसन पढ़ाना बंद नही किया । लोगो को बड़ा आश्चर्य लगता, लोग मुझे कहने लगे "तू सोता कब है यार" । इसी दौरान घर में खाली पड़े प्लाट पर पूरा मकान बनवा लिया दो कमरे खाली पड़े थे तो एक में सोसायटी की आफिस और एक खाली ही पड़ा था ।  1998 से 2003 कैसे आ गया पता ही नही चला । मार्च 2003 में एक सेलरान 1.7Ghz कंप्यूटर और Epson एक प्रिंटर खरीदा और सोसायटी के अकाउंटिंग के लिए साफ्टवेयर बनवा लिया । 
          नवंबर 2003 में मेरे जीवन में एक बार फिर एक टर्निंग प्वाइंट आया । कालोनी में ही श्याम घारगे की किराने की दुकान थी, वहा सिगरेट पीने अधिकांसतह रुकता था । (सिगरेट 1984 से ही पी रहा था) । उन्होंने बताया की कालोनी के "बसरा साहब" अपना कंप्यूटर सेंटर बेच रहे है । अगले दिन उनके घर गया और उनके कंप्यूटर सेंटर में सिर्फ तीन कंप्यूटर थे तीनो कंप्यूटर सहित खरीद लिया और घर में आरंभ कर दिया । मुझे तो Computer का C भी नही पता था । जो लड़की बसरा के यहां पढ़ाती थी वही मेरे यहां भी पढ़ाने लगी, सिर्फ दो स्टूडेंट्स थे । अब दूर वाले ट्यूसन छोड़ने लगा और कंप्यूटर सेंटर के प्रचार प्रसार में लग गया नाम रखा ....
"High Tech Copmuter Education" । बड़े बड़े पोस्टर पैंपलेट छपवाया और रात में खुद ही पोस्टर लगाता दीवारों में । खुद ही पैंपलेट बाटता । रिस्पांस मिलने लगा तो और कंप्यूटर खरीदने लगा, इस तरह धीरे धीरे घर में ही 10 कंप्यूटर रख लिया  और जो लड़की पढ़ाती थी उसी से कंप्यूटर सीखने भी लगा । 
सोसायटी का सुरु से लेकर तो अभी तक मैं ही अध्यक्ष रहा क्योंकि मेरे सामने कोई चुनाव ( सहकारिता विभाग प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव करवाता है) जीत ही नही सका । 
(शेष अगले भाग में)

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 06) ।


अब मेरा जीवन इतना व्यस्त हो गया कि लाइब्रेरी जाना छूट गया । औलिया जी के यहां आना जाना बंद हो गया क्योंकि ड्यूटी, छोटा सा बिजनेस व,सोसायटी में व्यस्त हो गया । 
मकान मालिक का 9 बाय 8 फिट के कमरे से निकल कर फ्रंट का दो दो रूम ले लिया क्योंकि साड़ी के ग्राहक और सोसायटी के सदस्य अब रूम पर आने लगे तो जगह कम  पड़ने लगी ।।
सोसायटी से थोक में किराने का समान लाते और सभी सदस्यों को थोक भाव में ही 6% वार्षिक ब्याज में लोन पर देते और किस्तों में वापस लेते।  सोसायटी हम सभी सदस्यों के लिया वरदान साबित हो रही थी । इस तरह समय बीतता गया ।  सूरत से साड़ी लाता और सीधे 75% मुनाफे तक बेचता । आर्थिक समस्या पूर्णतः खत्म हो गई । व्यस्तता ऐसी हुई की दिन रात सिर्फ काम ही काम ही काम ।

        नवंबर 1995 में फिर मेरे जीवन का तीसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे यहां 20/11/95 को बालक का जन्म हुआ,  जिसे देखने के लिए, मेरे गांव के पास बरहुला गांव के प्रेमनाथ तिवारी जी प्रथम बार आए जो हायर सेकंडरी स्कूल चलते है । उन्होंने मुझे दो कमरे छोटे छोटे कमरे में रहते देख बोले.... "आपको मकान दिला देता हूं", और  इस तरह 9/12/95 को 70K लोन सेंसन हो गया और बाकी के 95K रू की व्यवस्था कर के मकान बन गया । 12/6/ 1996 को अपने मकान में रहने आ गया । कुछ कारणों से  यहां आकर साड़ी का बिजनेस बंद कर दिया ।  प्रेमनाथ तिवारी जी ने ट्यूसन पढ़ाने की सलाह दिया और कई जगह पर ट्यूसन दिला दिया । घर घर सायकल से घूम कर  ट्यूसन पढ़ाने लगा । एक साल में ही इतने ट्यूसन मिले को सेलरी से अधिक कमाई होने लगी ।  
नई नई जगह मकान लिया,  अपने काम से मतलब रखता, मुंडी नीचे किए सायकल से आता जाता, कालोनी में सिर्फ प्रेमनाथ जी से और गांव के पास के भीमसेन सिंह जी बैस संपर्क था ।

कालोनी वाले बुजुर्ग/लड़के नवरात्रि में कालोनी के चौराहे पर माता जी को बैठाते है । 2 अक्टूबर 1997 को करीब 30 लोग माता जी के लिए शाम को 7 बजे चंदा मागने आए, उस समय मैं व मेरे दोस्त स्व. मुद्रिका प्रसाद तिवारी और जयपाल दुबे के साथ खाना खा रहे थे । श्री मती जी किचेन की खिड़की से ही बोली "मेरे घर मेहमान आए हुए और अभी खाना खा रहे है, आप लोग बाद में आ जाइएगा" । कुछ लोग वापस होने के लिए मुड़े पर एक लड़के ने सभी को रोक लिया और बोला "अरे इसकी तो ऐसी की तैसी चंदा देने से मना कर रहा है,इससे तो चंदा ले कर ही जाएंगे" । ये बात श्री मती जी सुनकर बोली "भैया चंदा के लिए मना नहीं कर रहे, पर अभी खाना खा रहे है,इस लिए बाद में आने के लिए कह रही हूं" । इतने में ओ लडका जोर से चिल्लाया "अरे हम इतने फुरसत नहीं है की बार बार आऊ, और अधिक जोर से  चिल्ला कर बोला, ओय बाहर निकल" । चूंकि हम तीनो आगे के ही रूम में खाना खा रहे थे, इस लिए सारी बात सुनाई दे रही थी और समझ भी भी आ रही थी । उस लड़के की इस तरह की बदतमीजी से भरी आवाज से मुझे बहुत गुस्सा आया, पर गुस्से को कंट्रोल किया और जूठे हाथ ही बाहर निकला तो 30 के करीब अनजान लोगो की भीड़ खड़ी थी, उसी भीड़ में  ओ लडका बोला "क्यों बे क्या दिक्कत है तेरे को, चंदा देने में"। उसकी इस बदतमीजी पर मेरा खून खौल उठा, क्योंकि 11 साल हो गया था देवास में, किसी ने इस लहजे में मेरे से बात नही किया था,फिर भी कंट्रोल किया और उसे जूठा हाथ उठाकर दिखाया और बोला "खाने के बाद दूंगा, तब से आप लोग और घरों से लेकर आ जाइए" । भीड़ में से कुछ लोग बोले "टीक है" । पर उस लड़के ने मेरी बात को इग्नोर किया और अकड़ के साथ बोला "चंदा तो लेकर ही जायेंगे" । उसकी इस बात को इग्नोर करते हुए मैं वापस आने लगा तो उसने मेरा बाया हाथ पकड़ लिया । मैं तो पहले से ही गुस्सा कंट्रोल किए हुए था पर अब कंट्रोल नही हुआ गुस्सा । मैं घुमा और पूरी ताकत से एक घुसा उसके नाक पर मार दिया, ओ कटे पेड़ की तरह भर भरा का गिर पड़ा, और फिर मैं चढ़ गया उसके ऊपर और मारना सुरु कर दिया । भीड़ में भगदड़ मच गई, एक भी नही बचा, सभी भाग गए बस एक महेश मिश्रा मुझे पकड़ने लगा, इतने में स्व. मुद्रिका तिवारी जी ने महेश मिश्रा को मारना सुरु कर दिया तो ओ जान छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ । फिर मैं और मुद्रिका भाई उस लड़के को रोड में घसीट घसीट कर इतना मारा की उसकी पूरी पीठ लहूलुहान हो गई । उसके कुर्ता पायजामा फाड़ दिया । इतने में  कालोनी में रहने वाले  मेरे गांव के पास के स्व.भीमसेन सिंह जी बैस जो  पुलिस में थे, आए और हम दोनो को छुड़ाया ओ लडका चढ्ढी बनियान में जान बचाकर भाग गया ।
मारपीट के बाद जब क्रोध कम हुआ तो लगा की ये तो गलत हो गया, पर परिस्थितियां ऐसी बनी की होनी को कौन टाल सकता है । पूरे कालोनी में तहलका मच गया "दरबार (दरबार यानी राजपूत) को मारा, दरबार को मारा,रोड में घसीट घसीट कर मारा" । ये चर्चा का विषय बन गया ।         अगले दिन सुबह ड्यूटी चला गया, शाम को ट्यूशन पढ़ाकर 9 बजे रात वापस आया, चौराहे पर ओ लडका खड़ा था अपने दोस्तो के साथ,मुझे देखा......
(शेष अगले भाग में)

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 05)

भूली बिसरी यादें (भाग 05)
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मेरी प्रगति कैसे सुरु हुई ?

मनु के वे 59 रू मेरे जीवन का पहला टर्निंग प्वाइंट बना । मेरी आर्थिक समस्या तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए लगभग खत्म हो गई । मेरा हाथ जब काम के लायक हो गया तो मनु से खाना बनाने के लिए मना कर दिया । दिसंबर 1987 के आखिरी सप्ताह में मेरे रूम पार्टनर जगन्नाथ पटेल वापस देवास आ गए । अब मेरी दिनचर्या ठीक से चलने लगी । कंपनी में 500 रू महीने मिलने लगे । 6 माह बाद परमानेंट हो गया ।।

धीरे धीरे कम्पनी में दोस्ती हुई, मेरे सीनियर आपरेटर अशोक कुमार मिस्त्री ने मधुकर पाटिल से जान पहचान करवाया और हम तीनो ने मिलकर मार्च 1988 में एक सोसायटी बनाया "नूतन मित्र मंडल" । और एक महीने में ही 10 लोग जुड़ गए ।सोसायटी में  हर महीने 20 रू जमा करने लगे । जो राशि एकत्रित होती वह जिसे जरूरत पड़ती लोन के रूप में दे देते और बदले में 1% मासिक ब्याज लेते और मासिक किस्त में वापस लेते । सोसायटी का कैश व लेनदेन का पूरा हिसाब मेरे पास ही रहता । जो रू आते ओ मनु के पास रख देता क्योंकि मेरे रूम का दरवाजा ओपन मैदान तरफ था, चोरी का भय था ।जब जरूरत पड़ती मनु से वापस ले लेता । 
              कुछ महीने में मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ी की सोसायटी में 30 लोग सामिल हो गए । मैं किसी समय दस रुपए के लिए तरसता था,अब मेरे पास हजार रु रहने लगे । जब जिम्मेदारी बढ़ी तो मनु के पास ज्यादा रू रखना रिस्की हो गया,क्योंकि मनु और अनिल स्कूल चले जाते, औलिया जी ड्यूटी चले जाते, मैं भी ड्यूटी चला जाता, इस लिए तीन लोगो के नाम से ज्वाइंट खाता खोल लिया और खाते में बैंक खाते में रू जमा करने लगे ।

मई 1989 में मेरी शादी हो गई  । शादी में अनिल भी चला था मेरे साथ ।  पत्नी को ले आने के पहले ही औलिया जी के यहां से रूम खाली करके पास ही में ठाकुर भवन में रहने लगा । क्योंकि फेमिली के लिए सुरक्षित मकान था । 16 मार्च 1990 को श्रीमती जी को देवास लाया तब मेरा मासिक वेतन 800/ रू के लगभग था । खर्च टीक से नही चलता था तब मेरे अजीज दोस्त रामेश्वर भार्गव से उधार रू लेता था । 
कुछ महीने बाद ठाकुर भवन छोड़कर "सुक्रवरिया हाट" के दरबार निवास में रहने लगा । सोसायटी को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करता रहा, खुद के आर्थिक विकास के लिए कुछ नही करता । इसी दौरान बेटी भी आ गई । खर्चे बढ़ते गए पर इनकम नही बढ़ रही थी । कुल मिलाकर परेशानी में ही दिन निकल रहे थे । 8 घंटा ड्यूटी और बचा समय लाइब्रेरी में बीतता, क्योंकि पुस्तके पढ़ने का बहुत सौख था । नई सायकल भी खरीद लिया कुछ बचत से । जब किसी को सायकल में LPG गैस का सिलेंडर बांधकर जाता देखता तो मुझे भी सोख लगता । मैं सोचता "क्या मेरे पास एलपीजी का सिलेंडर, चूल्हा होगा" । 1991 में कंपनी से 3200 रू एरियल मिला तो गैस कनेक्शन लिया ब्लैक में ।

       फिर मेरे जीवन का दूसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे दोस्त बृंदावन साहू जो मेरे साथ मेरी ही फेक्ट्री में थे, वे सूरत से साड़ी लाते और बेचते । उन्होंने मुझे भी इस व्यवसाय के लिए उत्साहित किया । सोसायटी के तीन मित्रो से उनके नाम का और मेरे नाम का लोन लिया और मैं भी साहू जी के साथ सूरत गया और साड़ी लाकर बेचने लगा ।  ड्यूटी टाइम के बाद सायकल के केरियर में साड़ी रखकर देवास के आसपास के गावों में साड़ी, फाल,ब्लाउज,के कपड़े बेचने लगा । शुक्रवार के दिन रूम के सामने ही बाजार लगता  तो ड्यूटी नही जाता और घर के सामने ही बाजार में जमीन पर प्लास्टिक बिछाकर उसी पर साड़ी आदि बेचता । साड़ी के बिजनेस में अच्छी कमाई होने लगी । मेहनत मेरी, मैनेजमेंट मेरी पत्नी का । हमारे खर्चे फेक्ट्री के वेतन से ही चलता, बिजनेस का एक रु भी खर्च के लिए नही निकालता । 6-6 /7-7  घंटे तक 15-20 kn दूर दूर गांवों में जाकर साड़ी बेचता, फिर ड्यूटी भी करता । पैसा आने लगा तो मेहनत करने का मन भी पड़ने लगा । जब कुछ रू बचा लिया तो मैं और मेरे दोस्त रामेश्वर भार्गव ने 1992 में 30 बाय 50 फिट का प्लाट 12000 रू में खरीदा और आधा आधा (15 बाय 50) प्लाट की रजिस्ट्री करवा लिया ।
शेष अगले भाग में ।।

सोमवार, 19 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 04)

भूली बिसरी यादें (भाग 04)
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ग्वालियर में रहते हुए मेरा हाथ करीब 80% टीक हो गया था,पर घाव पूरी तरह से नही भरा था,हाथ को कंधे के सहारे एक पट्टे में लटका रखता था । एक दिन एक पत्र मिला जिसमे मुझे वापस देवास जाने/आने का निर्देश था (यहां विस्मृत हो रहा है की पत्र गांव से आया था या देवास से मकान मालिक औलिया जी ने भेजा था,आते समय औलिया जी को घर का व ग्वालियर का पता देकर आया था) । भाई साहब ने टिकट कटवाकर ट्रेन में बैठा दिया,कुछ रू भी दिया थे पर याद नही कितना दिया था । 

देवास आकर मकान मालिक ने GBGL कंपनी का ज्वाइनिंग लेटर दिखाया और बोले ज्वाइन कर लो । (कंपनी में इंटरव्यू देते समय ओलिया जी का पता दिया था) । मकान मालिक के लडके अनिल ने मेरी सायकल टीक करवा दिया, शाम का खाना मकान मालिक के यहां खाया, सुबह 10 बजे कंपनी गया और ज्वाइन करने किए एक माह का समय मागा,हाथ के कारण । तब कंपनी का HR श्री बादशाह जी (मुस्लिम) बोले "तू तो ज्वाइन कर ले, कोई काम मत करना जब तक हाथ टीक नही हो जाए,मैं बोल दूंगा एम. सिंह (मेरे सुपरवाइजर) को । फिर भी मैं तैयार नहीं हो रहा था, हाथ के कारण तो बादशाह जी फिर बोले "फिर ये नौकरी दुबारा नही मिलेगी" । उस समय जीबीएलएल देवास की टॉप कंपनी में से एक थी । मैने ज्वाइन कर  लिया और एक हाथ से ड्यूटी करने लगा । ड्यूटी के नाम पर दिन भर बैठा रहता मशीन की आड़ में । जो मेहनत थी तो बस एक हाथ से कुल 16 km सायकल चलाने की । 

इस दौरान मकान मालिक की लडकी मनु सुबह,शाम दोनो टाइम मेरा खाना बना दिया करती, बर्तन धो दिया करती, यहां तक की मेरे कपड़े भी धोकर प्रेस कर देती । (आज भी उसके लिए ढेर सारी दुआए निकलती है दिल से) । 
भाई साहब के दिए रुपए कुछ दिन तो चले फिर राशन खत्म हो गया,तो मनु अपने घर से आटा लाकर रोटी,सब्जी बना कर दे देती । 
एक दिन सायकल पंचर हो गई, तो मनु से बोला " तेरे पास 2 रू हो तो दे मुझे" । तो बोली "क्या करोगे भैया" । उसे बताया कि मेरे पास दो रुपए भी नही है की पंचर बना लूं । तो तुरंत 05 रू लाकर दे दिया । 
 फेक्ट्री की केंटीन में कूपन इसू हो गया तो दोपहर में फेक्ट्री में ही खा लेता और सिक्योर्टी वालों की नजर बचा कर चार, पांच रोटी और सब्जी पॉलिथीन में रखकर  सायकल के केरियर में रूमाल में लपेटकर रख लेता और रूम पर ले आता, क्योंकि मुझे रोज रोज मनु द्वारा लाई गई रोटी खाना अच्छा नही लगता था । पर चोरी ज्यादा दिन नहीं चली, एक दिन सिक्योर्टि गार्ड ने पकड़ लिया रोटी लाते हुए 😭 और सिक्योरिटी आफिसर नितिन गौर जी के पास ले गया । उन्होंने रोटी रखवा लिया और बोले "अब ऐसा मत करना,कंपनी के नियम के खिलाफ है" । 
मेरा स्वाभिमानी मन विद्रोह पर उतर आया । उस दिन पहली बार मेरे मन में नौकरी छोड़कर गांव जाने का ख्याल आया । पर किराए के लिए भी रू नही थे 😭 ,कैसे आता । (मैं बहुत ही अंतर्मुखी स्वभाव का हूं, जल्दी से मेरी परेशानी किसी को नही बताता) । अगले दिन कंपनी में अग्रिम सेलरी के लिए एप्लीकेशन दिया पर मंजूर नहीं हुई । GBGL से ड्यूटी से बाहर निकला और फ्लूडोमेट कंपनी गया और 8 दिन की सेलरी मागा पर नही मिली । बहुत निराश होकर रूम  लौट कर आया । आते ही बाहर मनु खड़ी थी, मेरा उदास चेहरा देख कर पूछी "क्या हुआ भैया,आज बहुत उदास लग रहे हो" । उसे कुछ नही बोला । जब ओ बार बार पूछने लगी तो परेशानी बताया तो बहुत ही मासूमियत से बोली "बस इत्ती सी बात के लिए मुंह लटका लिए" और हंसने लगी । मैं रूम के अंदर आ गया, कुछ देर बाद मनु आई, दरवाजे से आवाज लगाया, मैंने दरवाजा खोला तो  एक पॉलिथीन मुझे पकड़ा दिया, मैने पूछा "इसमें क्या है री" । तो बोली "सिक्के है रख लो" ,और मेरी  प्रतिक्रिया जाने बिना ही चली गई । मैने पॉलिथीन खोला और सिक्के गिने तो 59 रू निकले । पहली बार मुझे उस लड़की के लिए स्नेह जगा ।। 

मनु लक्ष्मी थी,उसके दिए रू के बाद मेरी परेशानी खत्म हो गई । फिर मुझे GBGL की पहली पेमेंट मिल गई और रोटेशन बन गया । पेमेंट मिलते ही मनु के 59 रू की जगह 65 रू  लौटा दिया तो 6 रू मुझे वापस कर दिया ।
(इस भाग में कुछ बाते ऐसी है जिसे आज तक किसी को नही बताया । जैसे रोटी की चोरी वाली बात, मनु के दिए 59 रू वाली बात।)  
(शेष भाग 05 में)

रविवार, 18 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 03)

भूली-बिसरी यादें भाग 02 से आगे....

हम तीनो रूम पार्टनर जो कपड़े पहनकर आए थे वही थे हमारे पास । छुट्टी के दिन कपड़े धोते और फिर छः दिन पहनते,पर फेक्ट्री में मशीन चलाते समय कपड़े दो,तीन दिन में ही गंदे हो जाते । मेरे पास एक कुर्ता पायजामा था पर कुर्ता पायजामा फेक्ट्री में येलाऊ नही था । एक बार शाम को कपड़े धोए पर सुबह तक सूखे नही तो गीले कपड़े ही पहनकर ड्यूटी किया कांबले जी गीले कपड़े देख समझ गए । तब उन्होंने ही बताया शुक्रवार को सुकरवारिया हाट लगता है,वहां पुराने कपड़े भी मिलते है । बस फिर क्या था,अंधेरे में रोशनी मिल गई । शुक्रवार को हम तीनो गए और गुदड़ी बाजार (पुराने कपड़े की बाजार)  किसी के पहने हुए 02 पुराने पैंट,शर्ट खरीद लाए और टेलर से अल्टर करवा लिया और खूब बढ़िया धोकर साफ कर लिया और पहनने लगे । अब हमारी कपड़े वाली समस्या हल हो गई ।

इसी दौरान बीच में 750 km दूर गांव गया और कुछ और जरूरी समान ले आया,जिसमे एक सायकल भी थी । 

एक कमरे में विष्णु चौधरी पत्नी,एक बच्चा और एक भतीजा के साथ रहते थे,पीछे कमरे में हम तीन रहते थे । विष्णु चौधरी ने एक दिन मेरे से बोले " मेरे बच्चे और भतीजे को पढ़ा दिया करो शाम को" । मै मन ही मन खुस हुआ,चलो 20,25 रू महीने का इंतजाम जो गया । पर एक माह बाद तो क्या तीन माह बाद भी चौधरी ने दस रुपए भी नही दिया, और मैं संकोच के कारण माग भी नही सका । 

एक दिन चौधरी मुझे अपने रूम में बुलाया और बोले "यार बघेल साहब, (साहब क्यों लगाया मेरे साथ क्योंकि मैं भी उन्हें चौधरी साहब ही कहता था) । आपके साथ ओ काला लडका है, ओ मेहतर है क्या" ? मैं गर्दन नीचे कर लिया, वे समझ गए की बात सही है । उन्होंने आर्डर दे दिया । "महीना पूरा हो जाए तो खाली कर देना" । और उसी दिन से रामनाथ का बाथरूम यूज करना बंद कर दिया । रामनाथ बाहर लोटा लेकर पास के मैदान में जाने लगे, मै भी कभी कभी  उनके साथ चला जाता । कमरे के सामने ही बाहर नहाने लगे । 

नहाने के बाद अपने चढ्ढी बनियान बाहर नहीं टांगते क्योंकि चौधराइन ने मना कर दिया  बोली "हम छू लेंगे तो नहाना पड़ेगा" । एक दिन रामनाथ का छोट भाई फेक्ट्री के गेट पर आया और एनटीपीसी में सलेक्सन होने की खबर बताया और उसी दिन शाम को इंदौर-बिलासपुर ट्रेन से रीवा चले गए । बस रामनाथ करीब पांच माह साथ रहे । 

13 अक्टूबर 1987 को किर्लोस्कर में हमारी  एक साल की अप्रेंटीसशिप पूरी हुई । सभी 13 लडके बेरोजगार हो गए, मैं भी उन्ही में सामिल था । देवास की कई फैक्ट्रियों के गेट पर जाते नौकरी की आस में पर कही नही मिली, 15 दिन से घर बैठे बैठे रोटी खाते । अगले महीने के मकान मालिक के किराए की चिंता होने नही देती थी रात भर । मजबूर होकर एक वर्कशाप में लेथ मशीन पर काम करने लगा  05 रू रोज में । 

इसी दौरान घर मे दाऊ साहब को पत्र लिखा कि नौकरी छूट गई है ,कुछ खर्चे के लिए भेज दीजिए तो यही पर नौकरी तलास लूं । करीब 20 दिन बाद घर से बड़े भाई साहब का लिखा हुआ पत्र आया जिसमे घर वापस आने की बात कही । पर मैं वापस नही गया और देवास में ही स्ट्रगल करने लगा । 
एक दिन चौधरी जी बोले "मेरा छोटा भाई आ रहा है,ओ भी देवास में नौकरी करेगा इस लिए रूम खाली कर दो" । तब पास में ही हनुमंत सिंह ओलिया (काछी) के यहां रूम ले लिया । ओलियां जी किर्लोस्कर में ही थे । सज्जन व्यक्ति थे । 

वर्कशॉप में करीब दस दिन काम किया होगा, इस दौरान काशीप्रसाद विश्वकर्मा जो हमारे रीवा के थे, उनसे जान पहचान हुई तो उन्होंने "फ्लूफोमेट" नाम की कंपनी में अपने साथ लगवा लिया । इस कंपनी में हवाई जहाज की कपलिंग बनती थी । 

इस कंपनी रात की पाली में ड्यूटी मिली । 8 दिन तक तो आराम से ड्यूटी चलती रही, किर्लोस्कर का अनुभव यहां खूब काम आ रहा था । पर एक दिन अचानक 9 वे दिन "जाब" को लेथ मासीन के चक में सीधा लगाते समय बाएं हाथ की हथेली लेथ मासीन के चक और जाब के बीच में फस गई और ब्लेड जैसे तेज धार वाले टूल से कट गई, खून की धार बह चली । बगल के आपरेटर को आवाज दिया तो उसने हाथ को निकाला और केबिन में बैठे सुपरवाइजर के पास ले गया ।।

UP में मानिकपुर के एक सुपरवाइजर थे "चंदेल जी" उन्होंने हाथ में दवाई लगाया, ड्रेसिंग किया और बोले "आप MG हॉस्पिटल चले जाओ, वहा टांका लगवा लेना और घर चले जाना" । उस समय रात के 2 बज रहे थे ।   कंपनी बहुत छोटी थी, कोई सुविधा नही थी तब । टूटी हुई सायकल टूटी फूटी रोड पर घसीटते हुए चल दिए, चूकि घाव गहरा था तो खून रिस रिस कर ड्रेसिंग पट्टी को लाल कर दिया, तो हाथ को सीने से चिपका लिया । दर्द के मारे हाथ अकड़ रहा था,फिर भी चलना तो था । जब NH3 पर आया तो रोड थोड़ी अच्छी थी, एक ऊंची जगह देखकर सायकल पर चढ़ गए,और चलने लगा, मुस्किल से एक km ही गया होगा की सामने से एक ट्रक आया और सायकल सकरी रोड से नीचे उतारते ही  सम्हाल नही पाया और गिर गया, जमीन से वही बाया हाथ टकराया और उफ....😥😥 खूब की धार बह चली । दर्द के मारे हाल बेहाल हो गया । खैर...इंसान हूं,हिम्मत किया और बाबडिया चौराहे से तो MG हॉस्पिटल तक पैदल चलने लगा,वर्तमान विकास नगर चौराहे पर (तब यहां इतना विकास नही हुआ था) । किसी की रूमाल गिरी थी, उसे उठाया और दाए हाथ से घुमा घुमा कर कस कर बांध लिया तो खून का बहना बंद हो गया 
            
           रात के करीब 3 बजे MG हॉस्पिटल पहुंचा, और आपातकालीन वार्ड में गया, सोते हुए कंपाउंडर को उठाया, डाक्टर या नर्स कोई था नहीं, बड़ी मुस्किल से कंपाउंडर उठा,और बिना आंख खोले ही झल्लाते हुए बोला "जाओ सुबह आना" । मैने फिर से निवेदन किया और बोला "साहब जी, मेरे हाथ में चोट लगी है,खून बह रहा है, ड्रेसिंग कर दीजिए" ।  तब उसने आंख खोला और मेरे हाथ से टपकते खून को देखा, तो शायद उसे दया आ गई,सामने ड्रेसिंग टेबल की तरफ इसारा किया "वहा बैठ जाओ" । ड्रेसिंग टेबल पर बैठ गया, फेक्ट्री में बांधी गई ड्रेसिंग पट्टी को खोला तो देखा, घाव ऐसा लग रहा था जैसे "देशी ककड़ी पक कर फूट जाती हो" उसी तरह से पट्टी खोलते ही दोनो तरफ की चमड़ी विपरीत दिशा में फैल गई । कंपाउंडर बोला "ये तो चाकू का घाव है,पुलिस केस है,पहले पुलिस को सूचना देनी पड़ेगी, फिर ड्रेसिंग होगा"।  मैने बोला " भाई साहब पहले ड्रेसिंग कर दीजिए,खून बंद हो जाए फिर पुलिस् को सूचना दे देना" । उसने मेरी बात मान लिया,और टांका लगाने की सुई ले आया, घाव को आधा अधूरा साफ किया और फिर एक एक करके टांका लगाना सुरु किया, तो मैंने बोला "सुन्न का इनजेक्सन लगा दीजिए, नही तो बहुत दर्द होगा" तब कंपाउंडर बोला "शून्य का इंजेक्शन तो डाक्टर ही लगाते हैं,जो है नही अभी" । मैं निरुत्तर हो गया । कंपाउंडर ने टांका लगाना सुरु किया, एक टांका मुझे एक एक युग के बराबर लग रहा था, क्योंकि कंपाउंडर घाव के एक तरफ की चमड़ी को चिमटी से पकड़कर उठाता खींचता फिर सुई चुभोता धागा खींचता, फिर दूसरी तरफ की चमड़ी चिमटी से पकड़ कर उठाता, खींचता और सुई चुभोता और धागा खींचता फिर दोनो तरफ के धागे को खीच कर गठान लगाता और फिर कैंची से काटता । फिर दूसरा टांका लगाता, इस तरह से 6 टांका लगाया और दर्द की टेबलेट्स दिया,टेबलेट्स तुरंत ही खा लिया । OMG उतना दर्द मैने जीवन में पहली और आखिरी बार सहन किया था । टांका लगने के बाद करीब 25 मिनट तक बैठा रहा बेंच पर । अबतक डाक्टर साहब आ गए थे,कंपाउंडर बोले "डाक्टर साहब आ गए है,दिखा दो" । डाक्टर साहब को दिखाया,जो दवाइयां लिखा था,मेडिकल स्टोर से ले लिया । अब दर्द कम हुआ तब सायकल उठाया और सुबह के 04:30 बजे रूम पहुंचा, अंधेरे में बड़ी मुस्किल से ताला खोला, क्योंकि रूम पार्टनर पटेल जी गांव गए हुए थे । 
    दर्द कम हुआ तो नींद लग गई तो सुबह 9 बजे नींद खुली ओ भी भूख के कारण । अकेला इंसान,हाथ में चोट लगी,क्या बनाए,कैसे बनाए । पर पेट की ज्वाला शांत तो करना ही था । एक हाथ से स्टोव तो जला नही सकता, पास ही किराने की दुकान गया और 2 पैकेट बिस्कुट ले आया, एक बार में ही दोनो पैकेट बिस्कुट खत्म कर लिया, दवाई खाया और पेट भर पानी पिया और फिर आंख बंद करके लेट गया । 

कास आज मेरे पास मेरे परिजन होते,मेरी मां होती, मेरे दाऊ होते तुझे इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती । बरबस ही आंखों से आसू छलक पड़े । 

दो घंटे बाद फिर से भूख लग गई, अब बिस्कुट से काम चलने वाला नही था । वापस किराने की दुकान गया और चना ले आया,उसे पानी में गला दिया । जब आधा अधूरा गल गया तो नमक छिड़क कर चबा लेता । क्योंकि जेब में इतने रुपए तो थे,नही की होटल में जाकर कुछ खा आता । 

मकान मालिक आगे के दो कमरे में रहते थे,सबसे पीछे के रूम में मैं रहता था । बिधुर मकान मालिक के परिवार में तीन लोग थे,खुद मकान मालिक, एक 15 -16 साल का बेटा और 14-15 साल की लड़की । दो एक ही क्लास में थे । सामन्यातौर पर मकान मालिक या उनका परिवार मेरे कमरे तरफ कभी झांकते भी नही थे, इस लिए उन्हें पता नही चला । 

दो दिन चना खा कर काम निकाल लिया,कई दिन हो गया थे नहाए  हुए,तो बाथरूम में नहाने जाने लगा तब मकान मालिक की नजर मेरे उपर पड़ी तो पास आए और देखकर पूछा, उन्हे सारी बात बताया । जब उन्हें पता चला की मैं दो दिन से चना खाकर रह रहा हूं तो बहुत दुखी हुए और बोले "अब मेरे वहा खाना,भूखे मत रहना" । बरबस ही मेरे आंखो से आसू छलक पड़े उनके स्नेह के कारण ।
उस दिन रविवार था, बच्चे घर पर ही थे, मकान मालिक औलिया साहब ने लड़की को आवाज दिया "मनु,मनु" तब मनु आई तो उसे बोला "आज से बघेल भैया के लिए भी खाना बना लेना" । और सारी बात बताया तो  मनु भी बहुत स्नेह से बोली "ठीक है" और मेरी तरफ देखकर लगभग डाटते बोली "कितने बड़े पागल हो आप, हम सब के रहते हुए आप चने खाकर रह रहे हो" ।
उस दिन से मकान मालिक के यहां खाने लगा,मनु बहुत प्रेम से खिलाती,उनका लड़का अनिल भी बहुत प्रेम से बोलता । कुल मिलाकर औलिया साहब का पूरा परिवार बहुत ही अच्छा है ।।
दो दिन बाद घाव में बहुत दर्द होने लगा,मैं समझ गया, घाव पक रहा है,मेरे पास न तो इलाज के लिए पैसे है, और कब तक मकान मालिक पर बोझ बनूगा । ये सोचकर ग्वालियर चला गया जहा मेरे आर्मी वाले बड़े भाई रहते थे । 
ग्वालियर में करीब करीब एक माह रहा, बड़े भाई ने भाभी जी ने पूरा ख्याल रखा,दोनो का स्नेह आज भी मुझे उनका ऋणी बनाए हुए है ।।
(शेष अगले भाग में)

शनिवार, 17 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 02)

देवास के मोती बंगला कालोनी  में रेलवे पटरी के किनारे ही रूम मिला (वर्तमान में ओवरब्रिज भी है) । हम तीनो ने अपने अपने बोरिया बिस्तर रखने के बाद घर से लाई पूड़ी,गुड खाकर सो गए ।  अगले दिन 15 अक्टूबर 1986 को हमे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी । लंबे सफर की थकावट, मानसिक कष्ट झेलने के कारण सुबह नींद लेट खुली । लैट्रिन, बाथरूम इंगेज ।  क्योंकि मकान मालिक के तीन लड़के, दो वे खुद,सुबह एक लैट्रीन, एक  बाथरूम कैसे खाली रहेगा भला, मैने तो लोटा उठाया और हल्के अंधेरे का फायदा उठाते हुए ट्रेन की पटरी के किनारे हल्के होकर आ गए । पर हाथ धोने के लिए जगह नहीं, क्योंकि बाथरूम में मकाल मालकिन जो घुसी तो निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी, मजबूर होकर नल से बाल्टी भरे और रोड पर ही अपना कुल्ला,मुखारी,स्नान सब हो गया । हम तीनो इसी तरह फ्रेश हुए ।

सोचा था गुड रोटी खाकर काम चला लेंगे आज, मुझे मीठा बहुत पसंद है, इस लिए माता जी ने आधा किलो गुड़ दे दिया था । रोटी बनाने के लिए  मैं स्टोव जलाने लगा, तो पिन स्टोव के बर्नर में ही टूट गई । रोटी बनाने का प्लान चौपट हो गया । 

जब घर से देवास के लिए निकले थे तब पूज्य माता जी ने थोड़ी,थोड़ी खाद्य सामग्री की पोटली बांधकर दे दिया था, बोली "जाते से नई नई जगह में कहा तलासोगे" । 

बचपन से ही मेरी ऐसी आदत बनी है की सुबह बहुत तेज भूख लगती है । पर अब क्या करू, भूख जमकर लगी थी, जिस पोटली में पूड़ी बांधकर लाए थे, ओ रूम के किनारे कोने में पड़ी थी,उसे टटोला तो देखा एक पूड़ी रही थी,पर चीटियां आ गई थी ढेर सारी, पूड़ी को उठाया, चीटियां को झटकार कर, खाने के लिए निकाला तो रामनाथ टोक दिए "दादा लास्ट में मैने पूड़ी खाया था, ओ छुतीही हो गई मत खाइए आप" । मैने बोला "अरे छोड़ो,भूख से बढ़कर कुछ नही" पर रामनाथ नही माने और पूड़ी मेरे हाथ से ले लिया ।  भूख ऐसी लगी थी की खड़े होते नही बन रहा था, फिर भी वही सफर वाले पैंट, सर्ट पहन कर तैयार हुए । पर बार पेट गुहार लगाए, तो एक कटोरी में लगभग 100 ग्राम आटा को घोला और जैसे तैसे करके पी गया 😥। क्योंकि इतने पैसे नही थे पास कि, बाहर जाकर समोसा, कचोरी आदि खा सकूं । 
6:45 पर फेक्ट्री का सायरन बजा तो हम तीनो ड्यूटी के लिए निकल पड़े । किर्लोस्कर फेक्ट्री के NW शॉप में श्री  श्याम कांबले जी (मराठा क्षत्रिय) के साथ हम तीनो को सुपरवाइजर "साइबा"  ने मसीन चलाने को सीखने के लिए खड़ा कर दिया । श्याम कांबले जी भी सज्जन इंसान है, जान पहचान हुई । रामनाथ बहुत निश्छल स्वभाव के थे उन्होंने  अपनी जाति भी उन्हे बता दिया । हालाकि कोई नकारात्मक भाव नही आए उनके चेहरे पर ।।

लंच का सायरन बजा,हम लंच में नही जा रहे थे,तो श्याम कांबले जी पूछे "भूख नही लगी है क्या" । मैने बताया "कुछ लाए ही नही तो खाऊंगा क्या केंटीन में जाकर,इस लिए यही स्मोकिंग रूम में बैठेंगे" । 
श्याम कांबले जी सज्जन इंसान है, बोले "चलो तो सही" । सुबह की पिया हुआ आटे का घोल पच चुका था, भूख  की हालत सुबह जैसे फिर से हो गई थी । मारता क्या न करता, तीनों किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह पीछे पीछे चल दिए । 
जीवन में पहली बार किसी फेक्ट्री की कैंटीन देखा । घुसते ही तरह तरह के खाने के आयटम (सभी वर्कर अपनी अपनी टिफिन खोलकर बैठे थे) ने भूख और बढ़ा दिया ।
श्याम कांबले जी ने 15-15 पैसे के तीन कूपन दिए और बोले "जाकर एक एक कटोरी कढ़ी लाओ" । हम तीनो चले गए काउंटर पर,5 मिनट बाद जब लौट कर आया तो देखा की टेबल पर करीब 25-30 रोटी रखी थी, उसमे कुछ पराठा, कुछ पूड़ी भी थी । दरअसल हमारे जाने के बाद कांबले जी ने सभी से एक एक,दो,दो,रोटी हमारे लिए माग लिया । कसम से रोटी देखकर पलक के कोने नाम  पड़ गए । वाह री मालवा की मिट्टी, वाह री मालवा के लोग । केंटीन में बैठे सभी को तरफ नज़र उठा कर देखा और बरबस ही दिल से आवाज निकली "आप सभी में देवताओं का अंश है" । 
("तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करू" । यदि ये गाना उस समय होता तो मुंह से यही निकलता ।)  किसी ने सच ही कहा है "दाने दाने में लिखा है खाने वाले का नाम" ।। सच कहूं उन रोटियों जैसा स्वाद मुझे आज तक नही मिला ।

इस तरह ड्यूटी आराम से होने लगी,मसीन सीखते सीखते 7 नवंबर आ गया,पहली सेलरी मिली शायद 147 रू थी (टीक से याद नही) तीन रू ESI के कट गए थे ।  
एक दिन अचानक बज्रपात हुआ, हम जैसे चार बजे ड्यूटी से आए, घर में घुसने लगे तो मकान मालिक आग बबूला हो गए और जोर से चिल्लाए "तुम ठाकुर हो ? कैसे के ठाकुर हो ? जो भंगी को साथ में रखे हो, ये (रामनाथ की तरफ इशारा किया) मेरे यहां नही रहेगा,तुम दोनो रहो कोई दिक्कत नही" ।
मैने बहुत अनुनय,विनय किया पर मकान मालिक नही पिघले । 
दरअसल मकान मालिक व उनके बेटे ओमप्रकाश ठाकुर (शिवपुरी एमपी के लोधी हैं)  दोनो किर्लोस्कर में थे । कही से पता चल गया था । हालांकि मकान मालिक के लडके ओमप्रकाश ठाकुर ने हमारा पक्ष रखा पर उनकी एक न चली, उनकी माता जी फंगनाते हुई बोली "खबरदार, तू (रामनाथ की तरफ इशारा)  घर में घुसना मत" । मैने बोला "माता जी सिर्फ आज रात इन्हे रहने दीजिए, कल सुबह इनके लिए अलग कमरा देख लूंगा" । पर वे जिद पर अड़ गई । 

हम तीनो वापस गौतम जी के पास "भोषले कालोनी" पहुंचे और अपनी व्यथा बताया, तो गौतम जी तुरंत उठे वही पास में कालोनी में एक विष्णु चौधरी जी (खाती पटेल) जो गजरा गियर में उनके ही साथ थे,उनके यहां रूम दिला दिया, 85 रू महीने में । एक झटके में हमारा 10 रू खर्चा बढ़ गया । पर कोई विकल्प नहीं था ।
        वापस गए और पहले वाले मकान मालिक लोधी जी के यहां से समान उठाने तो मैं और पटेल जी हम तीनो की गृहस्थी उठा लाए,रामनाथ को घुसने नही दिया । हम तीनो आराम से विष्णु चौधरी जी के यहां रहने लगे...पर यहां भी रामनाथ भाई के जाति ने पीछा नहीं छोड़ा...😭😭 ।
(बस अब लिखा नही जा रहा, फिर कभी लिखूंगा) ।
श्री श्याम राव कांबले जी मेरे कालोनी ही रहते हैं । 
#NSB

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 01)

13 अक्टूबर 1986 में जब हम 13 युवक इंदौर,बिलासपुर ट्रेन से नौकरी करने देवास आये थे । जिसमे  07 ब्राह्मण, 03 कुर्मी, एक काछी, एक ठाकुर (मैं खुद) एक बसोर (मेहतर)  । दोपहर 2 बजे से  रेलवे स्टेशन में मायूस होकर खड़े थे, क्योंकि हम देवास में किसी को नही जानते थे,देवास पहली बार आए थे, किर्लोस्कर कंपनी का ज्वाइनिंग लेटर लेकर  । हमारे रीवा में कंपनी से इंटरव्यू लेने वालों ने वादा किया था "कंपनी गेट पर आ जाना, रहने,खाने, नहाने,धोने की  सारी व्यवस्था हो जायेगी" । पर जब हम सभी अपना बोरिया, बिस्तर लेकर कंपनी की गेट पर गए तो कंपनी ने सभी के ज्वाइनिंग लेटर रखवा लिया और बोले " कल सुबह से ड्यूटी पर आ जाना" । जब हमने वादा को याद दिलाया तो साफ नकर गए, बोले "ये सब व्यवस्था खुद करिए" । हमने बहुत विनती किया पर हमारी एक न चली ।  हम सभी पुनः अपना बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर वापस रेलवे स्टेशन आ गए ।
      तब यही इंदौर बिलासपुर वापस 4 बजे आती है । हम सभी ने वापसी का प्लान बना लिए । 13 लडको में से 7 बहुत ही गरीब घर से थे, वे वापस नही जाना चाहते थे, वे रोने लगे । पर एक तरफ कुआं,एक तरफ खाई वाली बात थी । हम सभी रुआसे मन से मुंह लटकाए खड़े थे,हम सभी आपस में हमारी स्थानीय भाषा "बघेलखंड़ी" में बाते कर रहे थे । 
हमारी बाते सुनकर,हम लोगो के उदास चेहरे देखकर श्री महेंद्र गौतम जी (जो पहले से देवास में गजरा गियर में थे) हमारे पास साक्षात देवदूत बनकर आए और हम सभी की पूरी बात सुनकर बोले "कोई वापस मत जाओ, सभी की व्यवस्था हो जायेगी" । फिर अपने पिता जी को ट्रेन में बैठाकर  हम लोगो को अपने साथ ले कर चल पड़े । हम 13 लड़के अपने अपने बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर कर प्रवासी मजदूर की तरह पीछे पीछे चल पड़े । 

बोरिया बिस्तर इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि हम सभी पूरी व्यवस्था से आए थे, स्टोव, कुकर, लोटा,गिलास,थाली, कटोरी,बाल्टी Etc....

श्री महेंद्र गौतम जी का किराए का सिर्फ एक कमरा 9×10 फिट का था, (पर दिल बहुत बिसाल था ) जिसमे एक बच्चा व पत्नी के सात रहते थे ।  हम सभी के समान मकान की गैलरी में रखवा दिया, सभी का परिचय पूछा,जलपान करवाया  और रात के 9 बजे तक 
सभी के लिए  रूम की व्यवस्था करवा दिया । हम सभी 13 लडके दो,दो-तीन, तीन लोग एडजेस्ट हो गए एक एक रूम में । मैं  एक पटेल जी (कुर्मी)  के साथ रूम पार्टनर बन गया । जब सभी गौतम जी के यहां से बोरिया बिस्तर लेकर चल पड़े तो  रामनाथ बसोर जिन्हे कोई अपना रूम पार्टनर नही बनाना चाहता था । रामनाथ, अनाथ जैसे फफक फफक कर रोने लगे और वापस गांव लौटने की तैयारी करने लगे । 

क्योंकि 300/ रू वेतन में 100रू -75 रू,किराया दे कि जीवन यापन कैसे करे ? 

मुझे उनकी रुलाई नही देखी गई तो मैंने उन्हें भी मेरा रूम पार्टनर बना लिया । मेरे रूम पार्टनर पटेल जी थोड़ा नाराज हुए पर उनकी नाराजगी के बाद भी  मैं मेरे निर्णय पर अडिग रहा ।

रामनाथ जी जब तक हमारे साथ रहे,पांव की तरफ बिस्तर लगा कर सोए, कई बार बोला, "बगल में बिस्तर लगा लो" तो उनका एक ही जबाब विनम्रता के साथ रहता था "दादा अपने आश्रय दे दिया,तो क्या आपके सिर पर बैठू, कभी नही दादा, मैं आपकी प्रजा हूं, प्रजा की तरह ही रहूंगा" । 
जब मैं बोलता "यहां काहे का राजा,प्रजा,हम सभी फेक्ट्री मजदूर हैं" । वे मुस्कुरा कर चुप रह जाते । 

हम दोनो खाना निकाल लेते  तभी रामनाथ बर्तन से खाना निकालते, दूर बैठकर खाते, बर्तन धोते और रख देते ।

5 माह बाद रामनाथ का एनटीपीसी सिंगरौली (शक्ति नगर) में सलेक्सन हो गया, चले गए,जाते समय पहली बार मेरे गले लगकर लिपट कर खूब रोये, बार बार मेरा पांव छुए और यही बोले "दादा आप मेरे लिए देवता समान है" । 

एक बार रामनाथ रीवा में मिल गए,मिलते ही रोड में ही दंडवत हो गए । इतना मान,सम्मान मुझे कभी किसी ने नही दिया । 

उसी तरह मैं भी पूज्य महेंद्र गौतम जी को सम्मान देता हूं ।उनका एहसान, आज तक नही भुला हूं । गौतम जी का बाद में CAT (इंदौर) में सलेक्सन हो गया था,अब तो रिटायर्ड हो गए  । 
(ये सब लिखते लिखते कई बार मेरी पलके गीली हुई)
देवास आने के बाद की जिंदगी की सच्चाई फिर कभी लिखूंगा ...।

#NSB

शनिवार, 3 सितंबर 2022

देश के संस्थानों को बेचने की शुरुआत...

आज जो निजी क्षेत्र के 03 सबसे बड़े बैंक है, यानी ICICI बैंक,  HDFC बैंक, और AXIS बैंक - यह तीनों कभी सरकारी बैंक हुआ करती थी, लेकिन पी.वी नरसिम्हा राव सरकार में महान वित्त मंत्री रहे डॉ.मनमोहन सिंह ने इन्हें बेच दिया!

ICICI का पूरा नाम था इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया! यह भारत सरकार की ऐसी संस्था थी, जो बड़े उद्योगों को ऋण देती थी!

एक झटके में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसका डिसइनवेस्टमेंट करके, इसे प्राइवेट बना दिया, और इसका नाम और ICICI बैंक हो गया!

आज जो HDFC बैंक है, उसका पूरा नाम हाउसिंग डेवलपमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया था! यह भारत सरकार की एक ऐसी संस्था हुआ करती थी, जो मध्यम वर्ग के नागरिकों को सस्ते ब्याज पर होम लोन देने का काम करती थी!

नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, "सरकार का काम केवल गवर्नेंस करना है, होम लोन बेचना नहीं है!"

डॉ. मनमोहन सिंह  इसे आवश्यक कदम बताते हैं, और कहते हैं, "सरकार का काम केवल सरकार चलाना है, बैंक चलाना, या लोन देना नहीं है!"

और एक झटके में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने HDFC बैंक को बेच दिया! और यह निजी क्षेत्र का बैंक बन गया!

इसी तरह की बेहद दिलचस्प कहानी AXIS बैंक की है!

भारत सरकार की एक संस्था हुआ करती थी, उसका नाम था यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया! यह संस्था लघु बचत को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई थी! यानी आप इसमें छोटी-छोटी रकम जमा कर सकते थे!

नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, "सरकार का काम चिटफंड की स्कीम चलाना नहीं है!"

और एक झटके में इसे बेच दिया गया! पहले इसका नाम UTI बैंक हुआ, और बाद में इसका नाम AXIS बैंक हो गया!

इसी तरह आज IDBI बैंक है, जो एक प्राइवेट बैंक है! एक समय में यह भारत सरकार की संस्था हुआ करती थी, जिसका नाम था इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया! इसका भी काम उद्योगों को ऋण देना था! 

लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे भी बेच दिया! और आज यह निजी बैंक बन गया है!

अपनी याददाश्त को कमजोर न होने दें कभी!

डिसइनवेस्टमेंट पॉलिसी को भारत में कौन लाया था? जरा सर्च कर लो!

जब नरसिम्हा राव के समय में डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था, "मैक्सिमम गवर्नमेंट, लेस गवर्नेंस!"

उन्होंने कहा था, कि "सरकार का काम व्यवसाय (धंधा) करना नहीं, सरकार का काम गवर्नेंस देना है! ऐसा वातावरण देना है, कि देश के नागरिक यह सब काम कर सकें!"

डॉ. मनमोहन सिंह ने ही सबसे पहले "टोल टैक्स पॉलिसी" लाई थी! यानी "निजी कंपनियों द्वारा सड़क बनाओ, और उन कंपनियों को टोल टैक्स वसूलने की अनुमति दो!"

डॉ. मनमोहन सिंह ने "सबसे पहले एयरपोर्ट के निजी करण" को आरंभ करवाया था, और सबसे पहला दिल्ली का "इंदिरा गांधी एयरपोर्ट" को जी.एम.आर ग्रुप को व्यवसायिक स्वरूप से चलाने के लिए दिया गया!

आज चम्पक उछल-उछल कर नाच-नाच कर, बेसुर राग गाता फिर रहा है, "मोदी ने अपने मित्रों में बेच दिया!"
डॉ. मनमोहन सिंह करें तो - विनिवेश!और मोदी करें तो - देश को बेचा!!

 २००९-१० में डॉ. मनमोहन सिंह ने ५ सरकारी कंपनियां बेचीं!
१. HPC Ltd.;
२. OIL 
३. NTPC 
४. REC 
५. NMDC 

 २०१०-११ में डॉ. मनमोहन सिंह ने ६ सरकारी कंपनियाँ और बेचीं!
१. SJVN 
२. EIL 
३. CIL 
४. PGCIL 
५. MOIL 
६. SCI - 
२०११-१२ मे
१. PFC 
२. ONGC 

२०१२-१३ में डॉ. मनमोहन सिंह ने बेचीं और ८ सरकारी कंपनियां!
१. SAIL 
२. NALCO 
३. RCF 
४. NTPC 
५. OIL 
६. NMDC 
७. HCL 
 ८.  एनबीसीसी!

 २०१३-१४ में डॉ. मनमोहन सिंह ने १२ और सरकारी कंपनियां बेचीं!
१. NHPC 
२. BHEL 
३. EIL 
४. NMDC 
५. CPSE 
६. PGCI 
७. NFL 
८. MMTC 
९. HCL 
१०. ITDC 
११. STC 
१२. NLC

कामीयो वामियो का तो मोदी विरोध में ये हाल हो चुका है , कोई बोले मोदी तुम्हारा कान ले गया, तो ये फोरन लठ ले कर मोदी  के पिछे भागेगे,अपना कान नहीं देखेंगे...

भीम राव अम्बेडकर के बारे में फैलाये गये मिथक और उनकी सच्चाई ?



1- मिथक- अंबेडकर बहुत मेधावी थे । 
सच्चाई - अंबेडकर ने अपनी सारी शैक्षणिक डिग्रीयां तीसरी श्रेणी में पास की ।
2- मिथक - अंबेडकर बहुत गरीब थे ! 
सच्चाई -जिस जमानें में लोग  फोटो नहीं खींचा पाते थे उस जमानें में अंबेडकर की बचपन की बहुत सी फोटो है , वह भी कोट पैंट और टाई में !
3 - मिथक- अंबेडकर ने शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया !
सच्चाई -अंबेडकर के पिता जी खुद उस ज़माने में आर्मी में सूबेदार मेजर थे ! इसके अलावा सविंधान बनाने वाली सविंधान सभा में 26sc और 33st के सदस्य शामिल थे !
4- मिथक- अंबेडकर को पढ़ने नहीं दिया गया ।
सच्चाई -उस जमानें में अंबेडकर को गुजरात बडोदरा के क्षत्रिय राजा सियाजी गायकवाड़ नें स्कॉलरशिप दी और विदेश पढ़ने तक भेजा और ब्राह्मण गुरु जी ने अपना नाम अंबेडकर दिया ।
5- मिथक- अंबेडकर नें नारियों को पढ़ने का अधिकार दिया !
सच्चाई- अंबेडकर के समय ही 15 पढ़ी लिखी औरतों ने संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया !
6- मिथक- अंबेडकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे !
सच्चाई -अंबेडकर नें सदैव अंग्रेजों का साथ दिया भारत छोड़ो आंदोलन की जम कर खिलाफत की अंग्रेजों को पत्र लिखकर बोला कि आप और दिन तक देश में राज करिए उन्होंने जीवन भर हर जगह आजादी की लड़ाई का विरोध किया ।
7- मिथक - अम्बेडकर बड़े शक्तिशाली थे ! 
सच्चाई- 1946 के चुनाव में पूरे भारत भर में अंबेडकर की पार्टी की जमानत जप्त हुई थी ।
8- मिथक अंबेडकर नें अकेले आरक्षण दिया !
सच्चाई- आरक्षण संविधान सभा में दिया जिसमें कुल 299 लोग थे , अंबेडकर का उसमें सिर्फ एक वोट था आरक्षण सब के वोट से दिया गया था और भारत में कई दलित जातियों को आरक्षण 1909 में ही दे दिया गया था !
9- मिथक- अंबेडकर ने सविंधान बनाया । 
सच्चाई- अंबेडकर केवल संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे जबकि पूरी संविधान सभा के अध्यक्ष परम् विद्वान डाक्टर राजेंद्र प्रसाद जी थे और सविंधान का मसौदा , ढांचा बी एन राव ने बनाया था ! 
10- मिथक- अंबेडकर राष्ट्रवादी थे
सच्चाई -1931 में गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी से भारत के टुकड़े करने की बात कर दलितों के लिए अलग दलिस्तान की मांग की थी ।
11 मिथक- आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत थे ।
सच्चाई- इसी आरक्षण को लेकर सरदार पटेल से अंबेडकर की कहा सुनी हो गई थी । पटेल जी संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गये थे , बाद में नेहरू के कहने पर पटेल जी वापस आये थे । सरदार पटेल ने कहा कि जिस भारत को अखण्ड भारत बनानें के लिए भारतीय देशी राजाओं , महराजाओं , रियासतदारों , तालुकेदारों ने अपनी 546 रियासतों को भारत में विलय कर दिया जिसमें 513 रियासतें क्षत्रिय राजाओं की थी । इस आरक्षण के विष से भारत भविष्य में खण्डित होने के कगार पर पहुंच जाएगा ।
12- मिथक- अंबेडकर स्वेदशी थे ।
सच्चाई - देश के सभी नेताओं का तत्कालीन पहनावा भारतीय पोशाक धोती - कुर्ता , पैजामा - कुर्ता , सदरी व टोपी , पगड़ी , साफा आदि हुआ करता था । गांधी जी नें विदेशी पहनावा व वस्तुओं की होली जलवाई थी । यद्यपि कि नेहरू , गाधीं व अन्य नेता विदेशी विश्वविद्यालय व विदेशों में रहे भी थे फिर भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे।अंबेडकर की कोई भी तस्वीर भारतीय पहनावा में नहीं है । अंबेडकर अंग्रेजियत के हिमायती थे । अंत में चाहता हूँ कि अंग्रेज जब भारत छोड़ कर जा रहे थे तो अपने नापाक इरादों को जिससे भविष्य में भारत खंडित हो सके के रुप में अंग्रेजियत शख्सियत अंबेडकर की खोज कर लिए थे ।