मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

सूरजमल जाट

सवाई जय सिंह द्वारा जाटों के सत्ता केंद्र थून को नेस्तनाबूद किए जाने के पश्चात जाट बेहद कमजोर हो चुके थे। इसी कड़ी में हम बदन सिंह का उत्थान पाते है जो की सिनसिनी गांव का जाट जमीदार था और बेहद महत्वाकांक्षी था। वह इस सच्चाई से अवगत था की बिना क्षत्रियों के समर्थन के उसकी दाल नहीं गलने वाली इसलिए उसने धीरे धीरे जयपुर दरबार से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करना शुरू किया। एक सेवक के भांति उसके विनम्र और विनितपूर्ण स्वभाव ने सवाई जय सिंह का दिल जीत लिया। इस चाटुकारिता का यह परिणाम हुआ की जयपुर महाराज ने बदन सिंह को बृज राज का खिताब दे दिया जिससे उसकी जाटों में प्रतिष्ठा एकाएक बढ़ गई।
इतना होने के बाद भी बदन सिंह ने राजा की उपाधि धारण नहीं की और ताउम्र खुद को कच्छवाहों का नौकर कहता रहा। वह हर साल दशहरा दरबार में हाजिरी लगाने के लिए जयपुर आता था और सवाई जय सिंह के धोक लगा कर जाता था।

बदन सिंह का उत्तराधिकारी सूरजमल था । सूरजमल असल में बदन सिंह का पुत्र नहीं था। उसकी (सूरजमल की) मां एक शादीशुदा महिला थी जिसपर मोहित होकर बदन सिंह ने उसे अपने हरम में रख लिया था। बाद में बदन सिंह ने सूरजमल को अपने पुत्र की तरह ही पाला। सूरजमल एक कुशल राजनीतिज्ञ था तथा शुरू से ही उसने मुगलों से अच्छे संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रकार हम देखते हैं की 1745 में जब मुगल सेना अली मुहम्मद रुहेला का विद्रोह दबाने जाती है तो जाट उस सेना के साथ मुगलों की तरफ़ से लड़ रहे थे। 

सूरजमल से प्रभावित हो मुगल वज़ीर सफदर जंग ने उसे अपने बेड़े में शामिल कर लिया था। इसी के तहत वजीर ने बादशाह से अपील कर बदन सिंह को राजा का और सूरजमल को कुमार बहादुर की उपाधि दिलवाई तथा साथ ही साथ सूरजमल को मथुरा का फौजदार भी नियुक्त करवा दिया (यही कारण है कि आज भी भरतपुर के जाट फौजदार सरनेम का इस्तेमाल करते हैं जो उन्हें मुगल बादशाह की बदौलत मिला था)। इसके बाद जाटों की प्रतिष्ठा में काफी बढ़ोतरी हुई क्योंकि उनके सरदार को स्वयं मुगल बादशाह ने राजा की उपाधि नवाजी थी। 

सूरजमल के मुगलों से मैत्रीपूर्ण संबंध एवं उसके बढ़ते प्रभाव से उसका राजपूतों से टकराव होना निश्चित था। 1753 में सफदर जंग की मदद से उसने घसेड़ा के जागीरदार बहादुर सिंह बड़गुर्जर पर अचानक हमला बोल दिया। मुगलों और जाटों की संयुक्त सेना ने किले का घेराव कर लिया । यह सीज करीब 3 महीने तक चली। आखिरकार जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई और कोई दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण अंदर मौजूद क्षत्राणियो ने जौहर किया और बहादुर सिंह तथा उसके 25 सैनिक केसरिया कर जाटों और मुगलों पर टूट पड़े। मात्र इन 25 राजपूतों ने करीब 1500 जाटों को मौत के घाट उतार दिया। इतिहास में शायद पहला मौका था जब राजपूत महिलाओं को एक हिंदू सेना के हमले के कारण जौहर करना पड़ा। आज इसे " हिंदुआ सूरज" भी कह रहे हैं लोग।

सफदर जंग के बादशाह के खिलाफ विद्रोह में सूरजमल उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था। उसके जाट सैनिकों ने दिल्ली के बाहरी हिस्सों को लूटा और इतना उत्पात मचाया की इसे जाटगर्दी कहा जाने लगा। मुख्य दिल्ली की तरफ जाने की इनकी हिम्मत नहीं हुई, जहां मुगल सैनिक थे। So called दिल्ली की जीत और चित्तौड़ के किले का दरवाजा , क्या रूहानी कहानियां चल रही हैं, आजकल।

  दिल्ली के जिन निर्दोष व्यापारियों को लूटा गया था वे सभी ज्यादातर हिंदू थे। इसी तरह हिंदू महिलाओं से बलात्कार और हिंदुओं की हत्या ही सबसे ज्यादा हुई।

1757 में अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा पर धावा बोला। सूरजमल इस सच्चाई से भली भांति परिचित था की उसके जाट सैनिक अफगानों के सामने नहीं टिक पाएंगे। अतः उसने अब्दाली से संधि करना उचित समझा और एक मोटी रकम पेश कर चालाकी से अपने राज्य को पठानों के हमले से बचाने में सफल रहा। 

सूरजमल और नजीब रुहेला का आपसी संघर्ष चलता रहता था। इसी तरह एक युद्ध में पठानों ने सूरजमल की सेना पर हमला बोल दिया। इस लड़ाई में सूरजमल तुरंत मारा गया। सैय्यद मुहम्मद खान रुहेला ने हुकुम दिया की सूरजमल का सर काटकर उसे भाले पर लगा दिया जाए। यह दृश्य देखने के बाद डरी हुई जाट सेना वहां से भाग खड़ी हुई।

इस तरह सूरजमल की मृत्यु हुई है। जादूनाथ सरकार लिखते है की सूरजमल एक सामान्य कद का था। शरीर मोटा और रंग बेहद काला था। बदन सिंह की तरह सूरजमल भी हर साल जयपुर में दशहरा दरबार में नजराना भेंट करने और जयपुर राजा सवाई माधो सिंह को धोक लगाने जाता था।

आजकल वोटों की राजनीति के चलते "हिंदुआ सूरज" और अजेय योद्धा और पता नही क्या क्या इनका नया इतिहास बनाया जा रहा है और नए नायक कागजों पर पैदा किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ वास्तविक नायकों के मान मर्दन और इतिहास विकृतिकरण की बाढ़ आई हुई है।

Source: Fall of the Mughal Empire: Volume 2 by Jadunath Sarkar.
History of Jaipur by Jadunath Sarkar

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

समंदर का वली...

तैमूर लंगड़ा जब दिल्ली के करीब पहुंचा उसके पास एक लाख से ज्यादा हिन्दू गुलाम थे, जिनमें औरतें, बच्चे भी थे। इन गुलामों का नियंत्रण था एक उज्बेक अमीर शाहरुख मिर्ज़ा के हाथ। इस शाहरुख मिर्ज़ा का बेहद करीबी मौलवी और उज्बेक व्यापारी था शाह अली खानजादा...!

तैमूर परेशान था कि दिल्ली सल्तनत में युद्ध के समय इन गुलामों का क्या किया जाए... ऐसे में शाह अली ने अपनी राय दी "जो गुलाम मुसलमान हैँ उन्ह रिहा कर दिया जाए काफिरों को क़त्ल कर दिया जाए... काफिरों को नहीं छोड़ा जा सकता।"

एक लाख हिन्दू तलवार के घाट उतार दिये गए उनके सरों का बड़ा ढेर दिल्ली के बाहर बनाया गया... और फिर दिल्ली को फतह कर हज़ारों की तादाद में हिन्दू कत्ल किये गए...!

हिंदुस्तान में भारी कत्लोगारत मचा और बड़ी लूट कर तैमूर 1398 ई में वापस लौटा। मगर ज्यादा दिन राज नहीं कर सका और 1405 ई में मर गया। उसके बाद मचे उत्तराधिकार के गदर में मौलवी शाह अली तैमूर के खजाने से पैसा चुरा भाग निकला... और हिंदुस्तान के सिंध इलाके में आकर व्यापारी बन गया... और अपने व्यापार के लिए गुजरात और तब की दक्कन की सल्तनतों तक जाने लगा उसने अपनी छवि एक धार्मिक और नर्मदिल इंसान की बना ली... उसे लोग हाजी शाह अली बुखारी के नाम से जानने लगे।

उत्तराधिकार की जंग फ़तेह कर गद्दी पर बैठा शाहरुख मिर्ज़ा और उसे अपने चोर और गद्दार साथी की याद आयी। उसने उसकी तलाश का हुक्म दिया तो शाह अली फकीर का भेष बना अरब भाग निकला... मगर वहां पहचान लिया गया और तैमूर के कत्लोगारत को देख चुका अरब किसी हालात में दोबारा उज़्बेकों को अपने यहां नहीं देखना चाहता था। सो उन्होंने शाह अली को जिंदा एक संदूक में बंद कर समुद्र में फैक दिया...!

ये संदूक इत्तेफ़ाक़ से बहता हुआ आज की मुम्बई के पास के एक टापू पर आ लगा। जिसे कुछ मछुआरों ने खोला तो उसमें फकीर के लिबास में एक लाश थी। इस लाश को कुछ मछुआरों ने पहचान लिया और उसे उसी टापू पर दफ़न कर दिया गया...!

धीरे धीरे संदूक में मिली फ़क़ीर की लाश की चर्चा फैलने लगी और तमाम कहानियां भी प्रचलित हो गयीं और शाह अली, पीर हाजी शाह अली बुखारी बन गया... 
आगे के कहानी वही है जो हिंदुओं के चूतियापे को दिखाती है...

आज इस शाहरुख मिर्ज़ा के क्रूर हत्यारे साथी को पीर हाजी अली शाह बुखारी कह इसकी क़ब्र पर सैकड़ों हिन्दू नाक रगड़ने जाते हैं और उस टापू को जहां बक्सा दफ़नाया गया था हाजी अली दरगाह कहा जाता है...!
समझें हिंदुओं.....
 साभार
#NSB

रविवार, 17 दिसंबर 2023

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर निर्माण की कहानी...

सन् 1947 में घोसी मुसलमानों के अवैध कब्जे में थी कृष्ण जन्मभूमि.
फिर उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने कैसे बनवाया ‌मंदिर...? 

1670 में औरंगजेब ने मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़ दिया था... उसके बाद 281 सालों तक कृष्ण जन्मभूमि पर कोई मंदिर नहीं था...सिर्फ एक बहुत छोटा सा अस्थाई मंदिर बनाकर घंटा लगा दिया गया था जहां स्थानीय पंडे और पुजारी दर्शन करवाते थे...वो प्रतीक रूप में ही था...कि यहां पर भगवान कृष्ण का जन्म हुआ है। 

आज जिस मंदिर को हम कृष्ण जन्मभूमि पर देखते हैं वो सिर्फ 30-40 साल ही पुराना है...इस मंदिर का निर्माण कार्य 1984 में पूरा हुआ था...
इस वर्तमान मंदिर का निर्माण कैसे हुआ...? आपको समझाते हैं... 

आजादी के पहले करीब साल 1940 में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मथुरा का दौरा किया था.. तब उन्होंने देखा था कि कृष्णजन्मभूमि की जमीन पर घोसी मुसलमानों ने अवैध कब्जा जमा रखा था, 
इसके अलावा बहुत लंबे समय से यहां पर पुराने तोड़े गए मंदिरों का मलबा भी पड़ा हुआ था...!

जुगल किशोर बिड़ला ने जब कृष्ण जन्मभूमि का बुरा हाल देखा तो वो काफी दुखी हुए । 1940 में जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि वो पैसा लगाने को तैयार हैं आप यहां पर एक भव्य केशवदेव मंदिर का निर्माण करवाइए।

लेकिन केशव देव का मंदिर बनाने के लिए पहले कृष्ण जन्मभूमि की जमीन को खरीदना जरूरी था। 

-1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई और 1803 में मराठों ने मुगलों को गोवर्धन के युद्ध में हरा दिया...उन्होंने कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन घोषित कर दिया।

1803 में अंग्रेजों ने मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया को हराकर मथुरा पर कंट्रोल कर लिया । अंग्रेजों ने भी मराठों की पॉलिसी को जारी रखते हुए कृष्ण जन्मभूमि को सरकारी जमीन ही दर्ज रहने दिया।

1815 तक कृष्ण जन्मभूमि सरकारी जमीन के तौर पर दर्ज थी...लेकिन साल 1815 में अंग्रेजों ने कृष्ण जन्मभूमि की नीलामी की। 

बनारस के राजा पटनीमल ने साल 1815 में 13.37 एकड़ का पूरा कृष्ण जन्मभूमि परिसर खरीद लिया। जहां मस्जिद खड़ी थी वो जमीन भी राजा पटनीमल के नाम पर लिख दी गई।

- साल 1832 में शाही ईदगाह के मुअज्जिन ने ब्रिटिश कोर्ट में केस दायर किया लेकिन अंग्रेज जजों ने ईदगाह के मुअज्जिन का केस खारिज कर दिया। 

1947 के पहले पूरी कृष्ण जन्मभूमि बनारस के राजा पटनीमल के वंशज राय किशन दास के नाम पर थी। 

8 फरवरी 1944 को मदन मोहन मालवीय की मदद से जुगल किशोर बिड़ला ने 13.37 एकड़ की ये पूरी जमीन राय किशन दास से 13 हजार रुपए में खरीद ली।

साल 1951 में कृष्ण जन्मभूमि से यथा संभव अवैध कब्जे हटवाए गए । फिर जुगल किशोर बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की... तब मदन मोहन मालवीय की मृत्यु हो चुकी थी लेकिन जुगल किशोर बिड़ला ने मदन मोहन मालवीय के सपने को साकार करने के लिए जन्मभूमि पर निर्माण कार्य शुरू करवाया।

उद्योगपति विष्णु हरि डालमिया और रामनाथ गोयकना ने भी कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण के लिए काफी धन खर्च किया... और इस तरह औरंगजेब के द्वारा मंदिर का विध्वंस किए जाने के 281 साल बाद दोबारा कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर बनकर तैयार हुआ।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

6 दिसंबर...अयोध्या में कब क्या, कैसे हुआ ?

6 दिसंबर 1992  की रात, पत्रकार चंद्रकांत जोशी के आंखो देखा हाल ।

ढाँचे के आसपास तूफान के पहले और तूफान के बाद की खामोशी का मंजर था। कार सेवक, पत्रकार, नेता और तमाशाई जा चुके थे। मगर कुछ शक्तियाँ ऐसी थी जो अपने काम में चुपचाप लगी थी और इन शक्तियों के पीछे मैं भी चुपचाप एक गँवार देहाती की तरह लगा हुआ था। अगर किसी को तनिक भी भान हो जाता कि मैं पत्रकार हूँ और यहाँ मौजूद हूँ तो फिर मेरे लिए जान बचाना मुश्किल हो जाता, क्योंकि ढाँचा टूटने के बाद सबसे रहस्यमयी, रोमांचक और एक नया इतिहास लिखने वाला घटनाक्रम यहाँ होने वाला था।जिस जगह पर मैं 6 दिसंबर, 1992 की शाम को घुप्प अंधेरे और कड़कड़ाती ठंड में कुछ टिमटिमाते दीयों, लालटेन और टॉर्च की रहस्यमयी रोशनी में कुछ हिलति-डुलती मानवीय आकृतियों के बीच किसी भुतहा हिंदी फिल्म के दृश्यों को डरते-सहमते देख रहा था। रामसे ब्रदर्स की भुतहा फिल्मों से लेकर हॉलीवुड की खतरनाक भुतहा फिल्मों को तीन घंटे देखना रोमांच का काम हो सकता है मगर उससे भी ज्यादा खौफनाक दृश्य को, बगैर बुलाए मेहमान बनकर देखना और बात है।

ढाँचे का मलबा साफ होते ही वहाँ कुछ ही लोग बचे थे। तभी मैने एक व्यक्ति को ये कहते सुना कि अब रामलला की प्राणप्रतिष्ठा कर इस जगह पर स्थापित करना है और उसके आसपास ईंटों का या कपड़ों का घेरा बना देना है नहीं तो कल कोई अदालत जाकर स्टे लेकर आ सकता है, फिर राम लला को कहाँ बिठाएँगे? ये सुनते ही मुझे भी कुतुहल हुआ कि ढाँचा टूटता देख मैं तो ये भूल ही गया था कि असली मुद्दा ढाँचा तोड़ना नहीं राम मंदिर बनाना है। मुझे लगा कि कल यानि 7 दिसंबर की सुबह से हो सकता है राम मंदिर का काम शुरु हो जाए। ये जिज्ञासा पैदा होते ही कड़कड़ाती ठंड में मेरे शरीर में गर्मी आ गई। मैं भूल ही गया कि मैं यहाँ सुनसान जंगल में तीखी ठंडी हवा के बीच बगैर गरम कपड़ों के ठिठुर रहा हूँ। (पेशे का रोमांच और लक्ष्य् पर टिके रहना क्या होता है ये मैने पहली बार अनुभव किया) । मैं भी पक्का कारसेवक बनकर इन छायाओं का पीछा करता रहा। अंधेरा होते होते राम लला की मूर्तियाँ लाई गई। मै आज भी आश्चर्यचकित हूँ कि जब ढाँचा बगैर किसी योजना के ढहाया जा रहा था तो मूर्तियाँ सही सलामत कैसे बचा ली गई और मलबे में से कैसे निकाल ली गई। (इसका जवाब भी आगे मिलेगा)

इधर राम लला की मूर्तियों की विधि-विधान से कुछ साधु, कुछ पंडित और कुछ कार सेवकों ने मिलकर प्राण प्रतिष्ठा कर दी और तत्काल इसके चारों ओर ईँटों की छोटी सी चारदीवारी बनाकर बनाकर कपड़ा या कनात बांध दी गई। वही कनात और कपड़ा आज तक राम लला की रक्षा करता रहा है। अजीब संयोग देखिये इधर रामलला की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी उधर फैजाबाद और अयोध्या की मस्जिदों से अजान की आवाजें आ रही थी। प्राण प्रतिष्ठा के मंत्रों, घंटियों और शंख की ध्वनियों में अजान की आवाज़ भी घुल चुकी थी, ऐसा लग रहा था मानो मस्जिदों से भी राम लला की प्राण प्रतिष्ठा की स्वीकृति मिल गई हो।

अब मेरे मन से उन हिलती -डुलती मानवीय आकृतियों का खौफ़ जाता रहा, ये मेरे पास प्रसाद लेकर आए और कहने लगे, पक्के और सच्चे राम भक्त हो, इतनी ठंड में भी राम लला के दर्शन करने आए हो, तुम पहले दर्शनार्थी हो। उसी समय वहाँ रामजी की आरती हुई और मैने आरती भी ली और प्रसाद भी लिया।

कुछ ही देऱ में कुछ साधु-संत और शायद विश्व हिंदू परिषद या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता वहाँ और कुछ लोगों को लेकर आए और कहा कि यहाँ से अब कोई नहीं हटेगा, अगर हम हट गए तो पुलिस या सीआरपीएफ वाले मूर्तियाँ हटा देंगे। सुबह तक हम यहाँ रामायण पाठ करेंगे। मैं भी रामायण पाठ करने वाले भक्तों में घुल-मिल गया। अब मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि मैं वहाँ से होटल की तरफ जाऊँ या तिरुपति और अयोध्या होटल में ठहरे पत्रकारों को बताऊँ कि यहाँ क्या हो रहा है। धीरे धीरे वहाँ भक्तों की संख्या बढ़ने लगी और लगभग तीन सौ चार सौ कार सेवक या स्थानी भक्त वहाँ रामायण पाठ में जुड़ गए। ठंड से बचाने के लिए वहाँ अलाव भी जला दिए गए थे, इससे मुझे लगा कि अब रात भर यहीं रहना ठीक है। थोड़ी देर में प्रसाद के रूप में भोजन भी आ गया। शुध्द घी का खाना खाकर मैं भी तृप्त हो गया

दिसंबर की ठंडी काली रात और आसमान में टिमटिमाते तारों के बीच खुले में रामायण का पाठ मेरे लिए एक अजीब और सिहरन पैदा करने वाला अनुभव था। बार बार मुझे लग रहा था कि यहाँ कभी भी कुछ हो सकता है। आखिर वही हुआ जिसका मुझे डर था। आधी रात होते ही एक आदमी मेरे पास आया और बोला कि तुम कहाँ से आए हो, मैने कहा उज्जैन से। तो उसने कहा, तुम्हारे बाकी साथी कहाँ है, मैने कहा वो सब होटल में हैं। मै समझा वो मेरे पत्रकार साथियों की बात कर रहा होगा। तो उसने कहा कि हमने सब होटलें खाली करवा दी है और सबको स्टेशन भेज दिया है। ये सुनकर मैं डर गया। फिर उसने पूछा कि तुम कितने लोग साथ आए थे। मैने कहा मैं तो अकेला आया था। तो उसने कहा झूठ मत बोलो और पीछे देखो, हमने सब लोगों को स्टेशन भेज दिया है। मैने पीछे देखा तो आधे से ज्यादा लोग गायब थे। फिर उसने अपना परिचय दिया कि हम सीआरपीएफ वाले हैं, और कहा कि तुम भी जाओ और अपने साथियों को स्टेशन लेकर चले जाओ। हम सीआरपीएफ वालों ने अपनी ट्रकों में भर भर कर रात भर में सभी कार सेवकों को स्टेशन भेज दिया है, और कहा है कि जिनको जो गाड़ी मिले यहाँ से चले जाओ नहीं तो सुबह गोली चल सकती है।

फिर मुझमें अचानक हिम्मत आ गई और मैने कहा कि मैं कार सेवक नहीं हूँ, पत्रकार हूँ। मैं तो शाम से यहीँ फँस गया और मेरे साथी ढाँचा टूटते ही बिछुड़ गए और मैं यहीं रह गया। इस पर वो मुझे पास के ही सीआरपीएक के कैंप में अपने वरिष्ठ अधिकारी के पास ले गया। उस अधिकारी ने मुझसे पूछा कि रात भर में यहाँ क्या हुआ, कौन कौन आया था। तो मैने कहा कि मैं तो खुद उ्ज्जैन से आया हूँ, मैं यहाँ किसी को नहीं जानता। मेरी बातों से वो अधिकारी संतुष्ट नजर आया और उसने मेरे लिए चाय मंगवाई और कहा कि तुम हमारा एक काम करना अगर कोई कार सेवक कहीं छुपे हुए हों तो हमको बता देना क्योंकि हम पूरा अयोध्या और फैजाबाद बाहर के लोगों से खाली करवाना चाहते हैं।

चाय पीकर मैं वापस भजन गाने वालों के बीच बैठ गया। जैसे तैसे सुबह हुई। फिर भी मुझे लग रहा था कि यहाँ कुछ अनहोनी होने वाली है। मन में एक अजीब सा डर और रोमांच पैदा हो गया था।

अब जरा दिल थामकर बैठिये, इस जगह पर जहाँ रात भर कीर्तन भजन और रामायण पाठ चला, वहाँ अब एक नया इतिहास करवट लेने वाला था। इसका अंदाजा वहाँ मौजूद गिने चुने लोगों, मुझे और चारों ओर गिध्द दृष्टि से हर एक को घूरते हुए पुलिस व सीआरपीएफ के जवानों को भी नहीं था।

सुबह 7 बजे रम लला का पुजारी हाथों में पूजा की थाल, पूजा सामग्री घंटी, घड़ियाल और चिमटा लेकर आया। उसने जैसे ही राम लला की मूर्ति की ओर कदम बढ़ाया। वहाँ मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उसे रोक दिया। उन्होंने कहा कि तुम मूर्तियों के पास नहीं जा सकते। यहाँ बता दूँ कि राम लला की मूर्तियों को कनात और कपड़े में ढंकने के साथ ही वहाँ दो-तीन फीट ऊंची दीवार भी रातोंरात बना दी गई थी। इस पर पुजारी ने कहा कि क्यों नहीं जा सकते मैं तो रोज ठाकुरजी की पूजा और आरती करता हूँ। तो सुरक्षा कर्मी ने कहा कि रोज करते होगे आज तो वो हमारी निगरानी में हैं। इस पर पुजारी ने कहा, आप निगरानी करो, मैं तो पूजा करुंगा। यह बहस बहुत तीखी हो रही थी। इस पर पुजारी ने् चिल्लाकर कहा, अगर मुझे पूजा नहीं करने दी तो मैं शंख और चिमटे बजाकर सब अखाड़े वालों साधु संतों को बुला लाउंगा, फिर तुम जानना। ये सुनकर वो सुरक्षाकर्मी घबरा गया। उसने कहा, रुको मैं अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात करता हूँ। पुजारी ने कहा जल्दी करो, मेरी पूजा और आरती का समय हो रहा है। उस अधिकारी ने वरिष्ठ अधिकारियों को वायरलैस सैट पर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। इस घटना ने ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी। थोड़ी ही देर में वरिष्ठ अधिकारी ने वायरलैस पर सूचना दी जो मैने भी अपने कानों से सुनी, दिल्ली बात हो गई है, वहाँ से कहा गया है कि पूजा और आरती में कोई विघ्न न डाला जाए। ये सुनते ही पुजारी सहित सभी सुरक्षा कर्मी और दूसरे लोग खुशी से उछल पड़े। सबने इतनी जोर से जयश्री राम का नारा लगाया कि आसपास के पंछी पेड़ों से उड़ गए।

अगला दृश्य तो और भी रोमांचक था। पुजारी आरती कर रहा था, और जो सुरक्षा सैनिक पूजा करने से रोक रहे थे, वो अपने जूते और चमड़े के बेल्ट उतारकर आरती गा रहे थे। अंदर पूजा चल रही थी और बाहर सुरक्षा में लगे सैनिक गा रहे थे – भये प्रकट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या हितकारी, भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुजचारी। भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी॥

ऐसा लग रहा था मानो तुलसी दासजी ने ये आरती और छंद इसी दिन के लिए ही लिखा था।

इस आरती के बाद सबने श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम आरती गाकर पूजा का समापन किया।

लेकिन एक दृश्य देखकर मैं भी चौंक गया।जो सुरक्षा कर्मी पुजारी को आरती करने से रोक रहा था उसकी आँखोँ से अविरल आँसू बह रहे थे, वह अपने साथी से कह रहा था आज मैं बहुत बड़े पाप से बच गया अगर अज मेरी वजह से यहाँ आरती और पूजा नहीं होती तो मैं किसी को मुँह दिखाने काबिल नहीं रहता। उसका दूसरा साथी भी भीगी आँखों से उसे समझाने की कोशिश कर रहा था। मैने देखा कि सभी सुरक्षा सैनिकों की आँखें भीगी हुई थी और वे बार बार अपने आँसू रोकने का प्रयास कर रहे थे।

इधर आरती का समापन हुआ और थोड़ी ही देर में फैजाबाद के निलंबित जिलाधीश आर. एन श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी रॉय भी वहाँ आ पहुँचे, दोनों ने प्रसन्न मन से राम लला के दर्शन किए।

अब आपको दो रहस्य और बता देना चाहता हूँ। पहला तो ये कि ढाँचे मलबे में से राम लला की मूर्तियाँ सुरक्षित कैसे निकाल ली गई। इसकी मैने खोजबीन की तो पता चला कि ढाँचे के टूटने का अंदेशा होते ही राम लला की मूर्तियों की सुरक्षा की व्यवस्था कर ली गई थी।

और आखरी में एक और चौंकाने वाली बात। सर्वोच्च न्यायालय को उत्तर प्रदेश सरकार और राम जन्म भूमि आंदोलन के नेताओँ ने आश्वासन दिया था कि बाबरी मस्जिद परिसर में कोई निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय की ओर से तत्कालीन गृह सचिव श्री वनोद ढाल को पर्यवेक्षक बनाया गया था। श्री विनोद ढाल सुबह से लेकर ढाँचा टूटने तक एक वीडियो कैमरा और दूरबीन लिए ढाँचे के बाईँ ओर बनी सीता रसोई ( ये भी एक महल जैसा भवन है) की छत पर बैठे थे। श्री विनोद ढाल 1985 में उज्जैन के संभागायुक्त रह चुके थे और उनसे मेरी अच्छी दोस्ती थी। उनसे मैने पूछा की आपके सामने ही ढाँचा टूटता रहा और आप कुछ नहीं कर सके। तो उन्होंने चौंकाने वाला उत्तार दिया- मेरा काम ये देखना था कि यहाँ कोई निर्माण कार्य ना हो, टूटने के संबंध में मेरे पास कोई निर्देश नहीं थे।

तो ये है 1992 की रामकथा जिसकी प़टकथा श्री लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, साध्वी ऋतुंभरा, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी ने लिखी थी, आज एक नई रामकथा शुरु हो रही है जिसकी पटकथा की शुरुआत भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के हाथों हो रही है।

साभार –

इन्दौर से प्रकाशित दैनिक दैनिक प्रजातंत्र से।