शनिवार, 29 जुलाई 2023

रानी अबक्का चौटा' (Abbakka Chowta)

साल था 1555 जब पुर्तगाली सेना कालीकट, बीजापुर, दमन, मुंबई जीतते हुए गोवा को अपना हेडक्वार्टर बना चुकी थी। टक्कर में कोई ना पाकर उन्होंने पुराने कपिलेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर उस पर चर्च स्थापित कर डाली।

मंगलौर का व्यवसायिक बंदरगाह अब उनका अगला निशाना था। उनकी बदकिस्मती थी कि वहाँ से सिर्फ 14 किलोमीटर पर 'उल्लाल' राज्य था जहां की शासक थी 30 साल की रानी 'अबक्का चौटा' (Abbakka Chowta).।

पुर्तगालियों ने रानी को हल्के में लेते हुए केवल कुछ सैनिक उसे पकडने भेजा। लेकिन उनमेंसे कोई वापस नहीं लौटा। क्रोधित पुर्तगालियों ने अब एडमिरल 'डॉम अल्वेरो ड-सिलवीरा' (Dom Álvaro da Silveira) के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। शीघ्र ही जख्मी एडमिरल खाली हाथ वापस आ गया। इसके बाद पुर्तगालियों की तीसरी कोशिश भी बेकार साबित हुई।

चौथी बार में पुर्तगाल सेना ने मंगलौर बंदरगाह जीत लिया। सोच थी कि यहाँ से रानी का किला जीतना आसान होगा, और फिर उन्होंने यही किया। जनरल 'जाओ पिक्सीटो' (João Peixoto) बड़ी सेना के साथ उल्लाल जीतकर रानी को पकड़ने निकला।

लेकिन यह क्या..?? किला खाली था और रानी का कहीं अता-पता भी ना था। पुर्तगाली सेना हर्षोल्लास से बिना लड़े किला फतह समझ बैठी। वे जश्न में डूबे थे कि रानी अबक्का अपने चुनिंदा 200 जवान के साथ उनपर भूखे शेरो की भांति टूट पड़ी।

बिना लड़े जनरल व अधिकतर पुर्तगाली मारे गए। बाकी ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसी रात रानी अबक्का ने मंगलौर पोर्ट पर हमला कर दिया जिसमें उसने पुर्तगाली चीफ को मारकर पोर्ट को मुक्त करा लिया।कालीकट के राजा के जनरल ने रानी अब्बक्का की ओर से लड़ाई लड़ी और मैंगलुरु में पुर्तगालियों का किला तबाह कर दिया। लेकिन वहाँ से लौटते वक्त जनरल पुर्तगालियों के हाथों मारे गए।

अब आप अन्त जानने में उत्सुक होंगे..??

रानी अबक्का के देशद्रोही पति लक्षमप्पा ने पुर्तगालियों से धन लेकर उसे पकड़वा दिया और जेल में रानी विद्रोह के दौरान मारी गई।

क्या आपने इस वीर रानी अबक्का चौटा के बारे में पहले कभी सुना या पढ़ा है..??  इस रानी के बारे में जो चार दशकों तक विदेशी आततायियों से वीरता के साथ लड़ती रही, हमारी पाठ्यपुस्तकें चुप हैं। अगर यही रानी अबक्का योरोप या अमेरिका में पैदा हुई होती तो उस पर पूरी की पूरी किताबें लिखी गई होती।
है।
आज भी रानी अब्बक्का चौटा की याद में उनके नगर उल्लाल में उत्सव मनाया जाता है और इस ‘वीर रानी अब्बक्का उत्सव’ में प्रतिष्ठित महिलाओं को ‘वीर रानी अब्बक्का प्रशस्ति’ पुरस्कार से नवाज़ा जाता है।

इस कहानी से दो बातें साफ हैं..

हमें हमारे गौरवपूर्ण इतिहास से जानबूझ कर वन्चित रखा गया है। "रानी अबक्का चौटा" के बारे में "कुछ लोग" तो शायद पहली बार ही ये सुन रहे होगे, ये हमारी 1000 साल की दासता अपने ही देशवासियों (भितरघातियों) के विश्वासघात का नतीजा है। दुर्भाग्य से यह आज भी यथावत है..🙏🙏

शुक्रवार, 28 जुलाई 2023

नेहरू की पोल ।।

        
थ्रिलर सिनेमा का शौक हो तो नेहरू खानदान को पढ़ लीजिए रोम रोम में सनसनी दौड़ जाती है। किसी जर्नलिस्ट की बहुत पुरानी पोस्ट कहीं दिखी तो पढ़ते पढ़ते पोस्ट करने की इच्छा को दबा न पाए...

पंडित जी आप पंडित नेहरू के वंश का पोस्टमार्टम करने आए हैं क्या?

जम्मू-कश्मीर में आए महीनों हो गए थे, एक बात अक्सर दिमाग में खटकती थी कि अभी तक नेहरू के खानदान का कोई क्यों नहीं मिला, जबकि हमने किताबों में पढ़ा था कि वह कश्मीरी पंडित थे। नाते-रिश्तेदार से लेकर दूरदराज तक में से कोई न कोई नेहरू खानदान का तो मिलना ही चाहिए था। नेहरू राजवंश कि खोज में सियासत के पुराने खिलाडिय़ों से मिला लेकिन जानकारी के नाम पर मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर नेहरू का नाम ही सामने आया। 

अमर उजाला दफ्तर के नजदीक बहती तवी के किनारे पहुंचकर एक दिन इसी बारे में सोच रहा था तो ख्याल आया कि जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सचिव हाफीजा मुज्जफर से मिला जाए, शायद वह कुछ मदद कर सके। अगले दिन जब आफिस से हाफीजा के पास पहुंचा तो वह सवाल सुनकर चौंक गई। बोली पंडित जी आप पंडित नेहरू के वंश का पोस्टमार्टम करने आए हैं क्या ? 

हंसकर सवाल टालते हुए कहा कि मैडम ऐसा नहीं है, बस बाल कि खाल निकालने कि आदत है इसलिए मजबूर हूं। यह सवाल काफी समय से खटक रहा था। कश्मीरी चाय का आर्डर देने के बाद वह अपने बुक रैक से एक किताब निकाली, वह थी रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज कि किताब ए लैम्प फार इंडिया- द स्टोरी ऑफ मदाम पंडित। उस किताब मे तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा था। जिसके अनुसार गंगाधर असल में मुसलमान थे जिनका असली नाम था गयासुद्दीन गाजी। इस फोटो को दिखाते हुए हाफीजा ने कहा कि इसकी पुष्टि के लिए नेहरू ने जो आत्मकथा लिखी है, उसको पढऩा जरूरी है। नेहरू की आत्मकथा भी अपने रैक से निकालते हुए एक पेज को पढऩे को कहा। इसमें एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगाधर थे। इसी तरह जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत बहादुरशाह जफर के समय में नगर कोतवाल थे। अब इतिहासकारो ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफर के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था और खोजबीन करने पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे। लेकिन किसी गंगाधर नाम के व्यक्ति का कोई रिकार्ड नहीं मिला है। 

नेहरू राजवंश की खोज में मेहदी हुसैन की पुस्तक बहादुरशाह जफर और 1857 का गदर में खोजबीन करने पर मालूम हुआ कि गंगाधर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर के डर से बदला गया था, असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोककर पूछताछ की थी लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया बाकी तो इतिहास है ही। 

एक कप चाय खत्म हो गयी थी, दूसरी का आर्डर हाफीजा ने देते हुए के एन प्राण कि पुस्तक द नेहरू डायनेस्टी निकालने के बाद एक पन्ने को पढऩे को दिया। उसके अनुसार जवाहरलाल मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर। यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल कि एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू। कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी।कमला शुरु से ही इन्दिरा के फिरोज से विवाह के खिलाफ थीं क्यों यह हमें नहीं बताया जाता। लेकिन यह फिरोज गाँधी कौन थे ? 

सभी जानते हैं की राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं। फिर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था? किसी को मालूम नहीं, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब, एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाई करता था और जिसका मूल निवास जूनागढ गुजरात में था। नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया। फिरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था घांदी (गाँधी नहीं)घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था। विवाह से पहले फिरोज गाँधी ना होकर फिरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था। 

हमें बताया जाता है कि फिरोज गाँधी पहले पारसी थे यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है। फिरोज खान ने इन्दिरा को बहला फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली। नाम रखा मैमूना बेगम। नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल पीले हुए लेकिन अब क्या किया जा सकता था। जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने नेहरू को बुलाकर समझाया। राजनैतिक छवि की खातिर फिरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले, यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये बजाय धर्म बदलने के सिर्फ नाम बदला जाये तो फिरोज खान घांदी बन गये फिरोज गाँधी। 

विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और सत्य के साथ मेरे प्रयोग नामक आत्मकथा लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक नहीं नहीं किया। खैर उन दोनों फिरोज और इन्दिरा को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुन: वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक का भ्रम बना रहे। 

इस बारे में नेहरू के सेकेरेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक प्रेमेनिसेन्सेस ऑफ नेहरू एज ;पृष्ट 94 पैरा 2 (अब भारत में प्रतिबंधित है किताब) में लिखते हैं कि पता नहीं क्यों नेहरू ने सन 1942 में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी जबकि उस समय यह अवैधानिक था।कानूनी रूप से उसे सिविल मैरिज होना चाहिये था। 

यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फिरोज अलग हो गये थे। हालाँकि तलाक नहीं हुआ था। फिरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे। तंग आकर नेहरू ने फिरोज के तीन मूर्ति भवन मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। मथाई लिखते हैं फिरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बड़ी राहत मिली थी। 1960 में फिरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी जबकी वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे। 

संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था, अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता। लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था। ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था, इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था। 

एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ 206 पर लिखते हैं - 1948 में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था। वह संस्कत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे। वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृत की अच्छी जानकार थी। नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए। चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था। नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये। मथाई के शब्दों में एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा वह बहुत ही जवान खूबसूरत और दिलकश थी। एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं, किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं।

नवम्बर 1949 में बेंगलूर के एक कान्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया। उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कान्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी। उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया। 

मथाई लिखते हैं, मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफी कोशिश की लेकिन कान्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस जो कि एक विदेशी महिला थी बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कथोलिक संस्कारो में बड़ा करूँ चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था। 

नेहरू राजवंश की कुंडली जानने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो शाम पांच बज गए थे, हाफीजा से मिली ढेरों प्रमाणिक जानकारी के लिए शुक्रिया अदा करना दोस्ती के वसूल के खिलाफ था, इसलिए फिर मिलते हैं कहकर चल दिए अमर उजाला जम्मू दफ्तर की ओर ।।

बुधवार, 26 जुलाई 2023

सच्चे दिल से याद करें,प्रभु जरूर आयेंगे ।

(पढ़ते पढ़ते मेरी आंखे छलक पड़ी) ।।

श्री अयोध्या जी में 'कनक भवन' एवं 'हनुमानगढ़ी' के बीच में एक आश्रम है जिसे 'बड़ी जगह' अथवा 'दशरथ महल' के नाम से जाना जाता है।

 काफी पहले वहाँ एक सन्त रहा करते थे जिनका नाम था श्री रामप्रसाद जी। उस समय अयोध्या जी में इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी। ज्यादा लोग नहीं आते थे। 
श्री रामप्रसाद जी ही उस समय बड़ी जगह के कर्ता धर्ता थे। वहाँ बड़ी जगह में मन्दिर है जिसमें पत्नियों सहित चारों भाई (श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत एवं श्री शत्रुघ्न जी) एवं हनुमान जी की सेवा होती है। चूंकि सब के सब फक्कड़ सन्त थे... तो नित्य मन्दिर में जो भी थोड़ा बहुत चढ़ावा आता था उसी से मन्दिर एवं आश्रम का खर्च चला करता था।

प्रतिदिन मन्दिर में आने वाला सारा चढ़ावा एक बनिए (जिसका नाम था पलटू बनिया) को भिजवाया जाता था। उसी धन से थोड़ा बहुत जो भी राशन आता था... उसी का भोग-प्रसाद बनकर भगवान को भोग लगता था और जो भी सन्त आश्रम में रहते थे वे खाते थे। 
एक बार प्रभु की ऐसी लीला हुई कि मन्दिर में कुछ चढ़ावा आया ही नहीं। अब इन साधुओं के पास कुछ जोड़ा गांठा तो था नहीं... तो क्या किया जाए...? कोई उपाय ना देखकर श्री रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू बनिया के पास भेज के कहलवाया कि भइया आज तो कुछ चढ़ावा आया नहीं है...
 अतः
थोड़ा सा राशन उधार दे दो... कम से कम भगवान को भोग तो लग ही जाए। पलटू बनिया ने जब यह सुना तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि मेरा और महन्त जी का लेना देना तो नकद का है... मैं उधार में कुछ नहीं दे पाऊँगा।

श्री रामप्रसाद जी को जब यह पता चला तो "जैसी भगवान की इच्छा" कहकर उन्होंने भगवान को उस दिन जल का ही भोग लगा दिया। सारे साधु भी जल पी के रह गए। प्रभु की ऐसी परीक्षा थी कि रात्रि में भी जल का ही भोग लगा और सारे साधु भी जल पीकर भूखे ही सोए। वहाँ मन्दिर में नियम था कि शयन कराते समय भगवान को एक बड़ा सुन्दर पीताम्बर ओढ़ाया जाता था तथा शयन आरती के बाद श्री रामप्रसाद जी नित्य करीब एक घण्टा बैठकर भगवान को भजन सुनाते थे। पूरे दिन के भूखे रामप्रसाद जी बैठे भजन गाते रहे और नियम पूरा करके सोने चले गए।

धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी। करीब आधी रात को पलटू बनिया के घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वो बनिया घबरा गया कि इतनी रात को कौन आ गया। जब आवाज सुनी तो पता चला कुछ बच्चे दरवाजे पर शोर मचा रहे हैं, 'अरे पलटू... पलटू सेठ... अरे दरवाजा खोल...।' 

उसने हड़बड़ा कर खीझते हुए दरवाजा खोला। सोचा कि जरूर ये बच्चे शरारत कर रहे होंगे... अभी इनकी अच्छे से डांट लगाऊँगा। जब उसने दरवाजा खोला तो देखता है कि चार लड़के जिनकी अवस्था बारह वर्ष से भी कम की होगी... एक पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं।

वे चारों लड़के एक ही पीताम्बर ओढ़े थे। उनकी छवि इतनी मोहक... ऐसी लुभावनी थी कि ना चाहते हुए भी पलटू का सारा क्रोध प्रेम में परिवर्तित हो गया और वह आश्चर्य से पूछने लगा, 
'बच्चों...! तुम हो कौन और इतनी रात को क्यों शोर मचा रहे हो...?'
बिना कुछ कहे बच्चे घर में घुस आए और बोले, हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। ये जो पीताम्बर हम ओढ़े हैं... इसका कोना खोलो... इसमें सोलह सौ रुपए हैं... निकालो और गिनो।' ये वो समय था जब आना और पैसा चलता था। सोलह सौ उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। 

     जल्दी जल्दी पलटू ने उस पीताम्बर का कोना खोला तो उसमें सचमुच चांदी के सोलह सौ सिक्के निकले। प्रश्न भरी दृष्टि से पलटू बनिया उन बच्चों को देखने लगा। तब बच्चों ने कहा, 'इन पैसों का राशन कल सुबह आश्रम भिजवा देना।'

अब पलटू बनिया को थोड़ी शर्म आई, 'हाय...! आज मैंने राशन नहीं दिया... लगता है महन्त जी नाराज हो गए हैं... इसीलिए रात में ही इतने सारे पैसे भिजवा दिए।' पश्चाताप, संकोच और प्रेम के साथ उसने हाथ जोड़कर कहा, 'बच्चों...! मेरी पूरी दुकान भी उठा कर मैं महन्त जी को दे दूँगा तो भी ये पैसे ज्यादा ही बैठेंगे। इतने मूल्य का सामान देते-देते तो मुझे पता नहीं कितना समय लग जाएगा।'

बच्चों ने कहा, 'ठीक है... आप एक साथ मत दीजिए... थोड़ा-थोड़ा करके अब से नित्य ही सुबह-सुबह आश्रम भिजवा दिया कीजिएगा... आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना मत कीजिएगा।' पलटू बनिया तो मारे शर्म के जमीन में गड़ा जाए। 

वो फिर हाथ जोड़कर बोला, 'जैसी महन्त जी की आज्ञा।' इतना कह सुन के वो बच्चे चले गए लेकिन जाते जाते पलटू बनिया का मन भी ले गए।

इधर सवेरे सवेरे मंगला आरती के लिए जब पुजारी जी ने मन्दिर के पट खोले तो देखा भगवान का पीताम्बर गायब है। उन्होंने ये बात रामप्रसाद जी को बताई और सबको लगा कि कोई रात में पीताम्बर चुरा के ले गया। जब थोड़ा दिन चढ़ा तो गाड़ी में ढेर सारा सामान लदवा के कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े हुए पलटू बनिया आया और सीधा रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

रामप्रसाद जी को तो कुछ पता ही नहीं था। वे पूछें, 'क्या हुआ... अरे किस बात की माफी मांग रहा है।' पर पलटू बनिया उठे ही ना और कहे, 'महाराज रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी... मैं कान पकड़ता हूँ आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना नहीं करूँगा और ये रहा आपका पीताम्बर... वो बच्चे मेरे यहाँ ही छोड़ गए थे... बड़े प्यारे बच्चे थे... इतनी रात को बेचारे पैसे लेकर आ भी गये... 

     आप बुरा ना मानें तो मैं एक बार उन बालकों को फिर से देखना चाहता हूँ।' जब रामप्रसाद जी ने वो पीताम्बर देखा तो पता चला ये तो हमारे मन्दिर का ही है जो गायब हो गया था। अब वो पूछें कि, 'ये तुम्हारे पास कैसे आया?' तब उस बनिया ने रात वाली पूरी घटना सुनाई। 
अब तो रामप्रसाद जी भागे जल्दी से और सीधा मन्दिर जाकर भगवान के पैरों में पड़कर रोने लगे कि, 'हे भक्तवत्सल...! मेरे कारण आपको आधी रात में इतना कष्ट उठाना पड़ा और कष्ट उठाया सो उठाया मैंने जीवन भर आपकी सेवा की... मुझे तो दर्शन ना हुआ... और इस बनिए को आधी रात में दर्शन देने पहुँच गए।'

जब पलटू बनिया को पूरी बात पता चली तो उसका हृदय भी धक् से होके रह गया कि जिन्हें मैं साधारण बालक समझ बैठा वे तो त्रिभुवन के नाथ थे... अरे मैं तो चरण भी न छू पाया। अब तो वे दोनों ही लोग बैठ कर रोएँ। इसके बाद कभी भी आश्रम में राशन की कमी नहीं हुई। आज तक वहाँ सन्त सेवा होती आ रही है। इस घटना के बाद ही पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और यह पलटू बनिया ही बाद में श्री पलटूदास जी के नाम से विख्यात हुए।

श्री रामप्रसाद जी की व्याकुलता उस दिन हर क्षण के साथ बढ़ती ही जाए और रात में शयन के समय जब वे भजन गाने बैठे तो मूर्छित होकर गिर गए। संसार के लिए तो वे मूर्छित थे किन्तु मूर्च्छावस्था में ही उन्हें पत्नियों सहित चारों भाइयों का दर्शन हुआ और उसी दर्शन में श्री जानकी जी ने उनके आँसू पोंछे तथा अपनी ऊँगली से इनके माथे पर बिन्दी लगाई जिसे फिर सदैव इन्होंने अपने मस्तक पर धारण करके रखा। उसी के बाद से इनके आश्रम में बिन्दी वाले तिलक का प्रचलन हुआ।
वास्तव में प्रभु चाहें तो ये अभाव... ये कष्ट भक्तों के जीवन में कभी ना आए परन्तु प्रभु जानबूझकर इन्हें भेजते हैं ताकि इन लीलाओं के माध्यम से ही जो अविश्वासी जीव हैं... वे सतर्क हो जाएं... उनके हृदय में विश्वास उत्पन्न हो सके।जैसे प्रभु ने आकर उनके कष्ट का निवारण किया ऐसे ही हमारा भी कर दे..!!
‼️🙏जय सियाराम🙏‼️
#NSB

माननीय CJI साहब से मेरे सवाल 🙏

जज साहब मणिपुर मामले पर गुस्सा हो गए हैं ।
लेकिन मेरे सवाल हैं माननीय CJI साहब और न्यायपालिका से
- जज साहब, आप गुस्सा होने के बजाय जल्दी फैसले सुनाने का प्रबंध क्यों नहीं करते ?
- आप गुस्सा होने के बजाय कुछ ऐसा क्यों नहीं करते कि अदालत के चक्कर काटते हुए आम नागारिक की चप्पलें न घिसें ?
-जैसे आपने तिस्ता सीतलवाद के लिये समय निकाला वैसे आम नागरिकों के लिये समय क्यों नहीं निकालते ? 
- आप गुस्सा होने के बजाय आम आदमी को तारीख पर तारीख देने के सिस्टम में बदलाव क्यों नहीं करते ?
- जज साहब, आप गुस्सा होने के बजाय बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने का आदेश क्यों नहीं देते ?
- जज साहब, निर्भया के बलात्कारियों के बाद किसी भी अन्य बलात्कारी को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया ?
- जज साहब आप गुस्सा हो रहे हो न ? जबकि दिल्ली की ही अदालत ने श्रद्धा के 35 टुकड़े करने वाले आफताब को फांसी पर लटकाने का फैसला देने के बजाय उसे गर्म कपड़े और किताबें देने का निर्देश दिया था
गुस्सा करने वाले जज साहब आपको याद है न ? 
- 2021 में बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा में 7 हजार महिलाओं के साथ अत्याचार किया था (Source: फैक्ट फाइंडिंग कमेटी) लेकिन आप न तो गुस्सा हुए और न ही सजा सुनाई
- बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद 60 साल की बूढ़ी दादी का उनके पोते के सामने घर में घुसकर गैंगरेप किया था, आपको गुस्सा क्यों नहीं आया? अगर आया तो अभी तक उन हैवानों को तारीख पर तारीख देने के बजाय फांसी की सजा क्यों नहीं सुनाई ?
- बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद 17 साल की नाबालिग किशोरी को घर से घसीटकर जंगल ले जाया गया जहां उसके साथ 5 लोगों ने गैंगरेप किया, आपको गुस्सा क्यों नहीं आया? अगर गुस्सा आया तो अभी तक फांसी की सजा क्यों नहीं सुनाई ?
- नादिया में नाबालिग किशोरी के साथ TMC नेता के बेटे की जन्मदिन पार्टी में गैंगरेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई जिस पर CM ममता बनर्जी ने कहा कि ये तो लव अफेयर था. इस पर आपको गुस्सा क्यों नहीं आया जज साहब ? अगर आया तो उन हैवानों को अभी तक फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया ?
माननीय CJI साहब क्या आप बताएंगे कि
- दिल्ली में साक्षी को साहिल ने चाकुओं से गोदकर, पत्थर से कुचलकर मार डाला. क्या आपको इस पर गुस्सा नहीं आया जज साहब ? अगर आया तो सारे प्रमाण सामने होने के बाद भी अभी तक साहिल को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया ?
- चंद्रचूड़ साहब, 8 जुलाई को बंगाल के हावड़ा में TMC नेताओं ने एक महिला के कपड़े फाड़े, उसके शरीर को नोंचा और निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया. इस आपको गुस्सा क्यों नहीं आया ?
- कन्हैयालाल, उमेश कोल्हे, निशांक राठौर, प्रवीण नेत्तारू, शानू पांडेय की हत्या/सर तन से जुदा पर आपको गुस्सा नहीं आया जज साहब ? अगर आया तो सारे प्रमाण सामने होने के बाद भी इनके हैवानों को अभी तक फांसी क्यों नहीं दी गई ?
- जज साहब, भारतवर्ष की हजारों बेटियां हैं, जो रेप/गैंगरेप की शिकार हैं. न्याय का इंतजार कर रही हैं लेकिन आपको इस पर गुस्सा क्यों नहीं आता जज साहब ? क्यों बलात्कार के मामलों में जल्द सुनवाई कर न्याय सुनिश्चित नहीं किया जाता ?
- जज साहब, 90 के दशक का अजमेर रेप कांड सुना है आपने ? 250 से ज्यादा बेटियों का रेप/गैंगरेप किया गया था. 30 साल बाद भी एक भी सिंगल बलात्कारी को फांसी नहीं हुई है. क्या आपको इस पर गुस्सा नहीं आता जज साहब ?
जज साहब, मैं भारतवर्ष का एक आम नागरिक हूं, मणिपुर की घटना पर आपको गुस्सा आ गया तो मुझे भी आ गया, इसलिए मैंने गुस्से में ही ये सवाल पूछे हैं. क्या आप जवाब देंगे जज साहब ? अगर दे पाए तो मुझे लगता है कि देश अति प्रसन्न होगा जज साहब
CJI साहब,अगर आपको सच मे गुस्सा आ रहा है न तो एक काम करो. रेप के जिन मामलों में सीधे प्रमाण उपस्थित हैं, उनको तारीख पर तारीख देने के बजाय फैसला सुनाओ, बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाओ
जिस दिन नियमित अंतराल पर बलात्कारी फांसी पर झूलने लग जाएंगे,बहन-बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी, निर्वस्त्र कर उनकी परेड निकालने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा वैसे लगता नहीं है कि आप ऐसा कर पाएंगे क्योंकि न्यायपालिका की क्रेडिबिलिटी आम जन के बीच खत्म सी हो चुकी है. इसका कारण यही है कि जज साहब को भी नेताओं और अभिनेताओ की तरह सेलेक्टिव मामलों पर गुस्सा आता है।अतः मैं सभी ग्रुप के सदस्यों से विनती करूंगा इसी पोस्ट को माननीय नायमूर्ति तक पहुंच जाए।   
जय श्रीराम ....

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

मेरी टीवी कथा....😀

आज यह फोटो देखा तो एक घटना याद आ गई ।।
रामायण सीरियल चल रहा था मेरे मकान मालिक के घर भी टीवी नही थी । तो उनके साथ पड़ोस में जाकर देखते थे । रविवार को सुबह ही नहा धोकर तैयार हो जाते थे और सीरियल सुरु होने के पहले ही पड़ोस में जाकर अपनी सीट सुरक्षित कर लेते थे फर्स पर । 
       सीरियल सुरु होने के पांच मिनट पूर्व ही गृहस्वामिनी टीवी के पास पूजा वाली थाली सजा कर रख लेती थी । सीरियल सुरु होते ही गृहस्वामिनी धूप, दीप, जलाकर आरती करती और फिर जब तक सीरियल चलता तब तक ऐसा सन्नाटा छा जाता रूम में की एक दूसरे की सांस लेने की आवाज तक सुनाई दी जाती । यदि कोई खांसने लगता तो सभी उसी को घूर कर देखने लगते  और यदि किसी ने पूं पां कर दिया तो उसे तुरंत उठाकर बाहर कर देते । कभी कभी तो मुझे भी इस विषम परिस्थिति का सामना करना पड़ता तो बड़ी कुशलता के साथ पृष्ठ भाग को एक किनारे से हल्का सा उठा कर वायु निर्गमन कर प्रदूषण फैला देता, दबाते रहो जिसे अपनी नाक दबाना हो ।।

वैसे तो इस कुकृत्य के लिए विज्ञापन का समय चुनता ।

एक बार पड़ोसी गांव चले गए ।  अब इस रविवार को कहां देखा जाय रामायण ? 
    चूंकि अपुन रंगरूट/बैचलर किराएदार थे इस लिए आस पास वाले ज्यादा भाव नही देते थे । इस लिए कहीं जुगाड नही लगा तो हमारी मित्र मंडली (पांच लोग) पास में ही सिंधी की किराना की दुकान के सामने ही जम गए । चूंकि हम सिंधी के यहां से किराना का समान बहुत कम लेते थे इस लिए सिंधी भी ज्यादा भाव नही देता था । 
     अब रोड में खड़ी भीड़ बात चीत लिए बिना रह नहीं सकती, तो आवाज साफ साफ सुनाई नही देती । कुछ देर बाद मैने सिंधी को बोला "भैया थोड़ा आवाज बढ़ा दीजिए, सुनाई नही दे रहा है" । सिंधी मेरी आवाज तो  सुना पर इग्नोर कर दिया तो  दुबारा फिर से बोला तो बड़ी अकड़ के साथ बोला "जाकर तेरे घर में देख ले, मेरी टीवी में इतनी ही आवाज है" । "तेरे" शब्द सुनते ही तन बदन में आग लग गई । मैं भी अकड़ गया और जोर से चिल्लाकर बोला "ओए,जरा तमीज से बात कर" । सिंधी और जोर से चिल्लाया, सिंधी को लगा की ये तो यहां कालोनी में नया नया किराये दार है, बाहरी है फिर भी चिल्ला रहा है, इस लिए सिंधी जोर से चिल्लाया और बोला "चल हट यहां से नही तो अभी....." बस इतना बोलकर चुप हो गया । अब मैं खड़े हुए लोगो के बीच से आगे बढ़ा और काउंटर में बैठा सिंधी  के पास गया और बोला "अब बोल" । सिंधी कुछ बोलता उसके पहले ही गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया । लो हो गई रामायण की जगह महाभारत । सिंधी जब तक मुझे मारता मैने फिर से धर दिया । अब पकड़ा पकड़ी हुई, मेरे रिवाड़ी (रीवा) संगी साथी मुझे पकड़ कर ले आए कमरे में । सीरियल समाप्त होने के कुछ देर बाद सिंधी मकान मालिक के पास आया और पूरी बात बताया और कमरा खाली करवाने के लिए बोला । मकान मालिक के कुछ बोलते उसके पहले ही उनकी छोटी लड़की मनु बोल दिया " बघेल भईया से कमरा  खाली नहीं करवाऊंगी" । मनु ने बोल दिया, यानी यही होगा, मकान मालिक कुछ नही बोले तो सिंधी फिर बोला "इसको निकालो तुम्हारे घर से" । मकान मालिक बोले "मनु से बात करो" । सिंधी तुनक कर चला गया ।
दरअसल मकान मालिक बिधुर थे तीन लड़कियों में दो को शादी कर दिया , मनु बहुत लाड़ की थी, उसकी बात टालते नही थे ।।
शाम को हम रीवा वाले आठ दस नए नए रंगरूट  इकट्ठे हुए और टीवी खरीदने का प्लान बन गया ।  बाजार गए और टीवी का रेट पता लगा आए । "Crown"  ब्लैक & व्हाइट टीवी (सटर वाली) 3650/ रू की पसंद आई । 3650/ रू 1988 में  बहुत होते थे ।।
        चूंकि तब हम लोगो की अधिकतम सेलरी 300/ रू थी, जी हां 300/ रू. । सबने अपनी अपनी बचत बता दिया । सुबह हम सभी ड्यूटी चले गए । और ड्यूटी के बाद 5 बजे फिर सभी मेरे कमरे में इकठ्ठे हुए और सबने अपनी बचत रख दिया । कुल 3600 रू हो गए । हम 8 लोग टीवी खरीदने गए और ठेले में टीवी रखकर ले आए 😀😀 । दुकान वाले ने 50/ रू की छूट दिया ।।

ठेले में टीवी आते देख मुहल्ले के बच्चे दौड़ पड़े "बघेल भईया टीवी लाए,बघेल भईया टीवी लाए" । सिंधी के साथ मारपीट से लोग मुझे और मेरा उपनाम जानने लगे ।
    टीवी ले तो आए पर ये तो सोचा ही नही था कि रखेंगे किधर, क्योंकि हमारे दस बाय 12 SQ फिट के कमरे में तीन रूम पार्टनर ओ भी जमीन में बिस्तर लगे ।
मकान मालिक के कुल तीन तो कमरे, एक में हम किरायेदार बाकी दो कमरे मकान मालिक यूज करते । 
खैर मकान मालिक के आगे वाले कमरे में टीवी एक टेबल पर रख दिया ।  बड़ी मुस्किल से एंटीना लगाया और हो गई टीवी सुरु । 
टीवी लाने वाली बात हमारे रीवा वालों के बीच चर्चा की विषय बन गया, क्योंकि मुझे नौकरी किए हुए मात्र 7 माह ही हुआ था । इतनी जल्दी इतनी मंहगी टीवी कैसे ले आए ? इतने रुपए कहां पाए ?? आदि आदि....चर्चाएं चली...।
अगले रविवार को OMG.... हमारे रीवा के जितने भी बैचलर लड़के थे सभी आ धमके रामायण देखने...😀😀
बैठने की तो छोड़िए, कमरे में खड़े होने की जगह नही थी । 
हालांकि टीवी लाने के 3 सप्ताह  बाद ही मकान मालिक का रूम छोड़कर पास में ही ठाकुर भवन में आ गया रहने । 
और यहां पर एक साल में तीन लोहे की पलंग टूटी थी 😀🤣 क्योंकि एक पलंग में आठ दस लोग बैठ जाते थे ।

टीवी लाने के बाद एक दिन हम पांच छः रिवाड़ी भाई सिंधी की दुकान में गए और मैं बोला "आपकी टीवी में आवाज कम हो तो  मेरे रूम में देख लिया करें रामायण" । सिंधी कुछ नही बोला हम अकड़ते हुए आ गए उसकी दुकान से ।
तो ये थी टीवी कथा...😀
#NSB

बुधवार, 5 जुलाई 2023

जमीन के बदले रेलवे में नौकरी (लालू यादव का घोटाला)

1.) 2007 में पटना के हजारी राय ने 9527 वर्ग फीट जमीन एके इन्फोसिस्टम प्राइवेट लिमिटेड को ₹10.83 लाख में बेच दी। बाद में हजारी राय के दो भतीजों दिलचंद कुमार और प्रेमचंद कुमार को रेलवे में नौकरी मिली। 2014 में इस कंपनी सारे अधिकार और उसकी सारी संपत्तियाँ राबड़ी देवी और मीसा भारती के नाम पर चली गईं। राबड़ी देवी ने इस कंपनी के ज्यादातर शेयर खरीद लिए और इस कंपनी की डायरेक्टर बन गईं।

2.) नवंबर 2007 में पटना की रहने वाली किरण देवी ने अपनी 80,905 वर्ग फीट की जमीन मीसा भारती के नाम पर कर दी। यह सौदा सिर्फ ₹3.70 लाख में हुआ था। बाद में किरण देवी के बेटे अभिषेक कुमार को मुंबई में रेलवे में नौकरी मिली।

3.) फरवरी 2008 को पटना के किशुन देव राय ने अपनी 3375 वर्ग फीट जमीन ₹3.75 लाख में राबड़ी देवी को बेच दी। इसके बदले में किशुन राय के परिवार के तीन लोगों को रेलवे में नौकरी दी गई।

4.) फरवरी 2008 में पटना के महुआबाग में रहने वाले संजय राय ने 3375 वर्ग फीट की अपनी प्लॉट को राबड़ी देवी को ₹3.75 लाख में बेच दी। इसके बदले में संजय राय और उनके परिवार के 2 सदस्यों को रेलवे में नौकरी दी गई थी।

5.) मार्च 2008 में ब्रिज नंदन राय ने 3375 वर्ग फीट की अपनी जमीन गोपालगंज के रहने वाले ह्रदयानंद चौधरी को ₹4.21 लाख में बेच दी (तत्कालीन असली कीमत: ₹62 लाख)। बाद में ह्रदयानंद चौधरी ने यह जमीन लालू यादव की बेटी हेमा को तोहफे में दे दी। ह्रदयानंद चौधरी को साल 2005 में हाजीपुर में रेलवे में भर्ती किया गया था।

6.)  मार्च 2008 में विशुन देव राय ने अपनी 3375 वर्ग फीट की जमीन सीवान के ललन चौधरी को बेची। उसी साल ललन के पोते पिंटू कुमार को पश्चिमी रेलवे में भर्ती कराया गया। फरवरी 2014 में ललन चौधरी ने यह जमीन लालू यादव की बेटी हेमा को गिफ्ट कर दी।

7.) मई 2015 में पटना के रहने वाले लाल बाबू राय ने अपनी 1360 वर्ग फीट जमीन राबड़ी देवी को ₹13 लाख में बेच दी। 2006 में लाल बाबू राय के बेटे लाल चंद कुमार को रेलवे में नौकरी दी गई थी।

शनिवार, 1 जुलाई 2023

कुछ अनसुना इतिहास...भाग 01

बॉम्बे / मुंबई

1661 में जब इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरिन से विवाह किया तो राजा को दहेज में काफ़ी कुछ मिला। दहेज में शामिल था बॉम्बे का द्वीप। उस समय भारत में पुर्तगाल ने बॉम्बे पर क़ब्ज़ा कर रखा था।

लंदन में अंग्रेज लोग काफ़ी कंफ्यूज हुए- बॉम्बे है किधर? कुछ बड़े अंग्रेज विद्वान बोले- शायद ब्राज़ील के धोरे है। दहेज तो मिला लेकिन एक साल लग गया ये जानने में - बॉम्बे दुनिया में है किधर? 

1662 में जब अंग्रेज़ी हुकूमत को बॉम्बे की लोकेशन कन्फर्म हुई- तो अंग्रेज सूबेदार सर अब्राहम शिपमन को साढ़े चार सौ आदमियों के साथ बॉम्बे पर क़ब्ज़ा करने भेजा। जब शिपमन ने बॉम्बे में कदम रखा तो पुर्तगाली गवर्नर ने इन अंग्रेजों पर बंदूके तान दी। पुर्तगाली गवर्नर को ये नहीं ज्ञात था कि दहेज में बंबई दिया जा चुका है। अंग्रेज और पुर्तगाली फ़ौज में मुठभेड़ हुई- तीन साल तक झड़पें चलती रही। 1665  में अंतः पुर्तगाल के राजा के फ़रमान के बाद पुर्तगाली गवर्नर वहाँ से निकल गया। शिपमन उस से पहले ही ख़ुदा को प्यारा हो लिया था- केवल 115  अंग्रेज लोग शेष बचे थे 450 में से। 

इधर से बॉम्बे की कहानी शुरू हुई थी। दहेज देने वाला पुर्तगाली, लेने वाला अंग्रेज और जगह हिंदुस्तानी।
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मद्रास/ चेन्नई

1626 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना पहला क़िला बनाया- नये शहर मद्रासपतिनम में । फ़्रांसिस डे नामक अंग्रेज गवर्नर ने वहाँ के नायक से ये गाँव ख़रीदा । 

फ़्रांसिस डे की एक वहाँ की लोकल मछुरनियान महिला से आशनाई थी- फ़्रांसिस डे को इस मछलीवाली से नाईट में मुलाक़ात करना अच्छा लगता था तो उसने ये निर्जन वीरान गाँव कंपनी के नाम ख़रीद लिया। शुरू में इधर कुछ फ़्रेंच पादरी और छः लोकल मछुआरे परिवार रहते थे। कंपनी ने एलान किया आगामी तीस साल तक इधर कोई कस्टम ड्यूटी टैक्स आदि देना ना पड़ेगा। बस इस के तहत जुलाहे ,व्यापारी आदि भर भर कर आने शुरू हो गये - सैंट जॉर्ज क़िला बनने से पहले आबादी बसनी शुरू हो चुकी थी। 
   अगले चालीस वर्षों में लोकल अंगेज़ हुकूमत के चलते चालीस हज़ार से ऊपर लोग इधर बस चुके थी - ख़ुद की बनाये स्वर्ण सिक्के भी चलने लगे थे। जब मद्रास पूर्ण विकसित हो चुका था तब बॉम्बे पर अंग्रेज क़ब्ज़ा होना शुरू हुआ। सूरत में भी प्रचुर मात्रा में अंग्रेज लोग मटरगश्ती करते दिखते। व्यभिचारी पियक्कड़ फ़सादी अंग्रेज लोगों को भारतीय लोग बेटीच* और बहनच* गालियों से सरेआम नवाज़ते थे। अंग्रेज ट्रैवललोग में ये गालीयाँ बक़ायदा नोट है। मतलब उन्हें बाद में समझ आया होगा।

मद्रास बना आशनाई से और बंबई बना दहेज से! 
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कोलकाता / कलकत्ता

1681 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने पैर जमा लिए थे। मुनाफ़ा भरपूर हो रहा था - चाँदी काट रहे थे। इस समय सर जोशुआ चाइल्ड नामक आदमी कंपनी का डायरेक्टर बना। सर चाइल्ड को मुग़ल सूबेदारों और अफ़सर लोगो को पेशकश अर्थात् रिश्वत देना बहुत अखरता था। औरंगज़ेब का मामू शाइस्ता ख़ान जो बंगाल का नवाब था- उसे अंग्रेज़ लोगो से सख़्त घृणा थी। बादशाह को कई बार आगाह भी किया था।

सर चाइल्ड ने 1686  में लंदन से सैन्य सहायता मंगाई- इरादा था मुग़ल रिश्वतखोरी को ताक़त से क़ाबू करेंगे। लंदन से उन्नीस जहाज़ आये- दो सौ तोप और छः सौ गोरे सिपाही। लेकिन सर चाइल्ड ने समय बड़ा ग़लत चुना। इस टाइम औरंगज़ेब ख़ुद पूरी फ़ौज लेके दखन में पड़ा हुआ था- मराठा और बीजापुर के ख़िलाफ़ लड़ाई में। जुलाहे का ग़ुस्सा दाढ़ी पर निकाला- इन अंग्रेजों को मुग़लिया सेना ने पटक कर मारा- सब सफ़ाचट कर दिया। यही नहीं- हुगली, पटना क़ासिमबाज़ार मसूलीपतनाम विशाखापतनाम आदि में कंपनी की फैक्ट्री सब तबाह कर दी गई। सूरत और ढाका में अंग्रेज़ी अफ़सरन को बेडियो में जकड़ घुमाया गया। 1690 में बादशाह ने काफ़ी लल्लोचप्पो के बाद कंपनी को माफ़ी दी और फिर से व्यापार करने की अनुमति।

हालाँकि औरंगज़ेब ने अंग्रेज कंपनी के व्यापार आदि बंद करवा दिये थे लेकिन हज यात्रा रुके नहीं और ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलने वाला पैसा ना मारा जाये- इन कारणों से बादशाह ने तीन साल बाद 1690 में ईस्ट इंडिया कंपनी को तीन हज़ार रुपये सालाना पर फिर से व्यापार करने की अनुमति दे दी। गौर करने वाली दो बाते थी- कंपनी को इतना भारी नुक़सान हुआ था लेकिन फिर भी ये अंग्रेज भारत में व्यापार करने को उतावले थे। दूसरी बात- औरंगज़ेब जैसे फ़क़ीर को रेवन्यू लॉस की इतनी फ़िक्र थी कि मात्र तीन हज़ार सालाना के लिए बंगाल में कंपनी को लाइसेंस फिर से दे दिया।

ख़ैर- जॉन चरणोंडक नामक अंग्रेज बारिश के मौसम में बंगाल में अंग्रेज़ी थीया ढूँढ रहा था। सुतानुति और कालीकटा नामक गाँव के पास उसने दलदल वाली एक जगह देखी और इस जहां उसने कलकत्ता नामक कॉलोनी बसाने का निर्णय लिया। अंग्रेज़ी रोजनामचे के अनुसार इस से बदतर जगह कोई और हो ही नहीं सकती थी- सती प्रथा से लबरेज़ ये स्थान मूर्तिपूजा के लिए जाना जाता था। दलदली जगह और ना रहने योग्य मौसम। जॉन ने इधर एक सती होती हुई स्त्री को बचाया और उससे विवाह किया। ये सब लोग उधर नये बसाये शहर में रहने लगे। 

एक साल के भीतर ही इस नये शहर में एक हज़ार लोग रहने आ चुके थे किंतु चिंता वाली बात और कुछ थी। इसी समय में साढ़े चार सौ लोग मर भी चुके थे। कहावत थी- इधर रहो अंग्रेजों की भाँति और मरो भेड़ बकरियों की भाँति। ख़ैर जो भी हो- शहर बस चुका था और अंग्रेज़ी व्यापार भी जम चुका था। 

औरंगज़ेब को ये तीन हज़ार रुपये बड़े भारी पड़े। कालांतर में बहादुर शाह ज़फ़र की दाढ़ी को जब अंग्रेज़ी अफ़सरान ने पकड़ खींचा तो इन तीन हज़ार रुपये के एक एक कौड़ी को वसूला होगा।