गुरुवार, 21 मार्च 2013

!! मुग़ल शाशक भी होली खेलते थे !!

रंगों का त्यौहार होली पूरी दुनिया में अपने अनोखे अंदाज के लिए जाना जाता है।कहते हैं कि इस दिन रंगों में रंग ही नहीं मिलते बल्कि दिल भी आपस में मिल जाते हैं। फिल्म शोले के एक सुप्रसिद्ध गाने के बोल भी इसी ओर इशारा करते हैं।हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार हर वर्ष फाल्गुन माह में होली का त्यौहार मनाया जाता है, इस माह की पूर्णिमा को पूरी दुनिया में होली पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।
मान्यता के अनुसार होली पूर्णिमा के दिन हिरणकश्यपू नाम के राक्षस ने अपने पुत्र प्रहलाद को होलिका की गोद में बिठाकर आग लगा दी थी लेकिन इस आग में होलिका जलकर भस्म हो गई और भगवान विष्णु का भक्त होने के कारण प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ जबकि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। तभी से होली पूर्णिमा के दिन होलिका दहन की परंपरा चल निकली। होलिका दहन की इस परंपरा और कथा के बारे में सभी जानते हैं।
होली खेलने की परंपरा कोई आधुनिक परंपरा नहीं है इसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों नारद पुराण, भविष्य पुराण में मिलता है।कुछ प्रसिद्ध पुस्तकोंजैसे जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र में भी होली पर्व के बारे में वर्णनं किया गया है।
इतिहास पर अगर प्रकाश डालें तो मुग़ल काल में होली की परंपरा  के सटीक उदाहरण मिलते हैं।इतिहास में इस बात का वर्णन मिलता है कि अकबर अपनी पत्नी जोधाबाई के साथ होली खेला करते थे।अकबर के समय होली के दिन मेलों का आयोजन किया जाता था जिसकी सभी तैयारियां खुद अकबर की निगरानी में पूरी होती थीं।
अब बात करते हैं जहांगीर के समय की, जहांगीर अपनी बेगम नूरजहां के साथ होली का त्यौहार मनाया करते थे। अलवर के ऐतिहासिक संग्रहालय में एक प्राचीन चित्र लगा हुआ है जिसमें जहांगीर को नूरजहां के साथ होली खेलते दिखाया गया है।इतना ही नहीं जहांगीर ने होली की परंपरा का उल्लेख अपनी पुस्तक तुज्क-ए -जहांगीरी में भी किया है।
 शाहजहां का समय आते-आते होली खेलने का मुगलिया अंदाज बिलकुल बदल गया। इतिहास पर गौर किया जाए तो मिलता है कि शाहजहां के समय होली को ईद-ए -गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) के नाम से जाना जाता था।इस अवसर पर मिलन समारोहों का आयोजन किया जाता था जिसमें विभिन्न रियासतों के राजे-महाराजे हिस्सा लिया करते थे, इन मिलन समारोहों का मुख्य उद्देश्य आपसी दुश्मनी को भुलाकर भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना हुआ करता था।
 मुगलों के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफ़र के समय में भी होली का विशेष महत्त्व हुआ करता था, इतिहास इस ओर इंगित करता है कि होली के अवसर पर बहादुर शाह जफ़र के मंत्री रंग लगाने जाया करते थे।यही कारण था कीसन 1857 की क्रांति में पुरे हिन्दुस्तान के हिन्दू बादशाह बहादुर शाह जफ़र के झंडे के नीचे क्रांति किया
      पर दुःख का विषय यह है की आज ज्यादातर मुस्लिम भाई हिन्दुओ के त्यौहार में सरीक नहीं होती है और यही हाल हिन्दुओ का भी है (अपवाद की बात नहीं कर रहा हु ) जहा तक मेरी ब्यक्तिगत राय है की हम सभी धर्मो के लोगो को आपस ने सभी त्यौहार मिल जुल कर मानना और मनाना चाहिए । पर यहाँ एक बहुत बड़ा अंतर है साकाहार और मांसाहार का जो हमें इन त्योहारों पर साथ खडा नहीं होने देता है । फिर भी रंगों का त्यौहार होली में इस तरह का कोई भी अड़चन नहीं होना चाहिए । आखिर हम भी तो ईद में मीठी सेवैया खाते है मुस्लिमो   के घर में फिर मुस्लिम भाई होली का रंग से दूर क्यों ?

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

!! 'वेदांत ??

वेदांत' शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है -'वेद' और 'अंत।' हमारे वेद चार हैं -ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों वेदों के चार-चार भाग हैं। आखिरी भाग 'उपनिषद' हैं। उपनिषद ही 'वेदांत' हैं। वेदों के अंत में होने से वे वेदांत कहलाए। वेदांत भावनाओं को महत्व नहीं देता। जैसे गणित तर्क पर आधारित है, वह हमारी कल्पना अथवा मन की भावना से नहीं चलता, उसी प्रकार वेदांत भी नियमों पर आधारित है। वेदांत के नियमों का पालन जीवन को सुखी बनाने के लिए जरूरी है। इन नियमों का उद्देश्य है अपने मन का विश्लेषण।

वेदांत का प्रमुख नियम है, 'जितना हम आध्यात्मिक स्तर पर ऊपर उठेंगे उतनी हमारी संसार पर निर्भरता कम होगी।' जो व्यक्ति संसार पर जितना अधिक निर्भर है, वह उतना ही कम आध्यात्मिक है। कोई व्यक्ति कितना आध्यात्मिक है, यह हम कैसे माप सकते हैं? हम देखते हैं कि शरीर का तापमान, ब्लडप्रेशर, हीमोग्लोबिन, शुगर आदि नापने के लिए सैकड़ों उपकरण हैं। पर किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति कितनी है, इसको मापने के लिए कोई उपकरण नहीं है। 

              
                जो व्यक्ति पूजा करता है, माला जपता है, तिलक लगाकर सुबह-शाम मंदिर जाता है, क्या हम उसे आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त कह सकते हैं? अथवा जो व्यक्ति वस्त्र त्याग चुका है, दाढ़ी बढ़ा रखी है, क्या उसे हम आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त कह सकते हैं? वेदांत ने इसे जानने का एक थर्मामीटर इस नियम के रूप में दिया है। हमारी संसार पर निर्भरता जितनी अधिक होगी, हम अध्यात्म से उतने ही दूर होंगे। जो व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से अस्सी प्रतिशत उन्नत है, उसकी संसार पर निर्भरता बीस प्रतिशत होगी। जो व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से बीस प्रतिशत उन्नत है, तो उसकी संसार में प्रवृत्ति अस्सी प्रतिशत होगी। आध्यात्मिक विकास का प्रतिशत जितना बढ़ता जाएगा, सांसारिक निर्भरता उतनी कम होती जाएगी।  
जो व्यक्ति सांसारिक अथवा इंद्रिय विषयों पर जितना अधिक निर्भर है वह उतना कम आध्यात्मिक है। इंद्रिय विषय जितने हमारे वश में होते जाते हैं, उतनी हम आध्यात्मिक उन्नति करते जाते हैं। यदि दवाई अधिक मात्रा में ली जाए तो वह विष बन जाती है, ऐसे ही विषयों का अधिक सेवन किया जाए तो वे विष बन जाते हैं। आज हम इस बात से दुखी नहीं हैं कि तालिबान ने पाकिस्तान पर आक्रमण कर दिया अथवा ईरान -इराक में लड़ाई हो रही है, हम इस बात से दुखी हैं कि वह व्यक्ति मुझे नमस्ते करके नहीं गया। अथवा उसने मेरी प्रशंसा नहीं की, मुझे सम्मान नहीं दिया। छोटी-छोटी बातों को लेकर आज हम दुखी होते हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत है, वह इन छोटी-छोटी बातों से दुखी नहीं होता। वह इन सबके मोह से परे हो जाता है।

       ईशावास्योपनिषद में कहा है, जो संसार से मोह रखते हैं वे अंधकार में हैं, पर जो अध्यात्म में मोह रखते हैं वे गहन अंधकार में हैं। अध्यात्म पर निर्भरता भी एक बंधन है, इस बंधन से भी जो व्यक्ति मुक्त हो जाता है वह वास्तविक रूप से आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करता है। 



       इस संसार का ज्ञान नियमों पर आधारित है। गणित, रसायन शास्त्र, भौतिक विज्ञान, समाज शास्त्र नियमों पर आधारित हैं। हमारा शरीर भी नियमों पर आधारित है। पूरा संसार नियमों पर चलता है। ये नियम दो प्रकार के हैं -कुछ परिवर्तनीय हैं जो समय के साथ-साथ बदलते रहते हैं। कुछ अपरिवर्तनीय हैं जिन पर देश, काल, परिस्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन अपरिवर्तनीय नियमों को ही 'सनातन धर्म' कहा जाता है। 'सनातन' से अभिप्राय है 'जो अनादि काल से चला आ रहा है।' और 'धर्म' से अभिप्राय है 'नियम।' इस सनातन धर्म का ही दूसरा नाम 'वेदांत' है।