गुरुवार, 26 जून 2014

सामान नागरिक संहिता - अपेक्षाएं और आकांक्षाएं


आज की सबसे बड़ी आवशकता है विचार क्रांति ।  इसके तीन आधार हैं “व्यक्ति निर्माण -अर्थात व्यक्तित्व का परिष्कार !परिवार निर्माण -अर्थात परिवार मेंश्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण !समाजऔर राष्ट्र निर्माण -अर्थात समाज को श्रेष्ठ नागरिक प्रदान करना जो अपनी प्रतिभा ,योग्यता और क्षमता का एक अंश सतत राष्ट्र के हित में समर्पित करने के लिए कृत संकल्प हो !यदि यह कार्य देश को आजादी मिलने के बाद हमारे तथा कथित उस समय के नेता अथवा शिक्षा विद जो अपने आपको प्रकांड विद्वान मानते थे ,किये होते तो आज हमारी यह दुर्दशा नहीं हुई होती !भारतीय संस्कृति से ओत प्रोत जीवन मूल्यों पर आधारित प्राचीन शिक्षाप्रणालीजिसमें शिक्षा के साथ विद्या का समन्वय होता था; को हमारे स्कूलों मेंलागू करने के बजाये लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति को एक षड़यंत्र के तहत लागू किया गया और हमारे बड़े बड़े डिग्री धारीनेता मूक दर्शक बन कर रह गए और यंही से हमारा अवमूल्यन प्रारंभ हो गया !हमारा संविधान जो बना वह आधा अधूरा बना !एक तरफ तो वह समानता की बात करता है तो दूसरी तरफ आरक्षण की !मध्यकाल में जो जातिवाद ;अश्पृश्यता वर्ण विभेद उंच नीच की भावना थी उसे इस संविधान को बनाने वाले और लागू करने वालों नें और बढाया !काश !हमारा संविधान मौलिक होता जिसमे हमारे पूर्वजों की थाती होती !गीता का दर्शन ;रामायण की मर्यादा औरबुद्ध की करूणा;महावीर की शुचिता औरचाणक्य की नीति; कुछ भी तो नहीं है इस संविधान में !वसुधेव कुटुम्बकम की भावना भारतीय संस्कृति की आत्मा है यह जानते हुएभी हमारे नेताओं ने क्यों समान नागरिक संहिता को लागू करने मेंहिचकिचाया !आज के समस्त समस्याओं का मूल वर्तमान संविधान है जिसमे इंडिया दैट इज भारत कहा गया है बजरंग मुनि जी की आज की वार्ता हमारे तथा कथित हत्यारे ;भ्रष्ट; डकैत बलात्कारी आरोपी राजनेताओं को अवश्य देखना चाहिए और अपने हृदय को परिवर्तित कर ;वोट की राजनीतिको त्याग कर बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के राष्ट्रव्यापी महाभियान में अपना योगदान देकर अपने कुकर्मो का प्रायश्चित करना चाहिए यही समय की मांग है ।




नागरिक संहिता तथा आचार संहिता बिल्कुल अलग-अलग अर्थ और प्रभाव रखते हैं। नागरिक संहिता नागरिक की होती है, राजनैतिक व्यवस्था से जुड़ी होती है, सामूहिक होती है जबकि आचार संहिता व्यकित की होती है, व्यकितगत होती है, समाज या राज्य के दबाव से मुक्त होती है। नागरिक संहिता को हर हाल में समान होना ही चाहिये दूसरी ओर आचार संहिता को समान करने का प्रयत्न घातक होता है।विवाह, खानपान, भाषा, पूजा-पद्धति, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आचार संहिता से जुड़े विषय हैं। कोर्इ सरकार इस संबंध में कोर्इ कानून नहीं बना सकती। सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में सरकारी सहायता व्यकितगत न होकर नागरिकता से जुड़े हैं। इस संबंध में सरकार कोर्इ कानून बना सकती है।
स्वतंत्रता के समय से ही आचार संहिता और नागरिक संहिता का अन्तर नहीं समझा गया और न आज तक समझा जा रहा है। आचार संहिता तथा नागरिक संहिता को एक करने के कारण समाज में अनेक समस्याएं बढ़ती गर्इं समाज टूटता गया तथा राजनेता मजबूत होते चले गये। राजनेता तो लगातार चाहता है कि समाज, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिंग, गरीब-अमीर, किसान, मजदूर के रूप में वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष की दिशा में बढ़ता रहे तथा राजनेता बिलिलयों के बीच बन्दर बनकर सुरक्षित रहें।
भारत की राजनैतिक व्यवस्था को व्यकित, परिवार, गांव, जिला, प्रदेश, देश और विश्व के क्रम में एक दूसरे के साथ जुड़ना चाहिये था, किन्तु उसे जोड़ा गया व्यकित, जाति, वर्ण, धर्म, समाज के क्रम में। स्वाभाविक था कि उपर वाला क्रम एक दूसरे का पूरक होता तथा नीचे वाला क्रम एक दूसरे के विरूद्ध। स्वतंत्रता के तत्काल बाद अम्बेडकर जी, नेहरू जी आदि ने तो सब समझ ते हुए भी यह राह पकड़ी जिससे समाज कभी एक जुट न हो जावे किन्तु अन्य अनेक लोग नासमझी में आचार संहिता और नागरिक संहिता को एक मानने लगे। आज भी संघ परिवार के लोग समान नागरिक संहिता के नाम पर आचार संहिता के प्रश्न उठाते रहते हैं। विवाह एक हो या चार यह नागरिक संहिता का विषय न होकर आचार संहिता से संबंधित है जिसे बहुत चालाकी से नागरिक संहिता में घुसाया गया है।
आज भारत में जो भी सामाजिक समस्याएं दिख रही हैं उनका सबसे अच्छा समाधान है समान नागरिक संहिता। भारत एक सौ इक्कीस करोड़ व्यकितयों का देश होगा, न कि धर्म, जाति, भाषाओं का संघ। भारत के प्रत्येक नागरिक को समान स्वतंत्रता होगी। संविधान के प्रीएम्बुल में समता शब्द को हटाकर स्वतंत्रता कर दिया जायेगा। प्रत्येक नागरिक के अधिकार समान होंगे। न्यायालय भी कर्इ बार समान नागरिक संहिता के पक्ष में आवाज उठा चुका है। अब समाज को मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिये।

बुधवार, 25 जून 2014

शंकराचार्य के बयान पर कोहराम क्यों ?

मैं पिछले दो दिन से मीडिया और सोसल मीडिया में देख रहा हु शिर्डी के साईं बाबा पर तरह तरह के समर्थन और बिरोध हो रहे है कुछ साईं भक्त तो शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के पुतले भी फुक रहे है । मुझे तो मलेशिया की सर्वोच्च अदालत और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की सोच में कोई अंतर नजर नहीं आता। लगता है दोनों की सोच सामाजिक संरचना के ढांचे को अस्त-व्यस्त करती नजर आ रही है। मलेशिया की अदालत ने फैसला दे डाला कि ''अल्लाह'' मुसलमानों के लिए ही है, इस शब्द का दूसरे लोग इस्तेमाल नहीं करें। फैसला देने वाले जज शायद नहीं जानते कि "अल्लाह", "भगवान" अथवा "गॉड" ऎसे शब्द हैं जिन्हें किसी भी दायरे में नहीं बांधा जा सकता, बांधा जाना भी नहीं चाहिए। अल्लाह, भगवान और गॉड उन सबके हैं जो इन पर विश्वास करते हैं। इसी तरह शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साई बाबा को भगवान मानने से इंकार करते हुए उनकी पूजा नहीं किए जाने का आह्वान कर डाला। स्वामी स्वरूपानंद जिस पद पर आसीन हैं, वहां उनका दायित्व और बढ़ जाता है तथा उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सबको साथ लेकर चलें।

किसी भी आराध्य की पूजा करना व्यक्ति की निजी आस्था से जुड़ा सवाल है और इसके लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। ''क्या शंकराचार्य उन लोगों को रोक सकते हैं जो उन्हें पूजते हैं'' । देश में करोड़ों लोग ऎसे हैं जो सभी मंदिरों में जाकर भगवान को नमन करते हैं तो करोड़ों ऎसे भक्त भी होंगे जो एक ही भगवान की पूजा करते हैं। समझ में नहीं आता कि साई बाबा की पूजा करने से हिन्दू धर्म बंट कैसे जाएगा ? विदेशी ताकतों ने सदियों तक हिन्दू धर्म को मिटाने के लिए क्या-कुछ नहीं किया लेकिन क्या हिन्दू धर्म खत्म हो गया ? गुलामी के काल में जब हिन्दू धर्म नहीं मिटा तो अब विदेशी ताकतों के इशारे पर कैसे बंट सकता है ? शंकराचार्य को साई के मंदिर बनाए जाने पर आपत्ति क्यों है ? उनका तर्क है कि मंदिरों के नाम पर कमाई की जा रही है।

साई मंदिर ही क्यों, देश के दूसरे ऎसे तमाम मंदिर हैं जहां हर साल करोड़ों-अरबों का चढ़ावा चढ़ता है। भगवान का दर्जा किसे दिया जाए, इसे लेकर शंकराचार्य के अपने तर्क हो सकते हैं और उन तर्को पर बहस भी हो सकती है। धार्मिक आस्था को विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। ऎसे विवाद समाज को कमजोर करने का ही काम करते हैं। खासकर शंकराचार्य और साधु-संतों को तो ऎसे विवादों से दूर ही रहना चाहिए। भारत धार्मिक आस्थाओं वाला देश है और यहां का व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, धार्मिक आस्था के बारे में उसके अपने तर्क हैं और उन्हीं के आधार पर वह अपने आराध्य को पूजता है ।
शंकराचार्य के उस कथन से मैं भी सहमत हु की साईं भगवान के अवतार नहीं है , साईं की पूजा नहीं की जानी चाहिए पर शंकराचार्य ये बतायेगे की उनके जैसे कई साधु संतो की पूजा क्यों की जाती है या करवाई जाती है ?

यदि संकराचार्य या साईं को गुरु मान लिया जाए तो फिर '''गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वर:, गुरु साक्षात पर ब्रह्मा, तस्मय श्री गुरुव नम:' । और इस श्लोक के साथ तो सारा विवाद ही ख़त्म हो जाना चाहिए ।