सोमवार, 19 दिसंबर 2011

समय का महत्व

समय का महत्व ही जीवन दर्शन है ,मैं कई महीनो से देख रहा हु की हमारे कुछ  मित्र फेसबुक में अनवश्यक बहस में अपना अनिवार्य समय नष्ट करते है ,,मूर्खो से अनावश्यक रूप से बहस करके अपना समय नष्ट करते है ,,,समय को जाने और पहचाने ,,जिसने समय की कीमत नहीं पहचाना है उसकी पहचान नष्ट हो जाती है ,,   समय ही जीने की राह.. समय के साथ दो बातें हमेशा ध्यान रखी जाएं, उसका आना और जाना। आते हुए समय की चुनौती को समझा जाए और गुजरते हुए वक्त के नुकसान को पकड़ा जाए। भारतीय संस्कृति ने तो समय को भी काल रूप में देव माना है। उसमें प्राण जैसी अनुभूति दी है। समय को जीवनरूप में स्वीकार कर मान दिया है। आज का काम आज किया जाए, यह सिर्फ कहावत नहीं है, पूरा जीवन दर्शन है। कबीर ने अपनी एक पंक्ति में ‘पल में परलय’ शब्द का बहुत सही उपयोग किया है।  काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब? आज की चूक एक बहुत बड़ा धक्का है। इसकी चोट जीवन के अंतिम समय तक असर करती है। यूं तो समय बहुत हल्का होता है, हौले-हौले गुजरता है। शीतल और सुगंधित पवन की तरह समय भी आनंद देता बीत जाता है, लेकिन विलंब और टालने की वृत्ति आते ही अपने आप को भारी बना देता है और हर अगले दिन वह अपने भार को मल्टीपल कर लेता है। इसीलिए टाले हुए काम बोझ बनकर अशांत बनाते हैं। साथ ही हमारे व्यक्तित्व को अप्रिय व आलोचनापूर्ण बना देते हैं।  भारी समय अपने साथ अंधकार भी लाता है। वक्त की बर्बादी अपराध है। ऐसे लोग खुद का समय भी नष्ट करते हैं और दूसरे के समय का महत्व भी नहीं समझ पाते। यदि समय के मामले में स्फूर्त रहना है तो हर कार्य करने के पूर्व थोड़ा शांत होकर, विश्राम मुद्रा में अपने भीतर उतरें, एक गहरे प्रकाश को पकड़ने का प्रयास करें, जो हमारे भीतर होता ही है, फिर काम करें। भीतर उतरकर मौन साधना समय का सम्मान ही होता है।
दूसरा एक बात और है जो समय के अनुकूल अपने में बदलाव नहीं लाता है वह पिछाड जाता है ,,समय के साथ चले और समय की कीमत पहचाने ,,,
नोट --लेख अभी जारी है .......

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

ब्रह्मा जी की पूजा क्यों नहीं होती है ?

 कहते हैं कि ब्रह्मा ने इस जगत की रचना की। विष्णु इस जगत का पालन करते हैं और महेश यानि भगवान शिव इस दुनिया का विनाश करते हैं। धरती पर भगवान विष्णु और शिव के तो कई मंदिर हैं। लेकिन ब्रह्मा जी के मंदिर इतने कम क्यों? पुष्कर जैसा ब्रह्मा जी का पौराणिक मंदिर कहीं दूसरी जगह कम ही देखने को मिलता है। ये एक ऐसी जगह है जहां धरती के लोग उस रचनाकार की पूजा करते हैं जिसकी वजह से इस दुनिया का अस्तित्व है।
पुष्कर का मतलब है वो तालाब जिसका निर्माण पुष्प यानि फूलों से होता है। मान्यता है कि एक बार ब्रह्मा के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यज्ञ के लिए जगह की तलाश करनी थी। लिहाजा उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए कमल को धरती लोक की ओर भेज दिया। वो कमल इस शहर तक पहुंचा। कमल बगैर तालाब के नहीं रह सकता इसलिए यहां एक तालाब का निर्माण हुआ। यज्ञ के लिए ब्रह्मा यहां पहुंचे। लेकिन उनकी पत्नी सावित्री वक्त पर नहीं पहुंच पाईं। यज्ञ का समय निकल रहा था। लिहाजा ब्रह्मा जी ने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ में बैठ गए।
सावित्री थोड़ी देर से पहुंचीं। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और औरत को देखकर गुस्से से पागल हो गईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दिया कि जाओ इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। यहां का जीवन तुम्हें कभी याद नहीं करेगा। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।
अब इस कहानी के पीछे का प्रतीक देखिए। ब्रह्मा हिंदू मान्यता में वो देवता हैं जिनके चार हाथ हैं। इन चारों हाथों में आपको चार किताब देखने को मिलेंगी। ये चारों किताब चार वेद हैं। वेद का मतलब ज्ञान होता है। पुष्कर के इस ब्रह्म मंदिर का पद्म पुराण में जिक्र है। इस पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा इस जगह पर दस हजार सालों तक रहे थे। इन सालों में उन्होंने पूरी सृष्टि की रचना की। जब पूरी रचना हो गई तो सृष्टि के विकास के लिए उन्होंने पांच दिनों तक यज्ञ किया था। और उसी यज्ञ के दौरान सावित्री पहुंच गई थीं जिनके शाप के बाद आज भी उस तालाब की तो पूजा होती है लेकिन ब्रह्मा की पूजा नहीं होती। बस श्रद्धालु दूर से ही उनकी प्रार्थना कर लेते हैं।
और तो और यहां के पुरोहित और पंडित तक अपने घरों में ब्रह्मा जी की तस्वीर नहीं रखते। कहते हैं कि जिन पांच दिनों में ब्रह्मा जी ने यहां यज्ञ किया था वो कार्तिक महीने की एकादशी से पूर्णिमा तक का वक्त था। और इसीलिए हर साल इसी महीने में यहां इस मेले का आयोजन होता है। ये है तो एक आध्यात्मिक मेला लेकिन वक्त के हिसाब से इसका स्वरूप भी बदला है। कहा ये भी जाता है कि इस मेले का जब पूरी तरह आध्यात्मिक स्वरूप बदल जाएगा तो पुष्कर का नक्शा इस धरती से मिट जाएगा। वो घड़ी होगी सृष्टि के विनाश की।
हर साल एक विशेष गूंज कार्तिक के इन दिनों में यहां सरोवर के आसपास सुनाई पड़ती है जिसकी पहचान कुछ आध्यात्मिक गुरुओं को है। मान्यता ये भी है कि इन पांच दिनों में जगत की 33 करोड़ शक्तियां यहां मौजूद रहती हैं। ये शक्तियां उस ब्रह्म की उपासना के लिए आती हैं जिनकी वजह से इस दुनिया का वजूद है। इस दौरान सरोवर के पानी में एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति का जिक्र है जिससे सारे रोग दूर हो जाते हैं।
आजतक किसी को पता नहीं कि इस मंदिर का निर्माण कैसे हुआ। बेशक आज से तकरीबन एक हजार दो सौ साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक स्वप्न आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया। लेकिन उसके बाद जिसने भी किसी और जगह ऐसे मंदिर के निर्माण की कोशिश की वो या तो पागल हो गया या फिर उसकी मौत हो गई। भगवान ब्रह्मा के इस शहर में आकर लोगों को एक अलग आध्यात्मिक अहसास होता है। कई सैलानी तो ऐसे भी हैं जो यहां आते हैं तो यहीं के होकर रह जाना चाहते हैं।

ब्रह्माजी ने आयुर्वेद की रचना की

आज पूरी दुनिया आयुर्वेद की दीवानी है ,पर क्या अपने  कभी सोचा है,आयुर्वेद धरती पर कैसे आया ,तो लीजिये हम बतातें हैं आपको एक नायाब कहानी I सृष्टी के नियंता ब्रह्मा को जब एहसास हुआ क़ि इस धरती पर मेरी रचित जीव रचनाएँ रोग से ग्रसित होकर दुःख पा रही हैं ,तब उन्होंने आयुर्वेद की रचना की  और अपने इस ज्ञान को सूत्र रूप में दक्ष प्रजापति को दिया,दक्ष प्रजापति से यह ज्ञान देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार भाइयों को प्राप्त हुआ,जिन्होंने इस ज्ञान को देवताओं के राजा इन्द्र को दिया,इन्द्र से यह ज्ञान पृथ्वीलोक पर महर्षि भारद्वाज सशरीर लेकर आये और महर्षि भारद्वाज से अग्निवेश एवं धन्वन्तरी ऋषियों क़ी परम्पराओं के  आचार्य चरक ,सुश्रुत  एवं अन्य  को यह ज्ञान प्राप्त हुआ I  कालांतर में इन ऋषियों ने अपने अनुभवों को जोड़कर अपनी -अपनी संहिताएँ रचित की I महर्षि चरक यायावर ( घुमंतू ) ऋषि थे,उन्होंने पेड़,पौधों ,जीव ,जंतुओं से प्राकृतिक अनुभव लेकर प्राणियों में उत्पन्न रोगों को ,जानने,पहचानने एवं उनकी चिकित्सा के नुस्खे एवं  पंचकर्म जैसी   विधा को ‘काय- चिकित्सा’ के रूप में विकसित किया,जबकि महर्षि सुश्रुत ने शरीर में उत्पन्न शल्यों की चिकित्सा की विधियां विक्सित  की ,जो बाद में ‘शल्य -चिकित्सा’  के रूप में  ’क्षार-सूत्र’ आदि अनेक विधियों के माध्यम से   लोकप्रिय हुई I  ऐसे ही आचार्य वाग्भट ने आयुर्वेद के आठ अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा  विज्ञान को ‘अष्टांग आयुर्वेद’ के नाम से वर्गीकृत  किया I दक्षिण में ‘अष्टांग हृद्यम’ नामक ग्रन्थ आज भी अत्यंत लोकप्रिय है I  इन बड़े महर्षियों के ग्रन्थ  आज  ’वृहत्त्रयी’ के नाम से जाने जातें हैं I  ऐसे ही रोगों को पहचानने के लिए आचार्य माधव  ने माधव -निदान नामक ग्रन्थ  की रचना की I बच्चों के रोगों की  विशेष व्याख्या एवं चिकित्सा की विधियों  एवं नुस्खों को सूत्र रूप में लाने का श्रेय महर्षि काश्यप को जाता है I ऐसे ही अनेक आचार्यों  की परम्परा से मिलकर बना आयुर्वेद ,जिसमें  इंसान ही नहीं जानवरों से लेकर पेड़ पौधों तक की  चिकित्सा के अनेकों गूढ़ रहस्य एवं नायब नुस्खे मौजूद हैं ,बस जरूरत है तो रह्स्यवेधन की I