बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर विशेष



सुबह सुबह चामुण्डा माता जी के टेकरी में जाने का अवसर मिला । पूरा देवास शहर इस समय पर चामुण्डा मइया की भक्ति में लीन है । (क्या पता माता की भक्ति के लिए जाते है या नयन सुख लेने जाते है) अच्छा लगता है युवाओ में धर्म के प्रति यह झुकाव । पर मन उस समय खिन्न हो जाता है जब बुजुर्गो को रोड के किनारे हाथ फैलाते हुए देखता हु असहाय शरीर, काँपते हुए हाथ,लरजती हु आँखे में याचना के भाव । सच में ये सब देखने के बाद मन इतना दुखी हो जाता है की मेरा मन ही ''माँ'' की भक्ति से कोसो दूर इन बुजर्गो पर केंद्रित हो जाती है ।
एक पेड़ जितना ज्यादा बड़ा होता है वह उतना ही अधिक झुका हुआ होता है यानि वह उतना ही विनम्र और दूसरों को फल देने वाला होता है. यही बात समाज के उस वर्ग के साथ भी लागू होती है जिसे आज की तथाकथित ''युवा और एजुकेटेड'' पीढ़ी ''बूढ़ा'' कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ देती है. वे लोग भूल जाते हैं कि अनुभव का कोई दूसरा विकल्प दुनिया में है ही नहीं । फिर भी हम उस अनुभव से लाभ नहीं उठाते और ठोकर खाने के बाद ''ठाकुर'' कहलाते ।
वृद्ध होने के बाद इंसान को कई रोगों का सामना करना पड़ता है. चलने फिरने में भी दिक्कत होती है. लेकिन यह इस समाज का एक सच है कि जो आज जवान है उसे कल बुढ़ा भी होना होगा और इस सच से कोई नहीं बच सकता. लेकिन इस सच को जानने के बाद भी जब हम बूढ़े लोगों पर अत्याचार करते हैं तो हमें अपने मनुष्य कहलाने पर शर्म महसूस होती है ।
हमें समझना चाहिए कि वरिष्‍ठ नागरिक समाज की अमूल्‍य विरासत होते हैं.उन्होंने देश और समाज को बहुत कुछ दिया होता है. उन्‍हें जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों का व्‍यापक अनुभव होता है. आज का युवा वर्ग राष्‍ट्र को उंचाइयों पर ले जाने के लिए वरिष्‍ठ नागरिकों के अनुभव से लाभ उठा सकता है. अपने जीवन की इस अवस्‍था में उन्‍हें देखभाल और यह अहसास कराए जाने की जरुरत होती है कि वे हमारे लिए खास महत्‍व रखते हैं. हमारे शास्त्रों में भी बुजुर्गों का सम्मान करने की राह दिखलायी गई है । यजुर्वेद का निम्न मंत्र संतान को अपने माता-पिता की सेवा और उनका सम्मान करने की शिक्षा देता है.
यदापि पोष मातरं पुत्र: प्रभुदितो धयान् .
इतदगे अनृणो भवाम्यहतौ पितरौ ममां ॥

अर्थात जिन माता-पिता ने अपने अनथक प्रयत्नों से पाल पोसकर मुझे बड़ा किया है, अब मेरे बड़े होने पर जब वे अशक्त हो गये है तो वे जनक-जननी किसी प्रकार से भी पीड़ित न हो, इस हेतु मैं उसी की सेवा सत्कार से उन्हें संतुष्ट कर अपा आनृश्य (ऋण के भार से मुक्ति) कर रहा हूं ।
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मित्रो आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस है । चलिए संकल्प लेते है की कही भी,कभी भी कोई भी असहाय बुजुर्ग मिलते है तो उनकी सहायता करगे । अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर सभी बुजुर्गो को सादर नमन ।
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नोट ---: फोटो में समाज की कड़वी सच्चाई छिप हुई है ।







गुरुवार, 25 सितंबर 2014

मुस्लिम महिलाओ को कॉमन सिविल कोड के लाभ


1. मुस्लिम महिलाओ का  पति घर बैठे तीन बार ''तलाक ! तलाक !! तलाक''  कहकर पत्नी को घर से नही निकल सकेगा ।
2. यदि निकाला तो हिन्दू तलाकशुदा महिलाओ कि भांति उसे एक निश्चित राशि पत्नी कि देना होगी, जो तलाकशुदा मुश्लिम महिलाओ को नही मिलती । 
3. तलाकशुदा मुस्लिम महिला  को मात्र मेहर मिलता है जो जीवन यापन के लिए एक दो वर्ष भी नही चलता
4. कॉमन-सिविल कोड लागू हो गया तो पत्नी कि तलाक देने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाते मुसलमानो के जूते घिस जायेंगे ।
5. मुस्लिम महिला को आज तलाक देने का अधिकार नही है ।  वह उसे मिल जाएगा । घुट- घुट कर मरना नही पड़ेगा ।
6. मुसलमान लड़की को आज पिता कि संपत्ति में मात्र एक तिहाई का   अधिकार है वह बराबरी का हो जायेगा ।
7.मुस्लिम महिला के पति द्वारा तलाक दिए जाने पर तीन माह तक इद्दत कि मुद्दत पूरी होने के बाद ही दूसरी शादी कर सकती है ।  कॉमन सिविल कोड लागू होते ही पति द्वारा तलाक दिए जाने पर तुरंत विवाह कर सकेगी ।
8. भूल-चुक हो जाने पर या गलती से क्रोध में पति के मुंह से तीन बार तलाक निकल जाने पर निरपराध मुस्लिम महिला पुनः अपने पति के साथ नही रह सकती ।  उसे तीन माह बाद किसी दूसरे से निकाह करना पड़ता है, उससे तलाक दिए जाने पर फिर तीन माह बाद अपने पूर्व पति से विवाह कर सकती है ।  इस झंझट से मुक्ति मिलेगी  बिना कोर्ट में गये तलाक मान्य नही होगा और बीच में किसी दूसरे कि पत्नी बननें और शरीर अपवित्र करने कि बाध्यता भी नही होगी और नए पति ने यदि तलाक नही दिया तो आजीवन न चाहते हुए भी उसकी पत्नी बन रहना होगा। 
9. निकाह हराम हो जाने कि स्थित  में स्त्री अपने विवाहित पति के पास नही रह सकती उसे किसी दूसरे से निकाह कि रश्म अदायगी नही करनी पड़ती है। 

10. बैंगलोर में ७००० और मुम्बई ५००० मुस्लिम लड़किओं ने अपने क्लब बना आजीवन विवाह न करने का निश्चय कर लिया है  सारे संसार कि पड़ी लिखी मुस्लिम महिलाये कुंवारी रहना पसंद कर रही है  उन्हें सरियत से निकाह कर जीवनभर पति कि गुलामी पसंद नही   कॉमन सिविल कोड से उन्हें पुरुष कि गुलामी से मुक्ति मिल जायेगी । 

11. ससुर द्वारा बलात्कार किये जाने पर पति के लिए अपनी पत्नी हराम हो जाती है, वह माँ मान ली जाती है । ससुर को कोई दंड नही मिलता ।  कॉमन सिविल कोड से इस मानवताहीन प्रथा से मु.महिला मुक्त हो जायेगी । 

12. पति के कहीं खो जाने पर भी मुस्लिम महिला कहीं दूसरा विवाह नही कर सकती  उसे अपने पति कि ६३ वर्ष कि आयु हो जाने पर ही दूसरे निकाह कि अनुमति मिलती है  तब तक बेचारी स्वयं बूढी हो जाती है, विवाह व्यर्थ सा हो जाता है । 

13. आज मुसलमान अपनी अच्छी भली, सुंदर, पढ़ी-लिखी, कामकाज में चतुर, आज्ञाकारी, इनकी पीढ़ी चलाने वाली पत्नी होते हुए  भी, दूसरी, तीसरी, चौथी पत्नी ले आते  है ।  न पत्नी उसे रोक सकती है न न्याय व्यवस्था यह सरियत कि मुसलमान पुरुषो को दी गयी सहूलियत है  जब कॉमन-सिविल कोड बन जाएगा तो मु. महिला सोतन कि कुंठा से मुक्त होंगी उसका पति दूसरी पत्नी ला नही सकेगा । 

जरा कॉमन सिविल कोड के लाभ मुस्लिम महिलाओ तक पहुंचा कर तो देखिये|