मंगलवार, 5 अगस्त 2014

भारतीय जनता पार्टी को वंशवाद से बचना चाहिए




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी भले देश की राजनीति को वंशवाद से मुक्त करने के प्रयासों में जुटे हों लेकिन उनकी पार्टी भाजपा के ही नेता गाहे-बगाहे ऎसे बयान दे जाते हैं जिसमें वंशवाद की बू नजर आती है । ताजा मामला केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी का है जो चाहती है  कि उनके पुत्र वरूण गांधी सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभालें । लोकतंत्र में किसी भी नेता को किसी पद पर बिठाने का दारोमदार मतदाताओं पर है । माताओ पर नहीं ।
जैसे कांग्रेस हो या भाजपा अथवा अन्य दल, वंशवाद की लम्बी फेहरिस्त हर जगह है । कार्यकर्ताओं में प्रोत्साहित करने का मंत्र फूंका जाता हो लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं । किसी नेता का पुत्र होना कोई अयोग्यता नहीं मानी जा सकती लेकिन राजनीति में सिर्फ रिश्तेदारी को ही महत्व क्यों मिले ? लालबहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी, पी.वी. नरसिम्हाराव, चन्द्र शेखर और नरेन्द्र मोदी समेत तमाम नेताओं को राजनीति विरासत में नहीं मिली बल्कि उन्होंने संघर्ष  करके यह मुकाम हासिल किया ।
वरूण गांधी जी  उत्तर प्रदेश से दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं । भाजपा की राजनीति में वरूण सक्रिय हैं, युवा हैं, उत्साही भी हैं लेकिन उनकी यही खूबी क्या मुख्यमंत्री पद की योग्यता के लिए पर्याप्त है ? उत्तरप्रदेश पहले  से ही पहले ही इस वंसवादी राजनीती के कारण एक अयोग्य और अनुभवहीन मुख्यमंत्री को ढो रहा है ।  उत्तर प्रदेश भाजपा में तमाम ऎसे नेता होंगे जो योग्यता में वरूण से आगे होंगे । भारतीय राजनीति में अच्छे लोग खासकर युवा पीढ़ी इसलिए नहीं जुड़ पा रही है क्योंकि वह जानती हैं कि युवाओं के नाम पर यहां बड़े नेताओं के पुत्र-पुत्रियों अथवा रिश्तेदारों को ही प्रोत्साहन मिलता है । और जमीनी कार्यकर्ताओ की अनदेखी की  जाती है और यह रोग सभी राजनैतिक दलों में लगा हुआ है ।

राजनीतिक दलों के ढांचे पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि आज ''भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों'' को छोड़कर अधिकांश राजनीतिक दल एक व्यक्ति अथवा एक परिवार की छत्र छाया में फल-फूल रहे हैं । सेवाभाव की बजाय राजनीति व्यवसाय का रूप लेती जा रही है जो चिंता का विषय  है । राजनीति को वंशवाद अथवा परिवारवाद से मुक्त करना है तो भाषणो  की बजाय यथार्थ में ऎसा करके दिखाना होगा ताकि अच्छे युवा राजनीति से जुड़ने के लिए प्रेरित हो सकें । इसके लिए वरिष्ठ नेताओं को परिवारवाद के मोह से ऊपर उठना होगा, राजनीति की दशा और दिशा में सुधार की उम्मीद तभी बलवती होगी । मेनका गांधी और ऎसी इच्छा रखने वाले सभी नेताओं को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा । ऎसा करना मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव तो नहीं ।
यदि भाजपा भी वंसवाद की राजनीती की तरफ चल पडी तो अपनी विशेष पहचान खो सकती है । अतः मोदी जी को सावधान और सतर्क रहना होगा । अब मेनका जी तो माँ है , पर मेनका जी को एक नेक सलाह देता हु । जेठानी (सोनिया गांधी) नहीं बने । 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

क्या हम सभी धूर्तो के शिकार है ?

धूर्त और धूर्तता के बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा,छठी-सातवीं शताब्दी के साहित्य में जोरदार रचनाएं मिलती हैं जिन्हें पढ़ कर लगता है कि हमारे पूर्वज कितने बड़े ''मनोविज्ञानी'' थे। उन किस्से, कहानियों और नाटकों में एक से बढ़कर एक धूर्त पात्र मिलते हैं। इससे एक बात तो साफ है कि धूर्तता आदमी के स्वभाव में तब से ही विद्यमान थी जब से वह इस धरती पर पैदा हुआ है । लेकिन तब की धूर्तता और आज की धूर्तता में बहुत बड़ा अन्तर है ।

तब जनसंख्या इतनी नहीं थी । जिन्दगी एकदम सहज थी और धूर्त की पहचान शीघ्र ही कर ली जाती थी लेकिन आजकल तो पता ही नहीं चलता कि कौन धूर्त है और कौन शरीफ व ईमानदार । देश के एक जाने-माने अरबपति-खरबपति महाशय जेल में बैठे हैं । वे जेल में नेताओं की बदौलत नहीं हैं क्योंकि ये जनाब नेताओं, अभिनेताओं, नामी खिलाडियों और खबरनवीसों को तो अपनी जेब में रखते हैं । यह तो भला हो न्यायालयों का, जिनकी कुशलता से वे इस हालत में कई दिनों से वहां रहने को विवश हैं । हालांकि नेताओं का बस चले तो वे पल भर में उन्हें मुक्त करवा उनकी चरणरज माथे पर लगाने लगें ।

धूर्तता का ही परिणाम है कि आज जनता मारी-मारी फिरती रहती है और उसके दुखड़े सुनने वाला कोई नहीं है । यह तो मुखर मध्य वर्ग है जो कि जरा-सी असुविधा होने पर ही रोना-पीटना मचा देता है जिससे सरकारें भीर चौकन्नी हो जाती है वरना गरीब का तो कोई ''धणी-धोरी'' ही नही है । धूर्तो ने मिलकर अपना-अपना एक "संगठन" बना लिया है जिसके अंदर वे एक-दूसरे को सहलाते-दुलारते रहते हैं । अब मैं यहाँ उस संगठनो का नाम नहीं लिखुगा क्योकि मुझे भी अपने परिवार को पालना -पोसना है ,उन्हें सुरक्षा देना है  । वैसे पाठक गण उन सभी धूर्त संगठनो को समझ ही गए होगे  ।

धूर्त अपना काम निकालने के लिए धूर्तता का सहारा लेते हैं । एक धूर्त दूसरे धूर्त का काम तुरंत कर देता है क्योंकि वह जानता है कि आज उसका काम पड़ा है कल मेरा भी तो इससे पड़ सकता है । यही कारन है की ये धूर्त संगठन वाले दिखावा करते है आपसे लड़ाई का । कहने को तो सरकार न जाने कौन-कौन सी सुविधाओं की जब-तब घोषणा  करती रहती है पर सारी घोषनाये  धूर्तो को भेंट चढ़ाने से पहले आम जन को नहीं मिल पाती । अब रोते रहो इनके नाम को । पता नहीं धूर्तो का यह तंत्र कब जाकर कैसे टूटेगा । धूर्त जनता को बेवकूफ बना कर करोड़ों इकटा करके नौ दो ग्यारह हो जाते हैं और जनता हैरत से उन्हें ताकती रह जाती है । मजे की बात कि सोमनाथ से बद्रीनाथ और अमरनाथ से कन्याकुमारी तक धूर्तो का महाजाल फैला हुआ है । गरीब का कहीं कोई ''धणी-धोरी'' नहीं दिखता ।

वैसे जब से मोदी सरकार आई है तब से धूर्तो की दाल गलना बंद हो गई । अब ये तो समय ही बताएगा की नरेंद्र मोदी जी इन धूर्तो के नकेल कस पायेगे या धूर्तो की जमात में शामिल हो जायेगे ?