मंगलवार, 11 जून 2013

!! आडवाणी जी की कुछ गलतिया जिसके कारण आज ये दिन देखना पडा !!

लालकृष्ण आडवाणी जी भाजपा को दो से 180 सीटों तक लेकर आए हैं। मगर उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर कई बार दांवपेंच में उलझना पड़ा। उन्हें कई बार अपनी बात मनवाने के लिए मनोवैज्ञानिक संघर्ष करने पर मजबूर होना पड़ा। इतना ही नहीं वे बेहद उग्र स्वभाव के भी माने जाते हैं। छोटीछोटी बातों पर नाराज भी होते हैं। अटल जी से उनकी कई मौकों पर परदे के पीछे सियासी दांवपेंच भी चली। वे साइकोलॉजी व इमोशन के भंवर से कई बार जीतकर बाहर निकले, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है।
            
 खुद को भाजपा का भीष्म पितामह मानने वाले आडवाणी जी को अगर आज ये दिन देखने पड़े हैं, तो कहीं न कहीं इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। अब तो कांग्रेस भी ये कहने लगी है कि जो जैसा बोता है, वैसा ही फल काटता है। .
एक म्यान में दो तलवार तो नहीं आती पर दो तलवारों की दोस्ती संभव है
       1989 में आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकालने की योजना बनाई। मकसद थादेश में हिंदुत्व की लहर पैदा करना। अटल जी ने विरोध किया। लेकिन आडवाणी जी ने उनकी नहीं सुनी। इस बात को 25 दिसंबर 2009 को आडवाणी जी ने मीडिया से कहा। उन्होंने कहा था अटल जी खुद को लोकतांत्रिक दिखाना चाहते थे, लेकिन मैं सहमत नहीं था।
                     1992 में बाबरी विध्वंस हो गया। आडवाणी जी समेत पूरी भाजपा में मौन जश्न मन रहा था। लेकिन अटल जी पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए थे। तब संसद में उन्होंने अपना दुख इन शब्दों में बयां किया था। 'इस उम्र में मैं पार्टी छोड़कर जा भी नहीं सकता। आज पार्टी जीत गई, लेकिन मैं हार गया।
             अटल जी को आडवाणी जी ने ही भावी प्रधानमंत्री घोषित किया था। वे परोक्ष रूप से सत्ता में दखल चाहते थे। इसीलिए उन्होंने 1999 में संघ के जरिये पार्टी पर दबाव बढ़ाया और रातोंरात उपप्रधानमंत्री मनोनीत हो गए ...
                 2002 के गुजरात दंगे के बाद मोदी जी से प्रधानमंत्री अटलबिहारी जी नाराज थे। पार्टी के कई नेता भी चाहते थे कि मोदी जी को हटा दिया जाए। इसके पीछे तर्क दिया कि ऐसा हुआ तो कांग्रेस से हर मुद्दा छिन जाएगा और देश भी नहीं बंटेगा। लेकिन आडवाणी जी अड़ गए। कहा मोदी को किसी कीमत पर नहीं हटाया जाए। इससे पार्टी खत्म हो जाएगी। नहीं सुनी अटल जी की। वही किया जो खुद चाहते थे।
          2004 की घटना। अटल जी बीमार रहने लगे थे। आडवाणी जी आगे बढऩा चाहते थे। आडवाणी जी को इसके लिए प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, अरुण जेटली की मदद चाहिए थी। इनका साथ लेने के लिए आडवाणी जी ने उमा जी का साथ छोड़ा। क्योंकि ये चारों नेता हर हाल में उमा को पार्टी से निकालना चाहते थे। इन्हें आडवाणी जी की और आडवाणी जीको इनकी जरूरत थी। अंतत: उमा जी भाजपा से निकाल दी गई। तब उमा जी ने अटल जी को पत्र लिखा था जिसमें कहा था "यहां एक विमान चालक (अटलजी) है और 5 विमान अपहरणकर्ता "
              2013 में बताई दिल की बात। आडवाणी ने गोवा बैठक के दौरान ब्लॉग लिखा। महाभारत के कई प्रसंगों का जिक्र किया। पार्टी को द्रौपदी, खुद को भीष्म पितामह और संघ को धृतराष्ट्र की संज्ञा दी। एक किस्सा भी सुनाया। जिसमें संकेतों में खुद को पोप और मोदी-राजनाथ को हिटलर-मुसोलिनी बताया। विपक्ष ने चुटकी ली और कहा, आडवाणी आज पछता रहे होंगे कि आखिर उन्होंने मोदी को बचाया क्यों ?
     2013 में बताई दिल की बात से ही आडवाणी जी के बीजेपी से पराभाव की राजनीति सुरु हुई और 2013 ख़त्म होने के पहले ही ये दिन देखने पद गए।
     कुछ भी आडवाणी जी को आज भी बीजेपी की जरुरत है , इस उम्र के पड़ाव में आडवाणी जी की कोई राजनैतिक कैरियर नहीं बचता है ..ये भी निश्चय है की आद्चानि जी यदि कोई दूसरी पार्टी बनाए है तो ओ सफल नहीं होगे क्योकि जो आज अडवानी जी के साथ है नई पार्टी बनाने के मुद्दे पर ओ सभी नेता आडवाणी जी का साथ छोड़ देगे और आडवाणी जी हालत धोबी के कुत्ते माफिक हो जायेगी " न घर के न घाट के " 
                पर बीजेपी को  भी अडवानी  जी की 2014 के लोकसभा चुनाव तक बहुत जरुरत है .बीजेपी के उच्च नेतृत्व को चाहिए की अडवानी  जी को कैसे भी मनाये पर मोदी जी की इज्जत बचा कर क्योकि बीजेपी का भविष्य मोदी जी के हाथ सुरक्षित है । नमो नाम की आंधी आई है बीजेपी में यह नमो नाम की अंधी में कांग्रेस उडेगी या नहीं ये तो भविष्य के गारत में छिपा हुआ है । 

सोमवार, 10 जून 2013

राजनाथ सिंह की सफलता ?

भाजपा की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाये जाने के बाद मोदी ने कहा, ‘मैं पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के प्रति बहुत कृतज्ञ हूं कि उन्होंने न केवल मुझे नयी जिम्मेदारी सौंपी है बल्कि कार्यकर्ताओं और देश की जनता के सामने बहुत सम्मान भी दिया है.’ मोदी ने कहा, ‘राजनाथ जी बोलने के लिए खड़े हुए और मुझे बैठने को कहा. बाहर जो लोग बैठे हैं उनके लिए इसके महत्व को समझना कठिन है. कोई व्यक्ति केवल पद होने पर ऐसा नहीं करता बल्कि उसके लिए बड़ा दिल होना भी जरूरी है. इसे दरियादिली कहते हैं, जो पार्टी अध्यक्ष ने दिखाई.’ मोदी ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन माना जा रहा है कि ऐसी टिप्पणी करके उन्होंने आडवाणी और कुछ अन्य नेताओं की ओर इशारा किया जो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए.।
         हमारे देश में कई लोगो को ही नहीं बल्कि कई पार्टियों को यह सक ,.नरेन्द्र मोदी  को  बीजेपी पार्टी की चुनाव सिमित का प्रमुख बनाया है जिसमे की नरेन्द्र मोदी  की जीत हुई है पर सिक्के का दुसरा पहलु भी है।  आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच के संभावित रिफ्ट का फायदा उठाकर राजनाथ सिंह की यह सियासी जीत है। ऊपर से जो नरेंद्र मोदी की जीत लग रही है, उनका उभरना लग रहा है, वह वास्तव में राजनाथ सिंह की सफलता है। नरेंद्र मोदी का बीजेपी में अहम स्थान तो होना ही था, उन्हें एक किसी औपचारिक पद पर लाकर कार्यकर्ताओं को खुश करना ही पड़ता। राजनाथ सिंह इन दो तथ्यों को लेकर ही आगे बढ़े। आडवाणी कहते रहे कि इस बार और नरेंद्र को वेटिंग में रखा जाए, फिर अगला चुनाव उन्हें दे देंगे। किंतु कांग्रेस की नाकामयाबियों के चलते देश के फेवर टू अदर्स माहौल का फायदा भी तो उठाना है। इसे फेवर टू बीजेपी बनाना है, तो स्ट्रोंग फैसले करना होंगे। राजनाथ सिंह ने इस बात का पूरा ख्याल रखा। अब जब मोदी मैदान में हैं, प्रचार कमेटी के जरिए कार्यकर्ताओं के सीधे संपर्क में रहेंगे, तो राजनाथ सिंह को दो बड़े फायदे मिलेंगे, पहला तो उनके सांगठनिक नेतृत्व में पार्टी जीतेगी, तो दूसरा मोदी सौ फीसदी मेजोरिटी नहीं ला पाएंगे, तब कुछ सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में मोदी के नाम से देश के आधे से ज्यादा तथाकथित सेकुलर साथ नहीं आएंगे और अगर आएंगे तो अनअफोर्डेबल कंडीशन के साथ फिर क्या, ऑप्शन है ? आडवाणी ? तो राजनाथ सिंह यहां पर अपने दोनों ही मकसदों में कामयाब हुए हैं, एक तो मोदी को आगे बढ़ाने में और आडवाणी को मुकम्मल तौर पर किनारा करने में। चूंकि जब ढफली बजेगी कौन है सेकुलर या कौन है भाजपा में सर्वग्राह्य आदमी, तो खोज की सुई आडवाणी पर नहीं राजनाथ सिंह पर रुकेगी। अगर अभी आडवाणी भी मोदी-मोदी कर रहे होते, तो वे पीएम की रेस में सबसे आगे होते। इसलिए एक अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह इस रिफ्ट को बढ़ाना ही चाहते थे।
         मोदी तो परीक्षाएं ही देते रह जाएंगे, पहली तो गुजरात में लगातर साबित करते रहने की, दूसरी नवीनतम 6 लोस एवं विस चुनावों में सफलता, तीसरी पार्टी में कोई औपचारिक रूप से अखिल भारतीय स्तर की 2014 के लोस चुनावों से जुड़ी जिम्मेदारी पाने की, चौथी परीक्षा बेहद कठिन पार्टी की जो सीटें एंटी इंकंबेंसी फैक्टर और कांग्रेस की खराब छवि के चलते आनी हैं उनसे वे कितना ज्यादा ला सकते हैं, पांचवी कम पड़ गईं सीटों का गणित वे कैसे बिठाएंगे, छठवीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासकर अमेरिकी नकारात्मक रुख को वे कैसे चेंज करेंगे, सातवीं परीक्षा मोदी की वह होगी जिसमें वे लोगों की महा अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे, चूंकि अब लोगों को शांतिपूर्ण कैंडल मार्च, लालकिले पर प्रर्दशन की लपक लग चुकी है, फिर चाहे सरकार का मुखिया मनमोहन हों या मोदी। यूं भी नेवर वोट कॉस्टिंग पार्टिसिपेंट्स वोकेल ऑन इंटरनेट स्पेस प्रोटेस्टर्स के ऊपर यह ज्यादा दबाव है कि वे प्रो बीजेपी हैं, तो वे कुछ अनावश्क मुद्दों पर भी नई सरकार को घेरेंगे। देखिए परीक्षाओं की इतनी सीढिय़ां अगर कोई चढ़ सकता है तो वह बेशक नेता है और फिर सर्वस्वीकार्य है ही । अब यह नेता 2014 के लोकसभा चुनाव में क्या कारनामा दिखाते है यह इन्तजार करना होगा
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