यदि देहम् पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्त: बंधमुक्तो भविष्यसि ॥ 4॥
अर्थ : अगर तू देह को अलग करके और चैतन्य आत्मा में विश्राम करके अर्थात चित्त को एकाग्र करके स्थित है तो अभी तू सुखी और शान्त होता हुआ बन्ध से मुक्त हो जावेगा ॥
हे राजन! जब तू देह से आत्मा को पृथक विचार करके और अपने आत्मा में चित्त को स्थिर करके स्थिर हो जाएगा तब तू सुख और शांति को प्राप्त होवेगा। जब तक चिदजड़ग्रन्थि का नाश नहीं होता है अर्थात परस्पर के अध्यास का नाश नहीं होता है, तब तक ही जीव बंधन में है। जिस काल में अध्यास का नाश हो जाता है उसी काल में जीव मुक्त होता है। शिवगीता में भी इसी वार्ता को कहा है-
मोक्षस्य न हि वासोsस्ति न ग्रामन्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थि नाशो मोक्ष इति स्मृत: ॥ 1॥