बुधवार, 16 जून 2021

बाघेल राजपूतों का उपनाम "बाघेल" कैसे बना

बघेलखण्ड में ‘‘बाघेला राज्य’’ स्थापित होने के पूर्व गुजरात में बघेलों की सार्वभौम्य सत्ता स्थापित हो चुकी थी, जिनकी राजधानी ‘‘अन्हिलवाड़ा’’ थी। बाघेल क्षत्रिय चालुक्यों की एक शाखा है, जिन्होंने दक्षिण भारत के चालुक्य क्षत्रियों की एक शाखा के रूप में गुजरात पहुँचकर 960ई. में अन्हिलवाड़ा में सोलंकियों का राज्य स्थापित किया था। रीवा स्टेट गजेटियर में भी यह उल्लेख किया गया है कि, बघेलखण्ड की रीवा रियासत के नरेश सोलंकी अर्थात् चालुक्य क्षत्रिय की बाघेल शाखा के राजपूत हैं। बाघेलों का इस क्षेत्र में आने के पूर्व इनके पूर्वज चालुक्यों और सोलंकियों का दक्षिणी भारत और गुजरात के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दक्षिण भारत में चालुक्यों का इतिहास छठीं शताब्दी से प्राप्त होता है। दक्षिण भारत के इन्हीं चालुक्य सम्राटों के वंशज गुजरात आये। गुजरात में ‘‘अन्हिलवाड़ा’’ के शासक के रूप में महाराज ‘‘मूलराज’’ ने सन् 960 में चालुक्य क्षत्रियों की सोलंकी शाखा की नींव डाली। इस वंश के प्रतापी नरेश ‘‘जयसिंह सिद्धराज’’ हुए, जिनके कोई सन्तान नहीं थी। इन्होंने अपने नजदीकी संबंधी  (छोटे भाई)  त्रिभुवनपाल के पुत्र कुमारपाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया। कुमारपाल (1143-1173 ई.) ने अपनी मौसी के पुत्र अर्णोराज (गोत्र-भरद्वाज) को ‘‘व्याघ्रपल्ली’’ (बाघेला गाँव) का सामन्त/जागीरदार बना दिया। अर्णोराज के पुत्र लवण प्रसाद को गुजरात के लेखों में ‘‘व्याघ्रपल्लीय’’ कहा गया है, जो कालान्तर में अप्रभंश के रूप में ‘‘बघेल/बाघेला/वाघेला/बाघेल" हो गया। इस तरह व्याघ्रपल्ली गाँव में रहने के कारण अर्णोराज के उत्तराधिकारी ‘‘‘‘बघेल/बाघेला/वाघेला/बाघेल" कहलाये जाने लगे,किन्तु रीवा स्टेट गजेटियर, जीतन सिंह द्वारा लिखित रीवा राज्य दर्पण एवं गुरु राम प्यारे अग्निहोत्री ने रीवा राज्य के इतिहास में लिखा है कि, गुजरात के पाँचवें सोलंकी राजा भीमदेव के चैथे पुत्र सारंगदेव के पुत्र वीर धवल के सुपुत्र का नाम ‘‘बाघराव’’ था। गुजरात के शासक सिद्धराज जय सिंह (1093-1142ई.) ने ‘बाघराव’ को जागीर में व्याघ्रपल्ली (अन्हिलवाड़ा से 10 मील दक्षिण पश्चिम) (‘‘बाघेला गाँव) दिया था, जिसके आधार पर बाघराव की संतानें ‘‘बघेल/बाघेला/वाघेला/बाघेल" नाम से विख्यात हुई। बाघराव इससे संतुष्ट नहीं थे, उन्होंने यह जागीर सिद्धराज जयसिंह के पुत्रों को देकर गुजरात से प्रस्थान किया। गुजरात के इस सोलंकी वंश का विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। 

बाघराव को ‘‘बाघदेव’’ भी कहा जाता था, गुजराती में देव का अर्थ ठाकुर होता है। यही बाघदेव दक्षिण सोलंकी सम्वत् 631 यानी सन् 1233-34 में गुजरात से लाव लश्कर ले कर चलते हुए अनेक तीर्थों का भ्रमण तथा सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए चित्रकूट पहुँचे । चित्रकूट में पहुँचकर उन्होंने आसपास के क्षेत्र को देखा। उस समय वहाँ पर कोई सुदृढ़ सत्ता नहीं थी। तरौंहा में चन्द्रावत परिहारों का राज्य था, जिसके राजा मुकुन्ददेव थे। कालिंजर भटों के राज्य के अन्तर्गत था। ‘बाघदेव’, जिन्हें ‘व्याघ्रदेव’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है, ने कालिन्जर से 16 मील उत्तर पूर्व की और पहाड़ी पर चन्देलों के  दुर्ग ‘‘मरफा’’ पर (जो कि समुद्र तल 1240 फुट ऊँचा था) अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और उन्होंने अपने रक्षार्थ अपने साथ आये हुए लोगों की जो बस्ती बसाई उसका नाम ‘‘बघेलवारी’’ पड़ गया । बांदा गजेटियर के अनुसार व्याघ्रदेव का प्रभुत्व इस किले के उत्तर में 15 मील (24 किमी.) ‘‘बघेल भवन’’ और दक्षिण में 15 मील (24 किमी) ‘‘बघेलन नाला’’ तक था। उस समय दिल्ली के सिंहासन पर कोई सुदृढ़ शासक नहीं था और आस पड़ोस के शासकों ने व्याघ्रदेव से किसी प्रकार छेड़-छाड़ नहीं की। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने भटदेश के राजा से कालिंजर छीन लिया और साथ ही पड़ोसी मण्डीहा राजा को जीतकर उसका राज्य ले लिया। मण्डीहा रघुवंशी राजा था।
         गहोरा में लोधियों के राज्य को भी तिवारी ब्राह्मणों के सहयोग से व्याघ्रदेव ने अधिकार कर लिया । इसी लिए रीवा के तिवारी को "अधरजिया" कहते हैं । बाग़देव ने तिवारी ब्राह्मणों को अधराज देना चाहा तो तिवारियो ने लेने से मना कर दिया (हलाँकि इन बातों का कोई प्रमाण नही है) । अय्यास लोधी राजा के सलाहकार/मंत्री तिवारी ब्राह्मण थे जो व्याघ्रदेव से मिलकर लोधी राजा के साथ छलकर युद्ध मे हरवा दिया । 
इनका पाश्र्ववर्ती राज्य तरौंहा का था, जिसके शासक मुकुन्ददेव चन्द्रावत परिहार थे। उन्होंने अपनी इकलौती बेटी ‘‘सिन्दूरमती’’ का ब्याह व्याघ्रदेव के साथ कर दिया। इनके दूसरी कोई सन्तान भी न थी, अस्तु अपना राज्य भी इन्हीं को सौंप दिया। व्याघ्रदेव ने इसके पश्चात् परदवाँ और तरिहार प्रान्त भी जीत लिया। इस तरह 13वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर ‘‘बाघेल’’ राजपूतों का आधिपत्य हुआ। व्याघ्रदेव का एक विस्तृत भू-भाग में अधिकार हो गया। इन्होंने अपनी राजधानी गहोरा में स्थापित की। गहोरा रीवा पठार के तलहारी क्षेत्र में स्थित था। वर्तमान समय में गहोरा बाँदा-चित्रकूट जिला, उत्तरप्रदेश में स्थित है। कर्बी से 14 मील पूर्व रयपुरा गाँव के निकट उसके दक्षिण में बह रही दो नदियों के मध्य ‘‘गहोरा खास’’ नामक गाँव बसा है। अभयराज सिंह परिहार ने ‘‘गहोरा का ऐतिहासिक अनुसन्धान’’ (पृष्ठ 17) में लिखा है कि, गहोरा का असली नगर नदी के दूसरे किनारे से प्रारंभ होता है, यहाँ महल, मन्दिर, कुएँ तथा नागरिकों की बस्ती के चिन्ह अभी भी पाये जाते हैं। यह हिस्सा अब ‘‘खेरवा’’ नाम से विख्यात है। उस समय इनके शासित प्रान्त की आमदनी अठारह लाख रुपये थी। गहोरा के दो हिस्से थे। एक तो ‘‘गहोराखास’’ और दूसरा ‘‘गहोराघाटी’’ था। व्याघ्रदेव की परिहारिन ठकुराइन से दो पुत्र हुए जिनमें जेठ कर्णदेव गहोरा के अधिकारी हुए और लहुरे पुत्र कन्धरदेव कसौटा और परदमा के ठाकुर हुए। व्याघ्रदेव (बाघराव) इस प्रदेश के बघेलों के आदि पुरुष हैं। जिन्होंने बघेलों की सत्ता इस प्रदेश में स्थापित की। इनका स्वर्गवास वि.सं. 1245 के आसपास हुआ। 


गुरुवार, 10 जून 2021

खाद्य तेल मंहगे क्यो हुए

कुछ समय से सरसों एवं अन्य खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ रही है ।  आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है? 
लेकिन सर्वप्रथम यह विचार करने की आवश्यकता है कि सरकार को क्या सुनिश्चित करना चाहिए - उत्पादकों को अधिक लाभ मिले या उपभोक्ताओं को सस्ता उत्पाद मिले ? द्वितीय,  किस बिंदु पर उत्पादकों और उपभोक्ताओं का हित एक हो सकता है?
अगर किसानों को सरसों के उत्पाद पे MSP से 25 प्रति शत अधिक दाम मिल रहा है, तो सरसों के तेल की कीमत कैसे कम रह सकती है?
फिर, सरकार ने पिछले वर्ष सरसों के तेल पे किसी प्रकार के खाद्य तेल के मिश्रण पर प्रतिबंध लगा दिया था।  यद्यपि यह प्रतिबंध तीन माह में रद्द कर दिया गया था, लेकिन सरकार ने पुनः 8 जून से सरसों के तेल के साथ किसी अन्य खाद्य तेल के मिश्रण पर प्रतिबंध लगा दिया है। दूसरे शब्दों में, "शुद्ध" सरसो के तेल में 20% तेल पाम वृक्ष का होता था जिसे मलेशिया एवं इंडोनेशिया से आयात किया जाता है। 
क्या हम सस्ते के चक्कर में मिलावटी तेल खाना चाहते है, वह भी उस देश का जो भारत का विरोध करता है; एक जिहादी को अपने यहाँ शरण दे रखी है?
अब कुछ तथ्य देखते है। 
अप्रैल 2021 में भारतीय बंदरगाहों पर पाम तेल की औसत कीमत 1,173 डॉलर प्रति टन थी, जो एक साल पहले 599 डॉलर थी। यानि कि मिलावट वाले तेल का दाम भी दोगुना हो गया है। 
पिछले वर्ष जून में सरसों बीज की मंडी में कीमत 46362 रुपये प्रति टन थी; आज 72500 रुपये है। सोया बीन 38208 रुपये बिका था; आज 72000 रुपये मिल रहा है। सूरजमुखी 47000 था; आज 68000 रुपये है। 
पिछले वर्ष जून में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोया बीन का 442 डॉलर प्रति टन मिल रहा था; आज 820 डॉलर में बिक रहा है। सरसों 214 डॉलर था; आज 320 डॉलर प्रति टन है।  
दूसरे शब्दों में, सभी जगह खाद्य तेल के उत्पादों में भारी उछाल है और हम चाहते है कि भारत में तेल सस्ता मिले। 
लेकिन एक अन्य बिंदु पर भी विचार करना आवश्यक है। 
आज हमारी प्रति व्यक्ति तेल की खपत लगभग 15-16 किलो प्रतिवर्ष है। इसका अर्थ है कि हमें लगभग 220-230 लाख टन की प्रति वर्ष आवश्यकता है। लेकिन भारत लगभग 80 लाख टन तेल का उत्पादन करता हैं।  अतः हमें अपनी आवश्यकता की पूर्ती के लिए लगभग 130 लाख टन पाम आयल और कुछ सोया तेल का आयात करना पड़ता हैं। 
तो क्या हम खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकते है? 
खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में खाद्य तेल की खपत लगभग 20-21 किलो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पे स्थिर हो जायेगी। इसका अर्थ है कि हमें प्रति वर्ष लगभग 300 टन तेल की आवश्यकता होगी और उस लक्ष्य तक पहुंचने का कोई आसान रास्ता नहीं है। 
इस कारण से तिलहन की कीमतों में उछाल आया हैं; सभी कीमतें एमएसपी से 15 से 25 प्रति शत अधिक हैं और किसानों के लिए यह अच्छी खबर है। लेकिन उपभोक्ताओं के लिए खराब। 
भारत में पारंपरिक तिलहन का प्रति हेक्टेयर लगभग 300-500 किलो तेल का उत्पादन होता हैं, चाहे वह सरसों, मूंगफली, बिनौला, या चावल की भूसी हो; जबकि पाम वृक्ष प्रति हेक्टेयर लगभग 3.5-4 टन तेल का उत्पादन करता है। जलवायु के कारण भारत में केवल 20 लाख  हेक्टेयर कृषि भूमि पे पाम वृक्ष उगाया जा सकता है।  लेकिन तब भी हम केवल 80 लाख टन पाम तेल लाख उत्पादन कर पाएंगे। अन्य तिलहनों की तुलना में पाम ऑयल में बड़ा निवेश करना पड़ता है और लगभग आठ वर्ष के बाद लाभ मिलना शुरू होता है। 
दूसरे शब्दों में, हमारा कुल तेल (पारम्परिक एवं पाम) उत्पादन केवल 160 लाख टन के आस-पास सिमट कर रह जाएगा, जबकि आवश्यकता 300 टन तेल की होगी। 
यहीं पर कृषि सुधारो का महत्त्व पता चलता है।  आज हम ऐसी फसलें (गेंहू, चावल, गन्ना) उगा रहे है जिनका उत्पाद आवश्यकता से कहीं अधिक है और जिनकी कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार से कहीं अधिक है। हालत यह है कि अगर हम आयात का गेंहू खाना शुरू कर दे, तो वह MSP के गेंहू से सस्ता पड़ेगा।
ऐसे में किसानो को अधिक तिलहन उगाने के लिए प्रोत्साहित करना पड़ेगा जिसे वे गेंहू, चावल, गन्ना से अपना ध्यान हटाए। 
तिलहन की अधिक कीमत उसी दिशा में एक कदम है।
लेख के साथ तिलहन एवं तेल के दाम की लिस्ट लगी है।
अमित सिंघल जी...