बुधवार, 21 अप्रैल 2021

द्रौपदी का एक ही पति थे.. युधिष्ठिर


द्रौपदी के पांच पति थे, इस 200 वर्षों से प्रचारित झूठ का खंडन ...जर्मन के संस्कृत जानकार मैक्स मूलर को जब विलियम हंटर की कमेटी के कहने पर वैदिक धर्म के आर्य ग्रंथों को बिगाड़ने का जिम्मा सौंपा गया तो उसमे मनु स्मृति, रामायण, वेद के साथ साथ महाभारत के चरित्रों को बिगाड़ कर दिखाने का भी काम किया गया।

 द्रोपदी के पवित्र चरित्र को बिगाड़ने वाले विधर्मी, पापी वो तथाकथित ब्राह्मण, पुजारी, पुरोहित भी हैं जिन्होंने महाभारत ग्रंथ का अध्ययन किये बिना अंग्रेजो के हर दुष्प्रचार  और षड्यंत्रकारी चाल, धोखे को स्वीकार कर लिया और धर्म को चोट पहुंचाई।_
अब ध्यानपूर्वक पढ़ें---

#विवाह का विवाद क्यों पैदा हुआ था:--

(१) अर्जुन ने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। यदि उससे विवाह हो जाता तो कोई परेशानी न होती। वह तो स्वयंवर की घोषणा के अनुरुप ही होता।

(२) परन्तु इस विवाह के लिए कुन्ती कतई तैयार नहीं थी।

(३) अर्जुन ने भी इस विवाह से इन्कार कर दिया था। "बड़े भाई से पहले छोटे का विवाह हो जाए यह तो पाप है। अधर्म है।" (भवान् निवेशय प्रथमं)

मा मा नरेन्द्र त्वमधर्मभाजंकृथा न धर्मोsयमशिष्टः (१९०-८)

(४) कुन्ती मां थी। यदि अर्जुन का विवाह भी हो जाता,भीम का तो पहले ही हिडम्बा से (हिडम्बा की ही चाहना के कारण) हो गया था। तो सारे देश में यह बात स्वतः प्रसिद्ध हो जाती कि निश्चय ही युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष है जिसके कारण उसका विवाह नहीं हो सकता।

(५) आप स्वयं निर्णय करें कुन्ती की इस सोच में क्या भूल है? वह माता है, अपने बच्चों का हित उससे अधिक कौन सोच सकता है? इसलिए माता कुन्ती चाहती थी और सारे पाण्डव भी यही चाहते थे कि विवाह युधिष्ठिर से हो जाए।

प्रश्न:-क्या कोई ऐसा प्रमाण है जिसमें द्रौपदी ने अपने को केवल एक की पत्नी कहा हो या अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बताया हो ?

#उत्तर:-

(1)-#द्रौपदी को कीचक ने परेशान कर दिया तो दुःखी द्रौपदी भीम के पास आई। उदास थी। भीम ने पूछा सब कुशल तो है? द्रौपदी बोली जिस स्त्री का पति राजा युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है?

आशोच्यत्वं कुतस्यस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि ।।-(विराट १८/१)

_द्रौपदी स्वयं को केवल युधिष्ठिर की पत्नि बता रही है।_

(2)- वह भीम से कहती है- जिसके बहुत से भाई, श्वसुर और पुत्र हों,जो इन सबसे घिरी हो तथा सब प्रकार अभ्युदयशील हो, ऐसी स्थिति में मेरे सिवा और दूसरी कौन सी स्त्री दुःख भोगने के लिए विवश हुई होगी-

भ्रातृभिः श्वसुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।
एवं सुमुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ।।-(२०-१३)

द्रौपदी स्वयं कहती है उसके बहुत से भाई हैं, बहुत से श्वसुर हैं, बहुत से पुत्र भी हैं,फिर भी वह दुःखी है। यदि बहुत से पति होते तो सबसे पहले यही कहती कि जिसके पाँच-पाँच पति हैं, वह मैं दुःखी हूँ,पर होते तब ना ।

(3)-और जब भीम ने द्रौपदी को,कीचक के किये का फल देने की प्रतिज्ञा कर ली और कीचक को मार-मारकर माँस का लोथड़ा बना दिया तब अन्तिम श्वास लेते कीचक को उसने कहा था, *"जो सैरन्ध्री के लिए कण्टक था,जिसने मेरे भाई की पत्नी का अपहरण करने की चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचक को मारकर आज मैं अनृण हो जाऊंगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।"

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।
शांति लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रीकण्टकम् ।।-(विराट २२-७९)

इस पर भी कोई भीम को द्रौपदी का पति कहता हो तो क्या करें? मारने वाले की लाठी तो पकड़ी जा सकती है, बोलने वाले की जीभ को कोई कैसे पकड़ सकता है?

(4)-द्रौपदी को दांव पर लगाकर हार जाने पर जब दुर्योधन ने उसे सभा में लाने को दूत भेजा तो द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया। उसने कहा जब राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं अपने को दांव पर लगाकर हार चुका था तो वह हारा हुआ मुझे कैसे दांव पर लगा सकता है? महात्मा विदुर ने भी यह सवाल भरी सभा में उठाया। #द्रौपदी ने भी सभा में ललकार कर यही प्रश्न पूछा था -क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर मुझे दांव पर लगा सकता था? सभा में सन्नाटा छा गया।* किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तब केवल भीष्म ने उत्तर देने या लीपा-पोती करने का प्रयत्न किया था और कहा था, *"जो मालिक नहीं वह पराया धन दांव पर नहीं लगा सकता परन्तु स्त्री को सदा अपने स्वामी के ही अधीन देखा जा सकता है।"-

अस्वाभ्यशक्तः पणितुं परस्व ।स्त्रियाश्च भर्तुरवशतां समीक्ष्य ।-(२०७-४३)

"ठीक है युधिष्ठिर पहले हारा है पर है तो द्रौपदी का पति और पति सदा पति रहता है, पत्नी का स्वामी रहता है।"

यानि द्रौपदी को युधिष्ठिर द्वारा हारे जाने का दबी जुबान में भीष्म समर्थन कर रहे हैं। यदि द्रौपदी पाँच की पत्नी होती तो वह ,बजाय चुप हो जाने के पूछती,जब मैं पाँच की पत्नी थी तो किसी एक को मुझे हारने का क्या अधिकार था? द्रौपदी न पूछती तो विदुर प्रश्न उठाते कि "पाँच की पत्नि को एक पति दाँव पर कैसे लगा सकता है? यह न्यायविरुद्ध है।"

_स्पष्ट है द्रौपदी ने या विदुर ने यह प्रश्न उठाया ही नहीं। यदि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होती तो यह प्रश्न निश्चय ही उठाती।_

इसीलिए भीष्म ने कहा कि द्रौपदी को युधिष्ठिर ने हारा है। युधिष्ठिर इसका पति है। चाहे पहले स्वयं अपने को ही हारा हो, पर है तो इसका स्वामी ही। और नियम बता दिया - जो जिसका स्वामी है वही उसे किसी को दे सकता है,जिसका स्वामी नहीं उसे नहीं दे सकता।

(5)- #द्रौपदी कहती है- "कौरवो ! मैं धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नि हूं।तथा उनके ही समान वर्ण वाली हू।आप बतावें मैं दासी हूँ या अदासी?आप जैसा कहेंगे,मैं वैसा करुंगी।"-

तमिमांधर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णनाम् ।
ब्रूत दासीमदासीम् वा तत् करिष्यामि कौरवैः ।।-(६९-११-९०७)

#द्रौपदी अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बता रही है।

(6)- #पाण्डव वनवास में थे दुर्योधन की बहन का पति सिंधुराज जयद्रथ उस वन में आ गया। उसने द्रौपदी को देखकर पूछा -तुम कुशल तो हो?द्रौपदी बोली सकुशल हूं।मेरे पति कुरु कुल-रत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर भी सकुशल हैं।मैं और उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगों के विषय में आप पूछना चाह रहे हैं, वे सब भी कुशल से हैं। राजकुमार ! यह पग धोने का जल है। इसे ग्रहण करो।यह आसन है, यहाँ विराजिए।-

कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः
अहं च भ्राताश्चास्य यांश्चा न्यान् परिपृच्छसि ।-(१२-२६७-१६९४)

#द्रौपदी भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव को अपना पति नहीं बताती,उन्हें पति का भाई बताती है।

और आगे चलकर तो यह एकदम स्पष्ट ही कर देती है। जब युधिष्ठिर की तरफ इशारा करके वह जयद्रथ को बताती है---

एतं कुरुश्रेष्ठतमम् वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ।-(२७०-७-१७०१)

"कुरू कुल के इन श्रेष्ठतम पुरुष को ही ,धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं।"

क्या अब भी सन्देह की गुंजाइश है कि द्रौपदी का पति कौन था?

(7)- कृष्ण संधि कराने गए थे। दुर्योधन को धिक्कारते हुए कहने लगे"-- दुर्योधन! तेरे सिवाय और ऐसा अधम कौन है जो बड़े भाई की पत्नी को सभा में लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करे जैसा तूने किया। -

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति ।
आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदीम् त्वया ।।-(२८-८-२३८२)

कृष्ण भी द्रौपदी को दुर्योधन के बड़े भाई की पत्नी मानते हैं।
 द्रौपदी का केवल एक ही पति था - युधिस्ठिर। उनका नाम पांचाली इसलिए था क्योकि वो पांचाल नरेश की पुत्री थी , न की पाँच भाइयों की पत्नी। इसके अन्य प्रमाण भी महाभारत में हैं।

अब सत्य को ग्रहण करें और द्रौपदी के पवित्र चरित्र का सम्मान करें।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

गुजरात से आये बाघेल/बाघेला/वाघेला राजपूतो की भूली बिसरी वृत्तांत...

बाघेल वंश के आदि पुरुष व्याघ्रदेव जूदेव से पार्श्ववर्ती राज्य के तरोहा के परिहार शासक मुकुंददेव चंद्रावत ने अपनी एकलौती बेटी "सिन्दूरमती" का व्याह किया था और कोई पुत्र न होने पर अपना राज्य भी इन्हें सौप दिया था। व्याघ्रदेव की परिहारिन रानी के पाँच पुत्र हुए। सबसे बड़े करण देव गहोरा के अधिकारी, दूसरे सूरत देव नि:संतान, तीसरे कीरत देव दक्षिण में चले गए, चौथे श्यामदेव- गुजरात गये और पाँचवे कंधर देव को कसौटा (शंकरगढ़) और परदमा मिला। श्री अर्जुनसिंह इसी कसौटा शाखा से निर्गत बघेल राजपूत है।
रीवा इलाहाबाद मार्ग पर स्थित रायपुर के कलचुरियों की एक शाखा राज्य रीवा के दक्षिण में था, जो "चंदनियाँ" कहलाता था। इन्हीं में से सोमदत्त करचुली के अधिकार में बांधवगढ़ का किला था। सोमदत्त ने अपनी पुत्री (“पद्यकुँवरि") का ब्याह करणदेव से कर दिया और बांधवगढ़ का किला दहेज में दे दिया। अब इस राज्य की उत्तरी राजधानी गहोरा और दक्षिणी राजधानी बांधवगढ़ हो गई।
पाटन के व्याघ्रपल्ली देवस्थली में जन्मे करणदेव (कल्याणदेव) संस्कृत के धुरंधर विद्वान थे। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र का एक अच्छा प्रामाणिक ग्रन्ध "सारावली"लिखा है।
इसी बांधवगढ़ के कारण यह राजवंश कालान्तर में "बांधवेश महाराजा" कहलाया।
सारंग देव (करण देव के पौत्र) के युवराज काल में इनकी मुठभेड़ परमर्दिदेव चंदेल राजा से हुई, जिसके फलस्वरूप उसने वि.सं. 1246 के लगभग एक बहुत बड़ी सेना लेकर, बांधवगढ़ पर चढ़ाई करने के लिए अपने प्रसिद्ध सामंत ऊदल को भेजा। घोर संग्राम के बाद सारंग देव ने ऊदल को पकड़ कर बांधवगढ़ क़िले की एक कोठरी में बंद कर दिया, जिसे आज भी "ऊदल की कोठरी" कहते हैं। ऊदल जैसे अजयवीर को जीत लेने के कारण इन्हें वीर वघेला राय “संग्राम सिंह" भी कहा जाता था।
वि.सं.1300 के आस-पास सारंग देव के पश्चात. इनके पुत्र विलासदेव राजा हुए। इन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। वर्तमान बिलासपुर पहले एक गाँव था जिसे बिलासा नाम की एक मछुई (मल्लाहिन) ने बसाया था। उसका नाम “बिलसिया" था। इसी को बिलासदेव ने शहर के रूप में आकर इसका नाम बिलासपुर रखा। इन्हीं के शासनकाल में राज्य की सीमा बस्तर तक पहुच गई।
चुरहट के राव- इनका खानदान 16वीं शताब्दी के तृतीय चरण में, कसौटा के महाराज करनसिंह के ज्येष्ठ पुत्र विक्रमजीतसिंह से स्थापित हुआ है। विक्रमजीत कही बाहर थे, तभी इनके छोटे भाई मेदनी सिंह कसौटा की गद्दी में बैठ गए। छोटे भाई से विवाद न कर, महाराव विक्रमजीत सिंह, महाराजा रामचंद्र सिंह देव की सेवा बांधवगढ़ चले आये। यहाँ इन्हें राव की पदवी और चुरहट का ठिकाना 85, जिनकी आमदनी 35,000 रूपये थी, जागीर में मिली। चंवर, लंगर, डंका, निशान आदि मंसब भी प्रदान किया गया।
चुरहट के आदि पुरुष राव विक्रमजीत सिंह ने मड़वास के बालेन्दु राजा को हराकर, अपने आधीन कर लिया। कलचुरी राज्य के समाप्त हो जाने पर बालेन्दु राजाओं ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया और मड़वास को राजधानी बनाया था।
तब, मड़वास के जंगलों में जंगली हाथी बहुतायत से पाये जाते थे, और बांधवगढ़ हाथियों के बिक्री का प्रमुख केन्द्र था। महाराजा रघुराजसिंह जू देव के शासन काल वि सं.1927 में, मड़वास के जंगल से 30 हाथियों के पकड़े जाने का उल्लेख मिलता है। राव विक्रमजीत सिंह के पश्चात् इनके पुत्र गणेश सिंह, गणेश सिंह के पुत्र संग्राम सिंह और इनके पुत्र मदन सिंह चुरहट गद्दी पर बैठे। राव मदन सिंह की पहली यानी बड़ी रानी से 12 पुत्र व छोटी रानी से पाँच पुत्र हुए। किंतु छोटी रानी से पहले पुत्र करन सिंह हुए। बड़ी रानी को बाद में पुत्र प्राप्त हुए। उत्तराधिकार के लिए हुए विवाद के कारण राव मदनसिंह, बड़ी ठकुराइन के बारह पुत्रों को लेकर रामपुर नेकिन चले गए और दोनों ठिकानों की सरहद बाँध दी। घुघरी नदी के पूर्व दिशा में चुरहट इलाक़ा और पश्चिम में रामपुर नेकिन वालों को “लल्लू साहब" की उपाधि दी गई।
महाराजा गुलाबसिंह ने, अपने शासन के लगभग अंतिम दौर में, रामपुर के लल्लू साहब को “राव" की उपाधि दी।राव मदनसिंह के रामपुर नेकिन चले जाने से इनके ज्येष्ठ पुत्र करनसिंह चुरहट की गद्दी पर बैठे। इनके दूसरे भाई लालशाह को मोहनिया, जोरावर सिंह का बरखड़ा बैरीलाल को लकोड़ा और पाँचवे भाई पृथ्वी सिंह को घोघरा मिला। मोहिनिया में यह अंधविश्वास व्याप्त था कि यहाँ के ठाकुर का वंश नहीं चलेगा लिए लालशाह नाराज़ होकर रीवा दरबार में चले आये और चामू का इलाका प्राप्त किया। इन्ही के वंशज चामू के ठाकुर शत्रुघ्नसिंह के तृतीय पुत्र कर्नल, लाल जनार्दन सिंह, जो महाराजा वेंकटरमण सिंह जू देव के निजी सचिव थे। इनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर महाराज ने ताला इलाका प्रदान किया। इनके पुत्र कुँ. मोरध्वजसिंह महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव के ए.डी.सी.थे। मेनपुरी के चौहान राजा उदयभानसिंह के छोटे भाई गणेशराय की रिश्तेदार चुरहट के बघेलों के यहाँ थी। इसी कारण इनके पुत्र भू गाँव से वि.सं.1729 में चुरहट आये। इन्हें यहाँ टिका लिया गया और निर्वाह के लिए देवगढ़ दे दिया।रीवा महाराजा अवधूत सिंह (विसं. 1759-1812) के समय हृदयशाह बुन्देला ने रीवा पर चढ़ाई की थी। इस युद्ध में, चौहान बंधु रुद्रशाह और विरुद्ध शाह प्रशंसनीय वीरता के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। इसी युद्ध में मर्दन शाह कलचुरी जो उसी दिन नवपरिणिता पत्नी के साथ घर आये थे। हाथ-पाँव कट जाने के बाद भी अनुपम वीरता से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए थे। रीवा क़िले के अंदर इनकी एकमात्र छतरी अभी भी बनी हुई है।चौहान बंधुओं की वीरता से प्रसन्न होकर, बघऊँ इलाके के कुछ गाँव पटपरा, बढ़ोना, हटवा, पहाड़ी, कमजी, कोल्हूडीह, तेंदुआ और खडबरा, चौहानों को दे दिया गया।
बालेन्दु राजा भीष्मशाह तक, मड़वास लगभग ढाई सौ वर्ष तक, चुरहट के अधीन रहा। चुरहट के राव ज़बरदस्त सिंह (वि. सं. 1860-1893) के समय में, मड़वास, पथरोला आदि के इलाकों का सीधा संबंध रीवा दरबार से हो गया।15 अक्टूबर 1812 (वि. सं. 1869) को, अंग्रेजी सरकार और रीवा महाराजा जयसिंह के बीच संधि हुई। इसी संधि के अंतर्गत अंग्रेजों ने रेल, तार और डाक की व्यवस्था प्रारंभ कर दी। एक डाक घर चुरहट में भी खोला गया। राव जबरदस्त सिंह की शह पर, अंग्रेजी सरकार की डाक लूट ली गई। अग्रता को महाराजा जयसिंह पर संदेह हो गया। वि.सं.1872 में अंग्रेजों ने रीवा पर चढ़ाई कर दी। अंग्रेज़ों का शिविर जब ग्राम सथिनी के पास पड़ा था, कुछ लोगों ने छापा मारकर, अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुँचाया। इस प्रकार रीवा राज्य अंग्रेजों से पहले विद्रोह, चुरहट वालों ने ही किया। अंग्रेजी सेना में खलबली मच गई। इसकी सूचना जब जयसिंह को मिली, उन्होंने स्वयं अंग्रेजों के शिविर में जाकर चढ़ाई में अंग्रेजो के खर्च हुए पैंतालीस हज़ार, एक सौ तिहत्तर रूपये देने और विदोहियों का दमन करने का वचन दिया।चढ़ाई का जो खर्च दिया गया, उसके बदले में चुरहट के इलाके का बघऊ परगना राज्य में मिला लिया गया। बघऊ इलाक़े के आठ गाँव पहले ही चौहानों को दिये जा चुके थे।बि सं. 1876 में, बर्दा के राजा अजीतसिंह ने रीवा महाराजा अजीतसिंह अधीनता स्वीकार कर ली। इसी के साथ चौहानों का चौहान खंड और वेणुवंशियो का सिंगरौली राज्य भी रीवा राज्य के अधीन आ गया।