शनिवार, 25 जनवरी 2014

जब तक ''गण'' सोये हुए है तंत्र सफल नहीं होगा ।

कल पूरा देश गणतंत्र दिवस उल्लास के साथ मनाने जा रहा हैं । 26 जनवरी, 1950 को हमने अपने देश का संविधान लागू किया था । जनता के द्वारा, जनता के लिये, जनता के शासन की व्यवस्था इस संविधान में की गयी थीं । समस्त कार्यों के सुचारु रूप से संचालन के लिये कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ-साथ पारदर्शी प्रशासन के मूल उद्देश्य से प्रेस को चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता दी गयी थी ।

संविधान में सभी स्तंभों के कार्यक्षेत्र का स्पष्ट विवरण दिया गया हैं। लेकिन कई बार ऐसे मौके भी आये जब इनमें यह होड़ मच गयी कि कौन सर्वोच्च हैं? ऐसे अवसर भी आये जब कभी विधायिका और न्यायपालिका आमने सामने दिखी तो कभी कार्यपालिका और विधायिका में टकराहट के स्वर सुनायी दिये तो कभी प्रेस पर स्वच्छंदता के आरोप लगे। ऐसे दौर में कुछ ऐसे अप्रिय वाकये भी हुये जो कि निदंनीय रहे।

‘गण’ को शिक्षित कर जागृत करने के अभियान को गति देने के प्रयास किये गये। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में इतने अधिक प्रयोग किये गये कि यह लक्ष्य हमसे आज साठ साल भी दूर ही दिखायी दे रहा हैं। वर्तमान में सरकार शिक्षा की गारंटी देने के उसी प्रकार प्रयास कर रही है जैसा कि रोजगार गारंटी योजना के तहत रोजगार की गारंटी दी गयी हैं। शिक्षा को प्रोत्साहन देकर जागृति लाने की महती आवश्यकता आज भी महसूस की जा रही हैं। ताकि ‘गण’ चुस्त हो सके।

‘तंत्र’ को नियंत्रित रखना अत्यंत आवयक हैं। ‘तंत्र’ यदि निरंकुश हो जाये तो ‘गण’ के अधिकारो को सुरक्षित रख पाना एक दुष्कर कार्य हो जाता हैं। एक समस्या यह भी हैं कि यदि देश में कोई ईमानदार हैं तो वो बाकी पूरे देश को बेइमान मानने लगता हैं। ऐसी घारणा हैं कि तंत्र को नियंत्रित रखने के लिये पारदर्शी प्रशासन होना अत्यंत आवश्यक हैं। इस दिशा में सरकार द्वारा लागू किया गया सूचना का अधिकार कानून कारगर साबित हो सकता हैं। लेकिन कानूनी बारिकियों और प्रशासनिक अमले की हठधर्मिता कई मामलों में आड़े आते दिखायी दे रही हैं। राजनेता भी तंत्र से राजनैतिक काम लेकर उन्हें नियंत्रित करने में असहाय दिख रहें हैं। जिससे तंत्र अनियंत्रित ही दिखायी दे रहा हैं।

‘गण’ यदि सुस्त हो और ‘तंत्र’ अनियंत्रित हो भला ‘गणतंत्र’ कैसे सफल हो पायेगा ?
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हमारी यही कामना हैं कि ‘गण’ जागृत हो, ‘तंत्र’ नियंत्रित हो और राजनेता इस दुष्कर कार्य को कर सकें ताकि ‘गणतंत्र’ सफल हो सके।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

जानिये कैसी बनी जातियाँ

आज के समाज में कुछ लोग पाये जाये है जो अपने नाम के आगे डाक्टर लिखते है । मैने अक्सर देखा है की ये आजकल के डाँक्टर लोग का सामाजिक संपर्क डाँक्टर लोगो से साथ ही होता है ये लोग सब मिलकर सेमिनार करते रहते है और उन सेमिनार में डाँक्टर ही होते है । आजकल ने डाँक्टर किसी डाक्टरनी से ही शादी करते है और इनके बच्चे भी बडे होके अक्सर डाँक्टर बनते है ।

अच्छा ये बाताओ, मैने जो उपर लिखा कुछ गलत लिखा ? नही ना ? अच्छा ये बताओ की सनी देयोल क्या इन डाक्टर के सर पर बंदूक रख कर बोल रहा है की भाई तुझे डाक्टर लडकी से ही शादी करनी है ? या अपने बच्चे को भी डाक्टर बनाना है? नही ना ?? ये सब आटोमेटिक होता है ! अपने आप , सही बोला ना 
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 अब गौर करे । हमारे यहाँ जो जातियाँ होती है वो भी तो कुछ ऐसी ही है , जैसे दर्जी के बच्चे दर्जी बनते है, दर्जी लोगो अपने नाम के पीछे दर्जी लिखते है और उनका सामाजिक संबंध दर्जीयों से होता है और वो किसी दूसरी दर्जी की लडकी से ही शादी करते है ताकि पोलका बनाने की कला, नही तो कम से कम काँच-बटन लगाने तो सीख कर ही आये ।
जब आज के डाँक्टर लोगो ने एक तरह की डाँक्टर जात बना कर कुछ गलत नही किया तो हमारे पूर्बजो ने "कर्म" आधारित जातियाँ बना ली तो कौन ना गुनाह किया । क्या आपको लगता है डाँक्टरों के इस अलगाव से समाज टूटा है ? क्या समाज बटाँ हुआ है ? नही ना, फिर आप कैसे बोल सकते है की भारत जाती धर्मो में बँटा था । सब जातियाँ समाज का हिस्सा ही और रहेंगी । हाँ ४०० साल से उँची नीची जात की कुधारणा आ गई लेकिन मुझे नही लगता की वाकई में हिंदू समाज जातियों में बँटा था ।
               आज हमने अपनी सुविधा के अनुसार राज्य बना दिये । फिर उनको भी जिले और तहसील लेवल पर बाँट दिया । लेकिन हम ये थोडे ने बोल सकते है की भारत तो हजारों जिलो में बँटा हुआ देश है । सुविधानुसार बँटा होने के बाद भी एक देश है , इसी प्रकार हम हिंदू "कर्म" आधारित जातियों में बँट कर भी एक थे । ना वो कल गलत था और ना आज गलत है । आपने देखने का तरीका कुत्सित वामपंथीयों द्वारा बदल दिया है । अगर फिर भी आपको लगता है की जातीयाँ बुरी थी तो आप डाँक्टर लोगो को, वकील लोगो को, रईस लोगो को, समझाओं ये सब लोग अपने अपने हैसियत और काम से अनुसार समूह बना ही तो रहे है | एक और बात, आज भी सरकार , नगर निगम, नगर पालिका के द्वारा कई लोगो को कचरा उठाने जैसे काम में लगा रही है । क्या आपको लगता है की सरकार उन लोगो का शोषण कर रही है ? अगर ये लोग भी अपने नाम के पीछे अचानक से कचरादार (जैसे सुनील कचरादार) लगाने लग जाये तो कुछ १०० साल बाद अपने बच्चे भी ये बोलेंगे की मोदी सरकार ने कचरादार जाति का खूब शोषण किया ।


लेख लिखने का मतलब साफ है की हम चाहे जो भी कर ले लेकिन अर्थव्यवस्था अपने हिसाब से नये नये "कर्मचारी समूह" बनाती है इनको जाती बोल दो या कुछ और , लेकिन ये सब चलता आ रहा है और नये नये रूपो में चलता रहेगा । इसलिये आप हिंदू धर्म को कम से कम ये कोसना बंद करों की समाज जातियों में बटाँ था और इससे बहुत नुकसान आया ।