मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर एक महान हिंदूवादी नेता थे ?

 मित्रो , जैसा की आप जानते है की भीमराव आंबेडकर को भारत संविधान को बनाने वाला माना जाता है ?

लेकिन क्या आप ये भी जानते है की बाबा साहब द्वारा निर्मित भारत संविधान में भगवान् राम , माता जानकी , भगवान् श्रीकृष्ण आदि की तस्वीरे भी संविधान में थी ? यहाँ तक की भगवान् शिव ( नटराज रूप में ) की भी तस्वीरे संविधान में लगाईं गयी थी
संविधान की वो मूल प्रति जिसे बाबा साहब अपने साथ संसद में लेकर गए थे और संविधान की जिस किताब से उन्होंने संसद में संविधान को पढ़कर सुनाया था उसमे ये सभी तस्वीरे थी

जी हाँ, ये सच है बंधुओ

आंबेडकर को उनकी शैक्षिक योगयता के कारन संविधान सभा की प्रारूप सभा का अध्यक्ष चुना गया था और उनकी संविधान सभा की अन्य इकाइयों से कई बार संविधान के बारे में चर्चा होती थी
नेहरू और आंबेडकर की संविधान को लेकर कई बार बैठके हुई , ऐसी ही एक बैठक में तय हुआ की संविधान में भगवान् के सभी रूपो यथा राम, कृष्ण , शिव आदि को और भारतीय संस्कृति के अन्य रूपो को भारतीय संविधान में शामिल किया जाना चाहिए
भारतीय संविधान भारत कि संस्कृति और इसके समग्र रूपो का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए तय हुआ की भगवान् के सभी रूपो और भारतीय संस्कृति के अन्य रूपो को चित्रो की शक्ल में भारतीय संविधान में अलग अलग पेजो पर जोड़ा जायेगाये लगना चाहिए की भारतीय संविधान भारतीय संस्कृति के विविध रंगो से सजा हुआ हैप्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने इस अति महत्वपूर्ण कार्य का भार बिहार के विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को सौंपा
संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर ने नन्दलाल को बताया की वे भगवान्को के अवतारकाल के किन प्रसंगो को तस्वीर के रूप में संविधान में जोड़ना चाहते थे और किस जगह कौन सी तस्वीर लगायी जानी थी , उन्होंने चित्र सम्बन्धी अपनी इच्छाये और अन्य आवश्यक दिशा निर्देश नंदलाल को दिए पश्चात नंदलाल जी ने चित्र बनाना शुरू कियासंविधान में कुल 22 भाग हैं। इस तरह उन्हें भारतीय संविधान की इस मूल प्रति को अपने 22 चित्रों से सजाने का मौका मिला। इन 22 चित्रों को बनाने में चार साल लगे इस काम के लिए उन्हें 21,000 मेहनताना दिया गया
नंदलाल जी ने संविधान के हर भाग की शुरुआत में 8-13 इंच के चित्र बनाए नंदलाल बोस के बनाए चित्र वास्तव में भारतीय इतिहास की विकास यात्रा हैंसुनहरे बार्डर और लाल-पीले रंग की अधिकता लिए हुए इन चित्रों की शुरुआत होती है भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक की लाट सेअगले भाग में भारतीय संविधान की प्रस्तावना है, जिसे सुनहरे बार्डर से घेरा गया है, जिसमें घोड़ा, शेर, हाथी और बैल के चित्र बने हैं ये वही चित्र हैं, जो हमें सामान्यत: मोहन जोदड़ो की सभ्यता के अध्ययन में दिखाई देते हैं भारतीय संस्कृति में शतदल कमल का महत्व रहा है, इसलिए इस बार्डर में शतदल कमल को भी नंदलाल ने जगह दी है इन फूलों को समकालीन लिपि में लिखे हुए अक्षरों के घेरे में रखा गया है
अगले भाग में मोहन जोदड़ो की सील दिखाई गई है वास्तव में भारतीय सभ्यता की पहचान में इस सील का बड़ा ही महत्व है शायद यही कारण है कि हमारी सभ्यता की इस निशानी को शुरुआत में जगह दी गई है। अगले भाग से वैदिक काल की शुरुआत होती हैकिसी ऋषि के आश्रम का चिह्न है मध्य में गुरु बैठे हुए हैं और उनके शिष्यों को दर्शाया गया है। बगल में एक यज्ञशाला बनी हुई है मूल अधिकार वाले भाग की शुरुआत त्रेतायुग से होती है इस चित्र में भगवान राम रावण को हराकर पुष्पक विमान में सीता जी को लंका से वापस ले आ रहे हैं राम धनुष-वाण लेकर आगे बैठे हुए हैं और उनके पीछे लक्ष्मण और हनुमान हैं अब कमाल देखिये इस चित्र को लेकर संविधान सभा में विवाद हुआ था कुछ सदस्यों का तर्क था कि जब संविधान में ही भगवान राम का चित्र दिखाया गया है तो फिर यह संविधान पंथनिरपेक्ष कैसे ? लेकिन आंबेडकर इस पर अड़ गए और तस्वीरो को हटाने की किसी भी सम्भावना को सिरे से खारिज कर दिया जब विवाद बढ़ने लगा तो नेहरू ने दखल देते हुए इस पर वोटिंग करवाने का प्रस्ताव दिया जब वोटिंग हुई तो मामला तस्वीरो को बनाये रखने के पक्ष में था , हिन्दू भगवान् और पंथ निरपेक्षता को संतुलित करने के लिए यह तय हुआ कि संविधान में लिखे शब्द भारतीय संविधान के अंग हैं न कि उसमें छपे चित्र
इस तरह वोटिंग के बाद भी भगवान् राम आदि के चित्र भारतीय संविधान का हिस्सा बने रहे अगले भाग में नीति निर्देशक तत्व हैं ऐतिहासिक विकास क्रम के अनुसार त्रेता युग के बाद द्वापर युग आता है भगवान कृष्ण को इस चित्र में दर्शाया गया है। कृष्ण के गीता उपदेश की जो तस्वीर सामान्य: हम देखते हैं, उसे ही नंदलाल ने इस भाग में उकेरा है भारतीय संघ नाम के पाचवें भाग में भगवान विष्णु के अवतार भगवान गौतम बुद्ध की जीवन यात्रा से जुड़ा एक दृश्य है महात्मा बुद्ध बीच में बैठे हुए हैं और उनके चारों ओर उनके पांच शिष्य घेरकर बैठे हुए हैं हिरन और बारहसिंहा जैसे जानवरों को भी दर्शाया गया है अगले भाग संघ और उनका राज्य क्षेत्र-1 में भगवान महावीर को समाधि की मुद्रा में दिखाया गया है
आठवें भाग में गुप्तकाल से जुड़ी एक कलाकृति को उकेरा गया है भारतीय इतिहास में गुप्त काल को स्वर्णिम युग की संज्ञा दी जाती है, इसलिए इस चित्र में तत्कालीन भारतीय संस्कृति के हर अंगों को समेटने की कोशिश की गई है नृत्य करती हुई नर्तकियों के चारों ओर राजाओं का घेरा है यह चित्र कलात्मक दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ है
दसवें भाग में गुप्तकालीन नालंदा विश्वविद्यालय की मोहर दिखाई गई है मोहर पर देवनागरी लिपि में नालंदा विश्वविद्यालय लिखा हुआ है 11वें भाग से मध्यकालीन इतिहास की शुरुआत होती है उड़ीसा की मूर्तिकला को दिखाते हुए एक चित्र को इस भाग में जगह दी गई है और बारहवें भाग में नटराज की मूर्ति बनाई गई है , उल्लेखनीय है की नटराज भगवन शिव का ही एक रूप है नृत्य करते हुए भगवान् शिव का रूप जो नटराज के नाम से विख्यात है , इस तस्वीर को संविधान के बारहवे भाग में रखा गया तेरहवें भाग में महाबलिपुरम मंदिर पर उकेरी गई कलाकृतियों को दर्शाया गया है , भगवान् राम , कृष्ण , शिव के बाद इस भाग में भगवान् के शेषनाग रूप को दर्शाया गया है , इसमें भगवान् के शेषनाग के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के चित्र हैं भागीरथी तपस्या और गंगा अवतरण को भी इसी चित्र में दर्शाया गया है। हालांकि कालखंड के हिसाब से यह दृश्य अब तक की श्रृंखला को तोड़ता है। 14वां भाग केंद्र और राज्यों के अधीन सेवाएं इस भाग में मुगल स्थापत्य कला को जगह दी गई है मूल संविधान में 15वां भाग चुनाव है। इस भाग में गुरु गोविंद सिंह और शिवाजी को दिखाया गया है। पहली बार दो अलग-अलग चित्रों को जोड़कर एक चित्र बनाया गया है।


16वें भाग से ब्रिटिश काल शुरू होता है। टीपू सुल्तान और महारानी लक्ष्मी बाई को बरतानिया सरकार से लोहा लेते हुए दिखाया गया है
17वें भाग जो कि मूल संविधान में आधिकारिक भाषाओं का खंड है, में गांधी जी की दांडी यात्रा को दिखाया गया है। अगले भाग में महात्मा गांधी की नोआखली यात्रा से जुड़ा चित्र है सांप्रदायिक सद्भावना का प्रतिनिधित्व करते इस चित्र में गांधी जी के साथ दीन बंधु एंड्रयूज भी हैं

ये चित्र ख़ास इसलिए है क्योकि इसमें एक हिंदू महिला गांधी जी को तिलक लगा रही है और कुछ मुस्लिम पुरुष हाथ जोड़कर खड़े हैं

19वें भाग में नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज का सैल्यूट ले रहे हैं चित्र में अंग्रेजी भाषा में लिखा हुआ है कि इस पवित्र युद्ध में हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आवश्यकता हमेशा रहेगी
20वें भाग में हिमालय के उत्तंग शिखरों को दिखाया गया है। हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयंप्रभा समुजज्वला स्वतंत्रता पुकारती, अम‌र्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ हैं- बढ़े चलो, बढ़े चलो
ऐसे ही मनोभावों की व्याख्या करता यह चित्र भारतीय संस्कृति और सभ्यता की ऊंचाई का प्रतिबिंबन है। अगले भाग में रेगिस्तान का चित्रण है। दूर तक फैले रेगिस्तान के बीच ऊटों काफिला वास्तव में इस चित्र का उद्देश्य हमारी प्राकृतिक विविधता को दर्शाना है
अंतिम भाग में समुद्र का चित्र है एक समय था, जब भारत बर्मा, इंडोनेशिया, मलय जैसे दीपों पर अपना अधिकार रखता है। चित्र में एक विशालकाय पानी का जहाज है, जो हमारे गौरवशाली सामुद्रिक विस्तार और हमारी यात्राओं का प्रतीक है

इन चित्रो से सजा हुई भारतीय संविधान की मूल प्रति को लेकर बाबा साहब संसद में गए थे और उसी प्रति में से पढ़कर उन्होंने देश को भारतीय संविधान से अवगत कराया
अपनी सामर्थ्यनुसार आंबेडकर ने यथा सम्भव संविधान को भारतीय संस्कृति के अनुरूप दिखाया इसके लिए बाबा साहब को मेरी तरफ से लाखो सलाम , वर्ना अगर महात्मा गांधी जैसो की चलती तो इसमें हिन्दू भगवानो को शामिल करना तो दूर है , उल्टा मस्जिद में नमाज पढ़ते नमाजियो की फोटो होती और महात्मा गांधी कहते -- '' देखा , इसे कहते है असली धर्मनिरपेक्षता , ये है भारत का असली संविधान ""

महान हिंदूवादी और अपने समय में अपनी लिमिट के बावजूद हिंदुत्व के लिए परदे के पीछे रहकर निरंतर कार्य करने वाले बाबा साहब नेता अमर रहे संविधान में चित्रित किये गए चित्रो    सभी को ये स्पष्ट होना चाहिए की बाबा साहब एक महान हिंदूवादी नेता थे , लेकिन अगर वो खुलकर हिंदुत्व के पक्ष में आ जाते तो हरिजन लोग उनका साथ छोड़ देते , इसलिए उन्हें परदे के पीछे रहकर हिंदुत्व के लिए काम करना पड़ा , उन्होंने हिन्दू महासभा के साथ मिलकर बड़ी चालाकी से हरिजनो को साधे रखा लेकिन इन सब विषयो पर आगे बात होगी

हाँ तो आंबेडकर के ''फर्जी'' चेलो ,बाबा साहब की तारीफ में दो शब्द नहीं कहना चाहोगे ?


(संविधान में चित्रित किये गए चित्र )
 
















मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

क्या रावण जगद्जननी मां जानकी का हरण कर सकता था ?


बहुत दिन से इस विषयपर लिखने का सोच रहा था, जिसकी कई वजहें थी कुछ मूर्खों और अधर्मियों द्वारा माता सीता के बारे में निंदनीय बात कहना तथा मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के बारे में निराधार बातें कहना...

ये उन मूर्खों के लिए प्रत्युत्तर है.. जिन्होंने रामायण या रामचरित मानस का पठन तो क्या ढंग से रामायण सीरियल भी नहीं देखा और बातें ब्रहम की करते हैं... साथ ही अश्लील बातें करने वाले तथाकथित शांति के धर्म वालों के लिए भी सादर जानकारी है... जिनके लिए सो कॉल्ड खुदा की पुस्तक ही अंतिम सत्य है, बाकी सब मिथ्या ॥

तथा ये जानकारी अपने हिंदु भाइयों के ज्ञानवर्धन के लिए भी सादर प्रस्तुत है....

अब बात करते हैं सिया-हरण की। सीता हरण तो बहुत दूर की बात है, उन जैसी पतिव्रता नारी को छूना तक असम्भव था। उनके सतीत्व में इतना बल था कि अगर कोई भी उनको स्पर्श तक करता तो तत्काल भस्म हो जाता। रावण ने जिनका हरण किया वो वास्तविक माता सीता ना होकर उनकी प्रतिकृति छाया मात्र थी। इसके पीछे एक गूढ रहस्य है, जिसका महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण व गोस्वामी तुलसी कृत रामचरित मानस में स्पष्ट वर्णन है...

पंचवटी पर निवास के समय जब श्री लक्ष्मण वन में लकडी लेने गये थे तो प्रभु श्री राम ने माता जानकी से कहा-

"तब तक करो अग्नि में वासा।
जब तक करुं निशाचर नाशा॥"

प्रभु जानते थे कि रावण अब आने वाला है, इसलिए उन्होंने कहा- हे सीते अब वक्त आ गया है, तुम एक वर्ष तक अग्नि में निवास करो, तब तक मैं इस राक्षसों का संहार करता हूँ..

यह रहस्य स्वयं लक्ष्मण भी नहीं जानते थे..

"लक्ष्मनहु ये मरम न जाना।
जो कछु चरित रचा भगवाना॥"

इसीलिए रावण वध के पश्चात जब श्री राम ने लक्ष्मन से अग्नि प्रज्वलित करने के लिए कहा कि सीता अग्नि पार करके ही मेरे पास आयेंगी.. तो सुमित्रानंदन क्रोधित हो गये कि भइया आप मेरी माता समान भाभी पर संदेह कर र्हे हैं.. मैं ऐसा नहीं होने दुंगा.. तब राम ने लक्ष्मण को सारा रहस्य बताया और कहा हे लक्ष्मण सीता और राम तो एक ही हैं.. सीता पर संदेह का अर्थ है मैं स्वयं पर संदेह कर रहा हूँ... और छायारुपी सीता की बात बताई और कहा कि रावण वास्तविक सीता को अगर छू भी लेता तो तत्काल भस्म हो जाता...
इसके बाद स्वयं माता जानकी ने लक्ष्मण से कहा...

"लक्ष्मन हो तुम धर्म के नेगी।
पावक प्रगट करो तुम वेगी॥"

हे लक्ष्मण अगर तुमने धर्म का पालन किया है तो शीघ्रता से अग्नि उत्पन्न करो... उसके बाद छायारुप मां जानकी अग्नि में प्रविष्ट हो गई और वास्तविक सीता मां श्री राम के पास आ गई..॥

वैसे तो उपरोक्त वृतांत रामचरितमानस की चौपाइयों को आधार बनाकर मैंने वर्णन किया है, फिर भी बहुत से ज्ञानी या कहूं मतिमूढ, नकली(छायारुप) सीता वाली बात पर विश्वास नहीं करेंगे... उनके लिए कुछ तथ्य व प्रमाण नीचे सादर प्रस्तुत हैं...


आधुनिक विज्ञान ने ज़ेरोक्स (Xerox) मशीने बनायीं। एक पेपर मशीन में डालो और उसकी जितनी चाहो ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) निकाल लो। आधुनिक विज्ञान ने बॉयलर, कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर जैसी सुविधाजनक तकनीकों को भी आयाम दिया। बॉयलर में ठोस बर्फ डालो और उसे चुटकियों में भाप में बदल दो। इसी तरह भाप को कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर की मदद से वापिस बर्फ में भी बदला जा सकता है।

परन्तु क्या विज्ञानी कोई ऐसी तकनीक बना पाए हैं, जिससे पलक झपकते ही अपनी देह, एक मानव शरीर की ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) बनायी जा सकें? क्या आज की उन्नत लैबोरेटि्यों (प्रयोगशालाओं) में कोई ऐसी तकनीक विकसित हुई है, जिससे अपनी साकार देह को भाप और फिर उसी भाप को ठोस आकार देकर साकार बनाया जा सके? निःसंदेह, वर्तमान वैज्ञानिकों के लिए ये अभी एक परी-कथा ही है। बहुत संभव है कि आपको भी ये बातें कल्पना-जगत की बेलगाम दौड़ लगे।

परन्तु वास्तविकता बिल्कुल अनूठी और विराट है! वास्तव में, एक क्षेत्र ऐसा है जिसके शीश पर इन परमोन्नत तकनीकों के आविष्कारों का सेहरा बंधा है। यह क्षेत्र है- अध्यात्म ज्ञान अथवा वैदिक विज्ञान का! अध्यात्म- पोषित हमारे संत-सत्गुरु और प्राचीन कालीन ऋषिगण इन विलक्षण तकनीकों के कुशल आविष्कारक एवं अनुभवी रहे हैं। वे अपनी देह को इच्छानुसार अदृश्य और प्रकट- वह भी मनचाही गिनती में कई स्थानों पर एक साथ करते रहे हैं।

त्रेताकाल के एक बहु-चर्चित देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का प्रसंग इसका उदाहरण है, वर्णानानुसार देवी-सीता के लंका से लौटने पर श्री राम ने उन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार नहीं किया। रूखे वचन कहकर उन्हें अपनी चारित्रिक विशुधता प्रमाणित करने को कहा। देवी सीता ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रचण्ड अग्नि से गुज़रकर ‘अग्नि परीक्षा’ दी। यह ऐतिहासिक दृष्टांत विद्वानों, समाजवादियों, खासकर तथा-कथित नारी-संरक्षकों के लिए सदा से विवाद का विषय रहा है। वे इसे नारी की अस्मिता के प्रति घोर अन्याय मानते आए हैं।

परन्तु ऐसा केवल इसलिए है, क्यूँकि वे इस परीक्षा के तल में छिपे वैज्ञानिक सत्य को नहीं जानते। दरअसल यह लीला एक अनुपम विज्ञान था। इसकी भूमि सीता हरण से पहले ही रची जा चुकी थी।

अध्यात्म रामायाण (अरण्य काण्ड, सप्तम सर्ग) में स्पष्ट रूप से वर्णित है-
अथ रामः अपि ---- शुभे

अर्थात:- रावण के षड़यंत्र को समझ, प्रभु श्री राम देवी सीता से एकांत में कहते हैं- ‘है शुभे! मैं जो कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। रावण तुम्हारे पास भिक्षु रूप में आएगा। अतः तुम अपने समान आकृति वाली प्रतिबिम्ब देह कुटी में छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाओ। एक वर्ष तक वहीं अदृश्य रूप में सुरक्षित वास करो। रावण वध के पश्चात्त तुम मुझे अपने पूर्ववत स्वरुप में पा लोगी।’ आगे (अरण्य काण्ड २३/२) में लिखा है कि प्रभु का यह सुझाव पाकर श्री सीता जी अग्नि में अदृश्य हो गयी व अपनी छायामुर्ति कुटी में पीछे छोड़ गयीं-
जबही राम ---------- सुबिनीता

माँ सीता के इस वास्तविक स्वरुप को पुनः प्राप्त करने के लिए ही अग्नि-परीक्षा हुई थी। सो, यही अग्नि-परीक्षा के पीछे की सच्ची वास्तविकता है।


परन्तु आज का बौधिक व युवा वर्ग इसे एक अलंकारिक अतिशयोक्ति या जादुई चमत्कार मान बैठता है। किन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। दार्शनिक स्पिनोजा कहतें हैं ' Nothing happens in nature which is in contradiction with its Universal laws'. डॉ. हर्नाक कहते है 'जिन्हें हम चमत्कार समझते हैं, वे घटनाएँ भी इस सृष्टि और काल के व्यापक नियमों के आधीन हैं। हाँ, यह बात अलग है कि हम उन उच्च कोटि के नियमों को नहीं जानते हों।'


ऋषि पातंजलि इस प्रतिबिम्ब शरीर को निर्माण देह, बोध शास्त्र निर्माण काया कहते हैं। ‘ एकोअहं बहुस्याम’ की ताल पर श्री कृष्ण का रासलीला के अंतर्गत अनेक स्वरूपों में प्रकट होना; कौशल्यानंदन का शयनकक्ष व रसोईघर में एक समय में ही विद्यमान होना- ये सभी योगविज्ञान के साधारण से प्रयोग हैं। विपत्ति काल में सत्गुरु अपने दीक्षित शिष्यों की पुकार पर वे एक ही समय में विश्व के अनेकों भागों में समान रूप, रंग, गुण, कौशल व अभेद देह में प्रकट होते रहे हैं और अपना विरद निभाने के लिए आगे भी यूँ ही प्रकट होते रहेंगे।


किस प्रकार यह प्रकटिकरण होता है? दरअसल, इस सृष्टि में जीव, वस्तु या किसी भी प्रकार की सत्ता के निर्माण में दो अनादी तत्त्वों का मेल चाहिए होता है।

उपादान तत्त्व- यह प्रकृति का सूक्ष्म जड़ तत्त्व है। इसके स्थूल रूप को विज्ञान ‘मैटर’ कहता है। यह तत्त्व त्रिगुण (सत्त्व, रजस, तमस) से युक्त होता है। यह एक तरह से सृष्टि की प्रत्येक सत्ता का raw material माना जाता है।

निमित्त तत्त्व- यह एक चैतन्य शक्ति है, जो चेतना के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि व उसके कण-कण में समाई हुई है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली में 'cosmic conciousness' भी कहा गया है।

इन दोनों तत्वों के परस्पर संयोग से ही ‘निर्माण’ सधता है। किस प्रकार? आईये, इसके लिए हम एक सरसरी दृष्टि 'Creation of Universe' पर डालें, जहाँ ये दोनों तत्त्व अपने शुद्धतम रूप में प्रकट थे और ‘सृष्टि निर्माण’ में विशुद्ध भूमिका निभा रहे थे।
उपादान( Matter ) + निमित्त ( Conciousness ) = सृष्टि (Universe)

दरअसल इस देह रचना में भी ठीक ‘सृष्टि रचना’ का ही विज्ञान काम करता है। वही दो अनादी तत्वों का प्रयोग होता है-ब्रह्मचेतना तथा प्रकृति के उपादान तत्त्व। यूँ तो चेतना प्रत्येक मनुष्य में क्रियाशील रहती है। परन्तु यह प्रगाढ़ वासनाओं, करम- संस्कारों, अविद्या, अज्ञानता से ढ़की और दबी रहती है। अध्यात्म-ज्ञान या ब्रह्मज्ञान की साधना से ये समस्त आवरण दूर होते हैं व चेतना शुद्धतम प्रखर रूप में प्रकट होती है।


पूर्ण आध्यात्मिक विभूतियों ने चेतना के इसी ब्रह्ममय स्वरुप को पाया हुआ होता है। जब भी आवश्यक होता है, ये पूर्ण चैतन्य विभूतियाँ अपनी ब्रह्ममयी चेतना को प्रकृति के उपादान-तत्त्वों पर आरूढ़ करती हैं। उनकी यह चेतना प्रकृति के परमाणुओं पर लगाम कसती है ओर उनमें विक्षोभ पैदा कर देती है। फिर अपनी इच्छानुसार परमाणुओं में आकर्षण- विकर्षन कर स्वयं अपनी आकृति की देह निर्मित्त कर लेती हैं। वह भी मनचाही संख्या में!! अंततः इस ‘निर्माण देह’ में ‘निर्माण चित्त’ को भी प्रवेश कराके उसे पूर्ण रूप से सजीव कर देती हैं।

देवी सीता के विषय में भी ठीक यही अनादी विज्ञान प्रयोग में लाया गया था। सीता स्वयं में साक्षात चेतना-स्वरूपिणी माँ भगवती थीं। उनके लिए प्रकृति के जड़- तत्त्वों से छेड़छाड़ करके एक प्रतिबिम्ब देह निर्मित कर्म दर्पण देखने के समान सहज था।

परन्तु उनके सन्दर्भ को पूरी तरह प्रकाशित करने के लिए हमें एक तथ्य और जानना होगा। वह यह की वेदों में आदिकालीन ब्रह्म-चेतना को ‘वैश्वानर अग्नि’ भी कहा गया है। ब्रह्मसूत्र में इस अग्नि के विषय में यह बताया गया की यह अग्नि न तो कोई दैविक अग्नि है, न ही भौतिक है। यह निःसंदेह आदिकाल की ब्रह्म-अग्नि ही है।

ऋगवेद में कहा गया है (१-५८-१)-
जब यह अग्नि प्रकट होती है, तो अंतरिक्ष में फैल जाती है। यह प्रकृति के परमाणुओं को सही मार्गों पर ले चलती है और उनका निर्माण कार्य में प्रयोग करती है।

यहीं नहीं ऋग्वेद में एक अन्य ऋषि का कहना है –
केवल प्रकृति के कण-कण में ही नहीं, यह अग्नि मनुष्य के अंग-अंग में भी विद्यमान होती है। परन्तु ध्यान दें, यह अग्नि विद्यमान तो सब में होती है। लेकिन विशुद्ध रूप से प्रकट केवल विकसित आत्माओं में ही होती है-
(ऋग्वेद १-१-२)
यह अग्नि पूर्व (कल्प) के ऋषियों को ज्ञात थी। इस युग के ऋषियों को भी ज्ञात है। यह सभी दैव-स्वरुप आत्माओं को ज्ञात होती है।
अब इन समस्त जानकारियों को साथ लेकर हम सीता-अग्नि-परीक्षा के प्रसंग का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं।

देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण :

ऋग्वेद (१-५८-२ ) में वैश्वानर अग्नि की त्रि-स्तरीय भूमिका दर्शायी गई है।

वैश्वानर अग्नि शाश्वत चेतना है । यह प्रकृति के परमाणुओं को -
1. Integrate - संयुक्त करती है।
2. Disintegrate- पृथक भी करती है ।
3. Preserve- सुरक्षित भी रखती है।
यह तीनों वही भूमिकाएँ हैं, जो सृष्टि-निर्माण-कार्य में ब्रह्म-चेतना की थीं। और यही वे वैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जो सीता-अग्नि-परीक्षा में भी प्रयोग की गईं। सीता-हरण से पूर्व जब श्री राम ने देवी सीता को अपना प्रतिबिम्ब पीछे छोड़कर अग्नि में निवास करने को कहा , तो वास्तव में क्या हुआ? क्या वैज्ञानिक-लीला घटी ? सीता ने तत्क्षण अग्नि प्रकट की। कदाचित यह कोई लौकिक अग्नि नहीं, वैश्वानर अग्नि ही थी। अर्थात सीता ने अपनी ब्रह्म चेतना को सक्रिय किया। फिर उसके द्वारा प्रकृति के परमाणुओं में हस्तक्षेप किया। उन्हें प्रयोजनानुसार जोड़कर एक अन्य निज-देह प्रकट कर ली। यह पहली वैज्ञानिक क्रिया थी।

इसके पश्चात माँ सीता ने ब्रह्म-चेतना या वैश्वानर अग्नि के द्वारा अपनी वास्तविक देह के परमाणुओं को अलग-अलग कर दिया। प्रसंग के अनुसार माँ सीता कि वास्तविक देह अग्नि में विलीन हो गयी थी। अग्नि में यह विलीनता वैज्ञानिक स्तर पर वैश्वानर अग्नि द्वारा देह का उपादान तत्व में बिखर जाना अर्थात 'disintegration of body' ही था। यह दूसरी वैज्ञानिक क्रिया थी।

फिर ये पृथक तत्त्व या परमाणु एक वर्ष तक उनकी वैश्वानर अग्नि के संरक्षण में रहे। उसी वैश्वानर अग्नि अथवा ब्रह्म-चेतना के, जो सकल सृष्टि के परमाणुओं की रक्षा करती है व जिसका आह्वान कर ऋषियों ने कहा- (ऋग्वेद १-१-१) - हे अग्नि स्वरूप ब्रह्म-चेतना! पिता स्वरुप में , अपनी संतान की तरह हमारी रक्षा करो। कहने का आशर्य यह है कि सीता सशरीर नहीं, परमाणुओं के रूप में ब्रह्माण्ड की वैश्वानर अग्नि में समाहित रहीं। यह तीसरी वैज्ञानिक प्रक्रिया थी ।

एक वर्ष बाद ... विजय बिगुल बजे और पुनर्मिलन की बेला आई। तब पुनः यहीं विज्ञान दोहराया गया। रामायण (युद्धकाण्ड सर्ग १२/७५ ) के प्रसंगानुसार -

राघव ने एक विशेष कार्य के लिए निर्मित मायावत सीता को देखा और अग्नि-परीक्षा देने को कहा। श्री राम का यह कथन, वास्तव में देवी सीता को पुनः उसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का संधान करने की प्रेरणा ही थी। उस समय प्रतीकात्मक रूप में भौतिक अग्नि जलाई गयी। परन्तु सीता जी का आह्वान तो वैश्वानर अग्नि के प्रति ही था।

(युद्धकाण्ड सर्ग -१३ )- हे सर्वव्यापक! अति पावन! लोक साक्षी अग्नि !...स्पष्ट है, ये संबोधन लौकिक अग्नि के लिए नहीं हो सकते थे। अतः लौकिक अग्नि की आड़ मेंवैश्वानर-अग्नि (ब्रह्मचेतना) पुनः सक्रिय हुई। उसने सीता जी की प्रतिबिम्ब देह के परमाणुओं को बिखेर कर पुनः प्रकृति में मिला दिया। फिर वास्तविक देह के परमाणुओं को एकत्र कर पूर्ववत जोड़ दिया। देवी सीता को सुरक्षित रूप में श्री राम के समक्ष प्रकट किया। यहीं वैज्ञानिक विलास प्रतीकात्मक शैली में इस प्रकार रखा गया- लोक साक्षी भगवन वास्तविक जानकी को पिता के समान गोद में बिठाए हुए प्रकट हुए और रघुनाथ जी से बोले- मेरे पितास्वरूप संरक्षण में सौंपी हुई जानकी को पुनः ग्रहण कीजिये।
वह प्रतिबिंबरुपिणी सीता जिस कार्य के लिए रची गयी थी, उसे पूरा करके पुनः अदृश्य हो गयी है।

यह वचन सुनकर श्री राम ने अत्यंत प्रसन्नता से जानकी जी को स्वीकार कर लिया। उसी क्षण इस विज्ञान के ज्ञाताओं - ब्रह्मा, महेश आदि देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। परन्तु अवैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों ने उस काल से आज तक कभी सीता पर कलंक, तो कभी राम पार आक्षेप लगाए।