शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

!! मध्य प्रदेश विकाश की नई राह पर !!

 
सुप्रभात मित्रो....जय हिन्द जय भारत ..जय जय श्री राम.
दोस्तों मेरे कई राजपूत मित्र हमेसा कहते है की दिग्विजय सिंह राजपूत है ,राहुल सिंह बाघेल उर्फ़ राहुल भैया  (स्वर्गीय अर्जुन सिंह जी के पुत्र ) बर्तमान में MP में बिपक्ष के नेता (२०१३/२०१४ के भावी मुक्यमंत्री) ये दोनों राजपूत नेता है आप इनका समर्थन क्यों नहीं करते है ? शिवराज सिंह चौहान  को क्यों सपोट करते है ओ तो नकली राजपूत है
तो भाई लो सुन लो मेरी खरी खरी बाते मेरे लिए वही मेरा नेता है जो इस देश प्रदेश,मध्यप्रदेश का विकास करे            

   " भारत सरकार के अनुशार मध्यप्रदेश की विकाश दर बड़े राज्यों में अब्बल है ! प्रदेश की सकल घरेलु उत्पाद दर वर्ष 2002 -2003  में
 - 4 .1 % की नकारात्मक वृद्धि दर बढ़कर अब 2012 - 2013 में 10 .02 % हो गई है
मध्यप्रदेश ने बीमारू राज्य से झुजारु राज्य और फिर सुचारू राज्य का सफ़र तय किया है बीजेपी के मात्र 9 वर्ष के शाशन काल में देश का सर्वश्रेस्ट प्रदेश बन गया है  

             जहां पूरे विश्व में आर्थिक मंदी का माहौल बना हुआ है, वहीं मध्य प्रदेश को विकास दर आकर्षक दोहरे अंकों में रहने की उम्मीद है। राज्य ने 2011-12 में स्थिर कीमतों पर विकास दर 11.81 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। राज्य विधानसभा में आज पेश किए गए आर्थिक समीक्षा 2012-13 में कहा गया है कि 2010-11 में विकास दर 7.13 फीसदी थी।

हालांकि राज्य की अर्थव्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान 2004-05 से लगातार गिर रहा है, जो इसकी अर्थव्यवस्था का आधार है। समीक्षा में कहा गया है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान 2011-12 में 27.66 फीसदी से गिरकर 23.45 फीसदी रहा। हालांकि इसमें पिछले साल के 22.45 फीसदी की तुलना में मामूली बढ़ोतरी हुई है
2011-12 के दौरान स्थिर कीमतों  पर विकास दर 19.02 फीसदी अनुमानित है। कृषि क्षेत्र में वर्ष 2007-08 में -2.57 फीसदी और 2010-11 में -1.59 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि मध्य प्रदेश में स्थिर कीमतों (आधार वर्ष 2004-05) पर प्रति व्यक्ति आय 2011-12 (त्वरित अनुमान) में बढ़कर 24,395 रुपये पर पहुंच गई है, जो 2010-11 में 22,091 रुपये थी। इसमें कहा गया है कि इसी तरह चालू कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय 2011-12 के दौरान 37,994 रुपये पर पहुंच गई है, जो 2010-11 में 32,223 रुपये थी।
आर्थिक समीक्षा में द्वितीयक क्षेत्र या विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार में इजाफे का श्रेय केंद्र सरकार की मदद को दिया है। द्वितीयक क्षेत्र की वृद्धि दर 7.30 फीसदी रहने का त्वरित अनुमान लगाया गया है। लघु उद्योगों ने इस क्षेत्र की वृद्धि दर में काफी योगदान दिया है। 
राज्य में करीब 20,105 सूक्ष्म और लघु उद्योगों ने 415.17 करोड़ का निवेश किया है और इससे 46.5 लाख रोजगार के अवसरों का सृजन हुआ है। समीक्षा में कहा गया है, 'वर्ष 2012-13 (दिसंबर तक) में 12,22,000 सूक्ष्म और लघु उद्योगों ने राज्य में निवेश किया है, जिससे 27 लाख 79 हजार रोजगार असवरों का सृजन हुआ है। केंद्र सरकार ने राज्य की मदद के लिए हाथ बढ़ाया और इसके नतीजतन 2008 से 2011 के दौरान राज्य में प्रस्तावित पूंजी निवेश 4,70,071 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।
         
        अब आप ही लोग निर्णय लीजिये की जाति के नेताओं का साथ दू की उसका साथ दू जो देश ,प्रदेश में सभी के लिए बिना भेदभाव के विकास करता है उसका साथ दू ?

http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=69519

http://www.biztechreport.com/story/2289-interview-shri-shivraj-singh-chouhan-chief-minister-madhya-pradesh 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

!! फतवा सब के लिए नहीं होता : इस्लामी विद्वान !!

 बांह पर टैटू है तो नमाज जायज नहीं, मुस्लिम महिला रिसेप्शनिस्ट नहीं हो सकती अथवा मोबाइल फोन में पवित्र कुरान की आयतें अपलोड नहीं की जा सकतीं ये कुछ ऐसे फतवे हैं जिनको लेकर हाल के दिनों में कई सवाल खडे हुए हैं. ! इनमें सबसे बडा सवाल यह कि किसी संस्था या मुफ्ती की ओर से जारी किया गया फतवा क्या सभी मुसलमानों पर लागू होगा ? प्रमुख मुस्लिम विद्वानों की माने तो हर फतवा सभी पर लागू नहीं हो सकता क्योंकि यह संदर्भ और परिस्थिति विशेष पर निर्भर करता है, हालांकि मूल आस्था से जुडे फतवों पर किसी मुसलमान के लिए अमल करना अनिवार्य है.!
      जामिया मिलिया इस्लामिया के इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रमुख   प्रोफेसर अख्तरुल वासे का कहना है कि ज्यादातर फतवों के साथ परिस्थिति और संदर्भ जुडा होता है और ऐसे में वह सब पर लागू नहीं हो सकते. वासे ने कहा, ‘‘सभी फतवे सब पर लागू नहीं हो सकते. फतवा किसी सवाल का जवाब होता है. ऐसे में महत्वपूर्ण बात यह है कि सवाल किस परिस्थिति और संदर्भ में पूछा गया है. उदाहरण के तौर पर मुस्लिम महिला के रिसेप्शनिस्ट होने से जुडा फतवा सब पर लागू नहीं हो सकता.’’ देश की प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्था ‘दारुल उलूम देवबंद’ के फतवा विभाग ‘दारुल इफ्ता’ की ओर से हाल ही में दिये गये कई फतवों की खासी चर्चा रही. मसलन, उसने कहा कि बांह पर टैटू होने और अल्कोहल युक्त परफ्यूम का इस्तेमाल करके नमाज अदा नहीं की जा सकती. इसके साथ ही उसने महिलाओं के रिसेप्शनिस्ट होने अथवा मोबाइल फोन में कुरान की आयतें डाउनलोड करने के खिलाफ भी फतवा दिया. दारुल उलूम की तरह सुन्नी मुसलमानों की एक अन्य संस्था बरेली मरकज भी कई बार ऐसे फतवे देता रहा है. कुछ महीने पहले उसने फतवा दिया था कि इस्लाम में कृत्रिम गर्भाधान (आर्टिफीशियल इंसेमीनिशन) नाजायज है.
इस्लामी मसलों पर कई अंतरराष्ट्रीय शोधों से जुडे रहे प्रोफेसर जुनैद हारिस का कहना है, ‘‘यह स्पष्ट रुप से जान लेने की जरुरत है कि फतवा खुदा का हुक्म नहीं है. यह कुरान और हदीस नहीं है जो पूरी तरह सही हो. अगर कोई फतवा अटपटा लगता है तो उसके के बारे में किसी और विद्वान से पता किया जा सकता है. एक फतवा सभी पर लागू नहीं हो सकता.’’
उन्होंने कहा, ‘‘वक्त के साथ बहुत सारी चीजें बदली हैं. जरुरी नहीं है कि आज के दौर की हर चीज के बारे में कुरान या हदीस में जिक्र किया गया हो. ऐसे में कोई भी विद्वान कुरान और हदीस की रोशनी में किसी मामले पर अपनी राय देता है तो यह जरुरी नहीं है कि उसकी राय हमेशा सही हो.’’
दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद का कहना है, ‘‘फतवे को कोई आदेश या फरमान नहीं मानिए. यह इस्लामी नजरिए की बात है जिस पर लोग अमल करते हैं. वैसे हर मुसलमान का फर्ज है कि वह शरिया के मुताबिक कही गई बातों पर अमल करे.’’ मुस्लिम महिलाओं के रिसेप्शनिस्ट नहीं होने से जुडे फतवे के बारे में प्रोफेसर वासे कहते हैं, ‘‘इस्लाम सभी पुरुषों और महिलाओं को मान-मर्यादा में रहकर कोई काम करने की इजाजत देता है. ऐसे में इस तरह के फतवे का कोई मतलब नहीं है.’’
        फतवे के संदर्भ में शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद का कहना है, ‘‘अगर किसी इंसान को किसी मामले पर धार्मिक सलाह लेनी होती है तो वह मुफ्ती के पास जाता है. मुफ्ती उसे जो सलाह देता है, वही फतवा है. ज्यादातर लोग फतवों पर पूरी तरह अमल करते हैं.’’एक सवाल यह भी कि क्या किसी फतवे को अमल करना धार्मिक रुप से अनिवार्य है तो वासे ने कहा, ‘‘जब फतवा मूल आस्था से जुडा हो तो उसे मानना अनिवार्य है, लेकिन अगर फतवा कोई जानकारी विशेष हासिल करने के लिए मांगा गया है तो इसमें अनिवार्यता का महत्व नहीं रह जाता है.’’
अगर कोई मूल आस्था से जुडे फतवों पर अमल नहीं करता है तो जानकारों का कहना है कि इस्लाम के अनुसार वह गुनाह करता है.
दारुल उलूम की ओर से रोजाना 30-40 फतवे दिए जाते हैं. ये फतवे ऑनलाइन भी दिए जाते हैं. इसी तरह बरेली मरकज भी ऑनलाइन फतवा देता है. अन्य स्थानों पर मुफ्ती अपने स्तर से लोगों को फतवा देते हैं.

इन इस्लामी संस्थानों का कहना है कि फतवों को गलत संदर्भ में पेश किया जाता है. बरेली मरकज के मुख्य मुफ्ती कफील अहमद ने कहा, ‘‘हम लोग फतवा इस्लाम और हदीस की रोशनी में देते हैं. हमें कोई फर्क नहीं पडता कि मीडिया क्या कह रहा है. चटपटी खबरों के तौर पर इसे पेश किया जाता है. लोगों को सही रास्ता बताना हमारी जिम्मेदारी है और हम वही कर रहे हैं.’’