गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

।। वासना - रावण के द्वारा सीता का हरण है और प्रेम - गोपियों का कृष्ण के प्रति समर्पण है।।



ये प्रेम है 
 आम तौर पर वासना का तात्पर्य इच्छासमझा जाता है। इच्छा किसी भी रुप मे व्यक्त हो सकती है। अतः वासनाशब्द का प्रयोग हम किसी भी प्रकार की इच्छा के लिए कर सकते हैं। ज्ञान मंडल, बनारस द्वारा प्रकाशित बृहत हिन्दी कोश मे वासना शब्द का अन्य अर्थों के साथ एक अर्थ इच्छा भी दिया गया है। अन्य अर्थों मे कामना, भ्रम आदि अर्थ भी शामिल है। यहां हम जिस अर्थ मे वासना की चर्चा कर रहे हैं वह साधारण अर्थ मे नही बल्कि एक विशेष इच्छा यानि सेक्सके संदर्भ मे है। आज कल कम्युटर के फेस बुक पर युवक युवतियों के बीच दोस्ती का जो सम्पर्क स्थापित होता है वह इसी वासना से प्रेरित होता है। काफी संदेशों के आदान प्रदान के पश्चात यह इच्छा धीरे धीरे कितनी बलवत्ति हो उठती है यह जानने के लिए एक अवलोकन (ऑबजरवेशन) पर गौर करें। एक गृहस्थ अपनी गाय, बकरी, भैंस अथवा अन्य पालतु पशुओं को सुबह चरने के लिए खोलता है तो शाम को ये पशु अपने आप घर लौट आते ङैं। तीन चार साल तक लगातार एक गृहस्थ की गुहाल मे रह लेने के बाद यदि इनको किसी दूसरे के हाथ बेचा जाये तो ये पशु अपनी पहली गुहाल को आसानी से नहीं भुला पाते। खरीददार की गुहाल से छुटने के बाद काफी दिनों तक ये पशु बार बार लौट कर चले आते हैं। यदि इनके साथ ज्यादती न की जाये यानि बल पूर्वक बांध कर न रखा जाये तो लौट कर आने का सिलसिला बना ही रहता है। बेटियों को परिवार मे विशेष लाड प्यार और स्नेह के साथ पाला पौषा और पढ़ाया लिखाया जाता है और यह सोच कर कि बेटियां पराया धन होती हैं परिवार मे इनको कोई डांटता डपता भी नहीं। अपने भाइयों के साथ किसी बात को लेकर उलझने से मां बाप बेटियों का पक्ष लेकर बेटों को ही डांटते हैं बेटियों को नहीं। यही बेटियां फेस बुक पर अनजान युवकों सें इतनी गहरी दोस्ती कर बैठती हैं कि इस दोस्ती को प्रेम का नाम दे कर अपने मां बाप को चिंता और शौक मे डुबा कर घर से निकल आती है। कितना फर्क है सीधे साधे पालतु पशुओं और बेटियों की संवेदनशीलता मे। यह प्रेम नहीं बल्कि वासना प्रेरित या यों कहा जाये काम वासना प्रेरित सामाजिक ब्याधि है। कवि प्रवर गोपाल दास नीरज ने वासना और प्रेम को परिभाषित करते हुए एक जगह लिखा है वासना रावण के द्वारा सीता का हरण है और प्रेम गोपियों का कृष्ण के प्रति समर्पण है।आज के परिवेश और सामाजिक संदर्भ मे वासना और प्रेम को इससे बेहत्तर किसी भी रुप मे परिभाषित नहीं किया जा सकता। संत-महात्माओं और विद्वान लेखकों ने वासना और प्रेम के अन्तर को अपने अपने चिंतन के आधार पर अलग अलग ढ़ंग से स्पष्ट किया है। इनके अनुसार वासना तनाव लाती है, प्रेम विश्वास लाता है। वासना मे मांग है, प्रेम मे अधिकार। वासना एक अँग पर केन्द्रित होती है, प्रेम पूरे अस्तित्व पर। वासना हिंसा की ओर प्रेरित करती है, प्रेम बलिदान की ओर….. इत्यादि।इस तरह यदि गंभीरता पूर्वक विचार करें तो एक तरफ जहां वासना और प्रेम मे बड़ा अँतर है। इस अंतर को वर्तमान पीढ़ी तैयार नहीं। आज के युग मे जो युवक युवतियां प्रेम की दुहाई दे कर अपने मां बाप को मानसिक यंत्रणा देते हैं वह काम वासना युक्त प्रेम है। इस प्रकार के प्रेम के मूर्त रुप का दर्शन शाम के समय गुवाहाटी स्थित शील पुखरी वाले बगीचे मे सहज ही मे किया जा सकता है। गोलाघाट मे भी नगरपालिका उद्यान ( स्थानीय विवेकानन्द विद्यालय के सामने) मे कामयुक्त प्रेम का बिल्कुल खुला प्रदर्शन देखा जा सकता है। केवल गुवाहाटी अथवा गोलाघाट ही नही बल्कि हर सार्वजनिक बाग बगीचों मे युवक युवतियों की उपस्थिति का मानो एक ही मकसद रहता है।
ये वासना है

उपरोक्त विचारों का एक दुसरा पक्ष भी है जिसको भी अनदेखा करना उचित नहीं होगा। आज के युग मे वासना के बिना प्रेम सम्भव भी नही है। कृष्ण और गोपियों की बात अलग है। वह युग और कालक्रम अलग था। उनके प्रेम मे सात्विकता थी काम वासना का उसमे कहीं स्थान नहीं था। लेकिन वर्तमान के समाज-तत्ववेताओं की वासना और प्रेम की विचार धारा कुछ अलग है। उनके अनुसार वासना के बिना प्रेम की कोई गति नहीं लेकिन उनकी दृष्टि मे यह वासना काम प्रेरित वासना नहीं। वस्तुनिष्ठ चिंतकों का मानना है कि वासना और प्रेम एक ही अग्नि की दो चिनगारियां है। जब वह चिनगारी शरीर पर पड़ती है और केवल शरीर को ही जलाती है, मन को आलोकित नहीं करती तब वह वासना कहलाती है। यह रुपाकार्षण मात्र ही है जिसे अंग्रेजी मे लष्टकह सकते हैं। लेकिन शरीर को ताप देने के साथ साथ जब वह मन को भी ताप और प्रकाश देती तब वह वासना प्रेम बन जाती है। वासना केवल शरीर को लेकर जीती है, लेकिन प्रेम शरीर के साथ साथ हृदय की मांग करता है। दूसरे वासना जातिनिष्ट और प्रेम ब्यक्तिनिष्ट होता है। एक युवक का किसी भी युवती पर अनुरक्त होना वासना है। लेकिन एक युवक का किसी विशिष्ट युवती के प्रति आकर्षण और आकुलता का अनुभव करना प्रेम है। प्रेमी युवक के लिए हर युवती, युवती नहीं होती उसके लिए एक ही युवती, युवती होती है। लेकिन वासनाग्रस्त युवक हर युवती को अपनी प्रेमिका मान लेता है। संक्षेप मे हम यह कह सकते हैं कि वासना काम साधारणीकरण है और प्रेम काम का असाधारीकरण है। वासना को छल कपट का आश्रय लेकर छुपाया जा सकता है लेकिन प्रेम अब्यक्त नहीं रह सकता। इस संदर्भ मे कवि गंग का कहना हैः- सूरजतारो के तेज में चन्द छिपे नहीं
छिपे नहीं बादल छायो
चंचल नार के नैन छिपे नहीं
प्रीत छिपे नहीं पीठ दिखायो
रण पड़े राजपूत छिपे नहीं
दाता छिपे नहीं मंगन आयो
कवि गंग कहे सुनो शाह अकबर
कर्म छिपे नहीं भभूत लगायो।“ (गंगगगगग गंग पदावली)
अफसोस तो यह है कि फेसबुक पर विचरण करने वाले तथाकथित प्रेमी वासना और प्रेम दोनो की गहराइयों को नहीं समझते। यह एक ऐसी सामाजिक ब्याधि है जो धीरे धीरे महामारी का रुप धारण करती जा रही है। इससे त्राण पाने के लिए परिवार मे आधायात्मिक वातावरण बनाये रखने की आवश्यकता है।



बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

क्या बाबासाहब ने कभी मायावती जी को आशीर्वाद दिया था ?

गौरतलब है लखनऊ में मायावती की डेढ़ करोड़ रुपये की लागत वाली 24 फीट की मूर्ति प्रतिबिंब स्थल में, वहीं की गैलरी में 47.25 लाख रुपये की लागत से 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, परिवर्तन स्थल में ही 20.25 लाख रुपये की लागत से 12 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, नौ लाख की लागत वाली सात फीट उंची प्रतीमा, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल पर 47 लाख की लागत वाली 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, डॉ. बी आर अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर पौन करोड़ की लागत वाली तीन प्रतिमायें, कानपुर रोड योजना में 47.25 लाख रुपये की लागत से 15 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा लगी हुई हैं. राज्य के अलग-अलग इलाकों में मायावती की मूर्तियों की संख्या हजारों में है. ......
"गलत समझे यह बुद्धिमान गौतम की बसारत को, बलाए-बुत-परस्ती ने किया बर्बाद भारत को".- हफिज जालंधरी. धम्म यानि अनीश्वर, अनात्मा, अनित्य, प्रतीत्य सम्मुत्पाद, सम्यक अष्टांगिक मार्ग और जनतंत्र है, यही बुद्ध की देशना है.

बाबासाहब आम्बेडकर ने इन्ही बिचारों के रास्ते को आगे जानेवाला कल्याणकारी रास्ता समझा. इसमें कही पर बुत=पुतले का उल्लेख नहीं है. पुतले बनाकर उनकी पूजा सुरु करने की बात नहीं है. अब अगर पुतले बनाए गए है तो कल उन्हें पूजनेवाले मिलेंगे. क्या पूजापाठ से भुख मिट जायेगी? क्या इसे बुद्ध का कल्याणकारी मार्ग कहेंगे?

सम्राट अशोक ने बुद्ध की मुर्तिया और बुद्ध उपदेशों के शिलालेख बनवाए थे लेकिन पूजने के लिए नहीं. उन्होंने खुद की मुर्तिया बनाने का मोह नहीं किया.वह पुतले पूजने के लिए नहीं थे, यादों के लिए थे. फिर भी लोगों ने उन्हें पूजना सुरु किया.उसका क्या फायदा हुआ? सद्दाम हुसैन और गद्दाफी ...नामक तानाशाह ने अपने पुतले बनवाए थे, क्या अब वे है?

क्या बाबासाहब ने कभी मायावती को आशीर्वाद दिया था? बाबासाहब ने कभी भी मायावती के तानाशाही का समर्थन नहीं किया था, मगर तानाशाह मायावती के सर पर आशीर्वाद देनेवाला बाबासाहब आम्बेडकर का पुतला क्यों बनवाया गया? क्या आशीर्वाद देनेवाले बाबासाहब आम्बेडकर के पुतले कही पर देखे गए है? यह तो बाबासाहब को ईश्वर बनाकर उनके विचारों पर ताला लगाने का प्रयास है.

यह बाबासाहब ने बनाए क्रन्तिकारी इतिहास को बदलने का कपटी प्रयास है. कांशीराम और मायावती कोई मिया-बीबी नहीं थे, मगर जोड़ी से ही पुतले क्यों बनवाए? जैसे की सावित्रीबाई-जोतिराव फुले और रमाबाई-बाबासाहब आम्बेडकर के पुतले जोड़ी से इस "दलित स्मारक पार्क" में जोड़ी से है. हफिज जालंधरी के अनुसार पुतले पूजनेवाली परंपरा से बुद्धिमान तथागत बुद्ध के भी विचार लोग भूल गए और भारतीय लोगों को बर्बादी का मुहं देखना पड़ा. वे हमेशा गुलाम बनते गए और उन्हें दूसरों द्वारा लुटा गया.

क्या पूजापाठ से नए जनकल्याणकारी क्रांति की अपेक्षा की जा सकती है? फिर क्यों माने की पुतले बनाने का कार्य बाबासाहब के मिशन का महान कार्य है? सिद्धार्थ पाटिल भी बीएसपी के महान कार्यकर्ता है तो उनका भी एक पुतला उस दलित पार्क में क्यों नहीं बनवाया? क्या बुद्ध-आम्बेडकर मूर्ति पूजक थे? लोगों के पेट की फिकिर नहीं, महंगाई से निपटने की फिकिर नहीं और पुतले बनवाने और उन्हें पुजवाने की जरुरत आ गिरी. मेरे नजरों में यह बाबासाहब आम्बेडकर के मिशन का कार्य कदापि नहीं हो सकता, यह सिर्फ तानाशाह कांशीराम के मनुवादी मिशन का कार्य है..........