शनिवार, 12 मई 2018

हमारा गौरवशाली इतिहास

कठों के भीषण प्रतिरोध और यौधेयों की भीषण युयुत्सु वृत्ति के किस्सों को सुन सुनकर यूनानी सैन्य घबरा उठा । उन्होंने अभी अभी कठों की दुर्द्धष प्रवृत्ति को झेला था और उन्हें बताया गया कि यौधेय कठों से भी भीषण योद्धा हैं । उनकी हिम्मत जवाब दे गई और व्यास के किनारे उन्होंने खुला विद्रोह कर दिया ।
सिकंदर के सामने वापस लौटने के अलावा कोई चारा नहीं बचा पर यहां भी उसके सामने एक समस्या खड़ी हो चुकी थी ।
उसके आक्रमण के मार्ग में आई कई जातियाँ विद्रोह करने लगीं थीं जिनका नेतृत्व कर रहा था एक युवक चंद्रगुप्त मौर्य । पर इस विद्रोह का वास्तविक शिल्पकार था तक्षशिला का एक ब्राह्मण, एक शिक्षक का जो इतिहास में आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य के नाम से भारत का एक नया इतिहास लिखने वाला था ।
सिकंदर को पुरु पर विश्वास नहीं रहा और वो सत्य भी था क्योंकि सिकंदर की अधीनता स्वीकार करने वाले राजाओं व गणों का सम्मान जनसामान्य की नजरों में गिर गया था इसलिये लज्जा, ग्लानि और जनदवाब के कारण वे अपनी दासता के जुए को उतार फैंकना चाहते थे । पुरु की आंखें भी खुल चुकी थीं और संभवतः वह भी चंद्रगुप्त को गुप्त सहायता प्रदान कर रहा था ।
अत्यधिक सावधान सिकंदर इस बात को समझ चुका था इसलिये उसने भिन्न रास्ते से प्रत्यावर्तन का फैसला किया परंतु सिकंदर और यूनानियों का दुर्भाग्य ...
यहां उसका सामना हुआ एक और भयंकर युयुत्सु जाति से जो रावी और चेनाब के दोआब में बसी हुई थी । यह जाति आगे जाकर भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी और इस गणक्षत्रिय जाति का नाम था -----
********** #मालव ********
जिन्हें यूनानियों ने कहा #मल्लोई
कठ अगर अपने सौंदर्यबोध जैसे लंबाई , गौर वर्ण और नील नेत्रों के लिये प्रसिद्ध थे तो मालव प्रसिद्ध थे अपनी कठोर और भव्य मल्ल शारीरिक संरचना के लिये ।
कौन थे ये मालव ?
इन्हें मालव क्यों कहा जाता था ??
इनकी उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ ???
इतिहासकारों ने इस विषय में मौन साध रखा है क्योंकि उनके लिये इतिहास के मानक और स्रोत पश्चिम की अवधारणाओं से अभिप्रेरित रहे है और इसीलिये पुराण, रामायण, महाभारत आदि स्रोतों से इतिहास की खोई कड़ियों को जोड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पाते । मालवों का यशस्वी इतिहास भी इसीलिये चार लाइनों में समेट दिया जाता है ।
वास्तव में मालवों का इतिहास रामायण युग से प्रारंभ होता है जब प्रथम बार उनका उल्लेख सुग्रीव द्वारा पूर्व दिशा में खोजी दल के नायक के समक्ष उनकी स्थिति काशी , कोशल जैसे पूर्वी भारतीय जनपदों के साथ #मल्लों के रूप में वर्णित किया गया ।
जब श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य का पुनर्गठन प्रारंभ किया तो मल्लों की इस भूमि में कारूपथ नामक नगर या कहें सैन्यकेन्द्र स्थापित कर लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु को नियुक्त किया ।
मल्ल विद्या में आसक्ति या मत्स्यवेध में कुशलता या मल्ल जनों के बीच लोकप्रियता के कारण लक्ष्मण के इस पुत्र को #मल्ल की उपाधि भी प्राप्त थी ।
बाद में श्रीराम ने पंजाब में कारूपथ के नाम से ही एक और सैन्यकेंद्र स्थापित किया जिसे कालिदास ने #कारापथ नाम से वर्णित किया । लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु 'मल्ल' को ही इस नगर का शासक नियुक्त किया गया और उनके निष्ठावान अनुयायी कहलाये #मालव अर्थात मल्ल से निःसृत ।
मूल शाखा के गण 'मल्ल' नाम से ही पुकारे गये जो बौद्ध काल तक पावा और कुशीनार की दो शाखाओं में बंट गये । राहुल सांकृत्यायन के अनुसार कालांतर में जब इन गणक्षत्रियों में से कुछ ने शुंग काल में वर्णपरिवर्तन किया तो ये कहलाये मलांव वंश के #पांडे ।
अस्तु !
पश्चिमी मल्ल अर्थात मालवों का इतिहास अपेक्षाकृत दुर्धश रहा ।
महाभारत में मालव गणसंघ के सरदारों ने स्वतंत्र रूप से कौरव और पांडव दोंनों ओर से भाग लिया और कौरवों की तरफ से भाग ले रहे एक मालव नरेश इन्द्रवर्मा इतिहास में सिर्फ कुछ क्षणों के लिये चमके और वजह बन गये अपने ही सेनापति द्रोण की मृत्यु की क्योंकि उनके हाथी का नाम था #अश्वत्थामा । शेष घटनाक्रम सभी जानते ही हैं ।
पर अब 326 ई.पू. में उन्हें निभानी थी वह भूमिका जिसके लिये कभी वे पूर्व से आकर उत्तर पश्चिम में बसाये गये थे।
सिकंदर के आगमन ने मालवों के कान खड़े कर दिये । क्षुद्रकों से मतभेद भुला दिये गये और स्थापना हुई 'मालव-क्षुद्रक गणसंघ' की ।
परंतु गृद्धदृष्टि वाला सिकंदर खतरा भांप गया और दोंनों गणों की सेना के सम्मिलित होने से पूर्व ही उसने मालवों पर आक्रमण कर दिया ।
सिकंदर के वेग और रणनीति और गतिशीलता से आश्चर्यचकित परंतु निर्भीक मालव जूझ पड़े । सिकंदर की अप्रतिम अश्वारोहियों की गति कठों के बाद एक बार फिर कुंठित हो गई । एक एक पग बढ़ना भी सिकंदर को भारी पड़ रहा था ।
झुंझुलाये सिकंदर ने घोड़े को एड़ लगाई और मालवों की सबसे सघन पंक्ति में कूद पड़ा ।
एक सनसनाता हुआ मालव शर उसके घुटने में धंस गया और वह घोड़े से नीचे भूमि पर आ रहा ।
सिकंदर का भूमि पर गिरना भारत के इस भाग पर उसकी प्रभुसत्ता के पतन का भी प्रतीक था और उसके स्वप्न व जीवन की समाप्ति का भी ।
सिकंदर जैसे तैसे उठा कि एक मालव के गदा प्रहार ने उसे वापस भूशायी कर दिया । गदाधर मालव सिकंदर के अंगरक्षकों द्वारा वीरगति को प्राप्त हुआ और तभी तीसरा मालव खड्गधर सिकंदर का शीश उतारने को झपट पड़ा ।
सिकंदर की पूरी वाहिनी इसी क्षेत्र में सिमट आई और ना केवल वह खड्गधर खेत रहा बल्कि मालवों का व्यूह भी टूट गया ।
प्रतिशोध से भरे उन्मत्त यूनानी दुर्ग में घुस आये ।
आबाल वृद्ध एकतरफ से काट दिये गये । बलत्कृत और अबलत्कृत स्त्रियों के शवों से कूप भर गये ।
परंतु मालवों को अधीनता स्वीकार नहीं थी । अंततः सिकंदर ने मालवों से सन्धिवार्ता शुरू करनी पड़ी ।
रथों पर सवार 100 सर्वश्रेष्ठ मालव प्रतिनिधियों के व्यक्तित्व की भव्यता से यूनानी चमत्कृत से हो गये ।
सिकंदर ने मालवों पर अपनी एकतरफा विजय की घोषणा को लिपिबद्ध करवा दिया परंतु अधीनता की शर्तें कभी भी घोषित नहीं की गयीं और ना ही कठों की भांति मालवों का विनाश कर सका जो स्पष्ट करता है कि सिकंदर को यहाँ भी कोई निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हुई ।
परंतु मालवों की भी प्रभूत जनहानि हुई और इसीलिये उन्होंने चाणक्य द्वारा नियोजित व चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में अपनी आंतरिक गण स्वतंत्रता की एकमात्र शर्त पर अखिल भारतीय साम्राज्य में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया और सिन्धु तट पर सेल्यूकस के विरुद्ध अभियान में भारतीय प्रतिशोध का हिस्सा भी ।
परंतु मालवों की भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अभी शेष थी ।
सिकंदर के लौट जाने के बाद और मौर्यों साम्राज्य का भाग बन जाने के बावजूद मालवों के संकटों का अंत नहीं हुआ ।
सिकन्दर द्वारा बसाई गई बस्तियों के यूनानी अब भारत के स्थाई निवासी बन चुके थे । वे काफी कुछ हद तक हिंदू संस्कृति को अपना रहे थे और अब हिंद-यूनानी या इंडो-ग्रीक कहलाने लगे थे परंतु उनमें अभी भी राष्ट्रीय पार्थक्य और यूनानी श्रेष्ठता का भाव उपस्थित था और सबसे बुरी बात यह थी कि वे स्वयं को सिकंदर के साम्राज्य और उसके अधूरे स्वप्नों का उत्तराधिकारी समझते थे और भारतीय उनकी इस हेकड़ी को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे ।
जब तक मौर्य साम्राज्य शक्तिशाली रहा वे चुपचाप बैठे रहे और जैसे ही अशोक की अहिंसा और धर्मप्रचार की नीति ने साम्राज्य की सैनिक शक्ति को खोखला किया य्ये ग्रीक बैक्ट्रिया से काबुल घाटी और फिर गांधार से होते हुये आगे बढ़े।
कीमत चुकाई मालवों ने। सिकंदर के समय ही उन्हें शिबियों के साथ अपनी भूमि , घरबार छोड़कर पूर्वी पंजाब में आना पड़ा था जहां उनके गणक्षत्रिय बन्धुओं #यौधेय व#आर्जुनायनों ने उनका सहयोग किया। पंजाब का यह क्षेत्र आज भी उनके नाम पर पंजाब का #मालवा कहलाता है ।
शिबि आगे बढ़कर वर्तमान चित्तौड़ के इलाके में आ बसा जसए उस समय #माध्यमिका कहा जाता था ।
मौर्य सेनायें सम्राट बृहद्रथ और बौद्धों के देशद्रोह के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ थीं । यौधेयों ने अपनी सदैव की नीति के अनुरूप जंगलों व पर्वतों की शरण ली । मालवों ने प्रतिरोध किया परंतु पहले से ही दुर्बल मालव संख्यात्मक रूप से कमजोर थे । वे राजस्थान की ओर अपने गणक्षत्रिय बंधु #शिबियों के क्षेत्र में शरण लेने व सहयोग करने के लिये आगे बढ़े । परन्तु शिबि भी यूनानियों द्वारा पराजित हुये ।
अरुणद् यवन: माध्‍यमिकाम्।‘ (महाभाष्‍य, 3/3, 111)
भारत के सौभाग्य से महर्षि पतंजलि , पुष्यमित्र और उसके पौत्र वसुमित्र राजनीति के क्षितिज पर उभरे जिन्होंने #दिमित्रियस और #मिनांडर की महत्वाकांक्षाओं को सांगल तक सीमित कर दिया ।
मालवों को भी इस अवधि में फलने फूलने का मौका मिला और वे मध्यप्रदेश के उस हिस्से में फैल गये जिसे उनके नाम पर आज कहा जाता है मध्यप्रदेश का #मालवा और उनकी राजधानी बनी अवंतिका जिसे कहा जाने लगा #उज्जयनि और यहाँ पर नियति उनके इतिहास का ही नहीं भारत के इतिहास का सबसे "अमर अध्याय" लिखने वाली थी।
(क्रमशः)
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स्रोत:
1-वाल्मीकि रामायण
2-महाभारत
3-पातंजलि कृत महाभाष्य
4-गार्गी संहिता
5-नियार्कस व पलूटार्क के विवरण
6-बृहत्कथा मंजरी: गुणाढ्य
7-कथा सरित्सागर: सोमदेव
8-श्रेण्य युग : डॉ आर सी मजूमदार
9-प्राचीन भारतीय सिक्के: परमेश्वरी लाल गुप्त
10-प्राचीन भारतीय अभिलेख: परमेश्वरी लाल गुप्त
11-प्राचीन भारत का इतिहास: विमल चंद्र पांडेय
12-राहुल वाङ्गमय
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साभार ....देवेंद्र सिंह सिकरवार जी की फेसबुक पोस्ट .......

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

रामदेव एक पाखंड कथा

रामदेव के जीवन पर बना एक टीवी सीरियल रामदेव एक संघर्ष झूठ का पुलिंदा है जिसमें सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए रामदेव ने न सिर्फ ब्राह्मणों पर निशाना साधा है बल्कि यादवों के कुल को भी कलंकित किया है। रामदेव के गांव में दौरा करके डॉ ईश्वर सिंह यादव ने सच्चाई जानने की कोशिश तो आश्चर्यजनक सत्य सामने आया कि सीरियल में रामदेव सिर्फ झूठ बोल रहे हैं और पाखंड कर रहे हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है।
दिनांक 18 फरवरी 2018 के रोज़ इस षडयंत्र की सत्यता जानने के लिए अहीरवाल के भाईचारे के हिमाती व समाजसेवीयों का एक दल रामदेव की जन्मभूमि व पैतृक गाँव “अली सैदपुर” गया और लोगों से मिल कर सच्चाई जानने हेतु तफ्तीश की। इस दल में आर्य समाज के सन्यासी 88 वर्षीय स्वामी हरीश मुनि जी खवासपुर , प्रख्यात समाजसेवी राधेश्याम गोमला जी, फौजी रामफूल राव जी बास पदम का, नौजवान पियूष अहीर जी बुडीन शामिल थे। जो हैरतअंगेज सच्चाई सामने आई वो आप के समक्ष पेश है —
1. सबसे पहले गाँव का निरिक्षण किया और पाया की गाँव खुशहाल है, हाँ गाँव में खेती-लायक पानी की जरुर कमी है। गाँव अहीरवाल क्षेत्र यानी अहीर बाहुल्य क्षेत्र का हिस्सा है। रामदेव के दादा पूसा जी गाँव में “बोहरा जी” यानी “धनाढ्य” कहलाते थे और उनके बुजुर्ग किसी दौर में गाँव की कुल खेतिहर ज़मीन के करीब चौथाई हिस्से के मालिक थे। यानी रामदेव का परिवार पैतृक रूप से बड़े बिस्वेदार/जमींदार थे और इनके परिवार का बहुत सम्मान था।
2. गाँव में रामदेव के परिवार के ही बुजुर्ग जगदीश आर्य जी ने अपने पिता राव उमराव सिंह जी की याद में एक बहुत ही शानदार धर्मशाला सन 1972 में बनवाई थी जिससे रामदेव के परिवार की खुशहाली का पता चलता है।
3. एक ग्रामीण के मुताबिक किसी दौर में इनका कुटुम्ब इतना बड़ा था कि परिवार में घर के बाहर जूती ही जूतियाँ दिखाई देती थी , यानी इस परिवार के पास बहुत बड़ा संख्या बल था और ऐसे बड़े और धनाढ्य परिवार को गाँव में कोई दबा नहीं सकता।
4. रामदेव ने 8वि कक्षा तक पढाई यहीं रह कर करी और फिर इनके बड़े जगदीश जी आर्य ने इन का दाखिला गुरुकुल खानपुर(अहीरवाल) में करवा दिया जहाँ इनके गुरु थे आचार्य प्रद्युम्न ,जखराना वाले, जो समस्त हिन्द में संस्कृत व्याकरण के सबसे बड़े विद्वान् थे और जाति से राव साहब यानि यादव थे और आचार्य जी आज भी पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में ही रहते हैं i तो इसका मतलब गुरुकुल में भी इन के साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।
5. खानपुर गुरुकुल के बाद रामदेव की शिक्षा कालवा गुरुकुल में हुई जहाँ शिक्षक आचार्य बलदेवजी थे जो कूद एक पिछड़े कृषक समुदाय से आते थे ,इसलिए कालवा गुरुकुल में भी रामदेव पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी।
6. शिक्षा के बाद इन के मुख्य रूप से दो साथी थे, आचार्य बालकृष्ण जो ब्राह्मण है और आज तक इन के साथ हैं ,तथा दुसरे आचार्य कर्मवीर।
7. गाँव में इनके अग्रज देवदत्त जी मिले जो CRPF से रिटायर्ड हैं और इनका मकान गाँव का सबसे आलिशान महलनुमा मकान है और खेती के लिए इनके पास एक ट्यूबवेल भी है , यानि हर तरह से सम्पन्न। जब उनसे चर्चा हुई तो वे बोले कि सीरियल में काफी बातें सत्य से परे हैं।
8. गाँव में कभी एक मंगतू ब्राह्मण का परिवार था जिसकों यहाँ यादवों ने करीब 30 बीघा ज़मीन दान दे कर बसाया था जिसके एक पुत्र हुआ मांगू ब्राह्मण जिसके सिर्फ एक पुत्री थी जिसके पति निरंजनलाल को यहाँ बसाया गया ,जिसकी संतानें आज भी गाँव में हैं और बड़े सरल स्वभाव का परिवार है। ब्राह्मणों में कोई भी “गोरधन महाराज” नाम का व्यक्ति कभी पैदा ही नहीं हुआ ,यानी सारा टीवी सीरियल सिर्फ एक कपोल-गाथा है। कभी जिस ब्राह्मण परिवार को अहीरों ने बसाया हो वो कैसे अपने सहारा देने वालों पर कोई भेदभाव/ज़ुल्म कर सकता है या जो यादवों पर कभी आश्रित रहा हो वो कभी इतनी हिमाकत कर सकता है?
9. गाँव के कई यादव बुजुर्गों जिनकी आयु 80-90 वर्ष रही होगी उनसे मिले , उन्होंने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कृष्ण-लीला/रामलीला आदि का मंचन नहीं हुआ। रामदेव का जन्म तो 1973 में हुआ ,फिर टीवी सीरियल में ये कृष्ण-लीला का मंचन एक कोरा झूठ साबित होती है।
10. गाँव के बुजुर्गों और रामदेव के भाई व् कुटुम्ब के लोगों ने बताया कि रामदेव का परिवार तो इतना सबल था कि किसकी हिम्मत थी कि उनको गाँव से बाहर निकालते ? टीवी सीरियल के इस झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।
11. रामदेव के बड़े भाई देवदत्त ने खुद बताया कि उनको कभी पंचायत के सामने बाँध कर कोई भी किसी तरह की सामाजिक सज़ा नहीं दी गयी और न ही उनके माँ-बाप को।
12. जब हमने रामदेव के बड़े भाई देवदत्त से पूछा कि रामदेव ने टीवी सीरियल में झूठ क्यों दर्शाया तो वो बोले की “बिना तडके वाली दाल” कौन खायेगा ? इसमें “तड़का” नहीं होगा तो फिर कौन देखेगा ? यानी सिर्फ टीवी सीरियल की पब्लिसिटी के लिए झूठ का सहारा लिया जाएगा और यादवों के स्वाभिमान से खिलवाड़ किया गया। गाँव के कुछ लोग ये बोले कि इस सीरियल से गाँव और समाज की बदनामी हुई है और अब कौन यादव हमारे गाँव में अपने बच्चों का रिश्ता करेगा ?
13. गाँव में आज करीब 300 घरों की बस्ती है ,और 40 साल पहले शायद इस से भी कम घर होंगे। बुजुर्गों ने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कोई हाट-बाज़ार नहीं लगा। आज भी बस एक-आध ही छोटी सी कोई दुकान हैं। फिर टीवी सीरियल में ये दिखाया गया कि रामदेव और उनकी माता का दुकानदारों ने कोई सामान देने से इंकार कर दिया और कृष्ण-मुकुट नहीं खरीदने दिया ,ये कौन से युग में हुआ ? इस कोरे झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।
14. आज गाँव में गिनती के ट्यूबवेल हैं और एक रामदेव के बड़े भाई के पास है। अखबार में छपी ये खबर भी गलत साबित हुई कि अगर उनके मटके से पानी ज़मीन पर छलक जाता था तो पहले उस रस्ते को धोया जाता था। खुद उनके भाई और परिवार ने इस झूठ का खंडन किया। जिस गाँव में करीब 80-90 % यादव परिवार हों और खेडा भी यादवों का ही बसाया गया हो ,तो गाँव के सब रास्तों पर यादवों की ही सबसे ज्यादा आवाजाही रहती है ,फिर ऐसा कैसे हो सकता था ? इस झूठ का भी ग्रामीणों ने पर्दाफाश किया।
15. गाँव में ग्रामीणों और इनके कुटम्ब के लोगों से मिलने पर ये सच्चाई ज्ञात हुई —
(i) गाँव में कोई कृष्ण-मूर्ति या मंदिर नहीं है अपितु एक ठाकुरद्वारा हैं जहाँ गाँव की समस्त जातियाँ बड़े प्रेम से पूजा-अर्चना करती हैं।
(ii) गाँव में किसी भी तरह का जातिगत दुर्भावना नहीं है बल्कि सब जातियां बड़ी समरसता से रहती हैं।
(iii) गाँव बिछवालिया गोत्र के राव साहबों का ठिकाना है यहाँ के ब्राह्मण/कुम्हारों/स्वामी आदि जातियों में बहुत भाईचारा है और ब्याह-शादी आदि पर्वों को सब आपस में एक दुसरे के साथ मनाते हैं i यहाँ के यादव सरदार इतने दानवीर हैं कि अभी हाल ही में एक गरीब कुम्हार की बेटी की शादी में समस्त ग्रामीणों ने खूब दान दिया और गाँव की बेटी को बड़े प्रेम और ठाट-बाट से विदा किया। यानी गाँव खुशहाल है और भाईचारे की मिशाल है। ये ही हाल आस-पास के यादवों के गांवों का है क्योंकि ये अहीरवाल यानी अहीर बाहुल्य क्षेत्र का ही हिस्सा है
अहीरवाल पर यादव राजवंश का राज रहा है। सामंत/ज़मींदार भी यादव थे और आज भी ये यादव राजकुल मौजूद है। अहीरवाल क्षेत्र का बहुत ऐतिहासिक क्षत्रिय इतिहास रहा है। यहाँ के लोग देश व राष्ट्र-रक्षा के लिए तैमुर के खिलाफ लड़े, नादिरशाह के खिलाफ लड़े, अंग्रेजों के खिलाफ नसीबपुर में एक बहुत ही बहादुराना लडाई लड़ी। आधुनिक इतिहास में रेजांगला में वीरता की सबसे बड़ी शौर्यगाथा लिखी, हाजीपीर, जैसलमेर मोर्चा, टाइगर हिल आदि हर लडाई में यहाँ के यदुवंशी मौजूद थे। यहाँ घर-घर में फौजी हैं और ये यादवों का पुश्तैनी कार्य भी रहा है। सैद अलीपुर गाँव में भी बहुत फौजी है, खुद रामदेव के परिवार के कप्तान रोहताश सिंह साहब भी सेना में थे। यानी जिस कौम का इतना शानदार जंगी-इतिहास रहा हो उस पर कोई कैसे ज़ुल्म कर सकता है?
इस टीवी सीरियल के ज़रिये अहीरवाल के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की कोशिश है और सिर्फ व्यवसायिक फायदे के लिए विभिन्न वर्गों में विष फ़ैलाने की कोशिश है। रामदेव का परिवार बड़ा बिस्वेदार और धनाढ्य रहा है ,लेकिन झूठी सहानभूति के लिए कपोल-गाथा गढ़ी गयी। जिस परिवार ने गाँव में 1972 में बड़ी धर्मशाला का निर्माण किया, बड़ी ज़मीनों के मालिक हैं वो परिवार कभी तिरस्कार का कैसे भागी रहा होगा ? जिस यादव कौम का शानदार जंगी-इतिहास रहा हो, जिस ने अहीरवाल पर राज़ किया हो वो कैसे इस कपोल-गाथा का हिस्सा हो सकती है?
आज रामदेव के पास इज्ज़त, पैसा,नाम,सम्मान आदि सब कुछ है, फिर ये कैसे झूठा का भागीदार हो गया ? सन्यासी का पहला धर्म है कि सत्य की स्थापना करे और असत्य का खण्डन , फिर ये सन्यास-धर्म से कैसे विमुख हो गया ? खुद को एक अवतार घोषित करने के लोभ में रामदेव ने यादव जैसी मर्द कौम की गरिमा को ही दाँव पर लगा दिया है जिसका हर यदुवंशी को पुरजोर विरोध करना चाहिए।
डॉक्टर ईश्वर सिंह यादव “अजीत”
यादव अस्पताल , रेवाड़ी, हरियाणा