शनिवार, 28 जनवरी 2017

सेकुलर संजय लीला भंसाली क्या इतिहास से सीख लिया है ?

दुष्ट सेक्युलर भाड़ निर्देशिका द्वारा इतिहास को विकृत कर जोधा अकबर नाटक बनाये जाने के बाद अब दूसरे एक और सेक्युलर संजय लीला भंसाली द्वारा मुस्लिम आक्रान्ता अल्लाउदीन खिलजी पर फ़िल्म बनाने की घोषणा की गई है। इस फ़िल्म में भंसाली आक्रान्ता खिलजी द्वारा रानी पद्मावती पर बुरी नियत रखने वाले खिलजी को अथाह प्रेमी के रूप में दिखाने की योजना है। यह प्रयास न केवल खिलजी का प्रतिरोध करने वाले वीर हिन्दू पूर्वजों का अपमान है अपितु इतिहास के सत्य तथ्यों की अनदेखी करना भी है।
खिलजी सुल्तान के कारनामों को ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ पढ़िए-
जब जलालुद्‌दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर चढ़ाई की तो रास्ते में झौन नामक स्थान पर उसने वहाँ के हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया। उनकी खंडित मूर्तियों को जामा मस्जिद, दिल्ली, की सीढ़ियों पर डालने के लिए भेज दिया गया जिससे वह मुसलमानों द्वारा सदैव पददलित होती रहें।(बदायुनी : सीताराम गोयल स्टोरी ऑफ इस्लामिक इम्पीरियलिज्म इन इंडिया में उद्धत, पृ. 46 )
किन्तु इसी जलालुद्‌दीन ने, मलिक छज्जू मुस्लिम विद्रोही को कत्ल करने से, यह कहकर इंकार कर दिया कि 'वह एक मुसलमान का वध करने से अपनी सिहांसन छोड़ना बेहतर समझता है।'(ईलियट एंड डाउसन, खंड-3, पृ. 140) दया और भातृभाव केवल मुसलमानों के लिये है। काफिर के लिये नहीं।(एम. आर. बेग मुस्लिम, डिलेमा इन इंडिया, पृ. 13)
अलाउद्‌दीन खिलजी जो जलालुद्‌दीन का भतीजा और दामाद भी था, और जिसका पालन पोण भी जलालुद्‌दीन ने पुत्रवत किया था, धोखे से, वृद्ध सुल्तान का वध कर दिल्ली की गद्‌दी पर बैठा। हिन्दुओं से लूटे हुए धन को दोनों हाथों से लुटा कर उसने जलालुद्‌दीन के विश्वस्त सरदारों को खरीद लिया अथवा कत्ल कर, दिया। जब उसकी गद्‌दी सुरक्षित हो गई तो उसका काफिरों (हिन्दुओं) के दमन और मूर्तियों को खंडित करने का धार्मिक उन्माद जोर मारने लगा। 1217 ई. में उसने अपने भ्राता मलिक मुइजुद्‌दीन और राज्य के मुखय आधार नसरत खाँ को, जो एक उदार और बुद्धिमान योद्धा था, गुजरात में कैम्बे (खम्भात) पर, जो आबादी और संपत्ति में भारत का विखयात नगर था, आक्रमण के लिये भेजा। चौदह हजार (14,000) घुड़सवार और बीस हजार (20,000) पैदल सैनिक उनके साथ थे।(अब्दुल्लाह वसाफ : तारीखे वसाफ, खण्ड-3, पृ. 42 (सीताराम गोयल : द कलकत्ता कुरान पेटीद्गान में उद्धत)
मंजिल पर मंजिल पार करते उन्होंने खम्भात पहुँच कर प्रातःकाल ही उसे घेर लिया, जब वहाँ के काफिर निवासी सोये हुए थे। उनीदे नागरिकों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। भगदड़ में माताओं की गोद से बच्चे गिर पड़े। मुसलमान सैनिकों ने इस्लाम की खातिर उस अपवित्र भूमि में क्रूरतापूर्वक चारों ओर मारना काटना प्रारंभ कर दिया। रक्त की नदियाँ बह गई। उन्होंने इतना सोना और चाँदी लूटा जो कल्पना के बाहर है और अनगिनत हीरे, जवाहरात, सच्चे मोती, लाल औरपन्ने इत्यादि। अनेक प्रकार के छपे, रंगीन, जरीदार रेशमी और सूती कपड़े।(अब्दुल्लाह वसाफ : पूर्वोद्धत, पृ. 43)
'उन्होंने बीस हजार (20,000) सुंदर युवतियों को और अनगिनत अल्पायु लड़के-लड़कियों को पकड़ लिया। संक्षेप में कहें तो उन्होंने उस प्रदेश में भीषण तबाही मचा दी। वहाँ के निवासियों का वध कर दिया उनके बच्चों को पकड़ ले गये। मंदिर वीरान हो गये। सहस्त्रों मूर्तियाँ तोड़ डाली गयीं। इनमें सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण सोमनाथ की मूर्ति थी। उसके टुकड़े दिल्ली लाकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बिछा दिये गये जिससे प्रजा इस शानदार विजय के परिणामों को देखे और याद करे। (उपरोक्त, पृ. 44)
रणथम्भौर पर आक्रमण के लिये अलाउद्‌दीन ने स्वयं प्रस्थान किया। जुलाई 1301 ई. में विजय प्राप्त हुई। किले के अंदर तमाम स्त्रियाँ जौहर कर चिता में प्रवेश कर गईं। उसके बाद पुरुष तलवार लेकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े और कत्ल कर दिये गये। सभी देवी देवताओं के मंदिर ध्वस्त कर दिये गये। (ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-3, पृ.76 (अमीर खुसरो : तारीखे अलाई))
अलाउद्‌दीन खिलजी ने दिल्ली में कुतुबमीनार से भी बड़ी मीनार बनाने का इरादा किया तो पत्थरों के लिए हिन्दुओं के मंदिरों को तुड़वा दिया गया। उस स्थान पर उन मंदिरों के पत्थरों से ही'कव्बतुल इस्लाम मस्जिद' का निर्माण भी किया जो आज भी शासन द्वारा सुरक्षित राष्ट्रीय स्मारकों के रूप में मौजूद है।
उज्जैन में भी सभी मंदिर और मूर्तियों का यही हाल हुआ। मालवा की विजय पर हर्ष प्रकट करते हुए खुसरो लिखता है कि 'वहाँ की भूमि हिन्दुओं के खून से तर हो गई।' (ईलियट एंड डाउसन, खण्ड-3, पृ.76 (अमीर खुसरो : तारीखे अलाई))
चित्तौड़ के आक्रमण में अमीर खुसरो के अनुसार इस सुल्तान ने 3,000 (तीन हजार) हिन्दुओं को कत्ल करवाया। (उपरोक्त पृ. 77)
'जो वयस्क पुरुष इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करते थे, उनको कत्ल कर देना और द्गोष सबको, स्त्रियों और बच्चों समेत, गुलाम बना लेना साधारण नियम था। अलाउद्‌दीन खिलजी के 50,000 (पचास हजार) गुलाम थे जिनमें अधिकांद्गा बच्चे थे। फीरोज तुगलक के एक लाख अस्सी हजार (1,80,000) गुलाम थे।' ( के. एस. लाल : इंडियन मुस्लिम व्हू आर दे, पृ. 24)
अलाउद्‌दीन खिलजी के समय, जियाउद्‌दीन बर्नी की दिल्ली का गुलाम मंडली के विषय में की गई टिप्पणी है कि आये दिन मंडी में नये-नये गुलामों की टोलियाँ बिकने आती थीं। (उपरोक्त) दिल्ली अकेली ऐसी मंडी नहीं थी। भारत और विदेशों में ऐसी गुलाम मंडियों की भरमार थी, जहाँ गुलाम स्त्री, पुरुष और बच्चे भेड़ बकरियों की भाँति बेचे और खरीदे जाते थे।
अलाउद्‌दीन खिलजी ही क्यों, अकबर को छोड़कर, सम्पूर्ण मुस्लिम काल में, जो हिन्दू कैदी पकड़ लिये जाते थे, उनमें से जो मुसलमान बनने से इन्कार करते थे, उन्हें वध कर दिया जाता था अथवा गुलाम बनाकर निम्न कोटि के कामों (पाखाना साफ करना इत्यादि) पर लगा दिया जाता था। शेष गुलामों को सेना ओर शासकों के बीच बाँट दिया जाता था। फालतू गुलाम मंडियों में बेंच दिये जाते थे।
संजय लीला भंसाली द्वारा ऐसे धर्मांध, मतान्ध, जिहादी, लालची, अत्याचारी, चरित्रहीन तानाशाह पर फ़िल्म बनाकर उसका महिमामंडन करना निश्चित रूप से निंदनीय है।
अब देखते है हिन्दू हिन्दू चिल्लाने वाला हिन्दू समाज अब केवल संजय लीला भंसाली के खिलाफ भाषण देकर, पुतले फूंककर, या धरना देकर इतिश्री कर लेगा जैसा उसने एकता कपूर के साथ किया अथवा वीरोचित मार्ग अपनाकर इन सेक्युलर भाड़ों के हृदय को भय से भरेगा !


सोमवार, 5 दिसंबर 2016

भारत वसुधैव कुटुम्बकम वाला देश है



1942 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया था ... सबसे खराब हालत पोलैंड की थी ..क्योकि पोलैंड ब्रिटेन को जितने के लिए जर्मनी को पोलैंड को जितना जरूरी था ..पोलैंड पर रूस अमेरिका ब्रिटेन और जर्मनी जापान आदि देशो की सेनाओ ने कब्जे के लिए हमला बोल दिया ..



पोलैंड के सैनिको ने अपने 500 महिलाओ और करीब 200 बच्चों को एक शीप में बैठाकर समुद्र में छोड़ दिया ..और कैप्टन से कहा की इन्हें किसी भी देश में ले जाओ ..जहाँ इन्हें शरण मिल सके ..अगर जिन्दगी रही ..हम बचे रहे या ये बचे रहे तो दुबारा मिलेंगे ..
पांच सौ शरणार्थी पोलिस महिलाओ और दो सौ बच्चो से भरा वो जहाज ईरान के इस्फहान बंदरगाह पहुंचा .. वहां किसी को शरण क्या उतरने की अनुमति तक नही मिली .. फिर सेशेल्स .. में भी नही मिली .. फिर अदन में भी अनुमति नही मिली .. अंत में समुद्र में भटकता भटकता वो जहाज गुजरात के जामनगर के तट पर आया ... जामनगर के तत्कालीन महाराजा जाम साहब दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ पांच सौ महिलाओ बच्चो के लिए अपना एक राजमहल जिसे हवामहल कहते है वो रहने के लिए दिया ..बल्कि अपनी रियासत में बालाचढ़ी में सैनिक स्कुल में उन बच्चों की पढाई लिखाई की व्यस्था की .. ये शरणार्थी जामनगर में कुल नौ साल रहे ..
उन्ही शरणार्थी बच्चो में से एक बच्चा बाद में पोलैंड का प्रधानमंत्री भी बना .. आज भी हर साल उन शरणार्थीयो के वंशज जामनगर आते है और अपने पूर्वजो को याद करते है .. उनके फोटो और नाम सब रखे हुए है ...
पोलैंड की राजधानी वर्साय में चार सडको का नाम महराजा दिग्विजय सिंह रोड है ..उनके नाम पर पोलैंड में कई योजनाये चलती है .. हर साल पोलैंड के अखबारों में महाराजा जाम साहब दिग्विजय सिंह के बारे में आर्टिकल छपता है दया/परहित का दूसरा धर्मनाम " सनातन " भारत वसुधैव कुटुम्बकम वाला देश है, और आज कल हमें ही सहिष्णुता सिखाई जाती है। 

अगर यही उपकार किसी मुल्ले पर किया जाता तो वो मुल्ला उसी राजा का राज्य हड़प लेता, और राजा की पुत्री को भागा ले जाता और अंत में राजा की हत्या कर देता जैसा टीपू सुल्तान के बाप हैदर अली ने किया था। ..