सोमवार, 14 अप्रैल 2014

'नौकरशाह' ने बनाया ‘आयरन लेडी’ पर इंदिरा गांधी ने किया विश्वासघात ?

भारतीय राजनीति में ‘दी आयरन लेडी’ के नाम से मशहूर भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी नेहरू परिवार से जुड़े होने के कारण भले ही किसी पहचान की मुहताज कभी नहीं रही हों लेकिन नेहरू परिवार की बेटी से अलग भारतीय इतिहास में अगर भारत के सबसे सक्सेसफुल और पहली महिला प्रधानमंत्री की हैसियत वह रखती हैं तो इसके पीछे कारण नेहरू से जुड़ा होना नहीं बल्कि वह एक शख्स है जिसका दिमाग इंदिरा गांधी के हर फैसले में होता था. प्रधानमंत्री और ‘लौह महिला’ तो इंदिरा गांधी कही गईं लेकिन अगर पी एन हक्सर का दिमाग नहीं होता तो इतिहास भी आज से बिल्कुल विपरीत होता. शायद तब इंदिरा ‘लौह महिला’ की जगह ‘सबसे कमजोर’ महिला, सबसे लोकप्रिय की जगह सबसे अलोकप्रिय और भारत की सबसे सक्सेसफुल प्रधानमंत्री की जगह सबसे कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में जानी जातीं.
         एक समय इंदिरा गांधी ‘गूंगी गुड़िया’ के नाम से जानी जाती थीं. 1967 में पी एन हक्सर (परमेश्वर नारायण हक्सर) इंदिरा गांधी के निजी सचिव बने और फिर गूंगी गुड़िया के इमेज से निकलकर एक ‘लौह महिला’ के रूप में इंदिरा की लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता गया. राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो 1967–1973 का दौर इंदिरा की लोकप्रियता का दौर था पर कैबिनेट से भी ज्यादा प्रभावकारी पी एन हक्सर थे. जवाहर लाल नेहरू के करीबियों में रहे कश्मीरी पंडित और लंदन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पढ़ाई करने वाले हक्सर की हैसियत इसी से आंकी जा सकती है कि 1973 तक इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रधानमंत्री की ओर से पारित किए जाने वाले जितने फैसले होते थे अखबारों में वह इस तरह लिखा जाता था ‘प्रधानमंत्री कार्यालय का फैसला है कि…’
Politics in India

राजनीतिक कॅरियर से जुड़ने की शुरुआत
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई पूरी कर वापस लौटने के बाद हक्सर ने वकालत शुरू कर दी. 1960 में जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें विदेश मंत्रालय में काम करने का अवसर दिया. भारतीय राजदूत के पद पर काम करने वाले वे पहले भारतीय थे. प्रधानमंत्री कार्यालय से इंदिरा गांधी के निजी सचिव के रूप में जुड़ने से पहले वे नाइजीरिया तथा ऑस्ट्रिया में भारतीय राजदूत के पद पर काम कर चुके थे. 1967 में इंदिरा गांधी ने हक्सर को अपना निजी सचिव बनाया और उसके बाद इंदिरा ने लगातार तरक्की की.
PN Haksar


इंदिरा गांधी की तरक्की में सबसे मजबूत कड़ी
इंदिरा गांधी के विरोधी और उनको मानने वाले भी देश-विदेश नीतियों में इंदिरा की सफलता के पीछे हक्सर का कूटनीतिक और कुशाग्र दिमाग होने की बात मानते हैं. बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मुद्दा हो या उसी को आधार बनाकर अपने मजबूत विरोधी मोरारजी देसाई को वित्त मंत्रालय से हटाने का फैसला या बांग्लादेश गठन में सहयोग का फैसला, सबमें हक्सर की ही सलाह थी. राजनीति से जुड़ने से पहले ही हक्सर नेहरू परिवार के करीबी थे इसलिए नेहरू परिवार के लिए उनकी विश्वसनीयता पर किसी को शक न था. नेहरू के काल में राजदूत और लंदन में भारतीय उच्चायुक्त रहकर अपनी प्रशासनिक काबिलियत भी हक्सर साबित कर चुके थे. 1973 में, जब तक वे पीएमओ में प्रधान सचिव के पोस्ट पर रहे इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर रही. 1973 में इंदिरा गांधी ने उन्हें खुद ही प्रधान सचिव के पद से हटा दिया. कहने को पी एन हक्सर को पीमओ से हटाकर योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया लेकिन इसके पीछे की हकीकत कुछ और ही थी. इंदिरा गांधी का इसके बाद जो हश्र हुआ वह शायद किसी से छुपा नहीं. 2 साल की इमरजेंसी का फैसला और चुनाव में जबरदस्त हार इसका सबसे बड़ा नतीजा था. सत्ता में आने के बाद भी वह ज्यादा दिनों तक शासन नहीं कर पाईं. अगर पीएम हक्सर इंदिरा के साथ होते तो शायद ऐसा कभी नहीं होता.
Indian Politics

आखिर पीएमओ पद से क्यों हटाए गए हक्सर ?

इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी की तानाशाह हरकतें धीरे-धीरे प्रचार में आ रही थीं. यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के भी अधिकांश सदस्य संजय की नीतियों से नाखुश थे. पार्टी के अंदर और बाहर भले ही इतनी संजय विरोधी लहर थी लेकिन इंदिरा फिर भी संजय गांधी की नीतियों से प्रभावित थीं और उनके प्रभाव में आकर कई फैसले लेने लगी थीं.]
Indira with Sanjay Gandhi

हक्सर ने इंदिरा को समझाने की कोशिश की कि संजय की छवि उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रही है इसलिए वे कुछ दिनों के लिए संजय को खुद से दूर कहीं बाहर भेज दें. इंदिरा इससे खुश नहीं थीं. उन्होंने हक्सर से कहा कि सभी संजय की खिलाफत कर रहे हैं ऐसे में वे खुद भी उसका साथ कैसे छोड़ दें. नतीजे के तौर पर इंदिरा को तो यह बात इमरजेंसी काल के बाद अपनी शाख गंवाने के बाद समझ आई लेकिन हक्सर को तुरंत पीएमओ से हटाकर योजना आयोग का उपाध्यक्ष बना दिया गया.

नेहरू के काल में प्रतिष्ठित माना जाने वाला यह विभाग हक्सर के इसके उपाध्यक्ष बनने के समय अपनी गरिमा खो चुके राजनीतिज्ञों का जमावड़ा माना जाने लगा था. हक्सर की नजर से देखें तो यह उन्हें अपमानित करने वाला फैसला था. एक इंसान जिसका दबदबा इतना था कि उसके कमरे में आते ही कैबिनेट मंत्री भी खड़े हो जाया करते थे, इंदिरा से ज्यादा पार्टी सदस्य हक्सर से डरते थे, उसे अचानक अर्श से फर्श पर लाने वाला था यह फैसला. पर यह भी कांग्रेस और भारतीय राजनीति के इतिहास का एक बड़ा सच है कि इंदिरा गांधी के पूरे राजनीतिक कॅरियर को देखें तो यह इंदिरा की सबसे बड़ी भूल थी. अगर हक्सर होते तो न संजय गांधी की मौत होती, न ऑपरेशन ब्लू स्टार होता और न ही भारत की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा की मौत होती ,1998 में मौत से पहले 10 वर्षों तक हक्सर के आंखों की रौशनी नहीं थी. राजनीति के महारथी रहे वे लेकिन खाना बनाने में अच्छे-अच्छे कुक को मात दे दें. इंदिरा गांधी के अनुरोध पर खास उनके लिए ही कई बार उन्होंने खाना बनाया. संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में भी उनका कोई सानी नहीं था. हक्सर अपनी बेटी को हमेशा कहते थे कि ‘मार्क्स पर मत जाओ, मार्क्स रिमार्क्स नहीं होता.” इसलिए मैथ में कम नंबर आने की बात जानकर वे बेटी को डांटते नहीं बल्कि आइस्क्रीम खिलाने ले जाते. उन्होंने खुद के लिए भी यह बात साबित कर दी. भले ही इंदिरा ने उन्हें पीएमओ से हटाकर उनका ग्रेस कम करने की कोशिश की थी लेकिन उनके बिना इंदिरा की हालत हक्सर के रिमार्क्स ही हैं.

Note--जागरण जक्सन से साभार 

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

रामायण की वो रोचक बातें, जो न कभी बताई गर्इं न दिखाई गईं

भगवान श्रीराम व उनके छोटे भाई लक्ष्मण, पत्नी सीता और राक्षसराज रावण के जीवन का वर्णन यूं तो कई ग्रंथों में मिलता है, लेकिन इन सभी में वाल्मीकि रामायण में लिखे गए तथ्यों ko ही सबसे सटीक माना गया है। वाल्मीकि रामायण में कुछ ऐसी रोचक बातें बताई गई हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम हमको कुछ ऐसी ही बातें बता रहे हैं, जो शायद अब तक आप नहीं जानते थे। जानिए कौन सी हैं वो बातें-


1- रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। जिस समय राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था, उस समय उनकी आयु लगभग 60 हजार वर्ष थी।

2- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था।

3- जब लक्ष्मण को श्रीराम को वनवास दिए जाने का समाचार मिला तो वे बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने पिता दशरथ से ही युद्ध करने की ठान ली, तब श्रीराम द्वारा समझाने पर ही वह शांत हो पाए।

4- वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ गुरु विराजमान थे।

भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्न में हुआ था, जबकि लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म अश्लेषा नक्षत्र व कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थान में विराजमान थे।

5- गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का वर्णन नहीं है।

रामायण के अनुसार जब भगवान श्रीराम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे तो विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा। तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।

6- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर में जब श्रीराम ने शिव धनुष तोड़ दिया, तो क्रोधित होकर भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम द्वारा बाण चढ़ा देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।

7- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

8- राजा दशरथ ने जब श्रीराम को वनवास जाने को कहा तब उन्होंने धन-दौलत, ऐश्वर्य का सामान, रथ आदि भी श्रीराम को देना चाहा ताकि उन्हें वनवास में किसी प्रकार की तकलीफ न हो, लेकिन कैकयी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

9- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण(यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।

10- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवे सर्ग के चौदहवे श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।

11- सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।

12- जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया। उसी रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया। उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से सीता की भूख-प्यास शांत हो गई।

13- जब भगवान राम और लक्ष्मण वन में सीता की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस का राम-लक्ष्मण ने वध कर दिया था। वास्तव में कबंध एक श्राप के कारण ऐसा हो गया था। जब श्रीराम ने उसके शरीर को अग्नि के हवाले किया तो वह श्राप से मुक्त हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

14- श्रीरामचरितमानस के अनुसार समुद्र ने जब लंका जाने के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हो गए थे, जबकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण नहीं बल्कि भगवान श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सुखा देने वाले बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने भगवान श्रीराम को समझाया था।

15- सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल नामक वानर ने किया था क्योंकि उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फैंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र था और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उन्होंने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

16- रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13-16 किमी होता है)

17- एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

18- रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया, तब माता पार्वती भयभीत हो गई थीं और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

19- जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय देवराज इंद्र ने अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा था। उस रथ में बैठकर ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था।

20- जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता रहा, तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्यह्रदय स्त्रोत का पाठ करने को कहा, जिसके प्रभाव से भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

21- रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में रहता था, वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की थी। जब रावण विश्व विजय पर निकला, तो उसने अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका तथा पुष्पक विमान पर अपना कब्जा कर लिया।

22- रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा, लेकिन ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

23- रावण के पुत्र मेघनाद ने जब युद्ध में इंद्र को बंदी बना लिया तो ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को छोडऩे को कहा। इंद्र पर विजय प्राप्त करने के कारण ही मेघनाद इंद्रजीत के नाम से विख्यात हुआ।

24- ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था। क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था।

वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

25- रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था, तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा।

उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।


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