शुक्रवार, 10 मई 2013

आखिर वंदे मातरम क्यों ?

लोकसभा में "वंदे मातरम्" का  Shafiq-ur-Rehman Burq ( बासपा सासंद ) द्वारा अपमान किया गया इस पर लोकसभा अध्यक्षा ने कड़ी आपत्ति जताई (कड़ी आपत्ति क्या होती है ये तो कोई कंग्रेशी ही जाने ) और भविष्य में ऐसा नहीं करे इसके हिदायत भी दिया (मतलब कांग्रेश ने घडियाली आसू बहाया ) अब प्रश्न ये है की आखिर मुसलमान इस "वंदे मातरम्" को क्यों गाये ? तो भाई आप सुन लो  ऑस्कर विजेता एआर रहमान जैसे फनकार  1997 में आई उनकी एल्बम 'वन्दे मातरम' आज भी सबसे अधिक बिकने वाली गैर फिल्मी एल्बम्स में शुमार की जाती है। गीत 'माँ तुझे सलाम' सुनने पर भी आपके मन में देश प्रेम की लहर न उठती हो तो शायद खुद को भारतीय मानना ही नहीं चाहिए।  " खींची हैं लकीरें इस जमीन पर न खींचो देखो बीच में दो दिलों के ये दीवारें " गीत देश में अमन का पैगाम  देता  है
 " वंदे मातरम् " तो मातृप्रेम का गीत है {अब जिसे अपनी माँ से प्यार नहीं है ओ तो मनुष्य क्या जानवर भी कहलाने का हक़ नहीं रखते है } लेकिन विश्‍व के अनेक देशों के   राष्‍ट्रगीत तो ऐसे हैं जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्‍वयं के देश की प्रजा के स्‍वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। लेकिन हमारी बात अलग है। भारत ने सदैव विश्‍वशांति को प्राथमिकता दी है।
              देश के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद भीचाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अब वंदे मातरम् एक बार फिर चर्चा में है लेकिन कांग्रेसियों, भाजपाइयों, सपा और बसपा वालों सभी से अनुरोध हैं कि यह गीत किसी की जागीर नहीं है, यह देश की जागीर है और इस पर विवाद मत छेड़ना। जान लो....दूसरे देशों के राष्‍ट्रगीत जिनसे बेहतर है मेरा वंदे मातरम्

            छोटे छोटे देशों के राष्‍ट्रगीत भी अनेक बार क्रूर और हिंसक होते हैं। इन्‍हें आततायियों और शत्रु को फटकार लगाने के लिए लिखा गया है। छोटे से देश डेनमार्क का उदाहरण लें। डेनमार्क के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है जो राजा क्रिश्‍टीएन के वीरत्‍व को उकसाती है। उनकी तलवार इतनी तेज चलती थी, शत्रु के कलेजे और सिर को एक साथ काट फेंकती थी....। मध्‍य अमरीकी देश ग्‍वाटेमाला के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है-किसी आततायी को तेरे चेहरे पर नहीं थूकने दूंगा ... बल्‍गारिया के राष्‍ट्रगीत में भी आहूति की बात कही गई है....। बेशुमार योद्धाओं को बहादुरी से मारा है-जनता के पवित्र उद्देश्‍य के लिए....। चीन के राष्‍ट्रगीत में खून से सनी एक लाइन है -हमारे मांस और खून का ढ़ेर लगा देंगे-फिर से एक नई महान चीन की दीवार बनाने के लिए....

               अमरीका में मेरीलैंड नामक एक राज्‍य है...। इस राज्‍य का भी राज्‍यगीत या राष्‍ट्रगीत है, जो वीरत्‍व से भरा पड़ा है, इसमें शब्‍द हैं कि- बाल्टिमोर की सड़कों पर फैला हुआ है देशभक्‍तों का नुचा हुआ मांस- इसका बदला लेना है साथियों.... इन सभी की तुलना में सुजलां, सुफलां मलयज शीतलाम् अथवा मीठे जल, मीठे फल और ठंडी हवा की धरती जैसे विचारों का विरोध हो रहा है....। यह कितना साम्‍प्रदायिक लग रहा है?

ब्रिटेन का राष्‍ट्रगीत ‘गॉड सेव द क्विन (या किंग)’ को 19वीं सदी की शुरूआत में स्‍वीकृति मिली....। वर्ष 1745 में इसे पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाया गया, लेकिन इसकी रचना किसने की, किसने संगीत दिया इस विषय में जरा अस्‍पष्‍टता है....। लेकिन इससे पूर्व जिस गीत ने राष्‍ट्रगीत का दर्जा पाया, वह कैसे भाव व्‍यक्‍त करता है ? रुल ब्रिटानिया, रुल दि वेव्‍ज/ब्रिटंस नेवर शेल बी स्‍लेव्‍ज (देवी ब्रिटानिया राज करेगी, समुद्रों पर राज करेगी, ब्रिटिश कभी गुलाम नहीं बनेंगे) इस गीत में आगे है- तेरे नगर व्‍यापार से चमकेंगे/हरेक किनारे पर तेरी शोभा होगी....।

वंदे मातरम्...वंदे मातरम्...मातरम वन्दे ...



बेल्जियम का राष्‍ट्रगीत ‘ब्रेबेनकॉन’ था...। जिसे एक फ्रेंच कामेडियन ने लिखा था। इस गीत में डच प्रजा के खिलाफ विष उगला गया था। इसके शब्‍दों में तीन बार संशोधन करना पड़ा...। वर्ष 1984 में आस्‍ट्रेलिया ने ‘एडवांस आस्‍ट्रेलिया फॉर’ राष्‍ट्रगीत निश्चित किया...। रुस का राष्‍ट्रगीत ‘जिन सोवियत स्‍कोगो सोयूजा’ (सोवियत संघ की प्रार्थना) 1944 में स्‍वीकार किया गया और 1814 में अमरीका ने फ्रांसीस स्‍कॉट नामक कवि के ‘स्‍टार स्‍पेंगल्‍ड बेनर’ राष्‍ट्रगीत के रुप में स्‍वीकार किया...। इससे पूर्व रुस ने ‘इंटरनेशनल’ को राष्‍ट्रगीत माना था....।

इजरायल का राष्‍ट्रगीत ‘हा-निकवा’ केवल इतना ही है....। दिल के अंदर गहरे गहरे तक/ यहूदी की आत्‍मा को प्‍यास है/ पूर्व की दिशा/ एक आखं जायोन देख रही है/ अभी हमारी आशाएं बुझी नहीं हैं/ दो हजार वर्ष पुरानी हमारी आशा/ हमारी धरती पर आजाद प्रजा होने की आशा/ जायोन की धरती और येरुश्‍लम...। फ्रांस का राष्‍ट्रगीत ‘लॉ मार्सेस’ विश्‍व के सर्वाधिक प्रसद्धि राष्‍ट्रगीतों में एक है....। वर्ष 1792 में फौज के इंजीनियर कैप्‍टन कलोड जोजफ रुज दि लिजले ने अप्रैल महीने की एक रात यह गीत लिखा और इसके बाद इतिहास में हजारों फ्रांसीसियों ने इस गीत के पीछे अपने को शहीद कर दिया....। बहुचर्चित इस राष्‍ट्रगीत की दो लाइनें इस प्रकार है अपने ऊपर जुल्‍मगारों का रक्‍तरंजित खंजर लहरहा है....। तुम्‍हें सुनाई देता है अपनी भूमि पर से कूच करके आते भयानक सैनिकों की गर्जनाएं..?...साथी नागरिकों ...उठाओं शस्‍त्र, बनाओं सेना/ मार्च ऑन, मार्च ऑन/ दुशमनों के कलुषित रक्‍त से अपनी धरती को गीली कर दो...। फ्रांस के इस राष्‍ट्रगीत की इन दो पक्तिंयों की चर्चा समय असयम फ्रांस और उसके पड़ौसी देशों में होती रहती है....। अभी इन दो पक्तियों की बजाय जो नई दो पंक्तियां सुझाई गई है वे थीं स्‍वाधीनता, प्रियतम स्‍वाधीनता/ शत्रु के किले टूट गए हैं/फ्रेंच बना, अहा, क्‍या किस्‍मत है/ अपने ध्‍वज पर गर्व है.../ नागरिकों, साथियों/ हाथ मिलाकर हम मार्च करें/ गाओं, गाते रहो/ कि जिसने अपनी गीत/ सभी तोपों को शांत कर दें..लेकिन फ्रांस की जनता ने इस संशोधन को स्‍वीकार नहीं किया...। मूल पंक्तियों मे जो खुन्‍नस थी, जो कुर्बानी भाव था वह इनमें नहीं था...। आज भी पुरानी पंक्तियां ज्‍यों की त्‍यों हैं और फ्रांसीसी फौजी टुकडि़यां इन्‍हें गाते गाते कूच करती हैं...।



शायद सर्वाधिक विवादास्‍पद राष्‍ट्रगीत जर्मनी का ‘डोईशलैंड युबर एलिस’ है....। जर्मनी के कितने ही राज्‍य पूरे गीत को राष्‍ट्रगीत के रुप में मानते थे...। हिटलर के जमाने में भी यही राष्‍ट्रगीत था...। लेकिन 1952 से जर्मनी ने तय किया कि केवल तीसरा पैरा ही राष्‍ट्रगीत रहेगा....। जर्मनी के राष्‍ट्रगीत का पहला पैरा इस प्रकार है जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर/ रक्षा और प्रतिरक्षा की बात आए तब/ कंधे मिलाकर खड़े रहना साथियों/मियुज से मेमेल तक/ एडीज से बेल्‍ट तक/जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर... यह गीत जबरदस्‍त चर्चा का विषय बने यह स्‍वाभाविक है, आज मियुज नदी फ्रांस और बेल्जियम में बहती है....। बेल्‍ट डेनमार्क में है और एडीज इटली में है....। जर्मनी के इस राष्‍ट्रगीत में पूरे जर्मनी की सीमाओं के विषय में बताया गया है...। कितने ही लोगों के अनुसार यह ग्रेटर जर्मनी है और इसमें से उपनिवेशवाद की बू आती है जबकि जर्मनी की ऐसी कोई दूषित भावना नहीं है....। जहां फ्रांस में पंक्तियां बदलने की चर्चा होती है, वहां जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं है....। केवल जर्मनी ने ही राष्‍ट्रगीत के रुप में अहिंसक तीसरे पैरे को राष्‍ट्रगीत राष्‍ट्रगीत में स्‍वीकार किया है....। इटली में भी 1986 में एक आंदोलन हुआ था...। वहां राष्‍ट्रगीत जरा कमजोर महसूस किया जा रहा था....। जनमत का कहना था कि संगीतज्ञ बर्डी के बजाय तेजतर्रार देशभक्ति वाले का गीत राष्‍ट्रगीत होना चाहिए...। राष्‍ट्रगीत चर्चा में आए इससे चिंता नहीं करनी चाहिए....। 

           प्रत्‍येक देश के राष्‍ट्रगीत में स्‍वाभिमान, गर्व होता है, राष्‍ट्रध्‍वज और राष्‍ट्रगीत ही ऐसी प्रेरणा होती है जिसके लिए सारी की सारी पीढि़यां सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर देती हैं....। भारत में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों के अंतिम शब्‍द होते थे ‘वंदे मातरम्...
     अंत में इस ब्लॉग के माध्यम से मेरे देश भक्त मुस्लिम बहादुरों से अनुरोध है की,  धर्म से ऊपर देश है, देश नहीं तो धर्म को क्या अचार डालेगे ? 

          तो चलिए बोलिए वन्देमातरम ....मुझे पता है की आपके मन ने कह दिया वन्देमातरम । जय हिन्द ..जय भारत

मंगलवार, 7 मई 2013

।। बौद्ध मेँ चमत्कार-अंधविश्वास-विरोधाभाष ।।


हिन्दु धर्म के कुछ नीच समझी जाने बाली जातियाँ मानती हैँ कि बौद्ध अवैग्यानिकता और अंधविश्वास जैसी अशुद्धियोँ से मुक्त है ।पहली बात तो ये समझ नहिँ आती कि बिना भगवान का कैसा धर्म कैसी आस्था। बौद्ध एक ढोँगी पाखंडी धर्म है इनके अवधारणा को देखा जाये तो इसमेँ अंर्त्तविरोध भरा पडा है । जो कहते कुछ हैँ और करते कुछ और।इसमेँ जो विज्ञान जैसा कुछ भी है वो हिन्दु साहित्य कि चोरी से बाकी सारा ढकोसला मात्र है जिसे छद्म बुद्धिमता बोला जा सकता है ।इनके किताबोँ से एक बात तो साफ हो जाती है कि ये लोग या तो वेद को समझ नहिँ पाये थे या फिर उस समय का विग्यान वेद को समझाने मेँ पुर्ण सक्षम नहिँ था।अंर्त्तविरोध कि कुछ बातेँ ।
*ये आत्मा परमात्मा को नहिँ मानते फिर भी तपस्या साधना पुजा मेँ मगन रहते हैँ क्या जाने किसकि।
*बिना आत्मा का पुनर्जन्म भी करवा देते हैँ।
*एक दिन मेँ अचानक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैँ फिर भी दुनिया मेँ अशिक्षा फैला हुआ है।
*दुःख का कारण खोजने मेँ हि सारा जीवन दुःखी रहते हैँ ।ये अपने सुख कि चाहत मेँ ज्यादा लगे दिखते हैँ समाज कल्याण कि अपेक्षा ।
~संसार दुःख का कारण है इसे छौड़ दो बोलकर आत्महत्या को बढाबा देते है ।
~इस जीवन से इतना डरे हुए होते हैँ कि दुसरा जन्म नहि चाहते।
~पाप पुण्य कि अवधारणा नहिँ मानते लेकिन पाप का दंड देने के लिए खुद आत्महत्या कर लेते हैँ ।
~इनके अन्य लोग इनकी लाश को मुर्ति कि शक्ल देकर लाश कि पुजा करते हैँ ।
*ये ब्राह्मण कर्मकांडो के विरोधी होते हैँ खुद उल जुलुल कर्मकाँड करते फिरते हैँ कभी सिर मुँडबा लेते हैँ,भिक्षा माँगते हैँ ,पहिया घुमाते हैँ,अगरबती घुमाते है बुद्ध के सामने और उन्हेँ भगबान भी नहि मानते।
*कर्मकांड ब्राह्मणोँ जैसे करते हैँ फिर भी ब्राह्मण कर्मकांडोँ का विरोध करते हैँ।वेद का विरोध करते हैँ लेकिन तत्बग्यान वेतांत,उपनिषद,न्याय दर्शन और योगदर्शन से ही चोरी करते है।
*इनका ब्रह्मचर्य का ढोँग का भांडा तब फुट जाता है जब विदेशोँ से नाबालिग लडकियाँ वज्रयान के संभोग योगा के लिए मंगाया जाता है ।
*बौद्ध अवतारबाद पुर्नजन्म को नहिँ मानता लेकिन...गौतम बुद्धा सुमेधा नामक ब्राह्मण के पुर्नजन्म माने जाते हैँ जो पिछले जन्म मेँ उडने कि क्षमता भी रखते थे।बुद्ध के पहले भी 27 बुद्धा हो चुके हैँ ।
*इनके 27 बुद्धा अजीब अजीब हैँ जिसे कतई सच्चाई नहिँ कहा जा सकता दीपंकर ,मैत्रेय जैसे पुराने बुद्धा हैँ जो 35-40 फीट के होते हैँ और हजारोँ लाखोँ साल जीवन जीते हैँ ।
तेनजिन ग्यात्सो दलाइलामा के 14बेँ अवतार माने जाते हैँ!
*इनके जातक कथाओँ मेँ पौराणिक ,जादुइ ,रहस्यमयी ,अविश्वशनीय कथाओँ का संग्रह है ।इन जातक कथाओँ मेँ बुद्ध के 554 पुर्नजन्मोँ का उल्लेख मिलता है ।
*ये अहिँसा शाकाहारी का झुठा प्रचार करते हैँ और खुद दलाइलामा समेत अधिकांश भिक्षु मांसाहारी होते हैँ ।खुद बुद्ध शुक्रमडवा नामक सुअर का व्यंजन खाने से मरे थे।
।। बुद्धा के चमत्कार के और नमुने ।।
*सपने मेँ बुद्ध कि माता के पेट सफेद हाथी घुस जाने के बाद बुद्ध पैदा होते हैँ जो पैदा होते ही चलने और बोलने लगते हैँ और जहाँ जहाँ पैर रखते हैँ वहाँ कमल का फुल उग जाता था ।
*जब बुद्धा अपने राज्य लौटते हैँ तो पिता से मिलते वक्त उनके शरीर से आग और पानी निकलने लगता है ।उसके बाद मात्र 3 कदमोँ से मीलोँ दुर तवस्तीमा नामक जगह पहुँचते हैँ जहाँ बुद्ध कि माता का अगला जन्म होता है ।बुद्ध अगले जन्म कि संत्तुस्सीता नामक माता को अभिधम्मा बताते हैँ ।
*एक दिन बुद्धा ब्रह्मा के लोक मेँ पहुँच जाते हैँ लेकिन तपस्या से खुद को छुपा लेते हैँ ऑर ब्रह्मा बुद्ध को खोज नहिँ पाते ।
*बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्ता ने बुद्ध के सामने पागल हाथी छोड देता है ।रास्ते मेँ एक औरत का बच्चा जमीन पर छुट जाता है हाथी जैसे हि बच्चे के ऊपर पैर देने बाला था कि बुद्धा ने हाथी के माथे पर अपना हाथ रख कर उसे शांत कर दिया ।
*बुद्धा एक बार आनंद से पानी मांगते हैँ लेकिन आनँद बुद्धा को कुँआ घास फुस से भरा गंदा बताते हैँ लेकिन अगली बार कुँआ खुद साफ हो जाता है ।
*महावग्गा IV मेँ बुद्धा बाढ के पानी को बोलकर वापस लौटा देते हैँ ।
*अंगुत्रा निकाय के अनुसार
¤बुद्धा पानी के ऊपर चल सकते हैँ।
¤बुद्ध लाखोँ मेँ मल्टीपलाय होकर फिर एक हो सकते हैँ ।
¤बुद्धा अंतरिक्ष मेँ जा सकते हैँ ।
¤बुद्धा खुद को बडे से बडा सकते हैँ और चीँटी से छोटा भी बन सकते हैँ ।
¤बुद्धा पर्वतोँ को भी लांघ सकते हैँ ।
¤ बुद्धा धरती कि गहराइयोँ तक जा सकते हैँ ।
¤बुद्धा परलोक तक जा कर धरती पर फिर वापस आ सकते हैँ ।
*इतिबुताका के अनुसार बुद्धा अमर हैँ वो ना तो पैदा होते हैँ और ना ही मरते हैँ ।
*शीलाबत्ती नामक भिक्षुणी के नेवल को बुद्धा सपने मेँ छु देते हैँ तो भिक्षुणी गर्भवती हो जाती है ।
*यशोधरा बुद्धा के सिमेन को 6 साल तक अपने गर्भ मेँ छुपा कर रखती है उसके बाद राहुल पैदा होता है ।
*महसिहंदा सुत्ता के अनुसार बुद्धा मेँ दुरदृष्टि थी उनमेँ ,टेलिपैथी,भुतकाल मेँ देखने कि क्षमता,आधयात्मिक दृष्टि कि क्षमता थी ।वो किसी दुसरे का दिमाग भी पढ सकते थे ।
http://en.wikipedia.org/wiki/Miracles_of_Gautama_Buddha
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