गुरुवार, 13 नवंबर 2025

चाय वाला....

सोनिया जी की नाराजगी तो बस 'ट्रेलर' है—मेन फिल्म तो चाणक्य नीति की है! चाणक्य ने कहा था: "जब जड़ गहरी हो, तो पेड़ मत काटो—तेजाब डालो, धीरे-धीरे सूखने दो।" वाजपेयी जी ने कुल्हाड़ी नहीं चलाई, बल्कि 'महानता' का 'खाद-पानी' डाला—सोनिया का पेड़ और हरा-भरा हो गया। लेकिन चाय वाला? वो चाणक्य का 'असली शागिर्द' निकला! कुल्हाड़ी नहीं, तेजाब की बोतल लिए घूम रहा है। और तेजाब? वो है—गोपनीयता, प्रोटोकॉल, कानून की बराबरी, और सबसे बड़ा—धर्मांतरण पर ब्रेक!
चाणक्य नीति: "शत्रु की शक्ति का स्रोत पहले सूखाओ, फिर वार करो।"सोनिया का 'आभा मंडल' विदेशी मेहमानों से मिलता था। वाजपेयी जी 'राजधर्म' के नाम पर पानी देते रहे। चाय वाले ने पानी बंद कर दिया। विदेश मंत्रालय को सख्त ऑर्डर: "सोनिया से मिलना? नहीं चाहिए!" अब कोई मेहमान 10 जनपथ की 'चाय' तक नहीं पीता। जड़ का पहला हिस्सा सूखा—अंतरराष्ट्रीय वैधता खत्म!

 "शत्रु के वारिस को कमजोर करो।"पहले राहुल बोस्टन में पकड़े जाते—to वाजपेयी जी बुश को फोन: "छोड़ दो, हमारा प्रिंस है!" अब? चाय वाला फोन उठाता तक नहीं। "कानून सबके लिए बराबर!" राहुल अब 'आम यात्री' की तरह चेकिंग में खड़े होते हैं। जड़ का दूसरा हिस्सा सूखा—वारिस की 'रॉयल इम्युनिटी' गई!

 कतार में महारानी चाणक्य  "शत्रु को उसकी औकात दिखाओ—धीरे-धीरे।"51 साल बाद सोनिया धूप में कतार में! पासपोर्ट ऑफिस, राशन कार्ड, बैंक—कहीं VIP नहीं। चाणक्य की तरह चाय वाला ने 'समानता का तेजाब' डाला। जड़ का तीसरा हिस्सा सूखा—'महारानी' से 'आम आदमी' की यात्रा पूरी!

नंबर-4 NSCN संधि—चुपचाप, गोपनीय चाणक्य: "शत्रु को खबर तक न लगे, तब तक वार करो।"NSCN से संधि—बिना शोर, बिना लीक! सोनिया को कानो-कान खबर नहीं। पहले तो 'मनमोहन सरकार से शुरू हुआ' का बहाना बना लेतीं। अब? मुंह बंद। जड़ का चौथा हिस्सा सूखा—गोपनीयता का 'मास्टरस्ट्रोक'!

 क्रिश्चियन इवैंजेलिस्ट पर ब्रेकचाणक्य: "शत्रु की विचारधारा की जड़ पर प्रहार करो।"तीन दशक से सोनिया के 'आशीर्वाद' से चर्च को उत्तर-पूर्व में 'फ्री रन' था। 'किंगडम ऑफ क्राइस्ट' का सपना। चाय वाले ने धर्मांतरण कानून, FCRA सख्ती, और NSCN संधि से वेटिकन की जड़ पर तेजाब डाला। पोप साहब रो रहे हैं, सोनिया चिल्ला रही हैं: "ये मेरी धार्मिक भावनाओं का अपमान है!" जड़ का पांचवां हिस्सा सूखा—ईसाई मिशनरी का 'अनाधिकृत साम्राज्य' ढहा!

लेकिन पेड़ काटा क्यों नहीं?चाणक्य: "भारत में भावनाएं जल्दी आहत होती हैं।"पेड़ काटोगे तो 'प्रकृति प्रेमी' लिपट जाएंगे—कहेंगे: "अरे, बेचारी विदेशी बहू! गरीब विधवा!" भले पेड़ ने 10 साल लूटा हो, छांव 'हराम की' हो। चाय वाला चालाक है—तेजाब डाल रहा है, धीरे-धीरे। पत्ते गिर रहे हैं, जड़ सुख रही है—और 'प्रकृति प्रेमी' सो रहे हैं।

अंतिम चाय वाला खुद!चाणक्य का अंतिम सूत्र: "शत्रु की जड़ तब तक न सूखे, जब तक तुम स्वयं मजबूत न बनो।"चाय वाला रोज 'चाय' पी रहा है—लेकिन वो चाय नहीं, सोनिया की जड़ का तेजाब है!सोनिया जी, नाराज मत होइए—ये तो चाणक्य का खेल है।और खेल अभी बाकी है,

जय श्री राम

सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

संविधान किसने लिखा ??

भारतीय संविधान सभा 389 सदस्य थे ।
9 दिसम्बर 1946 को प्रथम बैठक,26 नवम्बर को संविधान तैयार हुआ....
 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे
  अध्यक्ष--- डॉ राजेन्द्र प्रसाद
    उपाध्यक्ष... एच. मुखर्जी
  संवैधानिक 
 सलाहकार... बी.एन.राव
  कुल 13 समितियां
 (1) संघ शक्त समिति....सदस्य नेहरू आदि
 (2)संविधान समिति.... नेहरू आदि
  (3) राज्यों के लिए समिति... नेहरू आदि
  (4) राज्यों,रियासतों से परामर्श समिति... सदस्य पटेल आदि
   (5) मौलिक अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति... पटेल आदि
   ( 6) प्रांतीय संविधान समिति... पटेल आदि
   ( 7) मौलिक अधिकार उपसमिति...जे.वी.कृपलानी
   ( 8) झण्डा समिति... जे.वी.कृपलानी
   (9) प्रक्रिया नियम समिति....राजेन्द्र प्रसाद आदि
   (10) सर्वोच्च न्यायालय संबंधित समिति... राजेन्द्र प्रसाद आदि
   (11) प्रारूप सविधिक समिति.... अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर
   (12) संविधान समीक्षा आयोग..एम.एन.वैकटाचलैया
   ( 13) प्रारूप समिति.....
 1.... मोहम्मद सादिला
 2....अल्लादी कृष्णस्वामी
 3... एन.गोपाल स्वामी अय्यर
 4....एन.माधवाचार्य
 5.... कन्हैयालाल माणिक्य लाल मुंशी
 6.....टी.टी.कृष्णमाचारी
 7..... भीमराव रामजी अंबेडकर

 आरक्षण की रोटी खाने वाले कहता है संविधान को भीमराव अंबेडकर, बाबा साहेब ने बनाया
  तो फिर 388 सदस्यों ने क्या किया-? क्या नेहरु, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बी एन राव जैसे कानून विद् प्याज छिल रहे थे????
अंबेडकर का हस्ताक्षर 26 वे स्थान पर क्यो है????
   13 समितियां थी उसमें से केवल एक समिति के 7 वें सदस्य ने ही संविधान बनाया-?
     तो फिर अन्य 388 सदस्यों ने 2 वर्ष,11 माह,18 दिन क्या किया-? संविधान का ड्राफ्ट बनाने वाले बी एन राव जिनकी 343 आर्टिकल आज भी संविधान में मौजूद हैं , वो क्या थे??????? संविधान सभा के एडवाइजर मतलब जो एडवाइस किया, वही लिखा गया। चाहे कोई कमिटी प्रमुख रहा।
नेहरु, पटेल और राजेन्द्र प्रसाद जो तीन तीन संवैधानिक कमेटी अध्यक्ष थे, एक मामूली कमिटी अध्यक्ष अंबेडकर को संविधान निर्माता क्यो???
   किसी भी विद्वान,बुद्धिजीवी,ज्ञानी...प्रबुद्ध जन को पता हो तो कृपया देश को बताने का कष्ट करे कि एक कमिटी का अध्यक्ष बड़ा होता है या सम्पूर्ण संविधान सभा अध्यक्ष?? सम्पूर्ण संविधान सभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद जी क्या चाय बनाते थे??????
वोट बैंक साधने के खेल में संविधान कमिटी कलर्क को संविधान निर्माता का दुष्प्रचार फैलाया गया।
कमिटी और सभा का अंतर तो जानो।
 मूल कॉपी पर सबसे ऊपर राजेंद्र प्रसाद जी और सबसे अंत में प्रमुख शिल्पकार बी एन राव का हस्ताक्षर है।
    वोट बैंक साधने के खेल में अंबेडकर का फर्जी प्रोपेगेंडा फैलाया गया ।
    ब्रिटिश पार्लियामेंट ने सरवन राव को 19 जुलाई 1946 को ही संविधान निर्माण का जीवन सौंप दिया और संविधान की चार कमेटियों का गठन राव ने किया जिसमें दो के अध्यक्ष नेहरू और दो के अध्यक्ष पटेल थे ।
 संविधान सभा के सभी जीते हुए सदस्यों ने 4 दिसंबर 1946 को शपथ लिया जिसके 167 बैठ के अर्थात 14 महीने बाद बाबा साहब अंबेडकर संविधान सभा के सदस्य बने तब तक बी एन राव ने 243 आर्टिकल संविधान का प्रस्तावना उद्देश्य प्रस्ताव बनाकर तैयार कर दिया था

  जय हिन्द, जय भारत 🇮🇳🇮🇳

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

मोदी सरकार की उपलब्धि....



पहली उपलब्धि -

1. दुनिया के 25 सबसे ताकतवर देशों की हुयी सूची जारी, भारत आया नम्बर 3 पर, हम से आगे अमेरिका, रूस हैं।

यह है मोदी युग। 

दूसरी उपलब्धि - 

2. 1.4- 1.5 लाख करोड़ के पार पहुँचा जीएसटी का मासिक टैक्स कलेक्शन, ये है एक चाय वाले का अर्थशास्त्र। 

तीसरी उपलब्धि - 

3. नाथ सौर ऊर्जा संयन्त्र लगाने में, अमेरिका और जापान को पीछे छोड़ , भारत पहुँचा दूसरे स्थान पर। 

चौथी उपलब्धि - 

4. 2024-25 में दो गुना हुआ, सौर ऊर्जा का उत्पादन, चीन और अमेरिका भी दंग है।

पाँचवी उपलब्धि - 

5. भारत की आसमान छू रही, जीडीपी को देखकर, भारत की जीडीपी 8.2% , चीन की 6.7% और अमेरिका की 4.2%, अब भी कहेंगे, भारतीय की मोदी विदेश क्यों जाते हैं।

छठी उपलब्धि - 

6. जल,थल और आकाश, तीनों क्षेत्रों से सुपरसोनिक मिसाइल दागने वाला, दुनिया का पहला देश बना भारत, ये है मोदी युग, अगर आपको गर्व हुआ हो, तो जय हिन्द लिखना न भूलें। 

सातवीं उपलब्धि - 

7. 70 सालों में पाकिस्तान को कभी गरीब नहीं देखा, लेकिन मोदी जी के आते ही पाकिस्तान कंगाल हो गया, दरअसल पाकिस्तान की कमायी का जरिया, भारतीय नकली नोटों का व्यापार था, जिसे मोदी जी ने ख़त्म कर दिया। 

आठवीं उपलब्धि - 

8. को भी पढ़ें, एक बात समझ में नहीं आयी, 2014 में कांग्रेसी रक्षामन्त्री ऐ. के. एन्टोनी ने कहा था, देश कंगाल है, हम राफेल तो क्या, छोटा जेट भी नहीं ले सकते, पर मोदी जी ने ईरान का कर्ज़ भी चुका दिया, राफेल डील भी करली, S-400 भी ले रहे हैं। शिप भी खुद बना रहे है आख़िर कांग्रेस के समय देश का पैसा कहाँ जाता था...?

नवीं उपलब्धि - 

9. सेना को मिला बुलेटप्रूफ स्कार्पियो का सुरक्षा कवच, जम्मू कश्मीर में मिली सेना को 2500 बुलेटप्रूफ स्कार्पियो।

दसवीं उपलब्धि - 

10. अब आपको बताता हूँ , भारत का इन 11 सालों में विकास क्या हुआ, अर्थ व्यवस्था में जापान को पीछे ढकेल नम्बर 4 बना।

ग्यारहवीं उपलब्धि - 

11. ऑटो मार्केट में जर्मनी को पीछे छोड़ नम्बर 4 बना।

बारहवीं उपलब्धि - 

12. बिजली उत्पादन में रूस को पीछे छोड़ नम्बर 3 बना।

तेरहवीं उपलब्धि  -

13. टेक्सटाइल उत्पादन में इटली को पीछे छोड़ नम्बर 2 बना।

चोदहवीं उपलब्धि - 

14. मोबाइल उत्पादन में वियतनाम को पीछे छोड़ नम्बर 2 बना। 

पन्द्रहवी उपलब्धि - 

15. स्टील उत्पादन में जापान को पीछे छोड़ नम्बर 2 बना।

 सोलहवीं उपलब्धि - 

16. चीनी उत्पादन में ब्राजील को पीछे छोड़ नम्बर 1 बना ।

सतरहवीं उपलब्धि - 
17. एक अर्थशास्त्री द्वारा विदेशों में गिरवी रखा सोना वापिस लाया ।

18. हमेशा सोये रहने वाले हिन्दुओं में राष्ट्रवाद जगा दिया, पूरी दुनिया के सवा सौ करोड़ हिन्दुओं का एक भी राष्ट्र नहीं है। मैं इस काम को सबसे महत्वपूर्ण मानता हूँ। 

आतंकियों का सफाया '8' महीनों में 230 आतंकियों को 72 हूरों के पास जहन्नुम में पहुँचाया ।

कृपया करके  - 2 मिनट का समय निकाल कर इसे देश हित में अवश्य शेयर करें विशेष रूप से मोदी जी से अविश्वास करने वाले लोगों को...!

 जय हिन्द जय भारत 🙏🇮🇳

शनिवार, 27 सितंबर 2025

लद्दाख को जलाने में किसकी साजिश??

महज़ कुछ ही दिनों पहले मैंने कहा था कि.. चमचों के राज कुमार विदेश दौरे पर हैं और वह अपने साथ कुछ नया प्रोडक्ट साथ में लाने वाले हैं. इसके लिए भाजपा और सरकार को तैयार रहना चाहिए.... 

विदेशी वामपंथी डीप स्टेट और भारत में रह रहे उसके कालनिमी एजेंटों द्वारा, कैसे एक खुशहाल गणतांत्रिक देश को आग में झोंका जा सके..!! उसका ताजातरीन उदाहरण भारत के केन्द्र शासित राज्य लद्दाख है. डीप स्टेट द्वारा कैसे एक इंसान की इमेज को देश-दुनिया में स्थापित करके, उसका उपयोग किसी देश के खिलाफ किया जा सकता है... उसका बड़ा उदाहरण बांग्लादेश का मोहम्मद यूनुस और भारत का सोनम वांगचुक है. 

मोहम्मद यूनुस का इतिहास तो आप लोगों को पता है, परंतु सोनम वांगचुक का पता नहीं होगा..! आप लोगों को थ्री इडियट्स फिल्म तो #याद होगा, उस फिल्म में आमिर खान ने जो भूमिका निभाई है.. वह असलियत में सोनम वांगचुक ही है.. और इसी बात से आप लोगों को पता चल गया होगा कि.! कैसे सोनम वांगचुक को विदेशी डीप स्टेट द्वारा स्थापित किये जा रहे थे, ताकि उसका उपयोग भारत में अशांति फैलाया जा सके. 

खबर है कि, सोनम वांगचुक की 9 बैंक अकाउंट में से 8 अकाउंट फर्जी निकले हैं..! CBI ने इस तथाकथित कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित एक संस्था के द्वारा FCRA उल्लंघन की जांच शुरू की, अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है. वांगचुक द्वारा स्थापित संस्था के द्वारा FCRA कानून के उल्लंघनों की, CBI द्वारा जाँच शुरू करना इस बात पर प्रकाश डालता है कि, समाज में रह रहे उच्च-प्रोफ़ाइल कार्यकर्ता और शिक्षाविद् भी कानून से ऊपर नहीं हैं.. FCRA नियम विदेशी धन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए हैं, और किसी भी उल्लंघन के, गंभीर राष्ट्रीय परिणाम हो सकते हैं. दुनिया भर के ये सभी तथाकथित कार्यकर्ता डीप स्टेट के पैसे वाले पिट्ठू हैं. उन्हें उन गतिविधियों के लिए पैसे मिलते हैं जिनकी वे योजना बनाते हैं और ये पिट्ठू टूल किट का पालन करते हैं. 

विदेशी और देसी डीप स्टेट द्वारा, लद्दाख में कैसे आग लगाई गई, चलिए उस पर थोड़ा चर्चा कर लेते हैं.. यह जो तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता, सोनम वांगचुक है, वह कई सालों से ही अंदरखाने भारतीय सरकार के खिलाफ काम कर रहा था.. जो देश की सेना और देश की विकास पे बाधा डाल रहा था. उस पे केन्द्र सरकार पिछले 2 सालों से बारीकियों से नजर रख रही थी एवं उसके हर गतिविधियों पर भी एजेंसियों का नज़र था. 

भारत का केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने एवं राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर विदेशी टुलकिट गैंग के तथाकथित स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ता... सोनम वांगचुक ने 35 दिनों के धरने का एलान किया था.! भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर 2025 को लेह, लद्दाख में भड़की हिंसा को लेकर एक बयान जारी किया जिसमें सोनम वांगचुक को उत्पात भीड़ को उकसाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया.. सरकार के अनुसार, वांगचुक ने 10 सितंबर 2025 को लद्दाख को छठी अनुसूची में दर्जा और राज्य का दर्जा देने के #मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. 

केन्द्र सरकार के अधिकारियों ने बताया है कि, केंद्र इन मुद्दों पे एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति, एक उ-समिति और कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से और शीर्ष निकाय लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ सक्रिय बातचीत कर रहा है. सरकार ने कहा कि इस व्यवस्था से पहले ही अभूतपूर्व परिणाम सामने आए हैं, जिनमें लद्दाख में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 45% से बढ़ाकर 84% करना, परिषदों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण और भोटी व पुर्गी को आधिकारिक भाषा घोषित करना शामिल है. 1,800 पदों पर भर्ती भी शुरू हो चुकी है. हालांकि बयान में आरोप लगाया गया है कि "कुछ राजनीति से प्रेरित व्यक्ति" इस प्रगति से नाखुश हैं और बातचीत को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं. अगली उच्च स्तरीय समिति की बैठक 6 अक्टूबर को होगी, जबकि लद्दाखी नेताओं के साथ अतिरिक्त बैठकें 25 और 26 सितंबर को निर्धारित हैं. सरकार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक द्वारा उठाई गई माँगें पहले से ही एचपीसी में चर्चा का हिस्सा थीं. सरकार ने कहा कि कई नेताओं द्वारा अनशन समाप्त करने की अपील के बावजूद भी वांगचुक ने अपना अनशन जारी रखा और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में GEN-Z विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया. 

24 सितंबर 2025 को लगभग 11:30 बजे, वांगचुक के भाषणों से कथित रूप से उकसाई गई एक भीड़ ने अनशन स्थल छोड़ दिया और लेह में एक राजनीतिक दल के कार्यालय और मुख्य कार्यकारी पार्षद CEC के कार्यालय पर हमला कर दिया। बयान में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों ने इन कार्यालयों में आग लगा दी, एक पुलिस वाहन को आग लगा दी, सुरक्षाकर्मियों पर हमला किया, जिसमें 30 से ज्यादा पुलिस एवं CRPF कर्मी घायल हो गए..! भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति को भी नष्ट करना और सुरक्षा बलों पर हमला करना जारी रखा. पुलिस ने आत्मरक्षा के लिए ऑपरेशन शुरू की, जिसमें कई लोग हताहत हुए. सरकार ने शाम 4 बजे तक स्थिति पर नियंत्रण पा लिया गया.. हिंसा के बीच, वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रयास किए बिना" एम्बुलेंस से अपने गाँव चला गया.. यह फुंगशुक वांगडू उर्फ रैंचो ने ही लद्दाख और उत्तराखंड में, हमारे #सेना के लिए जो स्ट्रक्चर बनाए जा रहे थे, #पर्यावरण के नाम पर उन सभी प्रोजेक्टों को लटकाने के लिए बहुत प्रयास किया था..! इसके पाकिस्तान दौरा भी CBI के जांच में है..

साभार वंदे मातरम

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

Happy Birthday Namo जी ❤️

राम यज्ञ से पैदा हुए थे, आकाश पुत्र थे। उनकी पत्नी सीता भूमि से पैदा हुई थी, भूमिजा थी, वन्य कन्या थी। राम सारी उम्र अरण्य के पशुओं और ग्राम के मानवों को मॅनेज करने में लगे रहे, पशुओं को इंसान बनाते रहे। राम ग्राम वासी भी थे और वनवासी भी। राम शिव भक्त भी है इसलिए राम के फैसलो में, भाव में दिगम्बर परम्परा दिखती है। माँ के कहने पर राज्य त्याग दिया, आभूषण त्याग दिए, मुकुट त्याग दिया। धोबी के कहने पर रानी सीता त्याग दी। "जीवन पर्यन्त नियमों का पालन करते रहे, नियम सही हो या गलत उन्हें पालन करना ही था।"

इसके विपरीत कृष्ण कभी किसी बंधन में नहीं रहे। उनके ऊपर परिवार का सबसे बड़ा बेटा होने का भार नहीं था। वो छोटे थे इसलिए स्वतंत्र थे और चंचल भी। मर्यादा का भार नहीं था उनपर। उन्होंने अरण्य और ग्राम में बॅलेंन्स साधने की कोशिश कभी नहीं की। उन्होंने वन को ही मधुवन बना लिया। गलत नियम मानने को बाध्य नहीं थे कृष्ण। अतः उन्होंने नियमों को नहीं माना। राम वचन के पक्के थे, उन्होने अयोध्या वासियों को वचन दिया था कि चौदह वर्ष बाद लौट आऊँगा। समय से पहुँचने के लिए उन्होंने पुष्पक विमान का उपयोग किया। 

कृष्ण ने गोपियों को वचन दिया था, मथुरा से लौट कर जरुर आऊँगा, वो कभी नहीं लौटे। राम ने गलत सही हर नियम माना, कृष्ण ने गलत नियम तोड़े। राम के राज्य में एक मामूली व्यक्ति रानी पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नियम के तहत गॉसिप कर सकता था,  मगर कृष्ण को शिशुपाल भी सौ से ज्यादा गाली नहीं दे सकते थे। राम मदद तभी करते है जब आप खुद लड़ो। वो पीछे से मदद करेंगे। सुग्रीव को दो बार बाली से पिटना पड़ा तब राम ने बाण चलाया। कृष्ण स्वयं सारथी बन के आगे बैठते हैं।

नरेंद्र मोदी को देखिए। वो भी त्यागने की बात करते हैं। पुराने नोट त्याग दो, दो नम्बर का पैसा त्याग दो, गैस सब्सिडी त्याग दो। उनके सारे फैसले राज-धर्म, संविधान के अनुरूप ही होते है, भले ही संविधान का वो नियम सही हो या गलत। मोदी हमेशा अरण्य और ग्राम में बैलेंस साधने की कोशिश करते हैं। 'सबका साथ सबका विकास'। वो पशुओं को मानव बनाने का प्रयास करते हैं। 

अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम अपना पराया कोई भी उन्हें 24  घण्टे गाली दे सकता है। मोदी में दिगम्बर भाव है, सब त्याग बैठे हैं, अपमान सम्मान सब। आपकी गालियों से उन्हें ताकत मिलती है। विरोध के अधिकार के नाम पर आप उनकी नाक के नीचे सड़क जाम कर महीनों बैठ सकते हैं। वो देश के बड़े बेटे है, नियम अनुरूप ही आचरण करेंगे। भेदभाव करते हुए नहीं दिख सकते।

वहीं योगी आदित्यनाथ को देखिए। उसी अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर एक उन्हें एक गाली दे दीजिए, 24 घण्टे के अंदर आप पर मुकदमा होगा औऱ 48  घण्टे में जेल में होंगे। कनिका कपूर मुंबई, दिल्ली, लखनऊ कानपुर गई। कहीं मुकदमा दर्ज नहीं हुआ उस पर सिवाय यूपी के। "आपिये दिन रात फ़र्ज़ी खबरें शेयर करते हैं"  मोदी के विरोध मे। मोदी प्रतिक्रिया  नहीं देते। योगी आदित्यनाथ पर एक फ़र्ज़ी ट्वीट में ही राघव चड्ढा पर मुकदमा दर्ज हो जाता है। 

जिस विरोध के अधिकार के तहत दिल्ली में सौ दिन से ज्यादा प्रदर्शन होता रहा, उन्हीं नियमों के तहत यूपी में एक भी प्रदर्शन नहीं चल पाया। राजनीति का नियम है कि सरकार बदलने पर बदला नहीं लिया जाता लेकिन योगी जी ने आज़म खान के पूरे परिवार को जेल में सड़ा दिया। मोदी का भाव दिगम्बर है योगी का आचरण दिगम्बर है। मोदी तब मदद करेंगे जब आप खुद लड़ोगे। योगी शंखनाद होते ही रथ की लगाम थाम लेते हैं।

मोदी ट्रेंड फॉलो करते है.....          ..
योगी ट्रेंड सेट करते हैं.... क्रिएट करते हैं, 

यू हॅव राम इन त्रेता.... यू हैव कृष्ण इन द्वापर।
"यू हैव बोथ इन कलयुग"  

हैप्पी बर्थडे मोदी जी ( be later)
(जोया मंसूरी)

संविधान V/S कांग्रेस का संविधान..

भीम राव अंबेडकर  के संविधान में....
 (1)वक्फ बोर्ड नहीं था।
(2) मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नहीं था।
(3) अल्पसंख्यक बोर्ड नहीं था।
(4) मदरसों को सरकारी पैसा नहीं था।
(5) मौलवी को सरकारी तनख्वाह नहीं थी।
(6)सभी पुरषों को समान अधिकार था।
(7) सभी महिलाओं को समान अधिकार था।

कांग्रेस पार्टी का संविधान

(1) वक्फ बोर्ड है।
(2)मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड है।
(3) अल्पसंख्यक बोर्ड हैं।
(4) मदरसों को सरकारी पैसा है।
(5)मौलवियों को सरकारी तनख्वाह है।
(6) सभी महिलाओं को समान अधिकार नहीं है। मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद गुजारा भत्ता तक नहीं है।
(7) सभी पुरषों को समान अधिकार नहीं है,हिन्दू 1 शादी करेगा तो मुस्लिम 4 शादी कर सकता है।

कांग्रेस पार्टी का सेकुलरवाद एवं धर्म निरपेक्षता।

(1) मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड हो सकता है हिन्दू पर्सनल बोर्ड नहीं।
(2) मुस्लिम वक्फ बोर्ड हो सकता है हिन्दू वक्फ बोर्ड नहीं।
(3) मुस्लिम 4 शादी कर सकता है हिन्दू नहीं।
(4)मदरसों में धार्मिक शिक्षा देने के लिए भारत सरकार पैसा देगी हिन्दू अपनी धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकता है।
(5) मस्जिद का पैसा मस्जिद कमेटी लेगी हिन्दू मंदिरों का पैसा सरकार लेगी।
(6)मुस्लिम भारत में दूसरे स्थान पर है फिर भी अल्पसंख्यक है। हिन्दू 8 राज्य मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम , लक्षद्वीप, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, पंजाब, और जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक है फिर भी उन्हें बहुसंख्यक बताया गया।

समाज मे ऐसे दोहरे चरित्र से क्या असर पड़ेगा लोग एक दूसरे से नफरत करने लगते है नफरत का बीज बोया गया और आज नफरत शुरू हो गई तो बोलते है हिन्दू मुस्लिम हो रहा है ।

 हिन्दू मुस्लिम के बीच नफरत की दीवार कॉंग्रेस पार्टी ने ही खड़ी कर दी। आज लोग बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जी के संविधान के अनुसार अपना अधिकार मांग रहे है बस सबको समान अधिकार चाहिए जब हिन्दू अपने ही देश मे अपना अधिकार मांग रहा है तो कॉंग्रेस बोलती है हिन्दू मुस्लिम हो रहा है।।
2014 के पहले सिर्फ मुस्लिम मुस्लिम होता था।।🔥🔥🔥

सोमवार, 15 सितंबर 2025

भगवा क्रांति कब ??

कुछ दिन पहले भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा :- 

"अगर इस देश में धार्मिक हिंसा भड़काने के लिए कोई जिम्मेदार है, तो वह सुप्रीम कोर्ट और उसके जज हैं!"

उनके इस बयान से बड़ा विवाद खड़ा हो गया और विपक्षी दलों ने उनकी कड़ी आलोचना की। हालांकि, जाने-माने वैज्ञानिक, लेखक और वक्ता आनंद रंगनाथन ने दुबे का पूरा समर्थन करते हुए एक वीडियो बयान जारी किया। 

धाराप्रवाह अंग्रेजी में रंगनाथन ने सुप्रीम कोर्ट से 9 शक्तिशाली सवाल पूछे। ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं।इसका नीचे एक संक्षिप्त सारांश दिया गया है :-

आनंद रंगनाथन के सुप्रीम कोर्ट से 9 सवाल:

1. 'कश्मीर मुद्दे पर दोहरे मापदंड:' सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के खिलाफ विपक्षी दलों की याचिकाओं पर तुरंत विचार किया। लेकिन जब 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ़ अत्याचारों के बारे में याचिकाएँ दायर की गईं - जैसे जबरन विस्थापन, घरों पर कब्ज़ा, मंदिरों को तोड़ना, हत्याएँ, बलात्कार और सामूहिक पलायन - तो उन्हें कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि, "यह बहुत पहले हुआ था।"

क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है ? 
क्या इससे हिंदुओं में गुस्सा नहीं पैदा होता? 
क्या यह धार्मिक संघर्ष का कारण नहीं बनता ?*

2. 'वक्फ बोर्ड के दुरुपयोग पर चुप्पी:` सुप्रीम कोर्ट अब वक्फ बोर्ड के सुधारों को लेकर चिंतित है। लेकिन पिछले 30 वर्षों में, वक्फ बोर्ड ने अवैध रूप से संपत्ति जब्त की, करों taxes से परहेज किया और एक समानांतर न्यायिक प्रणाली संचालित की - फिर भी कोर्ट चुप रहा। यदि सुधारों को इस्लाम के लिए खतरा माना जाता है, तो हिंदू भूमि पर मस्जिद और दरगाह बनाना कैसे स्वीकार्य था? 

वक्फ बोर्ड ने 2 मिलियन से अधिक हिंदुओं की संपत्ति जब्त की। सुप्रीम कोर्ट चुप रहा। अगर यह धार्मिक पक्षपात नहीं है, तो क्या है ?

3. `मंदिरों का धन कहीं और खर्च किया जाता है, हिंदुओं पर प्रतिबंध:` हिंदू मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण है। उनकी आय का उपयोग मदरसों, हज यात्राओं, वक्फ बोर्ड, इफ्तार दावतों और ऋणों के लिए किया जाता है। लेकिन हिंदू धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध हैं। हिंदू अधिकारों से संबंधित याचिकाएँ अक्सर खारिज कर दी जाती हैं। अल्पसंख्यकों को हमेशा विशेष प्राथमिकता दी जाती है। 

क्या यह उचित है ? या यह हिंदुओं के गुस्से को भड़काने का एक तरीका है ?

4. `हिंदुओं के खिलाफ शिक्षा में भेदभाव:` शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत, हिंदू स्कूलों को अल्पसंख्यकों के लिए 25% सीटें आरक्षित करनी पड़ती है । लेकिन मुस्लिम और ईसाई संस्थानों को इस नियम से छूट दी गई है। हजारों हिंदू स्कूलों को बंद करना पड़ा, और हिंदू बच्चे अब गैर-हिंदू संस्थानों में पढ़ते हैं।

क्या यह धर्म परिवर्तन को बढ़ावा नहीं दे रहा है ? 
सुप्रीम कोर्ट इस एकतरफा नियम को क्यों नहीं देखता ?

5. `स्वतंत्र भाषण का पाखंड:` जब हिंदू बोलते हैं, तो इसे “घृणास्पद भाषण” कहा जाता है। जब दूसरे बोलते हैं, तो इसे "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कहा जाता है। नुपुर शर्मा ने केवल हदीस से उद्धरण दिया, और न्यायालय ने इसे घृणास्पद भाषण कहा। लेकिन जब स्टालिन और अन्य नेताओं ने सनातन धर्म को "बीमारी" कहा, तो न्यायालय चुप रहा। 

क्या यह न्याय है ?

6. `हिंदू परंपराओं पर पक्षपातपूर्ण प्रतिबंध:` सर्वोच्च न्यायालय ने दशहरा पशु बलि जैसी हिंदू प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन ईद के दौरान सामूहिक हलाल पशु वध के बारे में कोई सवाल नहीं उठाया गया। जन्माष्टमी के दौरान, दही हांडी समारोह में ऊंचाई प्रतिबंध का सामना करना पड़ता है। लेकिन मुहर्रम से संबंधित हिंसा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। दिवाली के पटाखों को पर्यावरण के लिए हानिकारक कहा जाता है, लेकिन क्रिसमस की आतिशबाजी की कोई आलोचना नहीं होती।

क्या यह भेदभाव नहीं है?

7. `पूजा स्थल अधिनियम हिंदू पुनर्स्थापना को रोकता है:` 1991 के पूजा स्थल अधिनियम में यह अनिवार्य किया गया है कि 15 अगस्त, 1947 तक के स्थानों के धार्मिक चरित्र को नहीं बदला जाना चाहिए। यह कानून हिंदुओं को उन प्राचीन मंदिरों को पुनः प्राप्त करने से रोकता है जिन्हें मुस्लिमों शासकों ने नष्ट कर दिया था या परिवर्तित कर दिया था। राम मंदिर के लिए कई दशकों तक लड़ाई लड़नी पड़ी। कई अन्य मंदिरों पर अतिक्रमण जारी है। 

क्या यह ऐतिहासिक अन्याय नहीं है?

8. `केवल हिंदू परंपराओं को निशाना बनाना:` सबरीमाला मामले में, न्यायालय ने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाई। कुछ हिंदू मंदिरों में केवल पुरुषों या केवल महिलाओं के रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। लेकिन न्यायालय ने केवल हिंदू परंपराओं पर सवाल उठाया। इस्लाम में, महिलाएँ मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकती हैं या कुछ खास परिस्थितियों में कुरान नहीं पढ़ सकती हैं। ईसाई धर्म में, महिलाएँ पुजारी नहीं बन सकती हैं। 

न्यायालय ने उन धर्मों पर सवाल क्यों नहीं उठाया?

9. `सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान निष्क्रियता:` शाहीन बाग़ विरोध और सीएए विरोधी दंगों के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक सड़कें जाम कर दीं, लेकिन न्यायालय ने इसे नहीं रोका।

क्या यह कानून का मज़ाक नहीं है? क्या इससे भी हिंदुओं का गुस्सा नहीं बढ़ा ?

यह शक्तिशाली संदेश सभी तक पहुँचना चाहिए।

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

अहीर और मुस्लिम से विवाह संबंध..

 लालमणि गोंड़ संवाददाता शु'द्र  अहीर (ग्वाला) और मुगल वैवाहिक संबंध 🫣👇

(1). सन् (1299) 2 जनवरी को दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने रेवाड़ी के दास अहिर की बड़ी बेटी नीरा से विवाह किया

(2). सन् (1688) 15 जून को नूरशाह ने रीति अहिर से विवाह किया ने

 (3). सन् (1405) 30 जनवरी को फर्रुखसियार ने मजनी अहिर से विवाह किया

 (4). सन् (1509) 31 अक्टूबर को अहमदशाह ने चेऊरी अहिर से विवाह किया

(5). सन् (1630) 18 सितंबर को अहमदशाह खान ने रीतु अहिर से विवाह किया

 (6). सन् (1909) 19 अगस्त को महमूदशाह खान ने झरूखी अहिर से विवाह किया

 (7). सन् (1206) 30 दिसंबर को तुर्क मुरखाद खा ने मयूरी अहिर से विवाह किया था

(8). सन् (1923) 16 मार्च को असरूला खा ने लाल अहीर की दो पुत्रियों से विवाह किया था

 (9). सन् (1796) 23 अप्रैल को आदिलशाह ने चित्रा अहिर से विवाह किया

(10). सन् (1866) 9 नवंबर को रूप दुल्लाशाह खा ने चिंतामणि अहिर से विवाह किया

(11). सन् (1931) 13 फरवरी को सुरलाल अहिर की पुत्री कयुमी अहिर का विवाह हैदराबाद के नवाब गुरुफ्फा खां से

 (12). सन् (1616) 29 जुलाई को सलीमुल्लाह जहां का विवाह जंनवी अहिर से हुआ!

सोमवार, 24 मार्च 2025

राणा सांगा ने बाबर को आमंत्रण दिया क्या ?

अहमद यादगार एक अफगानी इतिहासकार थे जिसने एक किताब लिखी है - तारीख ऐ सलतनत ऐ अफ़ग़ान। इस किताब के एक अंश पर निगाह फेरनी जरुरी है। 

कालखंड - 
बाबर काबुल में मौजूद है और अपने लड़के कामरान के निकाह की तैयारी में मशरूफ है। 

देहली में सुल्तान इब्राहिम लोधी सत्ताशीन है - उसका चाचा दौलत खान लोदी पंजाब का सूबेदार है. सुल्तान ने अपने चाचा को देहली बुलवाया और चाचा ने खुद ना जाकर अपने लड़के दिलावर खान को भेज दिया। सुल्तान इब्राहिम लोदी अपनी हुक्मउदूली देख नाखुश हुआ और उसने अपने चचाजाद को पकड़ने का हुक्म दिया। दिलावर वहां से जान बचा कर भगा और लाहौर आ अपने बाप को इतिल्ला दी। बाप - दौलत खान लोदी की पेशानी पर चिंता साफ़ थी - सुल्तान उसे ना बख्शेगा - अब सुल्तान को देहली की गद्दी से पृथक करने में ही उसकी और उसके लड़के की जान बच सकेगी। दौलत खान लोदी ने तुरंत दिलावर खान और आलम खान को काबुल रवाना किया जहाँ बाबर शाह मौजूद था। 

काबुल में पहुंच दिलावर ने चार बाग़ में बाबर से मुलाकात की। बाबर ने उस से पुछा- तुम ने सुल्तान इब्राहिम का नमक खाया है तो ये गद्दारी क्यों ?

दौलत खान लोदी के लड़के ने उत्तर दिया - लोदी कुनबे ने चालीस साल तक सत्ता संभाली है किन्तु सुल्तान इब्राहिम ने सब अमीरो के साथ बदसलूकी की है - पच्चीस अमीरों को मौत के घाट उतार दिया है किसी को फांसी पर लटका कर , किसी को जला कर। उसकी खुद की जान के वांदे है - और उसे अनेक अमीरों ने बाबर से मदद मांगने भेजा है। 

निकाह में मशरूफ बाबर ने एक रात को मोहलत मांगी और चार बाग़ में इबादत की - आए मौला , मुझे राह दें - कुछ हिंट दे कि हिन्द पर हमला कर सकूँ। बाबर ने दुआ में कहा - यदि हिन्द में होने वाले आम और पान यदि उसे तोहफे में दिए जाएंगे तो वो मान लेगा कि खोदा चाहता है कि वो हिन्द पर आक्रमण करें। 

अगले दिन - दौलत खान के दूतों ने उसे अधपके आम जो शहद में डूबे हुए थे- पेश किये। 
 
ये देख बाबर उठ खड़ा हुआ - आम की टोकरी देख वो सजदे में झुक गया और अपने सिपहसालारों को हिन्द पर कूच करने का हुक्म दिया. 

ये है कहानी बाबर को न्योता देने की - दौलत खान लोदी द्वारा - अपने बेटे की जान बचाने हेतु. 

इस कहानी का रिफरेन्स दो किताबों से आप देख सकते है -

१- annette बेवरिज की अनुवादित बाबरनामा से - इस किताब से वो पन्ना भी पोस्ट में सगंलग्न देखिये. 
२- एलियट एंड डॉब्सन की किताब हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया वॉल्यूम पांच में इसी अफगानी इतिहासकार का सन्दर्भ बिलकुल यही है।

अब भी इस साक्ष में किंतु परंतु अगर मगर , अरे ऐसा नहीं है, घंट पिंट पचास बहाने पेश करने वाले भी मिल जाएँगे- लेकिन सत्य तो यही है- कि बाबर आम देख हिन्द पे हमले करने को लालायित हो गया था। 

आम- ही वो अभियुक्त है जिसने बाबर को ललचाया।

शनिवार, 11 जनवरी 2025

मुस्लिम लड़कियों के हिंदू पति

सुनील दत्त - नर्गिस
संजय दत्त - दिलनवाज शैख़ (मान्यता)
ऋतिक रोशन - सुजेन खान
अतुल अग्निहोत्री - अलविरा खान
रोहित राजपाल - लैला खान
किशन चंदर - सलमा सिद्दीकी
नाना चुडास्मा - मुनिरा जसदानवाला
अजय अरोरा - सिमोन खान
आदित्य पंचोली - ज़रीना वहाब
अजीत आगरकर - फातिमा घन्दिल्ली
सुनील शेट्टी - माना कादरी
सचिन पायलेट - उमर अब्दुलल्ला की बहन
अरुण आहूजा (गोविंदा के पिताजी ) - नजीम
शिरीष कुंदर - फरहा खान
सुंदर c - खुशबू
अरुण गवली - आयशा
मनोज वाजपेयी - शबाना रजा
पंकज कपूर - नीलिमा अज़ीम
गुंडू दिनेश राव - तबस्सुम
अनिल धारकर - इम्तिआज़ गुल
शशि रेखी - वहीदा रहमान
राज बब्बर - नादिरा ज़हीर
कर्नल सोढ़ी - नफीसा अली
मयूर वाधवानी - मुमताज़
रंधावा - मलिका खान
विष्णु भागवत - निलोफर
किशोर कुमार - मधुबाला (मुमताज़ बेगम)
v s नाइपाल - नादिया
कबीर सुमन - सबीना यास्मिन
राजीव राय - सोनम (बख्तावर)
बी आर इशारा - रेहाना सुल्तान
समीर नेरुकर - तसनीम शैख़
अनुराग मोदी - शमीम
कमलेश्वर नाथ सहगल - जोहरा खान
विक्रम मेहता - तसनीम
सौमिल पटेल - अनीता अय्यूब
भारत चन्द्र नारा - जहा आरा चौधरी
टीनू आनंद - शहनाज
एम एस सथ्यु - शमा जैदी
रवि शंकर - रोशन आरा
प्रदीप चेरियन - फौजिया फातिमा
पंकज उधास - फरीदा
के एन सहाय - जाहिदा हुसैन
ब्रिज सदाना - सईदा खानम
निर्मल पांडे - कौसर मुनीर
विजय गोविल - तबस्सुम
अमित मोइत्रा - नाहिद करीमभॉय
रूप के शोरी - खुर्शीद जहाँ
हंसलाल मेहता - सफीना हुसैन
कुमुद मिश्रा - आयशा रजा
रणजीत बेदी - नाजनीन
मनोज प्रभाकर - फरहीन
रोहित रामकृष्णनन - शबनम मिलवाला
गनपत लाल भट्टी - शमशाद बेगम
आर के पूरी - शहनाज़ हुसैन
टी के सप्रू - ताजोर सुल्ताना
रमेश भगवे - जैनब
महेश कौल - चाँद उस्मानी
किशोर शर्मा - मलिका बानो
चमन लाल गुप्ता - असगरी बाई
राजा बहाद्दुर शिवेंद्र सिंह - यमन खान
हेमंत भोंसले - साजिदा
विवेक नारायण - सोनिया जहाँ
सारनाथ बेनर्जी - बेनी आबिदी
अशोक काक - जबीं जलील
सुमेध राजेंद्रन - मासूमाँ सय्यद
धीरज सिंह - सहर जहाँ
गौरव करण - फातिमा मेहंदी
मनीष तिवारी - नाजनीन शिफा
शिरीष गोडबोले - ज़रीना मोइदु
इन्द्रजीत गुप्ता - सुरैया
सीताराम येचुरी - सीमा चिश्ती
नरसिंह ज्ञान बहाद्दुर - जुबैदा बेगम
सुमित सहगल - शाहीन
अर्जुन प्रसाद - परनिया कुरैशी
बालगन्धर्व - गोहर जान कर्नाटकी
रणजीत मल्होत्रा - रुबीना बक्षी
गजेन्द्र चौहान - हबीबा रहमान
राजीव राव - सोनिया फतह
संजय भौमिक - सबा नकवी
पी जी सतीश - शकीला
मलिन गज्जर - उमैमा बंदूकवाला
सचिन उपाध्याय - नाजिया युसूफ
राजिव सिंह - सनोबर कबीर
रितेश पंड्या - रोही मिर्ज़ा
विन्दु - फरहा नाज़
अनिल विश्वास मेहरुन्निसा
कुणाल खेमू - सोहा अली खान

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

मनमोहन सिंह महान थे या गुलाम ?

आपको याद होगा लालकिले से प्रधानमंत्री के सम्बोधन देने के तुरंत बाद जब मनमोहन सिंह अपनी सीट पर बैठे माइक रह गया और वह सोनिया से कहते नजर आए "मैडम ठीक है ना"
वह एक ऐसा व्यक्तित्व बन गए थे जो पूरी की पूरी बॉडी लैंग्वेज से एक गुलाम नजर आता था।

 जब आप देश के प्रधानमंत्री थे तब देश में सैकड़ों आतंकवादी हमले हुए, लेकिन आप कभी देश के लिए कड़े फैसले लेते नज़र नहीं आये. क्या आपकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी देश की जनता के प्रति जो आतंकवाद से अपने अपने जिलों में जूझ रही थी. भ्रष्टाचार पर एक बार को ये भी कह दें कि आपके साथ के लोग कर रहे थे, लेकिन अंततः जिम्मेदारी तो आपकी ही थी न. 

2005
दिल्ली सीरियल ब्लास्ट (29 अक्टूबर, 2005)
दिवाली से ठीक पहले तीन स्थानों पर बम धमाके हुए। 60 से अधिक लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए।
जिम्मेदारी: लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद।

2006
वाराणसी ब्लास्ट (7 मार्च, 2006)
स्थान: संकट मोचन मंदिर और रेलवे स्टेशन
विवरण: दो बम धमाकों में 28 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए।
जिम्मेदारी: हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (HuJI)।

मुंबई ट्रेन ब्लास्ट (11 जुलाई, 2006)
स्थान: मुंबई की लोकल ट्रेनों में सात जगहों पर धमाके।
विवरण: 209 लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हुए।
जिम्मेदारी: लश्कर-ए-तैयबा और सिमी।

2007
समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट (18 फरवरी, 2007)
स्थान: हरियाणा के पास समझौता एक्सप्रेस ट्रेन।
विवरण: ट्रेन में दो बम धमाकों में 68 लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश पाकिस्तानी नागरिक थे।

हैदराबाद ब्लास्ट (25 अगस्त, 2007)
स्थान: लुंबिनी पार्क और गोकुल चाट भंडार
विवरण: दो धमाकों में 42 लोग मारे गए और 50 से अधिक घायल हुए।
जिम्मेदारी: इंडियन मुजाहिदीन।

2008
जयपुर ब्लास्ट (13 मई, 2008)
स्थान: जयपुर के विभिन्न स्थानों पर।
विवरण: आठ धमाकों में 63 लोग मारे गए और 216 घायल हुए।

अहमदाबाद ब्लास्ट (26 जुलाई, 2008)
स्थान: अहमदाबाद के विभिन्न स्थानों पर।
विवरण: 21 धमाकों में 56 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए।

दिल्ली ब्लास्ट (13 सितंबर, 2008)
स्थान: दिल्ली के विभिन्न स्थानों पर।
विवरण: पांच धमाकों में 30 लोग मारे गए और 90 घायल हुए।

26/11 मुंबई हमला (26-29 नवंबर, 2008)
स्थान: मुंबई (ताज होटल, ओबेरॉय होटल, नरीमन हाउस और CST स्टेशन)।
विवरण: पाकिस्तान से आए 10 आतंकवादियों ने हमला किया। 166 लोग मारे गए और 300 से अधिक घायल हुए।
जिम्मेदारी: लश्कर-ए-तैयबा।

2010
पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट (13 फरवरी, 2010)
स्थान: पुणे
विवरण: धमाके में 17 लोग मारे गए और 60 घायल हुए।
जिम्मेदारी: इंडियन मुजाहिदीन।

2011
मुंबई ब्लास्ट (13 जुलाई, 2011)
स्थान: झवेरी बाजार, ओपेरा हाउस, और दादर।
विवरण: तीन धमाकों में 26 लोग मारे गए और 130 घायल हुए।

दिल्ली हाई कोर्ट ब्लास्ट (7 सितंबर, 2011)
स्थान: दिल्ली हाई कोर्ट
विवरण: धमाके में 15 लोग मारे गए और 70 घायल हुए।
जिम्मेदारी: हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (HuJI)।

2013
पटना सीरियल ब्लास्ट (27 अक्टूबर, 2013)
स्थान: नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान गांधी मैदान।
विवरण: धमाकों में 6 लोग मारे गए और 85 घायल हुए।
जिम्मेदारी: इंडियन मुजाहिदीन।
फिर भी उन्होंने अपना iconic बयान दिया
"भारत के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है"। 
बाकी घोटाले की फैरीस्त इतनी लंबी है कि राज्यो से लेकर केंद्र तक कर फ़ाइल में एक घोटाला था।
 

इतिहास आपको एक रीढ़विहीन प्रधानमंत्री के तौर पर ही याद करेगी. 🙏

मंगलवार, 24 दिसंबर 2024

अंबेडकर क्या सच में इतने महान थे ?

अज्ञात लेखक की पोस्ट को शेयर कर रहा हूं। इस पोस्ट से संबंधित तथ्यों पर कोई सहमति असहमति नहीं है मेरी लेकिन इच्छा जरूर है कि इसका तथ्यात्मक विश्लेषण हो।

अंबेडकर क्या सच में इतने महान थे, जितना अम्बेडकर के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है ?

अम्बेडकर और उसका झूठा प्रचार बंद होना चाहिए। मैं कुछ मिथक रखता हूं अम्बेडकर से जुड़े हुए..

1-मिथक-अंबेडकर बहुत मेधावी थे।

सच्चाई -अंबेडकर पूरी जिंदगी में सदैव थर्ड डिग्री में पास हुए ।

2-मिथक -अंबेडकर बहुत गरीब थे!

सच्चाई -जिस जमाने में लोग फोटो नहीं खींचा पाते थे उस जमाने में अंबेडकर की बचपन की बहुत सी फोटो है वह भी कोट पैंट में!

3-मिथक- अंबेडकर ने शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया !

सच्चाई -अंबेडकर के पिता जी खुद उस ज़माने में आर्मी में सूबेदार मेजर थे!

4-मिथक- अंबेडकर को पढ़ने नहीं दिया गया।

सच्चाई -उस जमाने में अंबेडकर को गुजरात बढ़ोदरा के क्षत्रिय राजा सीयाजी गायकवाड़ ने स्कॉलरशिप दी और विदेश पढ़ने तक भेजा और ब्राह्मण गुरु जी ने अपना नाम अंबेडकर दिया।

5-मिथक- अंबेडकर ने नारियों को पढ़ने का अधिकार दिया!

सच्चाई- अंबेडकर के समय ही 20 पढ़ी लिखी औरतों ने संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया!

6- मिथक-अंबेडकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे!

सच्चाई -अंबेडकर ने सदैव अंग्रेजों का साथ दिया भारत छोड़ो आंदोलन की जम कर खिलाफत की अंग्रेजो को पत्र लिखकर बोला कि आप और दिन तक देश में राज करिए उन्होंने जीवन भर हर जगह आजादी की लड़ाई का विरोध किया

7-मिथक -अम्बेडकर बड़े शक्तिशाली थे!

सच्चाई- 1946 के चुनाव में पूरे भारत भर में अंबेडकर की पार्टी की जमानत जप्त हुई थी

8- मिथक-अंबेडकर ने अकेले आरक्षण दिया!

सच्चाई- आरक्षण संविधान सभा ने दिया जिसमे कुल 389 लोग थे अंबेडकर का उसमें सिर्फ एक वोट था आरक्षण सब के वोट से दिया गया था

9-मिथक-अंबेडकर बहुत विद्वान था।

सच्चाई-अंबेडकर संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।
स्थाई समीति के अध्यक्ष परम् विद्वान डाक्टर राजेंद्र प्रसाद जी थे।

10-मिथक-अंबेडकर राष्ट्रवादी थे।

सच्चाई-1931मे गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी से भारत के टुकड़े करने की बात कर दलितों के लिए अलग दलिस्तान की मांग की थी।

11-मिथक-अंबेडकर ने भारत का संविधान लिखा।

सच्चाई-जो संविधान अंग्रेजों के1935 के मैग्नाकार्टा से लिया गया हो और विश्व के 12 देशों से चुराया गया है , उसे आप मौलिक संविधान कैसें कह सकते है ? 

अभी भी सोसायटी एक्ट में 1860 लिखा जाता है।

12-मिथक- आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत थे।

सच्चाई- इसी आरक्षण को लेकर सरदार पटेल से अंबेडकर की कहा सुनी हो गई थी। पटेल जी संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गये थे बाद में नेहरू के कहने पर पटेल जी वापस आये थे।

सरदार पटेल ने कहा कि जिस भारत को अखण्ड भारत बनाने के लिए भारतीय देशी राजाओं, महराजाओं, रियासतदारों, तालुकेदारों ने अपनी 546 रियासतों को भारत में विलय कर दिया जिसमें 513 रियासतें क्षत्रिय राजाओं की थी।इस आरक्षण के विष से भारत भविष्य में खण्डित होने के कगार पर पहुंच जाएगा।

13-मिथक-अंबेडकर स्वेदशी थे।

सच्चाई-देश के सभी नेताओं का तत्कालीन पहनावा भारतीय पोशाक धोती -कुर्ता, पैजामा-कुर्ता, सदरी व टोपी,पगड़ी, साफा, आदि हुआ करता था।गांधी जी ने विदेशी पहनावा व वस्तुओं की होली जलवाई थी।
यद्यपि कि नेहरू, गाधीं व अन्य नेता विदेशी विश्वविद्यालय व विदेशों में रहे भी थे फिर भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे।अंबेडकर की कोई भी तस्वीर भारतीय पहनावा में नही है।अंबेडकर अंग्रेजिएत का हिमायती था।

बाकी कुछ मीम भी देख ही लीजिए आप लोग...

बुधवार, 18 दिसंबर 2024

रसूल ऐसा ही होता है ?


इस्लामी मान्यता है कि अल्लाह सब कुछ कर सकता है .और बिना किसी योग्यता के और बिना कोई परीक्षा लिए ही किसी को भी अपना नबी और रसूल नियुक्त कर सकता है .और इसी शक्ति का प्रयोग करके अल्लाह ने आदम से लेकर मुहम्मद तक इस एक लाख चौबीस हजार लोगों को अपना नबी और रसूल नियुक्त करके इस दुनियां में भेजा था .चूँकि मुहम्मद साहब अल्लाह के सबसे प्यारे रसूल थे .इसलिए आचार , विचार , व्यवहार सभी नबियों से अलग और अनोखे थे .वैसे तो उनके वचनों और जीवनी के बारे में अधिकांश जानकारी प्रमाणिक हदीसों में उपलब्ध हैं .जिनको मुसलमान धार्मिक ग्रन्थ भी मानते हैं .और उन पर ईमान रखते हैं .
ऐसी ही एक हदीस की किताब है , जिसका नाम " समाइल मुहम्मदिया الشمائل المحمدية " है जिसमे इमाम " अबू ईसा अत तिरमिजी " ने मुहम्मद साहब के निजी जीवन के बारे में लिखा है .इमाम तिरमिजी हि ० 210 से 279 तक जीवित रहे .इन्होने अपनी हदीस की किताब में कुल 417 हदीसें जमा की थीं , जो 56 बाब ( अध्याय ) में विभक्त हैं .लेकिन इस हदीस की किताब में मुहम्मद साहब के बारे में ऐसी ऐसी चौंकाने वाली बातें दी गयी है कि जिनको पढ़कर मुहम्मद साहब को रसूल तो क्या इन्सान कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा .चूँकि कुछ हदीसें काफी लम्बी हैं , इसलिए सारांश में केवल मुख्य जरूरी बातें हि दी जा रही है .मुहम्मद साहब का असली रूप देखिये और पढ़कर समझिये कि रसूल कैसा होता है .
1-रसूल के पाशविक दांत
अबू हुरैरा ने कहा कि एक व्यक्ति ने रसूल को खाने के लिए एक बकरी भेजी ,लेकिन उस समय रसूल के पास जिबह करने के लिए चाकू नहीं था ." इसलिए रसूल ने अपने दांतों से ही उसे फाड़ डाला ,और खा गए .यानि उन्होंने चाकू का प्रयोग नहीं किया "
" صلى الله عليه وسلم بِلَحْمٍ، فَرُفِعَ إِلَيْهِ الذِّرَاعُ، وَكَانَتْ تُعْجِبُهُ، فَنَهَسَ مِنْهَا‏.‏ "

English reference: Book 25, Hadith 158
Arabic reference: Book 26, Hadith 167

2-पशुओं का पिछला भाग उत्तम है 
"अब्दुल्लाह बिन जाफर ने कहा कि रसूल ने उस बकरी को खाते हुए कहा कि " पिछले हिस्से का मांस उत्तम होता है "
"وسلم، يَقُولُ‏:‏ إِنَّ أَطْيَبَ اللَّحْمِ لَحْمُ الظَّهْرِ‏.‏ "
English reference: Book 25, Hadith 162

Arabic reference: Book 26, Hadith 171

3-रसूल उंगलियाँ चाटते थे 
"कअब बिन मालिक ने कहा कि रसूल खाने के बाद अपने हाथ नहीं धोते थे , बल्कि चाट चाट कर अपनी उंगलियाँ साफ कर देते थे "
" عليه وسلم كَانَ يَلْعَقُ أَصَابِعَهُ ثَلاثًا‏ "
English reference: Book 23, Hadith 130

Arabic reference: Book 24, Hadith 137
4-रसूल के तेल से चीकट बाल
" अनस ने कहा कि रसूल सिर पर खूब तेल लगाकर मलते थे , और कभी कंघी नहीं करते थे सिर पर एक कपड़ा डाल लेते थे . लेकिन दाढ़ी में कंघी करते थे .जिस से उनका पूरा सिर तेल का कपड़ा लगता था "
"يُكْثِرُ دَهْنَ رَأْسِهِ وَتَسْرِيحَ لِحْيَتِهِ، وَيُكْثِرُ الْقِنَاعَ حَتَّى كَأَنَّ ثَوْبَهُ، ثَوْبُ زَيَّاتٍ‏. "
English reference: Book 4, Hadith 32

Arabic reference: Book 4, Hadith 33

5-रसूल के सिर में जुओं की फ़ौज 
"अनस बिन मलिक ने कहा कि रसूल "उम्मे हारान बिन्त मिलहान" के घर गए , जो "उदबा बिन सामित " कि पत्नी थी .उसने जब रसूल को खाना खिलाया तो देखा कि उनके सिर में जुएँ भरे हुए है . फिर वह जुएँ निकालने लगी . जिस से रसूल को नींद आ गयी .
"انها قدمت له الطعام وبدأوا في البحث عن القمل في رأسه. ثم نام رسول الله "
Sahih Bukhari-Volume 4, Book 52, Number 47: 
6-रसूल के घर में लिंग पूजा 
" आयशा ने कहा कि मैं रसूल को एक बर्तन में बिठा लेती थी ,और उनके गुप्तांग ( private Part ) पानी डालकर इस तरह से साफ करती थी , जैसे नमाज के लिए वजू किया जाता है .
اعتاد كلما النبي تهدف الى النوم في حين أنه كان جنبا، ليغسل فرجه ويتوضأ من هذا القبيل للصلاة. "

नोट - इस हदीस में गुपतांग ( private Part ) के लिए अरबी में " फुर्ज فرجه " शब्द प्रयोग गया है . जो अश्लील शब्द है यही शब्द कुरान की सूरा-अहजाब 33 :35 में "फुरूजहुम- فُرُوجَهُمْ रूप में आया है हिंदी कुरान में इस का अर्थ " गुप्त इन्द्रियां , या शर्मगाह बताया है .इसी तरह बुखारी कि जिल्द 1 किताब 5 के अध्याय "ग़ुस्ल" में 7 बार " फुर्ज " शब्द आया है .इस से पता होता है कि रसूल अपनी पत्नियों के के साथ मिलकर इस शब्द का प्रयोग करते थे 

Sahih al Bukhari Volume 1, Book 5, Number 286
7-रसूल का लिंग वजू करता था 
"मैमूना ने बताया कि रसूल को वजू करवाते समय उनकी औरतें रसूल के पैर नहीं धोती थीं , और पैरों बजाय उनका वीर्य से सना हुआ गुप्तांग धोया करती थी .और उसी का वजू कर देती थी .

"رواه ميمونة:
(زوجة النبي) يؤديها رسول الله الوضوء من هذا القبيل للصلاة لكنها لم يغسل قدميه. انه يغسل قبالة إفرازات من أجزاء حياته الخاصة ومن ثم سكب الماء على جسده.  
"
Sahih al Bukhari Volume 1, Book 5, Number 249:

8-बुढियां जन्नत नहीं जा सकतीं 
" हसन बसरी ने कहा कि एक बार रसूल के पास एक बूढ़ी औरत आई और बोली कि अप अल्लाह से मेरे लिए दुआ करिए कि वह मुझे जन्नत में प्रवेश करने दे ." रसूल ने उस से कहा कि बूढ़ी औरत जन्नत में नहीं जा सकती , यह सुन कर वह औरत रोते हुए वापिस चली गयी "
" فَقَالَتْ‏:‏ يَا رَسُولَ للهِ، ادْعُ اللَّهَ أَنْ يُدْخِلَنِي الْجَنَّةَ، فَقَالَ‏:‏ يَا أُمَّ فُلانٍ، إِنَّ الْجَنَّةَ لا تَدْخُلُهَا عَجُوزٌ "

English reference: Book 35, Hadith 230

Arabic reference: Book 36, Hadith 240

9-लाश दफ़न करने की विधि 
"अनस ने कहा कि जब रसूल की लडकी उम्मे कुलसुम की मौत हुयी रसूल की आँखों से आंसू निकल गए .औए दफ़न की तय्यारी हो रही थी . तभी रसूल बोले केवल वही व्यक्ति कबर के अन्दर उतारे जिसने पिछली रात सम्भोग नहीं किया हो .अबू तल्हा बोले मैंने नहीं किया . तब रसूल ने कहा तुम अन्दर उतरो "
"، فَقَالَ‏:‏ أَفِيكُمْ رَجُلٌ لَمْ يُقَارِفِ اللَّيْلَةَ‏؟‏، قَالَ أَبُو طَلْحَةَ‏:‏ أَنَا، قَالَ‏:‏ انْزِلْ فَنَزَلَ فِي قَبْرِهَا‏.

English reference: Book 44, Hadith 310

Arabic reference: Book 45, Hadith 327

दी गयी इन सभी हदीसों का गंभीर रूप से अध्ययन करते से यह निष्कर्ष निकलते हैं .1 . यदि कोई सचमुच का समझदार अल्लाह होता तो , वह अपने दांतों से जानवरों को फाड़ कर खाने वाले ,गंदे मैले , जुओं से भरे सिर वाले ,व्यक्ति को अपना रसूल कभी नहीं बनाता. 2 . और अगर मुहम्मद वाकई नबी और रसूल होता तो ,लिंग का वजू नहीं कराता .या अपनी औरतों से अपने लिंग पर जल नहीं डलवाता.वास्तव में मुहम्मद एक सनकी और मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति था , वर्ना वह अपनी पुत्री को दफ़न से पहले ऐसी शर्त क्यों रखता ,और ऐसा क्यों कहता कि बूढ़ी औरतें जन्नत में नहीं जा सकती .इस से यह भी पता होता है कि मुहम्मद जवान औरतों का शौक़ीन था .बताइए क्या रसूल ऐसा ही होता है ?
(200/54)

शनिवार, 21 सितंबर 2024

भारतीय मंदिरों का अधिग्रहण


सदियों से, हिंदू धार्मिक पहचान मंदिरों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। इन पवित्र स्थानों ने न केवल सीखने को बढ़ावा दिया बल्कि चर्चा और बहस के लिए मंच भी प्रदान किए। साथ ही भारतीय मंदिर अनंतकाल से संपदा के भंडार रहे है। वार्षिक मंदिर उत्सवों ने कई भक्तों को आकर्षित किया और सांस्कृतिकआदान-प्रदान और पारस्परिक संबंधों को सुविधाजनक बनाया।मंदिरों के आसपास व्यापारी संघों की उपस्थिति ने व्यापार केमाध्यम से समृद्धि में योगदान दिया। 

भारतीय मंदिर की इस परंपरा ने ना जाने कितने लुटेरों को भारत की ओर आकर्षित किया है- ना जाने कितने बर्बर डाकू आये और मंदिरों को ढा कर लूट कर चले गये। इस शृंखला में हालाँकि फोकस मंदिरों का सरकारी नियंत्रण रहेगा।

वर्ष ७११ में सबसे पहला पतन सिंध के मुलतान के मंदिरों का हुआ था जब प्राचीन सूर्य मंदिर जो श्रीकृष्ण पुत्र सांब द्वारा बनवाया गया था- उसे लूट क़ासिम ने भारतीय मंदिरों की इस अनचाही शृंखला का आग़ाज़ किया। पूर्व में इस विषय पर एक विस्तृत शृंखला पोस्ट हुई थी। मुलतान अर्थात् मूलस्थान का सूर्य मंदिर पहला उदाहरण था जब किसी मंदिर से स्वर्ण भंडार एवं मूर्ति आदि लूटी गई- फिर काष्ठ प्रतिमा स्थापित कर फिर से पूजा शुरू हुई हालाँकि शहर और मंदिर पर क़ब्ज़ा मज़हबियो के गैंग ने कर लिया था। 

मुलतान के इस मंदिर पर क़ब्ज़े से दो कारण सिद्ध हुए- पहला- मंदिर पर आये चढ़ावे आदि का पूर्ण नियंत्रण। दूसरा- हिंद से आने वाले प्रतिरोध को एक कवच मिलना। हालाँकि कालांतर में ये मंदिर भी पूर्ण रूप से ढाया गया। लेकिन इतिहास में मुलतान का ये मंदिर सर्वप्रथम सत्ता ने अपने क़ब्ज़े में लिया था। इस से पूर्व मंदिरों के पास ज़मीन, गाँव आदि का स्वामित्व रहता रहा था जो राजा महाराजा आदि प्रदान करते थे। तब टोटल कंट्रोल परंपरागत तरीक़े से पुजारी दल और उनके मुख्य महंत आदि के पास रहता था।

इस के तीन सौ साल बाद भारत पर मंदिरों पर हमले बढ़ने लगे- निरंतर हमले से पस्त हिंदू समाज संघर्ष करता रहा- पुजारी विग्रह की पवित्रता बनाये रखने हेतु भागते रहे, बलिदान देते रहे। सोमनाथ मंदिर भी कदाचित् ऐसा मंदिर रहा जो बारंबार हमले का शिकार बनता और पुनः उठ खड़ा होता। 

अनेक विदेशी यात्रियों ने इन वैभवशाली मंदिरों पर अनेक वृतांत लिखे है- अब्दुल रज़ाक़ , निकेतन, मानुची , टेवरनीयर, बर्नियर आदि आदि- लिस्ट अपार है। इस विषय पर भी अनेक पोस्ट आ चुकी है। तो ये बात तो साफ़ है- मध्यकाल में भारतीय मंदिरों का वैभव ग़ज़ब का था- सब अपने अपने तौरतरीक़ों से संचालन कर रहे थे- सत्ता का हस्तक्षेप ना के बराबर था।

बारहवीं शताब्दी में ऐबक से शुरू हुआ मंदिरों का विध्वंस औरंगज़ेब काल तक एक विकृत रूप ले चुका था- अनगिनत देवस्थान या विध्वंस किए गए , लूटे गये, क़ब्ज़ा किए गए या फिर दीनहीन अवस्था को प्राप्त हुए। यही कारण है कि भारत के अनेक देवस्थान और पौराणिक स्थानों पर अवैध इमारतों का आज भी जमावड़ा है।

ऐबक के आने के बाद भारत में एक मेजर चेंज आया- अब ये लुटेरे गजनवी आदि की भाँति लूट कर वापस जाने के लिए नहीं आए थे- अब ये देहली में लूट का अड्डा बना रहते- भारत के भिन्न भिन्न स्थानों में डकैती डालते। साथ साथ में जज़िया कर वसूलते। जज़िया कर के भी अलग अलग स्वरूप थे। मसलन सूर्यग्रहण पर होनी वाली मंदिरों और गंगा तट पर होनी वाली पूजा पर भी पहले ही एकमुश्त रक़म जज़िया के रूप में जमा करवानी होती ताकि जनमानस अपने आराध्याओ को पूज सकें। यही क़ानून मंदिरों पर भी लागू था।

एक उदाहरण के तौर पर तिरूपति मंदिर को ही लीजिए। ऐसा नहीं था कि यहाँ डकैती डालने की चेष्टा इन लुटेरों ने नहीं की। इस स्थान का वैभव तो हर किसी की विदित था। अलाउद्दीन ख़िलजी के नरभोगी यार काफ़ूर ने बाक़ायदा सैन्य अभियान चलाया किंतु यहाँ के वराह मंदिर के विषय में सुन टिड्डों का दल वापस चला गया। किंतु औरंगज़ेब के समधी गोलकोंडा का सुल्तान अब्दुल्ला क़ुतुब शाह ने वो कार्य भी कर डाला। तिरूपति पर किए हमले में उसने अकूत दौलत लूटी- मंदिर को हानि भी पहुँचाई। लेकिन उसके वज़ीरों ने उसे समझाया इस स्थान को नष्ट करने का मतलब होगा सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को हलाल कर देना। लिहाज़ा सुल्तान ने भारी भरकम वार्षिक कर लगा कर मंदिर को संचालित होने दिया। मंदिर सुचारू रूप से चलता रहा- कर भरते रहे। भक्त गण आकर पूजा कर अपार संपत्ति जमा करते रहे। 

मुग़ल काल के आते आते कहानी में अब ट्विस्ट आया। मथुरा काशी आदि में विखंडित देवस्थानों को पुनः स्थापित करने में अनेक राजा महाराजाओं ने योगदान दिया। मुग़ल बादशाहों से वायदा लिया कि अब इन मंदिरों के निर्माण में कोई विघ्न ना डाला जाएगा। औरंगज़ेब से पहले अनेक मंदिर काफ़ी अच्छी अवस्था में आ चुके थे। काशी के मंदिरों का दौरा करते अनेक विदेशी यात्रियों का लेखन बताता है इन मंदिरों को इन राजा आदि से भूमि गाँव आदि मिलते है जो इनके संचालन में वित्तपोषण आदि का कार्य करते है। जगन्नाथ मंदिर में तो विशाल गौशाला थी जो केवल मंदिर में बंटने वाले प्रसाद आदि हेतु संचालित होती थी।

लेकिन इस सब में मंदिरों को वार्षिक रूप से कर देना पड़ता रहा। जब जब किसी बादशाह या सुल्तान में मज़हबी हिलौरा मारा या उसे अधिक धन की ज़रूरत पड़ी- वो मंदिर की संपदा लूटने में गुरेज़ ना करता। इस संदर्भ में एक बात और नोट करिए- अनेक सुल्तान बादशाह कई मंदिरों को जागीर आदि भी देते- कारण साधारण था- यहाँ से होने वाली वार्षिक आय; जज़िया का स्रोत सूख ना जाएँ। औरंगज़ेब तक ने ऐसा किया। किंतु १६६९ में जब उस पर मज़हबी उन्माद सर चढ़ कर बोला तो सिरे से उसने विध्वंस मचाना शुरू किया।

कहानी की शुरुआत काफ़ी लंबी हो चली है। इस अंक में बस यही तक। 

नोट- इस शृंखला में कुछ क़ानून और बिल आदि का उल्लेख रहेगा। पोस्टकर्ता क़ानूनी एक्सपर्ट नहीं है महज़ एक किताबी कीड़ा है। तो यदि कोई कमी दिखाई पड़ें तो संदर्भ सहित पॉइंट आउट कर दें। सुधार कर लिया जाएगा।

आगे है- अंग्रेज़ी काल के क़ानून से । आज़ादी तक के क़ानून की कहानी ।
साभार....Maan ji FB

मंगलवार, 27 अगस्त 2024

मिश्र की पिरामिड किसने बनाया ??

1. पिरामिड कब्रें नहीं हैं; पिरामिड के अंदर अब तक कोई ममी नहीं मिली है। सभी ममियाँ किंग्स वैली में पाई गईं। 

2. आप कैसे अत्यधिक सटीकता के साथ ग्रेनाइट के 20 टन के ब्लॉक काटते हैं और उन्हें "राजा के कक्ष" में, लकड़ी के रैंप के साथ एक के ऊपर एक उठाते हैं !! 

3. मान लीजिए कि लकड़ी के रैंप का उपयोग किया गया था; विशाल पत्थरों के 2.3 मिलियन ब्लॉकों को हटाने के लिए लकड़ी उपलब्ध कराने के लिए आपको पूरे जंगल को काटने की जरूरत है। आखिर उस लकड़ी का सबूत कहां है?

 4. ऐसा एक भी चित्रलिपि पाठ नहीं है जो कहता हो कि प्राचीन मिस्रवासियों ने पिरामिडों का निर्माण किया था। 

5. 2.3 मिलियन पत्थरों को खोदने, काटने और उठाने के लिए आपको कितने "गुलामों" या श्रमिकों की आवश्यकता है? आख़िर आपको ऐसे लोग कहां मिलेंगे जो लेजर से काट सकते हैं और इतने भारी कई कई टन ग्रेनाइट उठा सकते हैं? 

6. 4000 साल पहले, जब बिल्डरों को "पहिए के बारे में पता नहीं था" तो आप पूरे पिरामिड को सही उत्तर की ओर कैसे रखते हैं? (यह मुख्यधारा के मिस्र वैज्ञानिकों का पूर्वाग्रह है)। 

7. पिरामिड का शीर्ष केंद्र (पिरामिड का आधार) से एक चौथाई इंच दूर है; यह पत्थर के 2.3 मिलियन ब्लॉक रखने के बाद है। जब आप त्रुटि के उस छोटे से मार्जिन को 2.3 मिलियन पत्थरों से विभाजित करते हैं, तो जिस सटीकता से पत्थर रखे गए थे वह अद्वितीय है और सभी आधुनिक तकनीक वाले आधुनिक वास्तुकारों द्वारा कभी नहीं किया गया है। 

8. दुनिया भर में सभी मेगालिथ संरचनाओं के बारे में क्या? वे लगभग समान तकनीकों से समान ज्यामिति क्यों बना रहे थे? पानी के नीचे पाए गए जापान के पिरामिडों के बारे में क्या? 

निष्कर्ष: मानव इतिहास का 90% समय द्वारा दफन कर दिया गया, शेष 10% विजेताओं द्वारा लिखा गया है।

 नहीं, ये एलियंस नहीं हैं. बस उन्नत प्राचीन मानव तकनीक।

(एक अंग्रेजी लेख का गूगल हिंदी अनुवाद)

रविवार, 21 जुलाई 2024

अम्बेडकर के बारे में भ्रम और वास्तविक सत्य।

▪️1- भ्रम - अम्बेडकर बहुत गरीब थे !
सत्य - जिस समय फोटो लेना लोगों के लिए सपना था उस समय अम्बेडकर के बचपन की बहुत सारी फोटो है वो भी कोर्ट, पैंट और टाई में !
▪️2-भ्रम - अम्बेडकर ने सुद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया था!
सत्य - अम्बेडकर के पिता स्वयं उस समय सेना में सूबेदार थे, बिना शिक्षा के क्या!
▪️3-भ्रम - आंबेडकर को शुद्ध होने के कारण पढ़ने नहीं दिया गया।
सत्य - उस समय अम्बेडकर को बड़ोदरा, गुजरात के क्षत्रिय राजा सियाजी गायकवाड़ा को छात्रवृत्ति देकर विदेश पढ़ने भेजा था। साथ ही ब्राह्मण गुरुजी ने अपना उपनाम अम्बेडकर दिया।
▪️4-भ्रम- महिलाओं को पढ़ने का अधिकार अम्बेडकर ने दिया था!
सत्य- अम्बेडकर के समय 20 उच्च शिक्षित महिलाओं का संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान था।
▪️5- भ्रम- अम्बेडकर ने आरक्षण दिया था!
सत्य - आरक्षण जिस संविधान में 389 सदस्य थे, अम्बेडकर का एक ही वोट था उसमें आरक्षण सबके वोट से मिला।
▪️6-भ्रम - संविधान के संस्थापक अम्बेडकर थे।
सत्य - अम्बेडकर संविधान की प्रोटोटाइप समिति के अध्यक्ष थे, स्थायी समिति के अध्यक्ष सर्वोच्च विद्वान डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे।
जय श्री राम...🚩🚩

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

सिंध पराजय के प्रमुख सूत्रधार..

सिंध भारत का सीमावर्ती प्रदेश था। ६४४ में सिंध पर अरबो का प्रथम सागरी आक्रमण हुआ। हालांकि यह भारत पर प्रथम सागरी आक्रमण नही था। इससे पहले खलीफा उमर (६३४-६४४) के काल में आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। ६३६ में महाराष्ट्र के ठाणे नामक बंदरगाह पर अरबी नौ सेना पहुँची थी, इसके पश्चात बर्वास (भड़ूच प्राचीन भृगुकच्छ) पर दूसरा हमला हुआ, लेकिन दोनों ही आक्रमणों में अरबो को मुँह की खानी पड़ी। इस समय चचराय की सत्ता कश्मीर की सीमा से लेकर दक्षिण में अरब सागर तक थी। मकरान (बलूचिस्तान) भी चचराय के शासन में था। उत्तर में कुर्दन और किकान की पहाड़ियों तक चचराय का राज्य फैला हुआ था। देबल एक बंदरगाह था। अरब सेनानी अल मुंधेरा ने देबल पर आक्रमण कर दिया। चचराय का एक शूर सेनानी देवाजी पुत्र सामह (शाम) वँहा का शासक था। सामह देबल के दुर्ग से सेना लेकर बाहर निकला और अरब सेना पर टूट पड़ा। अल्पावधि में ही अरब सेना के पांव उखड़ गए, सेनापति मुंधेरा मारा गया।

उमर के बाद उस्मान खलीफा बना लेकिन सिंध की ओर किसी की आँख नही उठी। ६६० में खलीफा अली ने पूरी तैयारी के साथ सेनापति हारस के नेतृत्व में अरब सेना भेजी। स्थल मार्ग से भारत पर यह प्रथम आक्रमण था। किकान के मार्ग से सिंध में घुसना आसान था। बोलन घाटी का यह पहाड़ी राज्य चचराय के अधीन था। इस बार भी अरबो को मुँह की खानी पड़ी, हारस मारा गया। अगले खलीफा मुआविया के आदेश पर सेनापति अब्दुल और राशिद इब्न के नेतृत्व में ६६१ से ६७० तक मकरान पर लगातार छ: हमले किये। हर बार अरबो को पराजित होकर भागना पड़ा, अब्दुल और राशिद इब्न युद्धभूमि में फौत आये।

६८० में इराक का राज्यपाल जियाद था। उसने एक बड़ी विशाल सेना को अल बहिल्ली इब्न अल हर्रि के साथ भेजा। मकरान पर हुए लगातार हमलों के कारण पहाड़ी जनजातियां उनके संपर्क में आ गई थीं, कई कबीलों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया था। इस स्थिति का लाभ अल बहिल्ली को मिला और मकरान खलीफा के कब्जे में चला गया। फिर भी २८ वर्षो तक अरबो ने सिंध पर आक्रमण नही किया।

६९५ में जियाद के स्थान पर अल हज्जाज इराक का शासक बना। हज्जाज ने उबैदुल्लाह को भारी फौज के साथ रवाना किया, परंतु इस बार भी अरब हार गए, उबैदुल्लाह मारा गया। ओमान में इस समय खलीफा का नौ सेना का बेड़ा था, वँहा का शासक बुदैल था। हज्जाज ने तुरंत बुदैल को जलमार्ग से देबल पहुँचने को कहा । वँहा उसे मुहम्मद हारून अपनी सेना के साथ मिला। मकरान के सेनापति ने भी अपना एक सेनादल रवाना किया। अब जिहाद के नारे लगाती हुई अरब सेना देबल की दिशा में बढ़ी। दाहिर के आदेश पर उसका पुत्र जयसिंह (जैसिया) अपनी सेना लेकर देबल की ओर शीघ्रता से चल पड़ा। अरब सेना ने आजतक जिहाद के नाम पर मिस्र और सीरिया से लेकर ईरान तक के विशाल भूभाग में अनेक युद्ध जीते थे, उसी जोश में खड़ी अरब सेना पर भारतीय सेना टूट पड़ी। सूर्योदय से रणकंदन शुरू हुआ, दोपहर तक निरंतर भारतीय सेना ने ऐसी मारकाट मचाई कि अरब सेना के जिहाद के नारे ठंडे पड़ गए। सेनापति बुदैल मारा गया, हजारों अरबों के शव रणभूमि पर पड़े थे। जयसिंह के नेतृत्व में भारतीय योद्धाओं ने भारत के विजय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ लिखा।

इस हार से लज्जित होकर हज्जाज ने मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में ७११ में पहले से बड़ी सेना को देबल फतह के लिए रवाना किया। बिन कासिम ने देबल पर घेरा डाल दिया। सात दिन तक यह घेरा चलता रहा। नगरवासियों को विश्वास था कि जब तक नगर के भीतर मंदिर पर ध्वज पताका लहराती रहेगी, उनकी पराजय असंभव है। इसी बीच मंदिर के पुजारी ने इस रहस्य से बिन कासिम को अवगत करा दिया। मुस्लिम सेना ने पत्थर बरसाकर ध्वज पताका को नीचे गिरा दिया। सैनिको पर इसका मनोवैज्ञानिक असर हुआ। तीन दिन तक भयंकर नरसंहार चलता रहा। भारत ने पहली बार शत्रुओं द्वारा इस प्रकार निरपराध स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सभी का नृशंसता से कत्ले आम होते देखा। बिन कासिम ने चार हजार मुस्लिमों को वँहा बसाकर मस्जिद का निर्माण किया। इतिहासकारों का मानना है कि यह भारतीय सैनिकों की कायरता नही बल्कि अरब सेना का सही मूल्यांकन न होना, यह प्रारम्भिक पराजय अन्ततः हिन्दुओं के लिए महंगी पड़ी। 

देबल के बाद बिन कासिम नेरून दुर्ग की ओर बढ़ा। भारत के दुर्भाग्य से वँहा का शासक समनी (बौद्ध अनुयायी) एवं बौद्ध भिक्षु मुस्लिमों के पक्षपाती थे। हज्जाज के साथ उनका पहले ही पत्र व्यवहार हो चुका था। बिन कासिम ने भी उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया था, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। हजारों बौद्ध भिक्षुओं का बलात धर्मांतरण व उनकी स्त्रियों का बलात्कार किया गया। अविचारी कल्पना से हुई उनकी भूल भारत के लिए घातक थी। भविष्यकाल में भी सैकड़ो वर्ष मुस्लिमों ने बौद्धों का भी इसी प्रकार संहार किया, बामियान व स्वात घाटी में बौद्ध प्रतिमाओं को ध्वस्त करने के रूप में यह अभियान अद्यतन जारी है। ऐसा नही है कि सभी बौद्ध धर्मियों ने सर्वकाल शत्रु का साथ दिया। वँहा से आगे सिविस्तान तक उसका कोई प्रतिरोध नही हुआ।

सिविस्तान के शासक ने प्रतिकर तो किया लेकिन पराजित होकर उसे पीछे हटना पड़ा। सिंधु के पश्चिमी तट बिन कासिम आगे बढ़ रहा था। दाहिर का शासक "मोका" भी देशद्रोही था। उसने नदी पार करने के लिए बिन कासिम को नौकाएँ उपलब्ध कराई। बिन कासिम नदी पार कर पूर्वी तट पर आया जँहा मोका का भाई भी उसके स्वागत के लिए खड़ा था। इसके बाद बिन कासिम ने बैत दुर्ग पर हमला बोला लेकिन दुर्ग के शासक रासिल ने कासिम से मित्रता कर ली। बिन कासिम तेजी से रावर दुर्ग (राओर) की ओर बढ़ता चला आ रहा था। मंत्री सियाकर एवं मोहम्मद वारिस अल्लाफी को रावर दुर्ग की रक्षा का भार सौंपकर दाहिर ने रावर दुर्ग से पहले जीतूर नामक जगह पर मोर्चा संभाला। बिन कासिम और राजा दाहिर के बीच युद्ध शुरू हो चुका था। संघर्ष प्रारंभ होने पर कभी एक पक्ष का पलड़ा भारी होता तो कभी दूसरे पक्ष का। युद्ध के पाँचवे और निर्णायक दिन दोपहर पश्चात ऐसा प्रतीत होने लगा था कि हिन्दू सेना की जीत होने वाली है और अरब सेना रणस्थल से पलायित होने लगी। युद्ध के अंतिम समय में नफथा की चोट से घायल होकर दाहिर का हाथी तालाब में घुस गया और अरबो ने वँहा पहुँच कर घातक बाण से दाहिर का अंत कर दिया। दाहिर का जीवन सूर्य भी अपनी अंतिम किरणे बिखेर कर अंधेरे में विलीन हो गया। हिन्दू सेना अरब सेना से पराजित हो चुकी थी। सूर्य के तेजोद्रपति प्रकाश के क्षय के बाद चंद्रमा आकाश पर उग आया था।

बिन कासिम रावर दुर्ग पर चढ़ आया। मोहम्मद वारिस अल्लाफी कौम की खातिर बिन कासिम से मिल गया, यह वही हज्जाज का विद्रोही शत्रु था, जिसे कभी राजा दाहिर ने धर्माचरण के चलते अपने संरक्षण में लिया था। मंत्री सियाकर भी दुर्ग छोड़ कर बिन कासिम से जा मिला जिसे बाद में बिन कासिम ने पुनः वजीर बना दिया था। दाहिर की रानी बाई ने मोर्चा संभाला, कोई उपाय न देखकर बाई ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया। शायद भारतवर्ष के इतिहास का यह पहला जौहर था। रावर में तबाही मचाकर बिन कासिम ब्रह्मनाबाद की ओर मुड़ा। जयसिंह ने कश्मीर के राजा व आलेर के राजा (भाई) से मदद के लिए गुहार लगाई, किंतु समय रहते ऐसा संभव न हो सका। उधर बिन कासिम को हज्जाज की ओर से लगातार सैन्य सहायता व भारत के गद्दारों का साथ मिल रहा था। छ: मास तक ब्रह्मनाबाद में युद्ध चलता रहा, लेकिन बिन कासिम को कोई सफलता नही मिली। दुर्ग में दाहिर की दूसरी रानी लाडी सैनिको को प्रेरणा दे रही थी। भारत का दुर्भाग्य दुर्ग का पतन हुआ और दाहिर की रानी लाडी अपनी दोनो पुत्रीयों सहित बंदी बना ली गईं। जयसिंह ने भागकर कश्मीर के राजा के यँहा शरण ली।

बहरूर और घलीला दोनो दुर्ग अरबो के प्रलोभनों के वशीभूत बिक गये थे। मुल्तान जीतने में बिन कासिम को दो माह लगे और अन्ततः आलेर को भी कब्जा लिया। सिंध में हिन्दू प्रमुखता से देशद्रोही तत्वों के कारण हारे, रणकौशल, योजना और वीरता में कमी होने के कारण नही। ७१४ में इराक के हज्जाज की मौत हो गई। नये बने खलीफा वालिद की भी मृत्यु जल्द ही हो गई। उसके पश्चात बने खलीफा सुलेमान जोकि हज्जाज के रिश्तेदारों से द्वेष रखता था, ने बिन कासिम को वापस बुला लिया और सिंध विजय के पारिश्रमिक के बदले मृत्युदंड सुना दिया। बिन कासिम के वापिस जाते ही दो वर्ष के भीतर भीतर जयसिंह ने ब्रह्मनाबाद, आलेर, रावर और देबल आदि स्थानों से अरब सेनाओं को भगा दिया। सागर तट से देबल तक की भूमि छोड़कर सारा सिंध स्वतंत्र हो गया था।

मेवाड़ की गाथाएँ बप्पा रावल को ईरान जीतने वाले प्रथम हिन्दू नरेश के रूप में वर्णित करती हैं। दाहिर सेन की दूसरी पत्नी अपने ५ वर्ष के पुत्र को लेकर चित्तौड़ में बप्पा रावल के पास आई। बप्पा रावल ने उन्हें सरंक्षण प्रदान किया तथा काबुल-कंधार तक आक्रमण कर गजनी के सुल्तान सलीम को हराकर उसकी पुत्री से विवाह किया।

संदर्भ श्रोत : चचनामा (हरीश कुमार तलरेजा)
                : मुस्लिम आक्रमण का हिन्दू प्रतिरोध 
                     (शरद हेबालकर)
                : सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध 
                      (अशोक कुमार सिंह)

मंगलवार, 21 मई 2024

मोदी का विकास रथ...

ट्रिलियन

2014 निर्यात - 200 बिलियन
2024 निर्यात - 759 बिलियन

2014 मेट्रो सिटी - 5
2024 मेट्रो सिटी - 20

2014 हवाई अड्डे - 74
2024 हवाई अड्डा - 152

2014 ग्रामीण विद्युतीकरण प्रवेश - 40%
2024 ग्रामीण विद्युतीकरण कवरेज - 95%

2014 एक्सप्रेस-वे की लंबाई - 680 किमी
2024 एक्सप्रेस-वे की लंबाई - 4067 किमी

2014 सड़क गुणवत्ता - 80वीं रैंक
2024 सड़क गुणवत्ता- 42वीं रैंक

2014 कुल यूनिकॉर्न - 1
2024 कुल यूनिकॉर्न - 114

2014 1GB डेटा - 200 रुपये
2024 1GB डेटा- 15 रुपये

2014 रेल नेटवर्क की लंबाई - 22048 किलोमीटर
2024 रेल नेटवर्क की लंबाई - 55198 किमी

2014 इंटरनेट कनेक्शन - 25%
2024 इंटरनेट कनेक्शन - 93%

2014 एमबीबीएस सीटें - 51,348
2024 एमबीबीएस सीटें - 101,148

2014 पीजी मेडिकल सीटें - 31,152
2024 पीजी मेडिकल सीटें - 65,335

अन्य विशेष योजना :
80 करोड़ के लिए गरीब कल्याण राशन,
सभी के लिए जल जीवन, साफ पानी, जन औषधि पीएम आवास योजना...
कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं,

विदेशी धरती पर भारत के दुश्मन मारे गए...
यूपीआई पेमेंट,
वंदे भारत आदि.

दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम
दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति

विश्व का सबसे लम्बा रेलवे स्टेशन
एशिया की सबसे बड़ी हेलीकाप्टर निर्माण इकाई...
विश्व की सबसे लंबी विद्युतीकृत रेल सुरंग

अयोध्या में राम मंदिर और धारा 370 को हटाना हमारे लिए सिर्फ बोनस है।

पेट्रोल की कीमत दिल्ली:
2004 रु. 32
2014 रु. 86
2024 रू. 108
(पेट्रोल की बढ़त खुद निकाल लीजिए) ।।

जोधाबाई एक भ्रम

महारानी जोधाबाई, जो कभी थी ही नहीं, लेकिन बड़ी सफाई से उनका अस्तित्व गढ़ा गया और हम सब झांसे में आ गए ... 

जब भी कोई हिन्दू राजपूत किसी मुग़ल की गद्दारी की बात करता है तो कुछ मुग़ल प्रेमियों द्वारा उसे जोधाबाई का नाम लेकर चुप कराने की कोशिश की जाती है!

बताया जाता है कि कैसे जोधा ने अकबर की आधीनता स्वीकार की या उससे विवाह किया! परन्तु अकबर कालीन किसी भी इतिहासकार ने जोधा और अकबर की प्रेम कहानी का कोई वर्णन नहीं किया है!

उन सभी इतिहासकारों ने अकबर की सिर्फ 5 बेगम बताई है!
1.सलीमा सुल्तान
2.मरियम उद ज़मानी
3.रज़िया बेगम
4.कासिम बानू बेगम
5.बीबी दौलत शाद

अकबर ने खुद अपनी आत्मकथा अकबरनामा में भी किसी हिन्दू रानी से विवाह का कोई जिक्र नहीं किया। परन्तु हिन्दू राजपूतों को नीचा दिखाने के षड्यंत्र के तहत बाद में कुछ इतिहासकारों ने अकबर की मृत्यु के करीब 300 साल बाद 18 वीं सदी में “मरियम उद ज़मानी”, को जोधा बाई बता कर एक झूठी अफवाह फैलाई!

और इसी अफवाह के आधार पर अकबर और जोधा की प्रेम कहानी के झूठे किस्से शुरू किये गए! जबकि खुद अकबरनामा और जहांगीर नामा के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था!

18वीं सदी में मरियम को हरखा बाई का नाम देकर हिन्दू बता कर उसके मान सिंह की बेटी होने का झूठा पहचान शुरू किया गया। फिर 18 वीं सदी के अंत में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब "एनालिसिस एंड एंटीक्स ऑफ़ राजस्थान" में मरियम से हरखा बाई बनी इसी रानी को जोधा बाई बताना शुरू कर दिया!

और इस तरह ये झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया कि आज यही झूठ भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है और जन जन की जुबान पर ये झूठ सत्य की तरह आ चुका है!

और इसी झूठ का सहारा लेकर राजपूतों को नीचा दिखाने की कोशिश जाती है! जब भी मैं जोधाबाई और अकबर के विवाह प्रसंग को सुनता या देखता हूं तो मन में कुछ अनुत्तरित सवाल कौंधने लगते हैं!

आन, बान और शान के लिए मर मिटने वाले शूरवीरता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध भारतीय क्षत्रिय अपनी अस्मिता से क्या कभी इस तरह का समझौता कर सकते हैं??
हजारों की संख्या में एक साथ अग्नि कुंड में जौहर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती हैं???? जोधा और अकबर की प्रेम कहानी पर केंद्रित अनेक फिल्में और टीवी धारावाहिक मेरे मन की टीस को और ज्यादा बढ़ा देते हैं!

अब जब यह पीड़ा असहनीय हो गई तो एक दिन इस प्रसंग में इतिहास जानने की जिज्ञासा हुई तो पास के पुस्तकालय से अकबर के दरबारी 'अबुल फजल' द्वारा लिखित 'अकबरनामा' निकाल कर पढ़ने के लिए ले आया, उत्सुकतावश उसे एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाली । पूरी किताब पढ़ने के बाद घोर आश्चर्य तब हुआ, जब पूरी पुस्तक में जोधाबाई का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं मिला!

मेरी आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा को भांपते हुए मेरे मित्र ने एक अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ 'तुजुक-ए- जहांगिरी' जो जहांगीर की आत्मकथा है उसे दिया! इसमें भी आश्चर्यजनक रूप से जहांगीर ने अपनी मां जोधाबाई का एक भी बार जिक्र नहीं किया!

हां कुछ स्थानों पर हीर कुँवर और हरका बाई का जिक्र जरूर था। अब जोधाबाई के बारे में सभी ऐतिहासिक दावे झूठे समझ आ रहे थे । कुछ और पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के पश्चात हकीकत सामने आयी कि “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई जिक्र या नाम नहीं है!

इस खोजबीन में एक नई बात सामने आई, जो बहुत चौंकाने वाली है! इतिहास में दर्ज कुछ तथ्यों के आधार पर पता चला कि आमेर के राजा भारमल को दहेज में 'रुकमा' नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी, जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी!

रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को 'रुकमा-बिट्टी' नाम से बुलाते थे आमेर की महारानी ने रुकमा बिट्टी को 'हीर कुँवर' नाम दिया चूँकि हीर कुँवर का लालन पालन राजपूताना में हुआ, इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भांति परिचित थी!

राजा भारमल उसे कभी हीर कुँवरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे। राजा भारमल ने अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी परसियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुँवर का विवाह अकबर से करा दिया, जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया!

चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था, इसलिये ऐतिहासिक ग्रंथों में हीर कुँवरनी को राजा भारमल की पुत्री बता दिया! जबकि वास्तव में वह कच्छवाह राजकुमारी नहीं, बल्कि दासी-पुत्री थी!

राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था। इस विवाह के विषय में अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है!

(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें 
 संदेह है, इसी तरह ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक परसियन दासी की पुत्री से करवाए जाने की बात लिखी है!

'अकबर-ए-महुरियत' में यह साफ-साफ लिखा है कि (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں) 

हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है, क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नहीं थे और ना ही हिन्दू गोद भराई की रस्म हुई थी!

सिक्ख धर्म गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के विषय में कहा था कि क्षत्रियों ने अब तलवारों और बुद्धि दोनों का इस्तेमाल करना सीख लिया है, मतलब राजपूताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है!

17वी सदी में जब 'परसी' भारत भ्रमण के लिये आये तब अपनी रचना ”परसी तित्ता” में लिखा “यह भारतीय राजा एक परसियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें"!

भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था, वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे उन्होंने साफ साफ लिखा है-

”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत! (1563 AD)

मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है! हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD!

ये ऐसे कुछ तथ्य हैं, जिनसे एक बात समझ आती है कि किसी ने जानबूझकर गौरवशाली क्षत्रिय समाज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की और यह कुप्रयास अभी भी जारी है!

लेकिन अब यह षड़यंत्र अधिक दिन नहीं चलेगा।

जय राजपुताना❤️🙏

बुधवार, 6 मार्च 2024

नेहरू की आत्ममुग्धता

जब इन्दिरा गांधी की सुरक्षा में खूबसूरत रूसी नौजवान लगाए गए 

भारत को तब नई नई आज़ादी मिली हुयी थी। पण्डित नेहरू के नेतृत्व में पूरे देश मे कांग्रेस का झण्डा लहरा रहा था।

पण्डित नेहरू साम्यवाद और समाजवाद के घोड़े पर सवार थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनियां दो खेमों में बंट गई  थी। एक तरफ सोवियत रूस तब पूरी दुनियां में कम्यूनिज़्म और सोशलिज्म का झण्डा बरदार था तो दूसरी तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका डेमोक्रेसी और कैपिटलिज्म का पैरोकार। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इन दो महाशक्तियों में एक अदृश्य युद्ध छिड़ गया जिसे कोल्डवार के नाम से जाना जाता है। इस कोल्डवार को लीड कर रही थी यूएसएसआर की खुफिया एजेंसी केजीबी और यूएसए की खुफिया एजेंसी सीआइए।

ये दोनों एजेंसियां अलग अलग देशों में खुफिया ऑपरेशन चलाकर वहां की व्यवस्थाओं पर अपना कब्जा चाहती थीं। उस समय दोनों के निशाने पर था एक ऐसा देश जो क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवां सबसे बड़ा और जनसंख्या के लिहाज से दूसरा सबसे बड़ा देश था। भारत की व्यवस्था पर कब्जा का अर्थ पूरे यूरोप के बराबर व्यवस्था पर कब्जा। दोनों एजेंसियों ने अपने एजेण्ट भारत मे लगा रखे थे। लेकिन नेहरू के वाम पंथ की तरफ रुझान का फायदा उठा कर केजीबी व्यवस्था में गहरी घुसपैठ कर चुकी थी। नेहरू ने अमेरिका को अपना दुश्मन बना लिया था।                  
जोसेफ स्टालिन नेहरू और गांधी को खुलेआम "इम्पीरियलिस्ट पपेट" कहता था और उनकी खिल्ली उड़ाता था।लेकिन नेहरू को तब भी उसकी गोद मे बैठना ही पसंद आया। केजीबी ने भारत मे यूएसएसआर के दूतावास की मदद से अपने सैंकड़ों एजेंटों को भारत के सत्ता केंद्र दिल्ली में काम पर लगा दिये।

उस समय केजीबी के अहम खुफिया दस्तावेजों का प्रबंधन देख रहे थे "वेसिली मित्रोखिन"। मित्रोखिन कई वर्षों तक इन खुफिया दस्तावेजों की एक एक कॉपी अपने पास जमा करते रहे।फिर एक दिन ब्रिटिश खुफिया एजेंसी MI6 की मदद से वे रूस से भागने में सफल हुये और ब्रिटिश सुरक्षा में उन्होंने इन खुफिया दस्तावेजों के हवाले दो किताबें प्रकाशित करवाई जिन्हें मित्रोखिन आर्काइव 1 और 2 के नाम से जाना जाता है।

अपनी किताब में मित्रोखिन ने केजीबी के बहुत ही खुफिया ऑपरेशन्स की पोल खोलकर दुनियां भर में तहलका मचा दिया। मित्रोखिन के अनुसार 'जब भारत के प्रधानमंत्री नेहरू सोवियत रूस की यात्रा पर गये तो अपने साथ बेटी इन्दिरा को लेकर भी गये। उनकी इस यात्रा को केजीबी ने बहुत ही चतुराई से डिजाइन किया था। रूस पहुंचते ही नेहरू का अभूतपूर्व स्वागत किया गया। उन्हें मॉस्को की सड़कों पर स्टालिन के साथ घुमाया गया। आयोजन को भव्य रोड़ शो का स्वरूप दिया गया। कुल मिला कर नेहरू को ये अहसास दिलवाया गया कि वो रूस में भी बहुत लोकप्रिय हैं।'

केजीबी जानती थी कि नेहरू आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं अतः उन्हें नियन्त्रण में लाने का यही सबसे अच्छा तरीका था कि चने के झाड़ पर चढ़ाकर मनमाने समझौते करवा लिए जायें। मित्रोखिन आगे बताते हैं कि उस समय केजीबी की तरफ से इंदिरा गांधी को 20 मिलियन भारतीय रुपयों का भुगतान किया गया। उन्हें रूस के खूबसूरत द्वीपों पर और बीचों पर भ्रमण के लिये ले जाया गया। जहां उनकी सुरक्षा में जान बूझ कर लम्बे चौड़े और खूबसूरत दिखने वाले अफसरों को तैनात किया गया था।
Video- https://www.facebook.com/share/v/qkKqR8UUYe8WriEc/?mibextid=qi2Omg


आउटलुक के लेख का कुछ अंश:

उस यात्रा के दौरान केजीबी ने नेहरू से कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर करवा लिये। उस दौरान केजीबी ने नेहरू और इंदिरा को यह विश्वास दिलाया कि आने वाला समय कम्युनिस्टों का होगा। इसके बाद केजीबी बड़े पैमाने पर ऐसे नेताओं के चुनाव अभियान चलाने लगी जो चुनाव जीत कर मन्त्री बने। फिर इन मंत्रियों की मदद से वे हमारी व्यवस्थाओं पर और मजबूत पकड़ बनाते चले गये।

नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी ने केजीबी के पर कतरने शुरू कर दिये थे लेकिन ताशकंद में केजीबी ने उनकी हत्या कर दी। उनकी हत्या के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी। इस दौरान केजीबी ने रूस में भारतीय दूतावास में मौजूद राजनयिकों को पैसे का लालच देकर, भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसाकर और हनीट्रैपिंग करके कई गोपनीय सूचनाओं को बाहर निकलवाया।

बिजनेस स्टैंडर्ड का लेख:

केजीबी भारतीय राजनयिकों, लेखकों, पत्रकारों, फिल्मकारों, नेताओं और महत्वपूर्ण मंत्रालयों के अधिकारियों को कोई ना कोई सम्मान के बहाने मॉस्को बुलाती थी और वहां किसी को पैसे से खरीद लेते थे तो किसी को महिला एजेंटों का उपयोग करके फंसा लेते थे। महिला एजेंट जिन्हें स्पेरो यानी गौरेया कहा जाता था, इन नेताओं और लेखकों के साथ रंगरेलियां मनाती थी और उनका वीडियो बनाकर फिर ब्लैकमेल करके महत्वपूर्ण सूचनाओं को चुराती थीं।

जहां एक तरफ केजीबी भारत की व्यवस्थाओं में गहरी घुसपैठ कर रही थी वहीं दूसरी तरफ सीआइए भी इस खेल में जुटी हुई थी। दोनों एजेंसियों ने भारत को अपना प्लेग्राउंड बनाया हुआ था। भारतीय राजव्यवस्था के खेवनहार कांग्रेसियों को और वामपंथियों को खरीदने के लिये दोनों देश पानी की तरह पैसा बहा रहे थे। केजीबी ने भारत के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। इन अखबारों के माध्यम से केजीबी ने हजारों आर्टिकल प्रकाशित करवाये। इन लेखों के द्वारा भारतीय जनमानस में अमेरिका के खिलाफ एक माहौल तैयार करवाया गया।

आज जो Press trust of India है उसे उस समय Press TASS of India कहा जाता था। TASS उस समय सोवियत समाचार एजेंसी थी। यही एजेंसी भारतीय प्रेस को नियंत्रित करती थी। भारत से बड़े बड़े पत्रकारों और लेखकों को सोवियत खर्चे पर मॉस्को बुलाया जाता था। वहां उन्हें कोई छोटा मोटा सम्मान देकर केजीबी के दफ्तरों में भेजा जाता था जहाँ केजीबी के एजेंट उन्हें ब्रीफ करते थे। सोवियत सरकार अपने खर्चे पर भारत मे जगह जगह सोवियत पुस्तक मेलों का आयोजन करवाती थी। इन पुस्तक मेलों में ऐसी लाखों पुस्तकें मुफ्त में बांटी जाती थी जो अमेरिका के खिलाफ प्रोपेगैंडा चलाती थीं और वामपन्थी नीतियों के पक्ष में एक जनमत तैयार करने का काम करती थी। इस तरह के आयोजनों के लिये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के कैडरों का उपयोग किया जाता था।

उस समय दिल्ली में स्थित सोवियत दूतावास सबसे अधिक चर्चा में रहता था। वहां हर समय पत्रकारों, लेखकों, फ़िल्म कलाकारों, सरकारी अफसरों और नेताओं का हुजूम लगा रहता था। एक अनुमान के मुताबिक उस समय सोवियत दूतावास में 800 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे जिनमें से ज्यादातर केजीबी के एजेंट होते थे। हर वर्ष रूस ने करीब दस हजार ऐसे टूरिस्ट भारत आते थे जिन्हें सोवियत सरकार अपने खर्चे पर भारत भेजती थी। इन टूरिस्टों में कितने केजीबी के एजेण्ट होते थे यह आज भी रहस्य है।

सोवियत निर्देशों का पालन करते हुये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने इंदिरा गांधी को बाहर से समर्थन दिया जिसके कारण उनकी सरकार बच गयी।

इस समर्थन की एवज में वामपंथियों ने कला, संस्कृति, शिक्षा, पुरातत्व, भाषा इत्यादि विभागों में अपने लोग महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिये। इन्हीं वामपंथियों ने 1972 में Indian Council of Historical Research (ICHR) का गठन किया। इस संस्था ने भारतीय इतिहास का जो बंटाधार किया वो कई सौ वर्षों तक मुस्लिम और ईसाई भी नहीं कर पाये।

रोमिला थॉपर, डी.एन झा, रामगुहा, इरफान हबीब, जैसे फिक्शन लेखकों को इतिहास का विशेषज्ञ बना दिया गया। इन्होंने अपनी मर्जी से बिना किसी पुख्ता सबूत के मनमर्जी का इतिहास लिखा। ये जो आज आप देखते हैं ना कि किस तरह से इतिहास की किताबों में मुगलों की तारीफों का बखान किया गया है, ये सब इन्हीं की देन है।

ये जो देशद्रोहियों का अड्डा J.N.U है ना 1969 में ही बना था। इसे बनाने में भी कम्युनिस्ट ही शामिल थे। कम्युनिस्टों ने उस समय जो बीज बोया था वो आज वृक्ष बनकर "भारत तेरे टुकड़े होंगे" जैसा फल दे रहा है।
प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी सोवियत रूस के इशारों पर किया जाने लगा। पाठ्यक्रम से चुन चुन कर हिन्दू प्रतीकों को मिटाया जाने लगा। हिन्दू रीति रिवाजों का मजाक बनाया जाने लगा। इस काम मे तमाम समाचार पत्र पत्रिकाएं लगी हुई थी। केजीबी सोवियत खर्चे पर मुफ्त में ऐसा साहित्य वितरित करवा
रही थी जो हिन्दू धर्म के खिलाफ जहर उगलता था। उस समय पूरे देश में जगह जगह मास्को कल्चरल फेस्टिवल का आयोजन किया जाता था। इन आयोजनों में पहुंचने वाले युवाओं का जबतदस्त ब्रेनवॉश किया जाता था। कुल मिलाकर एक तरफ केजीबी सरकार पर नियंत्रण करके सैन्य और गोपनीय सूचनायें चुरा रही थी तो दूसरी तरफ कला, संस्कृति, धर्म और भाषा को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रही थी।