गुरुवार, 31 अगस्त 2017

भारतीय लोकतन्त्र में इस्लाम का कितना खौफ ?

15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दुओं ने कासिम से औरंगजेब तक इस्लाम के नाम पर जघन्य अत्याचार झेले थे किन्तु स्वतन्त्रता के समय तक उन्हें काफी हद तक भुला दिया गया था और भुला दिया जाना भी चाहिए था। सदियाँ और पीढ़ियाँ बीत चुकी थी.! किन्तु दुर्भाग्य से औरंगी मानसिकता अभी तक जीवित थी जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन के रूप में सामने आई। विभाजन मात्र भारतवर्ष का विभाजन ही नहीं था वरन लाखों-करोड़ों हिन्दू सिक्खों के लिए इस्लामिक आक्रमण काल का पुनर्योदय था जिसने उनकी संपत्ति, परिवार, पत्नी-बहन-बेटियाँ और घर सब कुछ छीन लिया। वे लुटे पिटे भारत आए।
भारत ने हिन्दू परिवारों को आश्रय तो दिया किन्तु भारत में बसे मुसलमानों से उसके एवज में बसूली नहीं की.! वे भयभीत तो थे किन्तु हिन्दू उदारता ने उनके भय को निरर्थक सिद्ध कर दिया। भारतीय राजनीति और संविधान ने भी पूरी सहिष्णुता का परिचय दिया, अंततोंगत्वा सहिष्णुता तो उचित ही थी और हिन्दू मूल्यों के अनुरूप भी! किन्तु भारत के दुर्भाग्य का दूसरा अध्याय फिर प्रारम्भ हो गया जब हिन्दू सहिष्णुता को छुद्र स्वार्थों के लिए कुछ गद्दारों ने पुनः छलना प्रारम्भ कर दिया। भारत की एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापना को हिंदुओं ने उस समय भी स्वीकार लिया जब मजहब के आधार पर उन्होने अपने देश के दो (तीन) टुकड़े होते हुए देखे थे और मजहब के आधार पर ही हिन्दुओं को लुटते और हिन्दू औरतों का बलात्कार होते देखा था, किन्तु उदारता और आधुनिकता का चोला ओढ़े संकीर्ण राजनीति ने उसमें भी हिन्दुओं के साथ छल किया। पंथनिरपेक्ष राष्ट्र का संविधान स्थान-स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के सन्दर्भ में अलग अलग बातें करता दिखाई देने लगा। फिर चाहे वह कश्मीर हो, विवाह अधिनियम हो, हज सब्सिडि हो, अल्पसंख्यकों के नाम पर करदाताओं के पैसों से दी जाने वाली भेदभावपूर्ण विशेष सुविधाएं हों, मस्जिदों को स्पेशल छूट और मंदिरों से बसूला जाने वाला कर हो अथवा मस्जिदों के लिए सरकारी जमीन और मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण हो, प्रत्येक स्थान पर हिन्दू पंथनिरपेक्षता का बोझ ढोता रहा है।
सतत मुस्लिम परस्त होती पंथनिरपेक्षता की परिभाषाओं से स्थित इतनी बिगड़ गई कि अब तो संविधान भी नागरिक समानता की रक्षा करने में असमर्थ होता जा रहा है, जितना यह चाहता भी है! बात अब तक कश्मीर में कश्मीरी पण्डितों की, अमरनाथ यात्रा की, असम में बोडो हिन्दुओं की अथवा केरल में जेहादी शोर की ही थी जहां कानून और सत्ता बेबस खड़ी तमाशा देखती रहती है किन्तु अब तो देश की राजधानी में भी शासन और प्रशासन संगठित कट्टरतावाद के चरणों में नतमस्तक दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली के चाँदनी चौक क्षेत्र में, जहां कि प्रसिद्ध लालकिला और जामामस्जिद स्थित हैं, मेट्रो की खुदाई के दौरान पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए थे जिसके बाद जमीन पुरातात्विक विभाग (एएसआई) के पास चली गयी। किन्तु एएसआई कुछ निष्कर्ष निकाले और जमीन के विषय में कुछ निर्णय हो इससे पहले ही वहाँ के मुसलमानों ने उसे शाहजहाँकालीन कालीन अकबरावादी मस्जिद घोषित कर दिया और रातों रात उस पर मस्जिद भी बना डाली। यह निर्माण किसी गाँव अथवा कस्बे में नहीं वरन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हृदय क्षेत्र चाँदनी चौक में किया गया किन्तु आश्चर्य कि दिल्ली पुलिस, जिसका स्लोगन है “हम तुरंत कार्यवाही करते हैं”, को खबर तक नहीं लगी.! कम से दिल्ली पुलिस का ऐसा ही कहना है। न्यायालय द्वारा जमीन पर किसी भी प्रकार के धार्मिक क्रियाकलाप पर रोक लगाने का आदेश भी जारी हुआ किन्तु कई दिनों तक नमाज़ पढ़ने से रोकने का साहस दिल्ली सरकार अथवा दिल्ली पुलिस नहीं कर सकी। विश्वहिंदू परिषद आदि हिन्दू संगठन इस अतिक्रमण के खुले विरोध में उतर आए और हिन्दू महासभा की याचिका पर न्यायालय ने अवैध मस्जिद को तत्काल गिरने का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश मिलते ही दिल्ली पुलिस की सारी वास्तविकता सामने आ गयी। दिल्ली पुलिस ने न्यायालय में निर्लज्जता से हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि अवैध मस्जिद गिराना उसके बस की बात नहीं है.! यह इस बात का सूचक है कि जिन मुसलमानों को राजेन्द्र सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र समिति जैसे सरकारी आडंबरों का प्रयोग कर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता दबा कुचला पिछड़ा और वंचित बताकर तुष्टीकरण का घिनौना खेल खेल रहे हैं, उस मुसलमान समुदाय की वास्तविक स्थिति देश में क्या है। बात-बात पर देश की अखंडता, राष्ट्रीय हितों और संविधान को पलीता लगाकर अपने दीनी हक़ का शोर मचाने वाले समुदाय की मानसिकता एवं शासन और प्रशासन का इस मानसिकता के सामने भीगी बिल्ली बनकर मिमियाना देश की संप्रभुता और संविधान के मुंह पर तमाचा ही कहा जा सकता है। यह तमाचा स्वयं में अनोखा नहीं है, दिल्ली उच्च-न्यायालय लम्बे समय से जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर रहा है किन्तु दिल्ली पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ रही कि वह बुखारी को गिरफ्तार करे! दिल्ली पुलिस न्यायालय में जाकर बताती है कि उसे बुखारी नाम का कोई सख्श इलाके में मिला ही नहीं.! पूर्व में शाही इमाम रहे अब्दुल्लाह बुखारी ने तो दिल्ली के रामलीला मैदान से खुली घोषणा की थी कि वो आईएसआई का एजेंट है और यदि भारत सरकार में हिम्मत है तो उसे गिरफ्तार कर ले.! सरकार और पुलिस तमाशा देखने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे.? यदि देश में राष्ट्रीय हितों की राजनीति हो रही होती तो कैसे मान लिया जाए कि कोई बुखारी राष्ट्रीय भावना और कानून से ऊपर हो सकता है अथवा भारत माँ को डायन कहने वाला कोई आज़म खाँ एक प्रदेश की सरकार में मंत्री बन सकता है??
प्रश्न उठता है कि क्या शासन और प्रशासन को इतना भय किसी बुखारी अथवा आज़म से लगता है कि देश का कानून बार बार बौना साबित होता रहे.? यह भय उस मानसिकता से है जो देश से पहले दीन-ए-इस्लाम को अपना मानती है। निश्चित रूप से हर मुसलमान को हम इस श्रेणी में नहीं रख सकते और न ही रखना चाहते हैं किन्तु यह सत्य है कि बहुमत इसी मानसिकता के साथ है अन्यथा शाहबानों जैसे मामले में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय को धता बताकर कानून नहीं बदले गए होते, मोहनचन्द्र शर्मा के बलिदान पर सवाल नहीं खड़े किए गए होते, अफजल की फांसी को लटकाकर नहीं रखा जाता और बुखारी पर केस वापस लेने की अर्जी लेकर दिल्ली सरकार न्यायालय के पास नहीं गिड़गिड़ाती.! गिलानी जैसे गद्दार देश की राजधानी में आकर बेधड़क चीखकर चले जाते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है और भारत सरकार उनके कार्यक्रम को सरकारी सुरक्षा मुहैया कराने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाती है.!
तर्क दिया जाता है कि बुखारी को गिरफ्तार करने अथवा अवैध मस्जिद को गिराने से दंगे भड़क उठेंगे, प्रश्न उठता है कि सैकड़ों साल पुराने हिन्दू मंदिरों को सरकारी आदेश पर जब गिरा दिया जाता है या अधिग्रहण कर लिया जाता है अथवा हिन्दुओं के शीर्ष धर्मगुरु कांची शंकराचार्य को दीपावली के अवसर पर सस्ते आरोपों में गिरफ्तार कर लिया जाता है तब दंगे क्यों नहीं भड़क उठते.? तब विरोध अधिकतम शासन और प्रशासन तक ही सीमित क्यों रहता है? क्या यह 1919-24 के खिलाफत आंदोलन की मानसिकता नहीं है कि इस्लाम का शोर उठते ही सामाजिक राष्ट्रीय प्रत्येक हित को किनारे लगा दिया जाता है और शुरुआत दंगों से होती है? भारत-पाकिस्तान विश्व कप में फ़ाइनल सेमीफ़ाइनल खेल रहे हों तो भारत के शहरों में अघोषित कर्फ़्यू लगता है, पाकिस्तान में ओसामा मारा जाता है तो भारत में शोकसभाएं होती हैं अथवा अमेरिका में कुरान जलाने की बात होती है तो भारत में हिंसा भड़क उठती है.!
इतिहास की मानसिकता अभी तक जीवित है अतः वर्तमान में इतिहास का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। यदि भारत को जीवित रखना है तो भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने की आदत को बदला जाए। वास्तविक पंथनिरपेक्षता को आखिर समान संवैधानिक क़ानूनों से परहेज क्यों होना चाहिए.? अन्यथा यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक ही है कि 21वीं सदी के लोकतन्त्र में इस्लाम से यह खौफ और हिन्दुओं के साथ ही दोगला व्यवहार क्यों.?

सोमवार, 28 अगस्त 2017

क्या गौवध वेद सम्मत है ?


भारतीय दर्शन के वेदों में ऐसे यज्ञों का कई बार जिक्र आया है जिनमे पशुओं की आहुति दी जाती है ,ऐसा सप्रमाण कर्मकांडीयों द्वारा प्रचारित एवं प्रचलित किया जाता है । किन्तु मेरा अन्तर्मन इसे स्वीकारने के लिए बिल्कुल भी तैयार नही । आजकल गौहत्या, गौमांस भक्षण को लेकर टीवी पर विद्वान धर्म गुरुओं के मध्य बहस चल रही थी कि प्राचीन धर्म शास्त्रों में गौमांस भक्षण तो ऋषि मुनियों द्वारा स्वीकार रहा है । अनेक क्लिष्ट भाषा मे श्लोक उच्चारित किये गए और उनका अर्थ बताया गया कि "अग्निसोमीय पशु" को यज्ञ के निमित्त बलि देकर उसका प्रसाद गृहण करने का जिक्र तो वेदों में बहुत अच्छी तरह मिलता है । मेरे आश्चर्य का ठिखाना नही रह जब वैदिक धर्म के सबसे बड़े प्रचारक आदि शंकराचार्य तक को इस पशुबलि खासकर "अग्निसोमीय" पशु अर्थात बैल की बलि का समर्थक बताया गया । जब बात शंकराचार्य तक चली गयी तो इसके लिए कांची कामकोटिपीठ शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी से विचार लेना अपेक्षित हुआ एंकर ने अपने संवाददाता के द्वारा उन्हें जोड़ा और उनसे पूँछा कि केंद्र की वर्तमान सरकार गोवध पर प्रतिबंध के नाम पर सत्ता में आई है और आज इस चुनावी वायदे से पीछे हटकर उल्टा गौरक्षकों को गुंडा कह रही है ।
इस बारे में आपके क्या विचार हैं तो शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी ने कहा कि वेदों में गोवध का विधान होते भी ऐसी मांग कैसे की जा सकती है ?" उनका इतना कहना था कि गौमांस भक्षण के पक्षकारो के चेहरे खिल उठे और वे इतने हावी हो गए कि राष्ट्रवादी टी वी चैनल ने जिस लक्ष्य से यह डिबेट रखी वो पूरी तरह ध्वस्त हो गयी अतः बाध्य होकर उसे एक लंबा ब्रेक लेना पड़ा । लेकिन मेरे मन मष्तिष्क में एक भंयकर द्वंद्ध उठ खड़ा हुआ और मुझे आधुनिक विश्वामित्र राजर्षि देवी सिंह जी महार साहब का वो उद्बोधन जो उन्होंने अप्रैल 2014 झाकड़ा(अलवर) में दिया था सहसा स्मरण हो उठा । मेरे पास उनके उस उद्बोदन की वीडियो रिकॉर्डिंग थी अतः मैंने पुनः इसे ध्यानपूर्वक सुना जिसमे उनका कहना था कि "समाज आज जितना पतित हुआ यह तो कुछ भी नही बल्कि आज से कोई 2500 वर्ष पूर्व तो इससे कहीं अधिक पतित हो चुका था । आज हम कितने ही संस्कारहीन हो गए हों किन्तु किसी भी धर्म के ठेकेदार के कहने पर हम गौमांस नही खा सकते ,गौहत्या नही कर सकते किन्तु उस समय कर्मकांडी पंडो गाँवों से हजारों गौवंश एकत्रित करवाकर यज्ञ के नाम पर उनकी निर्मम हत्या कर प्रसाद के रूप में क्षत्रियों सहित समस्त प्रजा को खिलाते थे और कहते थे कि जो गौमांस नही खाये वो आर्य नही है जैसे आजकल कुछ ठाकर कहते है कि बकरा न खायें तो काहे का राजपूत । उस विषम और धर्म के नामपर चल रहे इस पाखण्ड के विरुद्ध भी क्षत्रिय राजकुमारों ने विद्रोह किया कि यह धर्म नही हो सकता यह तो अधर्म है । इस महा पाखण्ड का जो सबसे सशक्त विद्रोह किया वो किया राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने । उन्होंने कहा कि यदि गौमांस खाने से ही कोई आर्य बनता तब तो कुत्ते, कौवे, चील एवं गिद्धादि सभी हिंसक पशु पक्षी आर्य हो गए । कर्मकांडी पंडो ने कहा ऐसा तो वेद सम्मत है तब गौतम बुद्ध ने कहा" ऐसे वेदों को मैं नही मानता ।"
इसका अर्थ यह हुआ कि 2500 वर्ष पूर्वतक तो गौमांस भक्षण प्रचलित हो चुका था किंतु इसका विरोध निरन्तर रहा और सम्भवतः बौद्ध प्रभाव के कारण गौमांस भक्षण बंद हुआ । 2500 वर्ष पहले भी धर्म के ये तथाकथित ठेकेदार गौमांस भक्षण को वेद सम्मत बता रहे थे और आज भी शंकराचाय जयेंद्र सरस्वती जी उसे वेद सम्मत बता रहे है । में चूंकि वेदों के प्रति पूर्ण आस्थावान हूँ और गौतम बुद्ध के प्रति पूर्ण सम्मान होने पर भी में उनकी तरह यह नही कह सकती कि "मैं नही मानती वेदों को" अतः मैंने वेदों के उन श्लोकों की तह में जाने का प्रयास किया कि आखिर विवाद की जड़ कहाँ है ? अबतक में वेदों के सबसे बड़े व्याख्याकार आदि शंकराचार्य को ही मानती रही हूँ अतः उनके शंकरभाष्य के
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' वेदांतदर्शन (१,१,१) की खोजकर पढ़ा जिसमे उन्होंने लिखा है-"यथा च हृदयाद्यवदानाना मानन्तर्य नियम:"
अर्थात जैसे हृदयादि के अवदान अर्थात छेदन में आनन्तर्यक्रम का नियम है । क्या नियम बताया देखें:-
हृदयस्याग्रेश्वद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्ष: (तै.सं.) अर्थात प्रथम उस अग्निसोमीय यज्ञ के पशु के हृदय का, फिर जिह्वा का, फिर वक्ष:स्थल का छेदन करे । ये वाक्य अग्निषोमीय यज्ञ में श्रुत है ।" 
इसका अर्थ हुआ कि वास्तव: आदि शंकराचार्य जी भी यह उदाहरण देकर यज्ञ में पशु वध को विधि सम्मत मानते थे ?
इसी प्रकार आसुरी प्रवृति के लोगों ने अपनी प्रकृति के अनुरूप यज्ञ, श्राद्ध, मधुपर्क आदि में मांसादि का विधान बतला दिया:-
" मधुपर्के तथा यज्ञे पित्र्यदैवत्वकर्मणि ।
अत्रैव पशवो हिंस्या: नान्यत्रेत्यब्रवीत् मनु: ।।
इस प्रकार के श्लोकों में यज्ञ पशुहिंसा तथा यज्ञशेष के रूप में मांसभक्षण को विधिसम्मत घोषित कर दिया जबकि मीमांसा शास्त्र में 'अपि वा दानमात्रं स्यात् भक्षशब्दानभिसम्बन्धात्' (मी. 10 !7! 15) इत्यादि सूत्रों म् यज्ञ में पशुओं के दनमात्र का विधान है, हिंसा का नही ।
अब यह बहुत उलझन का की बात हो गयी कि वेदों में यज्ञ में पशु वध और वो भी अग्निसोमीय पशु जिसका सीधा अर्थ होता है बैल की हिंसा और फिर यज्ञशेष के रूप में मांसभक्षण का विधान है ? मुझे लगता है वैदिक धर्म के सबसे बड़े व्याख्याकार ही कहीं कहीं चूक कर गए । सम्भव है महाभारत के युद्ध समस्त ज्ञानवान क्षत्रियों के इस लोक से चले जाने के बाद और चन्द्र वंश एवं नागवंश की करीब 2500 वर्ष लम्बे चले युद्ध के समय धर्मद्रोहियों ने वेदों के श्लोकों के साथ कोई छेड़छाड़ की हो और उस दूषित शास्त्रों को आधार मान शंकराचार्य जी ने शंकरभाष्य में मांशभक्षण एवं बैल एवं गाय की यज्ञ के नाम पर हत्या को वेदसम्मत घोषित कर दिया हो । या फिर यह भी सम्भव है कि आदि शंकराचार्य जी भी संस्कृत का मूल ज्ञान न रखते हों और उपलब्ध अर्थो के आधार पर ही व्याख्या कर दी हो । एक और भी बात तत्कालीन पिस्थिति में परिलक्षित होती है कि कुमारिल भट्ट से पूर्व बौद्ध प्रभाव इतना जबरदस्त था कि वैदिक मत को कोई मानने वाला ही नही बचा था अधिकांश क्षत्रिय राजपरिवार बौद्ध या जैन मत अपना चुके थे । अतः वैदिक मत की पुनः स्थापना के लिए बौद्ध और जैन मत के एकदम विपरीत धार्मिक अनुष्ठान और अनुयायियों की आवश्यकता रही होगी । चूंकि बौद्ध और जैन दोनों ही मत क्षत्रिय राजकुमारों ने जीवहिंसा विशेषतौर से गोवंश की हत्या जो यज्ञ एवं यज्ञशेष के नाम पर की जा रही थी के विरुद्ध आरम्भ किये गए थे अतः आदि शंकराचार्य जी ने पुनः पशुबलि को वेद सम्मत सिद्ध कर दिया हो । बात कुछ भी रही हो किन्तु मैं एक क्षत्राणी हूँ, और निरीह प्राणियों और विशेषतौर से गौ जैसे संपूण धर्म के प्रतीक पशु की हत्या को चाहें आदि शंकराचार्य जी शंकरभाष्य मे उचित ठहराये या आज के कांची के जयेन्द्र सरस्वती ,मैं मानने को तैयार नही । तो मुझे अब यह शोध करना ही होगा कि कहाँ पर चूके यह धर्ममूर्ति ? वेद के किस श्लोक के अर्थ से इन्हें प्रमाण मिल गया । क्योंकि वेद मेरे ही महान पूर्वजों की तपस्या के परिणाम है । जब भगीरथ माँ गंगा को धरती पर लाये तब ही गंगा जी ने कहा दिया कि जिस पात्र में मदिरापान या मांसभक्षण होगा वो मेरे जल से 3 कोटि मतलब करोड़ बार साफ करने से भी पवित्र नही हो सकता तो वो शरीर जिसमे मदिरा या मांशभक्षण हो गया कभी पवित्र हो ही नही सकता । अतः वेद के किसी श्लोक या कोई एक शब्द का कुअर्थ जिव्हा के स्वाद के लिए अवश्य किसी धर्मद्रोही ने विगत 5000 वर्ष के भीतर किया है । क्योंकि ज्ञान के सूर्य भीष्म, साक्षात ईश्वर श्री कृष्ण ने मदिरापान एवं मांशभक्षण को एकदम धर्म विरुद्ध घोषित किया है । और में आदि शंकराचार्य जी ज्ञानी मानती हूं किन्तु भीष्म या श्री कृष्ण की तुलना में कहीँ कोई स्थान नही दे सकती । वैसे वे श्लोक और शब्द मुझे इन्ही धर्म शास्त्रों में मिल गए हैं जिनके गलत अर्थ से पशुहिंसा को वेदसम्मत घोषित करने का पाप किया गया है ।