गुरुवार, 29 जून 2023

सैन्य कमांडरसंताजी & बादशाह औरंगजेब

Lसितंबर 1689 से 1696 वर्ष अर्थात सात वर्ष के भीतर मराठा सैन्य कमांडर संताजी घोरपड़े का बर्बर मुगलिया बादशाह औरंगजेब के साथ 11 बार घनघोर संघर्ष हुआ और इसमें से 9 बार औरंगजेब की सेना का जनाजा निकाला था सत्रहवीं सदी के सबसे महानतम सैन्य जनरल संता जी ने।

लेकिन इतिहास की पुस्तकें, मुख्यधारा के वामपंथी इतिहासकारों के इतिहास लेखन से एकदम गायब अध्याय !

ऐसा ही किया गया है !

कुत्सित, भ्रष्ट, विकृत और अर्द्धसत्यों का तम्बू खड़ा किए ये मक्कार इतिहास के इस सर्वाधिक रोमांचक व प्रेरक अध्याय को इग्नोर करके चलते हैं !

लेकिन सत्य तो तदयुगीन कृतियों में, ऐतिहासिक वृत्तांतों के भीतर मुकम्मल तस्वीर लेकर प्रस्तुत हुआ है।

आज 363 वीं जयंती है इस अतुलनीय जनरल की।

देखिए उस महासूरमा के कारनामे -----

1) सितंबर 1689 --- औरंगजेब के जनरल शेख निजाम को रौंदा।

2) 25 मई 1690 को सरजाखान उर्फ रुस्तम खान को सतारा के पास घसीट घसीट कर मारा।

3) 16 दिसंबर 1692 को औरंगजेब के जनरल अली मर्दान खान को पराजित करके जिंजी के दुर्ग में बंधक बना दिया।

4) 27 दिसंबर 1692 में मुगल सेनापति जुल्फिकार अली खान को जमकर रगड़ा संताजी ने और 5 वर्ष से जिन्जी दुर्ग की घेराबंदी करने वाले इस मुगलिया सेनापति को उसकी औकात दिखाई।

5) 5 जनवरी 1693 ईस्वी में देसूर स्थित औरंगजेब की विशाल सैन्यवाहिनी को 2000 चपल मराठा घुड़सवारों के साथ लैस होकर संताजी ने पूरी तरह ध्वस्त कर डाला था।
बादशाह किस्मत के संयोग और ईश्वरीय दुआ से उस रात अपने शिविर में मौजूद न होकर अपनी बेटी के तम्बूखाने में आराम फरमा रहा था, नहीं तो उसी दिन मुगलों का तबेला निकल जाता पूरे देश से !

6) 21 नवम्बर 1693 ईस्वी को मुगल जनरल हिम्मत खान को विक्रमहल्ली, कर्नाटक में बुरी तरह रौंदा संताजी घोरपड़े ने...

7) जुलाई 1695 में खटाव के पास घेरा डाले उछल रही मुगल सेना का कचमूर निकाला इस महान जनरल ने।

8) 20 नवम्बर 1695 ईस्वी को कर्नाटक में तैनात औरंगज़ेब के शक्तिशाली जनरल कासिमखान को चित्रदुर्ग के पास डाडेरी में घेरकर उसका सिर उतार लिया। मुगल राजकोष के 60 लाख रुपए संताजी ने हथियाए।

9) 20 जनवरी 1696 को कासिम खान के सहायतार्थ तैनात किए गए मुगल सैन्य कमांडर हिम्मत खान बहादुर को बसवपाटन(डाडेरी से 40 मील पश्चिम) के युद्ध में अभिभूत करते हुए जन्नत प्रदान किया।

10) 26 फरवरी 1696 को मुगल जनरल हामिद-उद्दीन खान ने संता जी को हराने में सफलता पाई थी।

11) अप्रैल 1696 में जुल्फिकार खान ने अरनी, कर्नाटक के पास एक बार युद्ध मैदान में संताजी को हराने में सफलता प्राप्त की थी।

आजीवन हिन्दू पद पादशाही और मराठा स्वाधीनता आन्दोलन के अपराजेय स्वर को ऊंचाई देने वाले इस अप्रतिम मराठा सेनानी से मुगल कितना भय और खौफ खाते थे तथा उनके मन में एशिया के इस सर्वोच्च सैन्य जनरल के प्रति कितनी नफरत भरी थी, इसका प्रमाण मुगलों के दरबारी इतिहासकार खाफी खान के शब्दों में पढ़िए :

         [ "...... जिस किसी ने भी संताजी का सामना किया, उन्हें या तो मार दिया गया या घायल कर दिया गया या बंदी बना लिया गया, या यदि कोई भाग निकला तो अपनी सेना और जान माल की हानि के साथ केवल अपनी जान बचा पाने में सफल हो पाया।

     ......यह शापित कुत्ता(संताजी घोरपड़े) जहां भी गया, किसी भी शाही अमीर में इतनी हिम्मत व साहस नहीं हुआ कि इसका मुकाबला कर सकें। किसी के करते कुछ न हो सका। मुगल सेना उसकी शक्ति व प्रतिष्ठा को अकेले इसने जितनी क्षति पहुंचाई है, शायद किसी भारतीय शक्ति ने कभी पहुंचाई हो।
स्थिति यह है कि मुगल खेमे का बड़े से बड़ा साहसी सूरमा दक्कन की जमीन पर भय व खौफ के साए में जी रहा है !

बादशाह द्वारा इस कुत्ते को नेस्तनाबूद करने के लिए जब अपने सबसे बडे़ जनरल फिरोज जंग को तैनात किया गया और उसे खबर मिली कि संताजी उससे सिर्फ 16 से 18 मील की दूरी पर आ खड़ा हुआ है घेरने, उस मुगल सैन्य कमांडर का चेहरा खौफ से बदरंग हो उठा। मुगल कमांडर के पास कोई रास्ता नहीं था, लिहाजा उसने सैन्य शिविर में घोषणा की कि वह संताजी से मुकाबला करने जा रहा है, लेकिन सेना को आगे भेजते हुए यह बड़का मुगल तोप गोल चक्कर वाले रास्ते से कल्टी मार बीजापुर की तरफ भाग गया।"

                (मुंतखुब-उल-लुआब, खाफी खान.)]

मुगलों के दरबारी इतिहासकारों द्वारा तथा फारसी स्रोतों में इस दुर्दांत सूरमा के बारे में जिस तरह के विशेषण प्रयुक्त हुए हैं, वे सबसे बडे़ व वास्तविक प्रमाण हैं कि औरंगजेब और मुगल साम्राज्य के गुरूर व दर्प को कितना अभिभूत कर डाला था इस मराठा रक्त ने !

प्रसिद्ध इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक "भारत के सैन्य इतिहास" में संताजी के बारे में लिखते हुए इसी बात को रेखांकित करते हैं :

       ("संताजी की ख्याति व प्रसिद्धि का सबसे बड़ा स्मारक मुगल सेना के सभी सैन्य कमांडरों के मन में उनके द्वारा संचारित भय व खौफ है, और यह सब फारसी स्रोतों में संताजी के नाम के साथ विशेषण के रूप में उपयोग किए जाने वाले शाप और गालियों में ईमानदारी के साथ परिलक्षित होता हुआ दिखता है।")

संताजी के नेतृत्व में हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ प्रतिबद्ध मराठा स्वराज और हिन्दू पद पादशाही की भयानक मुठभेड़ का सिलसिलेवार विवरण इतालवी यात्री तथा मुगल दरबार में तैनात तोपची निकोलाओ मनूची की शानदार कृति "स्टोरिया द मोगोर"(मुगल कथाएं) में अंकित है। सर्वाधिक रोमांच व जीवन्त अहसास पाने के लिए अध्येताओं को इन अंशों को इसी पुस्तक से पढ़ना चाहिए।

"इतिहास के पृष्ठों में एक जनरल तथा सैन्य कमांडर के रूप में प्रतिष्ठित संताजी की तुलना तैमूर और चंगेज खान जैसे महान एशियाई जनरलों से की गई। यह वास्तविक तुलना और हकीकत भी है। संताजी हमेशा 20 से 25 हजार तीव्रगामी अश्वों से लैस घुड़सवार सेना का नेतृत्व करते थे। गुरिल्ला रणनीति के साथ पार्थियन युद्ध सैन्यकला से उनके कौशल की तुलना की जा सकती है। कारण, वह रात्रि में न केवल मार्च करते थे बल्कि तीव्र गति से लंबी दूरी भी तय करते थे। व्यापक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को अंजाम देते हुए शत्रु खेमे में आतंक की सृष्टि कर देते थे। सटीकता तथा समय की पाबन्दी के साथ प्रचंड आक्रामक कार्यवाही जो चंगेज खान व तैमूरलंग के अलावा किसी भी एशियाई सेना के लिए नामुमकिन थी, संताजी के सैनिक कारनामों में यह सर्वत्र दिखती है। दुश्मन की योजना और परिस्थितियों के भीतर हर बदलाव का तुरन्त फायदा उठाने के लिए अपनी रणनीति को बदलते हुए लम्बी दूरी तक फैली बड़ी संख्या में सैनिकों को संभालने और विफलता के जोखिम के बिना संयुक्त सैन्य प्रहार को अंजाम देने की जन्मजात प्रतिभा संताजी में थी।" 

                     (मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इण्डिया; सर यदुनाथ सरकार.)

अपनी इस असाधारण सैन्य रणनीति के चलते संताजी मराठा सेनापतियों में छत्रपति शिवाजी के बाद सर्वोच्च घुड़सवार सेनापति के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनकी इस विरासत का विस्तार और क्रियान्वयन आगे पेशवाओं के शासनकाल में बाजीराव प्रथम और रघुजी भोंसले द्वारा सफलतापूर्वक किया गया। मराठों की सैन्य सर्वोच्चता के प्रवर्तक संताजी ही थे जिन्हें इतिहास के भीतर वह गौरव और महत्ता मिली नहीं, जिसके वास्तविक हकदार वे थे !

मराठा इतिहास के भीतर सर्वोच्च कमांडर तीन ही गिने गए ---- छत्रपति शिवाजी महाराज, संताजी घोरपड़े और बाजीराव।

इतिहास के चमकदार पृष्ठों में छत्रपति राजे और बाजीराव का नाम तो फिर भी हिन्दू जनसमुदाय जानता है। काफी हद तक बूझता गुनता है ! लेकिन संताजी घोरपड़े के बारे में अध्येताओं से चर्चा कीजिए तो....??

बुधवार, 28 जून 2023

धान की रुपाई.....पुरानी यादें

जेठ के महीने में  ही इंजन (ट्यूबबेल) के पास वाली डेबरी ( छोटे खेत)  में इंजन से पानी भर दिया गया है। तीन-चार दिन बाद ओंठि हो गई है यानि खेत अब  जोतने योग्य हो गया है। 

आज बड़े वाले बैल की गोई (जोड़ी) से खेत की जुताई हो रही है।  खेत के कोनों को फरुहा( फ़ावड़ा)  से गोंड़ (खुदाई)  दिया गया है।  सरावनि (लकड़ी का मोटा पटरा) से खेत को बराबर कर दिया गया है।खेत की जितनी खरपतवार,  घास-दूब है उसे  निकाल लिया गया है।

 अब खेत में पानी भर दिया गया है।  पानी भरे हुए खेत में दो-तीन बार अमिला (जुताई और पटाई) दे  दिया गया है। अब खेत की मिट्टी  बिल्कुल मुलायम, भुरभुरी हो गई है। खेत धान बोने के लिए बिल्कुल तैयार है।

 आज आषाढ़ का पहला दिन है।  भाई बाबा ने दो-तीन दिन पहले  से घर में फूल रहे धान को खेत में ले आए हैं। धान बोने से पहले पूरे खेत के पानी को खूब गंदा कर दिया गया है ताकि जब धान बो दिए जाएं तो इस गंदे पानी की परत धान के बीज के ऊपर चढ़ जाए और पक्षियों को ऊपर से धान न दिखे और वह इसे चुग न सके।

अब बाबा धान को एक बड़ी टोकरी में लेकर पहले खेत को झुक कर प्रणाम करते हैं , भगवान का नाम लेते हैं और फिर धान को दाहिने हाथ से पूरे खेत में बिथराते  चले जा रहे हैं। धान की बुआई हो रही है।

खेत का पानी गंदा करने के बावजूद शुरुआत के 1 हफ्ते   पक्षियों से धान की निगरानी करनी ही पड़ती है।  यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि नीलगाय, गाय या भैंस खेत में पानी पीने के लिए या गर्मी से राहत पाने के लिए घुस न जाएं।  नहीं तो उनके खुर के निशान जहां पड़ जाएंगे उस स्थान पर बेंड़ न उगेगी।

 आज धान बोए हुए पूरा एक हफ्ता हो गया है । धान  से छोटी-छोटी हरी मुलायम कोंपले बाहर निकलने लगी हैं।   अब पक्षियों का डर नहीं रहा, बस जानवरों का ध्यान रखना है। आज पूरे 25 दिन हो गए हैं । अब बेंड़  पूरी तरह रोपने के लिए तैयार है। 

 भाई बाबा पासिन टोला, गुड़ियन का पुरवा,  अहिरन का पुरवा में 15 मजूरों (मजदूरों) की गिनती कल और परसों के लिए कर आए हैं। आज सुबह से घर के लोग, सुंदर बाबा, हिरऊ बाबा सरावनि में बैठकर बेंड़ उखाड़ने लगे हैं।   बेंड़ के एक-एक पौधे को जड़ से उखाड़ कर  मूठी (मुट्ठी) भर जाने पर उसकी जोरई  (जूरी)बनाकर पीछे रखते जा रहे हैं।  

जैसे-जैसे बेंड़ उखड़ती  जा रही है, खेत खाली होता जा रहा है और सरावनि आगे बढ़ती जा रही है।   अब एक झौआ से अधिक बेंड़ की जूरी तैयार हो गई है । उसे लेकर चाचा धान रोपने के लिए तैयार बड़े वाले खेत 'बीजर'  में पहुंच गए हैं।  एक छोटे छीटा(टोकरी) में बेंड़ लेकर मैं भी उनके पीछे-पीछे पहुंच गया हूं। चाचा बेंड़ को पूरे खेत में  कुछ कुछ फासले पर फैलाते  जा रहे हैं ताकि मजूरों को बेंड़ लगाते समय इधर उधर न भागना पड़े ।

 अब बेंड़ लगाने वाली  मजूरों की टोली आ चुकी है । सभी महिलाएं हैं। हंसी मजाक करती महिलाएं अपनी धोती को घुटनो तक समेट कर पानी भरे खेत में प्रवेश कर चुकी हैं । राम का नाम लेकर उन्होंने बेंड़ की जूरी खोली और अब एक-एक धान का पौधा सधे हाथों से बराबर दूरी पर रोपना शुरू  कर दिया है । मैं महिलाओं के पीछे-पीछे उन्हें बेंड़ देते जा रहा हूँ।  जहां बेंड़ ज्यादा हो जाती  या बच जाती, वहां से हटाते जा रहा हूँ और जहां कम होती वहां पर बेंड़ रखते जा रहा हूँ। 

अब महिलाओं ने सावन का  गीत सामूहिक स्वर में गाना शुरू कर दिया है-

"चला सखी रोपि आई खेतवन में धान, बरसि जाई पानी रे हारी..'',

एक महिला गीत की पहली पंक्ति गाती है और बाकी महिलाएं उसके पीछे दुहराती जा रही हैं। उनके गीतों में देसी पन है,  स्वरलय भी कभी गड़बड़  हो जाता  है लेकिन भाव बिल्कुल शुद्ध, सात्विक हैं। भगवान इंद्र भी शायद ही उनकी इस निर्दोष जन हितकारी मांग को ठुकरा पाएं। बीच-बीच में वे एक दूसरे से चुहलबाजी भी करती जा रही हैं।

 अरे यह क्या ? मैंने जोर से बेंड़ उठा कर महिलाओं के पीछे फेंक दी।  पानी का छिट्टा  दो महिलाओं पर गिरा,  वे मुझे घूरने लगी। चाचा ने मुझे जोर से डांटा।   बेंड़ ऐसे  दूर से नहीं फेंकनी है,  वहां  पास जाकर रखना होता है। इनके कपड़े गीले हो गए तो  यह लोग दिनभर इन्हीं गीले कपड़ों में कैसे काम करेंगी?  यह उनका रोज का काम है। बीमार हो जाएंगी। खैर महिलाओं ने ज्यादा बुरा नहीं माना। बच्चा समझकर मुझे माफ कर दिया और फिर से अपने काम में जुट गई  हैं। 

अब दोपहर होने को है । बाबा खुद घर की तरफ जा रहे हैं और मुझे अपने साथ ले गए हैं।  वहां  गेंहू और चना  उबालकर और उसमें थोड़ा लोन (नमक) डालकर  बनाई हुई घुघरी अजिया ने बनाकर पहले से  तैयार रखी हुई है । उसके साथ  हरी धनिया, हरी मिर्च  को मिलाकर सिलवट (सिलबट्टे)  में पीसा हुआ नमक भी तैयार है ।

अब बाबा एक बड़ी डलिया में  कपड़े के ऊपर घुघुरी डालकर,  डलिया को पूरा भर दिए हैं और फिर  उसी कपड़े से घुघुरी को पूरा ढककर  खेत की ओर चल पड़े हैं।  उनके वहां पहुंचते ही महिलाएं हाथ- पैर धोकर मेंड़ पर बैठ गई हैं।  बाबा उन्हें अपनी अजूरे (दोनों हाथों)  से भर- भर कर घुघुरी देते जा रहे हैं। महिलाएं अपने आंचल में इसे लेती जा रही हैं। दोबारा मांगने पर भी बाबा मना नहीं करते,  हंस-हंसकर देते जा रहे हैं।

 हाथ से नमक देने और लेने से लड़ाई होती है,  मनमुटाव होता है इसलिए महिलाएं  कागज में या किसी साफ पत्ते में चम्मच से  नमक  ले रही हैं। अरे यह क्या मैंने रूपा को हाथ से नमक दे दिया,  अब उसे चुटकी काटनी पड़ेगी।  नहीं तो लड़ाई हो जाएगी ।  

 दुनिया में बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन होंगे।  लेकिन  बदरी (बादल)  वाले मौसम में आषाढ़ के महीने  में खूब तेज भूख लगने पर  खेत की मेड़ पर बैठकर घुघुरी खाने  का जो स्वाद है वह अकल्पनीय है, अद्भुत, दैवीय है।

अब  बाबा ने कुछ देर के लिए इंजन  चला दिया है।  सब महिलाएं इंजन की हौदी से  ताज़ा पानी पीकर  पुनः बेंड़ रोपने  लगी है। उनका गाना भी बदस्तूर जारी है - 

" हरी हरी काशी रे , हरी हरी जवा के खेत। 
हरी हरी पगड़ी रे बांधे बीरन भैया,
चले हैं बहिनिया के देस।
केकरे दुआरे घन बँसवारी,
केकरे दुआरे फुलवारी, नैन रतनारी हो।
बाबा दुआरे घन बंसवारी,
सैंया दुआरे फुलवारी, नैन रतनारी हो।”---------------

अब  सूरज ढलने को है।  खेत भी थोड़ा ही बचा हुआ है।  बाबा खेत में आ गए हैं । संयोग देखिए कि शाम होने से पहले ही पूरे खेत में बेंड़ लग गई है । अब महिलाएं  हाथ -पैर धोकर बाबा को घेर कर खड़ी हो गई हैं।  बाबा उन्हें 7- 7 रुपए देते जा रहे हैं।   रूपा की अम्मा , उसकी बहन और वह खुद भी आई है  इसलिए रूपा की अम्मा को पूरे 21/- रुपये मिले हैं, सबसे ज्यादा।

 सबका हिसाब करने के बाद बाबा ने याद दिला दिया है कि  कल भी सब लोगों को आना है, बलदुआ  खेत में बेड़ लगाने के लिए। थकी -हारी लेकिन संतुष्ट महिलाएं अपने घर जा रही हैं। रूपा भी मुझे कनखियों से एक बार और देखकर अपनी अम्मा के साथ  घर जा रही है, कल फिर से आने के लिए।
(विनय सिंह बैस.. बैसवारा वाले)
(गांव-बरी लालगंज रायबरेली UP)