शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

कितने भागो में बंटा है मुस्लिम समाज ?



चरमपंथ और इस्लाम के जुड़ते रिश्तों से परेशान भारत में इस्लाम की बरेलवी विचारधारा के सूफ़ियों और नुमाइंदों ने एक कांफ्रेंस कर कहा कि वो दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ हैं. सिर्फ़ इतना ही नहीं बरेलवी समुदाय ने इसके लिए वहाबी विचारधारा को ज़िम्मेदार ठहराया.
इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सभी की दिलचस्पी इस बात में बढ़ गई है कि आख़िर ये वहाबी विचारधारा क्या है. लोग जानना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज कितने पंथों में बंटा है और वे किस तरह एक दूसरे से अलग हैं?
इस्लाम के सभी अनुयायी ख़ुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन इस्लामिक क़ानून (फ़िक़ह) और इस्लामिक इतिहास की अपनी-अपनी समझ के आधार पर मुसलमान कई पंथों में बंटे हैं.
बड़े पैमाने पर या संप्रदाय के आधार पर देखा जाए तो मुसलमानों को दो हिस्सों-सुन्नी और शिया में बांटा जा सकता है.
हालांकि शिया और सुन्नी भी कई फ़िरक़ों या पंथों में बंटे हुए हैं.
बात अगर शिया-सुन्नी की करें तो दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि अल्लाह एक है, मोहम्मद साहब उनके दूत हैं और क़ुरान आसमानी किताब यानी अल्लाह की भेजी हुई किताब है.
लेकिन दोनों समुदाय में विश्वासों और पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं. इन दोनों के इस्लामिक क़ानून भी अलग-अलग हैं.

सुन्नी


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सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं.
सुन्नी मुसलमानों का मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद के बाद उनके ससुर हज़रत अबु-बकर (632-634 ईसवी) मुसलमानों के नए नेता बने, जिन्हें ख़लीफ़ा कहा गया.
इस तरह से अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी), हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और हज़रत अली (656-661 ईसवी) मुसलमानों के नेता बने.
इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में चलने वाला कहा जाता है. इसके बाद से जो लोग आए, वो राजनीतिक रूप से तो मुसलमानों के नेता कहलाए लेकिन धार्मिक एतबार से उनकी अहमियत कोई ख़ास नहीं थी.
जहां तक इस्लामिक क़ानून की व्याख्या का सवाल है सुन्नी मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं. हालांकि पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है.
इन पांचों के विश्वास और आस्था में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन इनका मानना है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने इस्लाम की सही व्याख्या की है.
दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख स्कूल हैं.
आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए. उन्होंने इस्लामिक क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के समर्थक बन गए.
ये चार इमाम थे- इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी), इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी), इमाम हंबल (780-855 ईसवी) और इमाम मालिक (711-795 ईसवी).

हनफ़ी

इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं. इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए हैं. एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं.

देवबंदी और बरेलवी


Image captionदेवबंद स्थित दारुल उलूम देवबंद मदरसे की तस्वीर.

दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो ज़िलों, देवबंद और बरेली के नाम पर है.
दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की.
अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसा से था, जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली से था.
मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी थी. देवबंदी विचारधारा को परवान चढ़ाने में मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही, मौलाना क़ासिम ननोतवी और मौलाना अशरफ़ अली थानवी की अहम भूमिका रही है.
उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से है.

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देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मानने वालों का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है लेकिन इस पर अमल करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है. इसलिए शरीयत के तमाम क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं.
वहीं बरेलवी विचारधारा के लोग आला हज़रत रज़ा ख़ान बरेलवी के बताए हुए तरीक़े को ज़्यादा सही मानते हैं. बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो बरेलवी विचारधारा के मानने वालों के लिए एक बड़ा केंद्र है.
दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लेकिन कुछ चीज़ों में मतभेद हैं. जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सब कुछ जानते हैं, जो दिखता है वो भी और जो नहीं दिखता है वो भी. वह हर जगह मौजूद हैं और सब कुछ देख रहे हैं.
वहीं देवबंदी इसमें विश्वास नहीं रखते. देवबंदी अल्लाह के बाद नबी को दूसरे स्थान पर रखते हैं लेकिन उन्हें इंसान मानते हैं. बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की बहुत अहमियत नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं.

मालिकी

इमाम अबू हनीफ़ा के बाद सुन्नियों के दूसरे इमाम, इमाम मालिक हैं जिनके मानने वाले एशिया में कम हैं. उनकी एक महत्वपूर्ण किताब 'इमाम मोत्ता' के नाम से प्रसिद्ध है.


उनके अनुयायी उनके बताए नियमों को ही मानते हैं. ये समुदाय आमतौर पर मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में पाए जाते हैं.

शाफ़ई

शाफ़ई इमाम मालिक के शिष्य हैं और सुन्नियों के तीसरे प्रमुख इमाम हैं. मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा उनके बताए रास्तों पर अमल करता है, जो ज़्यादातर मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों में रहता है.
आस्था के मामले में यह दूसरों से बहुत अलग नहीं है लेकिन इस्लामी तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी फ़िक़ह से अलग है. उनके अनुयायी भी इस बात में विश्वास रखते हैं कि इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है.

हंबली

सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मध्य पूर्व और कई अफ्रीकी देशों में भी मुसलमान इमाम हंबल के फ़िक़ह पर ज़्यादा अमल करते हैं और वे अपने आपको हंबली कहते हैं.

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सऊदी अरब की सरकारी शरीयत इमाम हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर आधारित है. उनके अनुयायियों का कहना है कि उनका बताया हुआ तरीक़ा हदीसों के अधिक करीब है.
इन चारों इमामों को मानने वाले मुसलमानों का ये मानना है कि शरीयत का पालन करने के लिए अपने अपने इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है.

सल्फ़ी, वहाबी और अहले हदीस

सुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है कि शरीयत को समझने और उसका सही ढंग से पालन करने के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए.
इसी समुदाय को सल्फ़ी और अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है. यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान, उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य की क़द्र करता है.
लेकिन उसका कहना है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण अनिवार्य नहीं है. उनकी जो बातें क़ुरान और हदीस के अनुसार हैं उस पर अमल तो सही है लेकिन किसी भी विवादास्पद चीज़ में अंतिम फ़ैसला क़ुरान और हदीस का मानना चाहिए.
सल्फ़ी समूह का कहना है कि वह ऐसे इस्लाम का प्रचार चाहता है जो पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था. इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया(1263-1328) और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब(1703-1792) के सिर पर बांधा जाता है और अब्दुल वहाब के नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है.
मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावित हैं. इस समूह के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है कि यह सांप्रदायिक तौर पर बेहद कट्टरपंथी और धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर है. सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं.
अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी सल्फ़ी विचाराधारा के समर्थक थे.

सुन्नी बोहरा

गुजरात, महाराष्ट्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मुसलमानों के कारोबारी समुदाय के एक समूह को बोहरा के नाम से जाना जाता है. बोहरा, शिया और सुन्नी दोनों होते हैं.

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सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक क़ानून पर अमल करते हैं जबकि सांस्कृतिक तौर पर दाऊदी बोहरा यानी शिया समुदाय के क़रीब हैं.

अहमदिया

हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय अपने आप को अहमदिया कहता है. इस समुदाय की स्थापना भारतीय पंजाब के क़ादियान में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी.
इस पंथ के अनुयायियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ख़ुद नबी का ही एक अवतार थे.
उनके मुताबिक़ वे खुद कोई नई शरीयत नहीं लाए बल्कि पैग़म्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे हैं लेकिन वे नबी का दर्जा रखते हैं. मुसलमानों के लगभग सभी संप्रदाय इस बात पर सहमत हैं कि मोहम्मद साहब के बाद अल्लाह की तरफ़ से दुनिया में भेजे गए दूतों का सिलसिला ख़त्म हो गया है.
लेकिन अहमदियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ऐसे धर्म सुधारक थे जो नबी का दर्जा रखते हैं.
बस इसी बात पर मतभेद इतने गंभीर हैं कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अहमदियों को मुसलमान ही नहीं मानता. हालांकि भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में अहमदियों की अच्छी ख़ासी संख्या है.


पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर अहमदियों को इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है.

शिया

शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग हैं. वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं.
उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे. उनके अनुसार पैग़म्बर मोहम्मद भी अली को ही अपना वारिस घोषित कर चुके थे लेकिन धोखे से उनकी जगह हज़रत अबू-बकर को नेता चुन लिया गया.
शिया मुसलमान मोहम्मद के बाद बने पहले तीन ख़लीफ़ा को अपना नेता नहीं मानते बल्कि उन्हें ग़ासिब कहते हैं. ग़ासिब अरबी का शब्द है जिसका अर्थ हड़पने वाला होता है.
उनका विश्वास है कि जिस तरह अल्लाह ने मोहम्मद साहब को अपना पैग़म्बर बनाकर भेजा था उसी तरह से उनके दामाद अली को भी अल्लाह ने ही इमाम या नबी नियुक्त किया था और फिर इस तरह से उन्हीं की संतानों से इमाम होते रहे.
आगे चलकर शिया भी कई हिस्सों में बंट गए.

इस्ना अशरी


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सुन्नियों की तरह शियाओं में भी कई संप्रदाय हैं लेकिन सबसे बड़ा समूह इस्ना अशरी यानी बारह इमामों को मानने वाला समूह है. दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत शिया इसी समूह से संबंध रखते हैं. इस्ना अशरी समुदाय का कलमा सुन्नियों के कलमे से भी अलग है.
उनके पहले इमाम हज़रत अली हैं और अंतिम यानी बारहवें इमाम ज़माना यानी इमाम महदी हैं. वो अल्लाह, क़ुरान और हदीस को मानते हैं, लेकिन केवल उन्हीं हदीसों को सही मानते हैं जो उनके इमामों के माध्यम से आए हैं.
क़ुरान के बाद अली के उपदेश पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा और अलकाफ़ि भी उनकी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तक हैं. यह संप्रदाय इस्लामिक धार्मिक क़ानून के मुताबिक़ जाफ़रिया में विश्वास रखता है. ईरान, इराक़, भारत और पाकिस्तान सहित दुनिया के अधिकांश देशों में इस्ना अशरी शिया समुदाय का दबदबा है.

ज़ैदिया


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शियाओं का दूसरा बड़ा सांप्रदायिक समूह ज़ैदिया है, जो बारह के बजाय केवल पांच इमामों में ही विश्वास रखता है. इसके चार पहले इमाम तो इस्ना अशरी शियों के ही हैं लेकिन पांचवें और अंतिम इमाम हुसैन (हज़रत अली के बेटे) के पोते ज़ैद बिन अली हैं जिसकी वजह से वह ज़ैदिया कहलाते हैं.
उनके इस्लामिक़ क़ानून ज़ैद बिन अली की एक किताब 'मजमऊल फ़िक़ह' से लिए गए हैं. मध्य पूर्व के यमन में रहने वाले हौसी ज़ैदिया समुदाय के मुसलमान हैं.

इस्माइली शिया


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शियों का यह समुदाय केवल सात इमामों को मानता है और उनके अंतिम इमाम मोहम्मद बिन इस्माइल हैं और इसी वजह से उन्हें इस्माइली कहा जाता है. इस्ना अशरी शियों से इनका विवाद इस बात पर हुआ कि इमाम जाफ़र सादिक़ के बाद उनके बड़े बेटे इस्माईल बिन जाफ़र इमाम होंगे या फिर दूसरे बेटे.
इस्ना अशरी समूह ने उनके दूसरे बेटे मूसा काज़िम को इमाम माना और यहीं से दो समूह बन गए. इस तरह इस्माइलियों ने अपना सातवां इमाम इस्माइल बिन जाफ़र को माना. उनकी फ़िक़ह और कुछ मान्यताएं भी इस्ना अशरी शियों से कुछ अलग है.

दाऊदी बोहरा

बोहरा का एक समूह, जो दाऊदी बोहरा कहलाता है, इस्माइली शिया फ़िक़ह को मानता है और इसी विश्वास पर क़ायम है. अंतर यह है कि दाऊदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं.

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उनके अंतिम इमाम तैयब अबुल क़ासिम थे जिसके बाद आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा है. इन्हें दाई कहा जाता है और इस तुलना से 52वें दाई सैय्यदना बुरहानुद्दीन रब्बानी थे. 2014 में रब्बानी के निधन के बाद से उनके दो बेटों में उत्तराधिकार का झगड़ा हो गया और अब मामला अदालत में है.
बोहरा भारत के पश्चिमी क्षेत्र ख़ासकर गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं जबकि पाकिस्तान और यमन में भी ये मौजूद हैं. यह एक सफल व्यापारी समुदाय है जिसका एक धड़ा सुन्नी भी है.

खोजा

खोजा गुजरात का एक व्यापारी समुदाय है जिसने कुछ सदी पहले इस्लाम स्वीकार किया था. इस समुदाय के लोग शिया और सुन्नी दोनों इस्लाम मानते हैं.
ज़्यादातर खोजा इस्माइली शिया के धार्मिक क़ानून का पालन करते हैं लेकिन एक बड़ी संख्या में खोजा इस्ना अशरी शियों की भी है.
लेकिन कुछ खोजे सुन्नी इस्लाम को भी मानते हैं. इस समुदाय का बड़ा वर्ग गुजरात और महाराष्ट्र में पाया जाता है. पूर्वी अफ्रीकी देशों में भी ये बसे हुए हैं.

नुसैरी


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शियों का यह संप्रदाय सीरिया और मध्य पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है. इसे अलावी के नाम से भी जाना जाता है. सीरिया में इसे मानने वाले ज़्यादातर शिया हैं और देश के राष्ट्रपति बशर अल असद का संबंध इसी समुदाय से है.
इस समुदाय का मानना है कि अली वास्तव में भगवान के अवतार के रूप में दुनिया में आए थे. उनकी फ़िक़ह इस्ना अशरी में है लेकिन विश्वासों में मतभेद है. नुसैरी पुर्नजन्म में भी विश्वास रखते हैं और कुछ ईसाइयों की रस्में भी उनके धर्म का हिस्सा हैं.
इन सबके अलावा भी इस्लाम में कई छोटे छोटे पंथ पाए जाते हैं.

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

"इंडिया" जो कि "भारत" है!

रामचंद्र गुहा की किताब "इंडिया आफ़्टर गांधी" यूं तो स्‍वतंत्र भारत का राजनीतिक इतिहास है, लेकिन वह एक रूपक भी है. यह रूपक है : "इंडिया : द अननेचरल नेशन." किताब में कोई भी सवाल हो : बंटवारे का मसला, रियासतों के विलय का मुद्दा, संविधान सभा में कॉमन सिविल कोड या राजभाषा पर बहस, प्रांतीय तक़रारें, कश्‍मीर की समस्‍या : ये तमाम इस एक रूपक के आलोक में विवेचित हैं.

ऐसा हुआ कि सन् 1888 में कैम्ब्रिज में सर जॉन स्‍ट्रेची नाम का एक व्‍यक्ति व्‍याख्‍यान दे रहा था. स्‍ट्रेची ने भारत में ब्रिटिश राज की जड़ें जमाने में काफ़ी मदद की थी और कैम्ब्रिज में वह अपने भारत के अनुभवों को साझा कर रहा था. स्‍ट्रेची का कहना था कि हिंदुस्‍तान एक सुविधाजनक नाम भर था, वस्‍तुत: हिंदुस्‍तान कहीं था नहीं. जो था, वह एक विशालकाय भूखंड था, जिसमें "कई सारे राष्‍ट्र" एक साथ रह रहे थे. स्‍ट्रेची के मुताबिक़ "पंजाब और बंगाल की तुलना में स्‍कॉटलैंड और स्‍पेन एक-दूसरे के ज्‍़यादह क़रीब थे."
बात ग़लत न थी.
लेकिन स्‍ट्रेची ने अपनी किताब में सबसे मज़ेदार जो बात कही, वो यह है कि हो सकता है, यूरोप के तमाम मुल्‍कों की जगह संयुक्‍त यूरोपियन महासंघ जैसा कुछ निर्मित हो जाए (जैसा कि आज सवा सौ साल बाद सचमुच हो गया है : "यूरोपियन यूनियन"), लेकिन इंडिया जैसे किसी एक मुल्‍क के घटित होने की कोई संभावना नहीं.
इसके पूरे 59 साल बाद जब 1947 में भारतीय गणराज्य का गठन हुआ तो कैम्ब्रिज में बहुतों को लगा होगा कि स्ट्रेची महोदय ग़लत साबित हुए, क्योंकि इंडिया जैसा एक मुल्क सच में बन गया है. लेकिन क्या वाक़ई वह "एक" मुल्क था. क्या वाक़ई एकल राष्ट्रीयता जैसी कोई चीज़ भारत की चेतना में है?

भारत में 22 अधिकृत भाषाएं हैं, तीन हज़ार से ज्‍़यादा जातियां हैं, हर प्रांत की अपनी कल्चर. हर लिहाज़ से भीषण विषमताएं. फिर भी नक़्शे पर आज एक भारत है तो, जिसे हम भारत कहते हैं. कैसे है, यह समझना कठिन है.
हमारे संविधान की पहली ही पंक्ति है : "इंडिया, दैट इज़ भारत, शैल बी अ यूनियन ऑफ़ स्‍टेट्स."
"इंडिया दैट इज़ भारत" : वाह, क्या परिभाषा है! इंडिया जो कि भारत है! लेकिन इंडिया क्या है और भारत क्‍या है, यह गुत्‍थी नहीं सुलझती. इस इंडिया और इस भारत को कहां खोजें?

"आइडिया ऑफ़ इंडिया", जो कि एक नेहरूवियन धारणा है, चंद गणतांत्रिक परिभाषाओं में भारत के विचार को बांधने की भरसक कोशिश करती है : "प्‍लुरल", "इनक्‍लूसिव", "टॉलरेंट", "सेकुलर", "डेमोक्रेटिक", "नेशन-स्‍टेट". अंग्रेज़ी के अख़बारों में आज जो एडिटोरियल लिखे जाते हैं, उन्होंने भारत की इन परिभाषाओं को अंतिम सत्य की तरह स्वीकार कर लिया है. उनका विमर्श ही यह मानने से शुरू होता है कि भारत प्‍लुरल, इनक्‍लूसिव, टॉलरेंट, सेकुलर, डेमोक्रेटिक, नेशन-स्‍टेट है.
काफ़्का ने कहा था कि एक बार आपने किसी ग़लत दिशासूचक पर पूरा भरोसा कर लिया तो फिर आप कभी सही रास्ते पर नहीं चल सकते.
26 जनवरी 1950 को एक संवैधानिक "जादू की छड़ी" से एक "राष्‍ट्र-राज्‍य" बना था. संविधान सभा ने वह जादू की छड़ी घुमाई और सहसा भारत का जन्म हुआ! "इंडिया दैट इज़ भारत".
लेकिन उसके पहले क्‍या था?
एक उपनिवेश, एक कॉलोनी? और उसके पहले, एक कुचली हुई सभ्यता, एक सल्‍तनत? उसके पहले, हिंदू-द्रविड़ जनपदों का एक जमा-जोड़? क्या अशोक के अखिल भारतीय साम्राज्य में ही भारत भारत की तरह एक था? आर्य यहां कैसे आए? या वे यहां कैसे विकसे और पनपे? आर्यों की भाषा, उनके देवता हमें विरासत में कैसे मिले? हमारे पर्व, तीर्थ, रीति, मिथक, काव्‍य कैसे उपजे? भारत को चंद परिभाषाओं में कैसे बांधें?
अमरीका होना बहुत आसान है, उसके पास मुड़कर देखने के लिए कोई बीता हुआ कल नहीं (बीकानेर की कई हवेलियां अमरीका से भी पुरानी हैं!). ब्रिटेन होना भी कठिन नहीं. लेकिन भारत अपनी पहचान किस अतीत में तलाशे? उससे विलग किस आज में?

दुनिया के तमाम देशों की एक राष्ट्रीय पहचान है, एक भाषा, एक बहुसंख्यक नस्ल, और कल्चर तो पूरे पूरे महाद्वीपों की यक़सां है. भारत से जब पाकिस्तान टूटा तो उसकी फिर वही एकल पहचान थी : मुस्लिम बहुल इस्लामिक स्टेट. बंगभूमि टूटी, टूटकर एकल पहचान वाला बांग्लादेश बना. खालिस्तान बनता तो वैसा ही होता. द्रविड़ भाषाओं ने अगर अपना पृथक राष्ट्र बनाया तो वह वैसा ही एक द्रविड़ देश होगा. पूर्वोत्तर टूटा तो एक पूर्वदेश होगा.
"ईशावास्योपनिषद्" कहता है : "पूर्ण में से पूर्ण को निकाल दें तो भी पूर्ण शेष रह जाएगा." मैं कहता हूं : "भारत में से भारत को निकाल दें तो भी भारत शेष रह जाएगा."
तो फिर भारत क्या है? या कहीं भारत है भी?

कहते हैं क्रिकेट भारत को एक कर देता है, बशर्ते पाकिस्तान से मैच ना चल रहा हो. पाकिस्तान से मैच के दौरान इस टूटे हुए देश की विडंबनाएं उभरकर दिखती हैं. मेरे प्यारे भारत, तुम्हें बाहरी दुश्मनों की दरक़ार भला क्यूँ हो.
गांधी, रबींद्रनाथ, नेहरू, आंबेडकर, तिलक, सावरकर ने अपने अपने भारत की कल्पना की है, कोई भी कल्पना पूर्ण नहीं. कोई कहता है भारत गांवों में बसता है, जबकि ये गांव ख़ुद टूटे हुए हैं, अलग अलग कुओं से पानी पीते! ठाकुरटोला अलग, चमारपट्टी अलग!
कोई कहता है भारत एक राष्ट्रीय भावना से बढ़कर एक राष्ट्रीय चरित्र है, और मध्यप्रदेश के क़स्बों की गोधूलि में अपना जीवन बिताने के बाद जब उस दिन मैंने दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर भी मेरे क़स्बे की तरह मवेशियों को पसरे हुए देखा तो एकबारगी मेरा मन हुआ कि उस बात को मान ही लूं. लेकिन "राष्ट्रीय फ़ितरत" का कोई एक "संविधान" कैसे बनाएं!

वीएस नायपॉल ने भारत की तीन परिभाषाएं दी हैं : "अंधेरे का देश", "एक ज़ख़्मी सभ्यता", "सहस्त्रों विप्लवों की धरती". तीनों ही सही, किंतु तीनों अर्धसत्य!
राष्‍ट्रों के उद्भव, विकास और पतन पर डेरन एस्‍मोगलु और जेम्‍स रॉबिन्‍सन की चर्चित किताब है : "व्‍हाय नेशन्‍स फ़ेल." क्‍या भारत पर कोई ऐसी किताब है, जो कहती हो : "हाऊ इंडिया मैनेजेस टु एग्ज़िस्‍ट?"
सवाल यही है कि : भारत एक "अस्‍वाभाविक राष्‍ट्र" है या फिर वह "एक राष्‍ट्ररूप" में एक "अस्‍वाभाविक अवधारणा" है? भारत का वास्‍तविक विचार क्‍या है? और अगर भारत एक चेतना है, तो उसे क्या एक सूत्र में बांधता है?
जॉन स्ट्रेची के अंदेशे तो ग़लत साबित हुए, लेकिन क्या ऐसा भारत द्वारा एक राष्ट्र रूप को अपने पर आरोपित करने के बावजूद हुआ है : इन स्पाइट अॉफ़ दैट?

1947 में हिंदुस्तान का बंटवारा हिंदुस्तान की हत्या थी. वैसा हरगिज़ नहीं होना चाहिए था.
और अगर 1947 में हिंदुस्तान यह ज़िद कर लेता कि हम टूटेंगे तो तीन टुकड़ों में टूटेंगे : "हिंदू राष्ट्र", "इस्लामिक स्टेट" और "सेकुलर इंडिया", तो वह बराबर का हिसाब होता, और चूंकि वैसी बराबरी हिंदुस्तान में कहीं भी नहीं है इसलिए शायद हिंदुस्तान इसी बहाने टूटने से बच जाता!
बशर्ते किसी हिंदुस्तान का सच में कोई वजूद हो!