रविवार, 18 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 03)

भूली-बिसरी यादें भाग 02 से आगे....

हम तीनो रूम पार्टनर जो कपड़े पहनकर आए थे वही थे हमारे पास । छुट्टी के दिन कपड़े धोते और फिर छः दिन पहनते,पर फेक्ट्री में मशीन चलाते समय कपड़े दो,तीन दिन में ही गंदे हो जाते । मेरे पास एक कुर्ता पायजामा था पर कुर्ता पायजामा फेक्ट्री में येलाऊ नही था । एक बार शाम को कपड़े धोए पर सुबह तक सूखे नही तो गीले कपड़े ही पहनकर ड्यूटी किया कांबले जी गीले कपड़े देख समझ गए । तब उन्होंने ही बताया शुक्रवार को सुकरवारिया हाट लगता है,वहां पुराने कपड़े भी मिलते है । बस फिर क्या था,अंधेरे में रोशनी मिल गई । शुक्रवार को हम तीनो गए और गुदड़ी बाजार (पुराने कपड़े की बाजार)  किसी के पहने हुए 02 पुराने पैंट,शर्ट खरीद लाए और टेलर से अल्टर करवा लिया और खूब बढ़िया धोकर साफ कर लिया और पहनने लगे । अब हमारी कपड़े वाली समस्या हल हो गई ।

इसी दौरान बीच में 750 km दूर गांव गया और कुछ और जरूरी समान ले आया,जिसमे एक सायकल भी थी । 

एक कमरे में विष्णु चौधरी पत्नी,एक बच्चा और एक भतीजा के साथ रहते थे,पीछे कमरे में हम तीन रहते थे । विष्णु चौधरी ने एक दिन मेरे से बोले " मेरे बच्चे और भतीजे को पढ़ा दिया करो शाम को" । मै मन ही मन खुस हुआ,चलो 20,25 रू महीने का इंतजाम जो गया । पर एक माह बाद तो क्या तीन माह बाद भी चौधरी ने दस रुपए भी नही दिया, और मैं संकोच के कारण माग भी नही सका । 

एक दिन चौधरी मुझे अपने रूम में बुलाया और बोले "यार बघेल साहब, (साहब क्यों लगाया मेरे साथ क्योंकि मैं भी उन्हें चौधरी साहब ही कहता था) । आपके साथ ओ काला लडका है, ओ मेहतर है क्या" ? मैं गर्दन नीचे कर लिया, वे समझ गए की बात सही है । उन्होंने आर्डर दे दिया । "महीना पूरा हो जाए तो खाली कर देना" । और उसी दिन से रामनाथ का बाथरूम यूज करना बंद कर दिया । रामनाथ बाहर लोटा लेकर पास के मैदान में जाने लगे, मै भी कभी कभी  उनके साथ चला जाता । कमरे के सामने ही बाहर नहाने लगे । 

नहाने के बाद अपने चढ्ढी बनियान बाहर नहीं टांगते क्योंकि चौधराइन ने मना कर दिया  बोली "हम छू लेंगे तो नहाना पड़ेगा" । एक दिन रामनाथ का छोट भाई फेक्ट्री के गेट पर आया और एनटीपीसी में सलेक्सन होने की खबर बताया और उसी दिन शाम को इंदौर-बिलासपुर ट्रेन से रीवा चले गए । बस रामनाथ करीब पांच माह साथ रहे । 

13 अक्टूबर 1987 को किर्लोस्कर में हमारी  एक साल की अप्रेंटीसशिप पूरी हुई । सभी 13 लडके बेरोजगार हो गए, मैं भी उन्ही में सामिल था । देवास की कई फैक्ट्रियों के गेट पर जाते नौकरी की आस में पर कही नही मिली, 15 दिन से घर बैठे बैठे रोटी खाते । अगले महीने के मकान मालिक के किराए की चिंता होने नही देती थी रात भर । मजबूर होकर एक वर्कशाप में लेथ मशीन पर काम करने लगा  05 रू रोज में । 

इसी दौरान घर मे दाऊ साहब को पत्र लिखा कि नौकरी छूट गई है ,कुछ खर्चे के लिए भेज दीजिए तो यही पर नौकरी तलास लूं । करीब 20 दिन बाद घर से बड़े भाई साहब का लिखा हुआ पत्र आया जिसमे घर वापस आने की बात कही । पर मैं वापस नही गया और देवास में ही स्ट्रगल करने लगा । 
एक दिन चौधरी जी बोले "मेरा छोटा भाई आ रहा है,ओ भी देवास में नौकरी करेगा इस लिए रूम खाली कर दो" । तब पास में ही हनुमंत सिंह ओलिया (काछी) के यहां रूम ले लिया । ओलियां जी किर्लोस्कर में ही थे । सज्जन व्यक्ति थे । 

वर्कशॉप में करीब दस दिन काम किया होगा, इस दौरान काशीप्रसाद विश्वकर्मा जो हमारे रीवा के थे, उनसे जान पहचान हुई तो उन्होंने "फ्लूफोमेट" नाम की कंपनी में अपने साथ लगवा लिया । इस कंपनी में हवाई जहाज की कपलिंग बनती थी । 

इस कंपनी रात की पाली में ड्यूटी मिली । 8 दिन तक तो आराम से ड्यूटी चलती रही, किर्लोस्कर का अनुभव यहां खूब काम आ रहा था । पर एक दिन अचानक 9 वे दिन "जाब" को लेथ मासीन के चक में सीधा लगाते समय बाएं हाथ की हथेली लेथ मासीन के चक और जाब के बीच में फस गई और ब्लेड जैसे तेज धार वाले टूल से कट गई, खून की धार बह चली । बगल के आपरेटर को आवाज दिया तो उसने हाथ को निकाला और केबिन में बैठे सुपरवाइजर के पास ले गया ।।

UP में मानिकपुर के एक सुपरवाइजर थे "चंदेल जी" उन्होंने हाथ में दवाई लगाया, ड्रेसिंग किया और बोले "आप MG हॉस्पिटल चले जाओ, वहा टांका लगवा लेना और घर चले जाना" । उस समय रात के 2 बज रहे थे ।   कंपनी बहुत छोटी थी, कोई सुविधा नही थी तब । टूटी हुई सायकल टूटी फूटी रोड पर घसीटते हुए चल दिए, चूकि घाव गहरा था तो खून रिस रिस कर ड्रेसिंग पट्टी को लाल कर दिया, तो हाथ को सीने से चिपका लिया । दर्द के मारे हाथ अकड़ रहा था,फिर भी चलना तो था । जब NH3 पर आया तो रोड थोड़ी अच्छी थी, एक ऊंची जगह देखकर सायकल पर चढ़ गए,और चलने लगा, मुस्किल से एक km ही गया होगा की सामने से एक ट्रक आया और सायकल सकरी रोड से नीचे उतारते ही  सम्हाल नही पाया और गिर गया, जमीन से वही बाया हाथ टकराया और उफ....😥😥 खूब की धार बह चली । दर्द के मारे हाल बेहाल हो गया । खैर...इंसान हूं,हिम्मत किया और बाबडिया चौराहे से तो MG हॉस्पिटल तक पैदल चलने लगा,वर्तमान विकास नगर चौराहे पर (तब यहां इतना विकास नही हुआ था) । किसी की रूमाल गिरी थी, उसे उठाया और दाए हाथ से घुमा घुमा कर कस कर बांध लिया तो खून का बहना बंद हो गया 
            
           रात के करीब 3 बजे MG हॉस्पिटल पहुंचा, और आपातकालीन वार्ड में गया, सोते हुए कंपाउंडर को उठाया, डाक्टर या नर्स कोई था नहीं, बड़ी मुस्किल से कंपाउंडर उठा,और बिना आंख खोले ही झल्लाते हुए बोला "जाओ सुबह आना" । मैने फिर से निवेदन किया और बोला "साहब जी, मेरे हाथ में चोट लगी है,खून बह रहा है, ड्रेसिंग कर दीजिए" ।  तब उसने आंख खोला और मेरे हाथ से टपकते खून को देखा, तो शायद उसे दया आ गई,सामने ड्रेसिंग टेबल की तरफ इसारा किया "वहा बैठ जाओ" । ड्रेसिंग टेबल पर बैठ गया, फेक्ट्री में बांधी गई ड्रेसिंग पट्टी को खोला तो देखा, घाव ऐसा लग रहा था जैसे "देशी ककड़ी पक कर फूट जाती हो" उसी तरह से पट्टी खोलते ही दोनो तरफ की चमड़ी विपरीत दिशा में फैल गई । कंपाउंडर बोला "ये तो चाकू का घाव है,पुलिस केस है,पहले पुलिस को सूचना देनी पड़ेगी, फिर ड्रेसिंग होगा"।  मैने बोला " भाई साहब पहले ड्रेसिंग कर दीजिए,खून बंद हो जाए फिर पुलिस् को सूचना दे देना" । उसने मेरी बात मान लिया,और टांका लगाने की सुई ले आया, घाव को आधा अधूरा साफ किया और फिर एक एक करके टांका लगाना सुरु किया, तो मैंने बोला "सुन्न का इनजेक्सन लगा दीजिए, नही तो बहुत दर्द होगा" तब कंपाउंडर बोला "शून्य का इंजेक्शन तो डाक्टर ही लगाते हैं,जो है नही अभी" । मैं निरुत्तर हो गया । कंपाउंडर ने टांका लगाना सुरु किया, एक टांका मुझे एक एक युग के बराबर लग रहा था, क्योंकि कंपाउंडर घाव के एक तरफ की चमड़ी को चिमटी से पकड़कर उठाता खींचता फिर सुई चुभोता धागा खींचता, फिर दूसरी तरफ की चमड़ी चिमटी से पकड़ कर उठाता, खींचता और सुई चुभोता और धागा खींचता फिर दोनो तरफ के धागे को खीच कर गठान लगाता और फिर कैंची से काटता । फिर दूसरा टांका लगाता, इस तरह से 6 टांका लगाया और दर्द की टेबलेट्स दिया,टेबलेट्स तुरंत ही खा लिया । OMG उतना दर्द मैने जीवन में पहली और आखिरी बार सहन किया था । टांका लगने के बाद करीब 25 मिनट तक बैठा रहा बेंच पर । अबतक डाक्टर साहब आ गए थे,कंपाउंडर बोले "डाक्टर साहब आ गए है,दिखा दो" । डाक्टर साहब को दिखाया,जो दवाइयां लिखा था,मेडिकल स्टोर से ले लिया । अब दर्द कम हुआ तब सायकल उठाया और सुबह के 04:30 बजे रूम पहुंचा, अंधेरे में बड़ी मुस्किल से ताला खोला, क्योंकि रूम पार्टनर पटेल जी गांव गए हुए थे । 
    दर्द कम हुआ तो नींद लग गई तो सुबह 9 बजे नींद खुली ओ भी भूख के कारण । अकेला इंसान,हाथ में चोट लगी,क्या बनाए,कैसे बनाए । पर पेट की ज्वाला शांत तो करना ही था । एक हाथ से स्टोव तो जला नही सकता, पास ही किराने की दुकान गया और 2 पैकेट बिस्कुट ले आया, एक बार में ही दोनो पैकेट बिस्कुट खत्म कर लिया, दवाई खाया और पेट भर पानी पिया और फिर आंख बंद करके लेट गया । 

कास आज मेरे पास मेरे परिजन होते,मेरी मां होती, मेरे दाऊ होते तुझे इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती । बरबस ही आंखों से आसू छलक पड़े । 

दो घंटे बाद फिर से भूख लग गई, अब बिस्कुट से काम चलने वाला नही था । वापस किराने की दुकान गया और चना ले आया,उसे पानी में गला दिया । जब आधा अधूरा गल गया तो नमक छिड़क कर चबा लेता । क्योंकि जेब में इतने रुपए तो थे,नही की होटल में जाकर कुछ खा आता । 

मकान मालिक आगे के दो कमरे में रहते थे,सबसे पीछे के रूम में मैं रहता था । बिधुर मकान मालिक के परिवार में तीन लोग थे,खुद मकान मालिक, एक 15 -16 साल का बेटा और 14-15 साल की लड़की । दो एक ही क्लास में थे । सामन्यातौर पर मकान मालिक या उनका परिवार मेरे कमरे तरफ कभी झांकते भी नही थे, इस लिए उन्हें पता नही चला । 

दो दिन चना खा कर काम निकाल लिया,कई दिन हो गया थे नहाए  हुए,तो बाथरूम में नहाने जाने लगा तब मकान मालिक की नजर मेरे उपर पड़ी तो पास आए और देखकर पूछा, उन्हे सारी बात बताया । जब उन्हें पता चला की मैं दो दिन से चना खाकर रह रहा हूं तो बहुत दुखी हुए और बोले "अब मेरे वहा खाना,भूखे मत रहना" । बरबस ही मेरे आंखो से आसू छलक पड़े उनके स्नेह के कारण ।
उस दिन रविवार था, बच्चे घर पर ही थे, मकान मालिक औलिया साहब ने लड़की को आवाज दिया "मनु,मनु" तब मनु आई तो उसे बोला "आज से बघेल भैया के लिए भी खाना बना लेना" । और सारी बात बताया तो  मनु भी बहुत स्नेह से बोली "ठीक है" और मेरी तरफ देखकर लगभग डाटते बोली "कितने बड़े पागल हो आप, हम सब के रहते हुए आप चने खाकर रह रहे हो" ।
उस दिन से मकान मालिक के यहां खाने लगा,मनु बहुत प्रेम से खिलाती,उनका लड़का अनिल भी बहुत प्रेम से बोलता । कुल मिलाकर औलिया साहब का पूरा परिवार बहुत ही अच्छा है ।।
दो दिन बाद घाव में बहुत दर्द होने लगा,मैं समझ गया, घाव पक रहा है,मेरे पास न तो इलाज के लिए पैसे है, और कब तक मकान मालिक पर बोझ बनूगा । ये सोचकर ग्वालियर चला गया जहा मेरे आर्मी वाले बड़े भाई रहते थे । 
ग्वालियर में करीब करीब एक माह रहा, बड़े भाई ने भाभी जी ने पूरा ख्याल रखा,दोनो का स्नेह आज भी मुझे उनका ऋणी बनाए हुए है ।।
(शेष अगले भाग में)