शनिवार, 17 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 02)

देवास के मोती बंगला कालोनी  में रेलवे पटरी के किनारे ही रूम मिला (वर्तमान में ओवरब्रिज भी है) । हम तीनो ने अपने अपने बोरिया बिस्तर रखने के बाद घर से लाई पूड़ी,गुड खाकर सो गए ।  अगले दिन 15 अक्टूबर 1986 को हमे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी । लंबे सफर की थकावट, मानसिक कष्ट झेलने के कारण सुबह नींद लेट खुली । लैट्रिन, बाथरूम इंगेज ।  क्योंकि मकान मालिक के तीन लड़के, दो वे खुद,सुबह एक लैट्रीन, एक  बाथरूम कैसे खाली रहेगा भला, मैने तो लोटा उठाया और हल्के अंधेरे का फायदा उठाते हुए ट्रेन की पटरी के किनारे हल्के होकर आ गए । पर हाथ धोने के लिए जगह नहीं, क्योंकि बाथरूम में मकाल मालकिन जो घुसी तो निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी, मजबूर होकर नल से बाल्टी भरे और रोड पर ही अपना कुल्ला,मुखारी,स्नान सब हो गया । हम तीनो इसी तरह फ्रेश हुए ।

सोचा था गुड रोटी खाकर काम चला लेंगे आज, मुझे मीठा बहुत पसंद है, इस लिए माता जी ने आधा किलो गुड़ दे दिया था । रोटी बनाने के लिए  मैं स्टोव जलाने लगा, तो पिन स्टोव के बर्नर में ही टूट गई । रोटी बनाने का प्लान चौपट हो गया । 

जब घर से देवास के लिए निकले थे तब पूज्य माता जी ने थोड़ी,थोड़ी खाद्य सामग्री की पोटली बांधकर दे दिया था, बोली "जाते से नई नई जगह में कहा तलासोगे" । 

बचपन से ही मेरी ऐसी आदत बनी है की सुबह बहुत तेज भूख लगती है । पर अब क्या करू, भूख जमकर लगी थी, जिस पोटली में पूड़ी बांधकर लाए थे, ओ रूम के किनारे कोने में पड़ी थी,उसे टटोला तो देखा एक पूड़ी रही थी,पर चीटियां आ गई थी ढेर सारी, पूड़ी को उठाया, चीटियां को झटकार कर, खाने के लिए निकाला तो रामनाथ टोक दिए "दादा लास्ट में मैने पूड़ी खाया था, ओ छुतीही हो गई मत खाइए आप" । मैने बोला "अरे छोड़ो,भूख से बढ़कर कुछ नही" पर रामनाथ नही माने और पूड़ी मेरे हाथ से ले लिया ।  भूख ऐसी लगी थी की खड़े होते नही बन रहा था, फिर भी वही सफर वाले पैंट, सर्ट पहन कर तैयार हुए । पर बार पेट गुहार लगाए, तो एक कटोरी में लगभग 100 ग्राम आटा को घोला और जैसे तैसे करके पी गया 😥। क्योंकि इतने पैसे नही थे पास कि, बाहर जाकर समोसा, कचोरी आदि खा सकूं । 
6:45 पर फेक्ट्री का सायरन बजा तो हम तीनो ड्यूटी के लिए निकल पड़े । किर्लोस्कर फेक्ट्री के NW शॉप में श्री  श्याम कांबले जी (मराठा क्षत्रिय) के साथ हम तीनो को सुपरवाइजर "साइबा"  ने मसीन चलाने को सीखने के लिए खड़ा कर दिया । श्याम कांबले जी भी सज्जन इंसान है, जान पहचान हुई । रामनाथ बहुत निश्छल स्वभाव के थे उन्होंने  अपनी जाति भी उन्हे बता दिया । हालाकि कोई नकारात्मक भाव नही आए उनके चेहरे पर ।।

लंच का सायरन बजा,हम लंच में नही जा रहे थे,तो श्याम कांबले जी पूछे "भूख नही लगी है क्या" । मैने बताया "कुछ लाए ही नही तो खाऊंगा क्या केंटीन में जाकर,इस लिए यही स्मोकिंग रूम में बैठेंगे" । 
श्याम कांबले जी सज्जन इंसान है, बोले "चलो तो सही" । सुबह की पिया हुआ आटे का घोल पच चुका था, भूख  की हालत सुबह जैसे फिर से हो गई थी । मारता क्या न करता, तीनों किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह पीछे पीछे चल दिए । 
जीवन में पहली बार किसी फेक्ट्री की कैंटीन देखा । घुसते ही तरह तरह के खाने के आयटम (सभी वर्कर अपनी अपनी टिफिन खोलकर बैठे थे) ने भूख और बढ़ा दिया ।
श्याम कांबले जी ने 15-15 पैसे के तीन कूपन दिए और बोले "जाकर एक एक कटोरी कढ़ी लाओ" । हम तीनो चले गए काउंटर पर,5 मिनट बाद जब लौट कर आया तो देखा की टेबल पर करीब 25-30 रोटी रखी थी, उसमे कुछ पराठा, कुछ पूड़ी भी थी । दरअसल हमारे जाने के बाद कांबले जी ने सभी से एक एक,दो,दो,रोटी हमारे लिए माग लिया । कसम से रोटी देखकर पलक के कोने नाम  पड़ गए । वाह री मालवा की मिट्टी, वाह री मालवा के लोग । केंटीन में बैठे सभी को तरफ नज़र उठा कर देखा और बरबस ही दिल से आवाज निकली "आप सभी में देवताओं का अंश है" । 
("तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करू" । यदि ये गाना उस समय होता तो मुंह से यही निकलता ।)  किसी ने सच ही कहा है "दाने दाने में लिखा है खाने वाले का नाम" ।। सच कहूं उन रोटियों जैसा स्वाद मुझे आज तक नही मिला ।

इस तरह ड्यूटी आराम से होने लगी,मसीन सीखते सीखते 7 नवंबर आ गया,पहली सेलरी मिली शायद 147 रू थी (टीक से याद नही) तीन रू ESI के कट गए थे ।  
एक दिन अचानक बज्रपात हुआ, हम जैसे चार बजे ड्यूटी से आए, घर में घुसने लगे तो मकान मालिक आग बबूला हो गए और जोर से चिल्लाए "तुम ठाकुर हो ? कैसे के ठाकुर हो ? जो भंगी को साथ में रखे हो, ये (रामनाथ की तरफ इशारा किया) मेरे यहां नही रहेगा,तुम दोनो रहो कोई दिक्कत नही" ।
मैने बहुत अनुनय,विनय किया पर मकान मालिक नही पिघले । 
दरअसल मकान मालिक व उनके बेटे ओमप्रकाश ठाकुर (शिवपुरी एमपी के लोधी हैं)  दोनो किर्लोस्कर में थे । कही से पता चल गया था । हालांकि मकान मालिक के लडके ओमप्रकाश ठाकुर ने हमारा पक्ष रखा पर उनकी एक न चली, उनकी माता जी फंगनाते हुई बोली "खबरदार, तू (रामनाथ की तरफ इशारा)  घर में घुसना मत" । मैने बोला "माता जी सिर्फ आज रात इन्हे रहने दीजिए, कल सुबह इनके लिए अलग कमरा देख लूंगा" । पर वे जिद पर अड़ गई । 

हम तीनो वापस गौतम जी के पास "भोषले कालोनी" पहुंचे और अपनी व्यथा बताया, तो गौतम जी तुरंत उठे वही पास में कालोनी में एक विष्णु चौधरी जी (खाती पटेल) जो गजरा गियर में उनके ही साथ थे,उनके यहां रूम दिला दिया, 85 रू महीने में । एक झटके में हमारा 10 रू खर्चा बढ़ गया । पर कोई विकल्प नहीं था ।
        वापस गए और पहले वाले मकान मालिक लोधी जी के यहां से समान उठाने तो मैं और पटेल जी हम तीनो की गृहस्थी उठा लाए,रामनाथ को घुसने नही दिया । हम तीनो आराम से विष्णु चौधरी जी के यहां रहने लगे...पर यहां भी रामनाथ भाई के जाति ने पीछा नहीं छोड़ा...😭😭 ।
(बस अब लिखा नही जा रहा, फिर कभी लिखूंगा) ।
श्री श्याम राव कांबले जी मेरे कालोनी ही रहते हैं । 
#NSB