गुरुवार, 15 सितंबर 2022

भूली-बिसरी यादें (भाग 01)

13 अक्टूबर 1986 में जब हम 13 युवक इंदौर,बिलासपुर ट्रेन से नौकरी करने देवास आये थे । जिसमे  07 ब्राह्मण, 03 कुर्मी, एक काछी, एक ठाकुर (मैं खुद) एक बसोर (मेहतर)  । दोपहर 2 बजे से  रेलवे स्टेशन में मायूस होकर खड़े थे, क्योंकि हम देवास में किसी को नही जानते थे,देवास पहली बार आए थे, किर्लोस्कर कंपनी का ज्वाइनिंग लेटर लेकर  । हमारे रीवा में कंपनी से इंटरव्यू लेने वालों ने वादा किया था "कंपनी गेट पर आ जाना, रहने,खाने, नहाने,धोने की  सारी व्यवस्था हो जायेगी" । पर जब हम सभी अपना बोरिया, बिस्तर लेकर कंपनी की गेट पर गए तो कंपनी ने सभी के ज्वाइनिंग लेटर रखवा लिया और बोले " कल सुबह से ड्यूटी पर आ जाना" । जब हमने वादा को याद दिलाया तो साफ नकर गए, बोले "ये सब व्यवस्था खुद करिए" । हमने बहुत विनती किया पर हमारी एक न चली ।  हम सभी पुनः अपना बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर वापस रेलवे स्टेशन आ गए ।
      तब यही इंदौर बिलासपुर वापस 4 बजे आती है । हम सभी ने वापसी का प्लान बना लिए । 13 लडको में से 7 बहुत ही गरीब घर से थे, वे वापस नही जाना चाहते थे, वे रोने लगे । पर एक तरफ कुआं,एक तरफ खाई वाली बात थी । हम सभी रुआसे मन से मुंह लटकाए खड़े थे,हम सभी आपस में हमारी स्थानीय भाषा "बघेलखंड़ी" में बाते कर रहे थे । 
हमारी बाते सुनकर,हम लोगो के उदास चेहरे देखकर श्री महेंद्र गौतम जी (जो पहले से देवास में गजरा गियर में थे) हमारे पास साक्षात देवदूत बनकर आए और हम सभी की पूरी बात सुनकर बोले "कोई वापस मत जाओ, सभी की व्यवस्था हो जायेगी" । फिर अपने पिता जी को ट्रेन में बैठाकर  हम लोगो को अपने साथ ले कर चल पड़े । हम 13 लड़के अपने अपने बोरिया बिस्तर सिर पर लादकर कर प्रवासी मजदूर की तरह पीछे पीछे चल पड़े । 

बोरिया बिस्तर इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि हम सभी पूरी व्यवस्था से आए थे, स्टोव, कुकर, लोटा,गिलास,थाली, कटोरी,बाल्टी Etc....

श्री महेंद्र गौतम जी का किराए का सिर्फ एक कमरा 9×10 फिट का था, (पर दिल बहुत बिसाल था ) जिसमे एक बच्चा व पत्नी के सात रहते थे ।  हम सभी के समान मकान की गैलरी में रखवा दिया, सभी का परिचय पूछा,जलपान करवाया  और रात के 9 बजे तक 
सभी के लिए  रूम की व्यवस्था करवा दिया । हम सभी 13 लडके दो,दो-तीन, तीन लोग एडजेस्ट हो गए एक एक रूम में । मैं  एक पटेल जी (कुर्मी)  के साथ रूम पार्टनर बन गया । जब सभी गौतम जी के यहां से बोरिया बिस्तर लेकर चल पड़े तो  रामनाथ बसोर जिन्हे कोई अपना रूम पार्टनर नही बनाना चाहता था । रामनाथ, अनाथ जैसे फफक फफक कर रोने लगे और वापस गांव लौटने की तैयारी करने लगे । 

क्योंकि 300/ रू वेतन में 100रू -75 रू,किराया दे कि जीवन यापन कैसे करे ? 

मुझे उनकी रुलाई नही देखी गई तो मैंने उन्हें भी मेरा रूम पार्टनर बना लिया । मेरे रूम पार्टनर पटेल जी थोड़ा नाराज हुए पर उनकी नाराजगी के बाद भी  मैं मेरे निर्णय पर अडिग रहा ।

रामनाथ जी जब तक हमारे साथ रहे,पांव की तरफ बिस्तर लगा कर सोए, कई बार बोला, "बगल में बिस्तर लगा लो" तो उनका एक ही जबाब विनम्रता के साथ रहता था "दादा अपने आश्रय दे दिया,तो क्या आपके सिर पर बैठू, कभी नही दादा, मैं आपकी प्रजा हूं, प्रजा की तरह ही रहूंगा" । 
जब मैं बोलता "यहां काहे का राजा,प्रजा,हम सभी फेक्ट्री मजदूर हैं" । वे मुस्कुरा कर चुप रह जाते । 

हम दोनो खाना निकाल लेते  तभी रामनाथ बर्तन से खाना निकालते, दूर बैठकर खाते, बर्तन धोते और रख देते ।

5 माह बाद रामनाथ का एनटीपीसी सिंगरौली (शक्ति नगर) में सलेक्सन हो गया, चले गए,जाते समय पहली बार मेरे गले लगकर लिपट कर खूब रोये, बार बार मेरा पांव छुए और यही बोले "दादा आप मेरे लिए देवता समान है" । 

एक बार रामनाथ रीवा में मिल गए,मिलते ही रोड में ही दंडवत हो गए । इतना मान,सम्मान मुझे कभी किसी ने नही दिया । 

उसी तरह मैं भी पूज्य महेंद्र गौतम जी को सम्मान देता हूं ।उनका एहसान, आज तक नही भुला हूं । गौतम जी का बाद में CAT (इंदौर) में सलेक्सन हो गया था,अब तो रिटायर्ड हो गए  । 
(ये सब लिखते लिखते कई बार मेरी पलके गीली हुई)
देवास आने के बाद की जिंदगी की सच्चाई फिर कभी लिखूंगा ...।

#NSB