शनिवार, 26 मई 2012

!! स्त्री की स्वतन्त्रता में बाधक -दहेज़ प्रथा !!

भगवान् ने स्त्री-पुरुष के रूप में संसार को एक ऐसी सौगात दी है जिसके नियमों का पालन कर वह समाज को विशिस्ट बना सकता है ! स्त्री वैदिक सभ्यता में पुज्यनीया थी जिसपर किसी प्रकार का भेद-भाव (चाहे वह लैंगिक हो या सामाजिक, जाति मूलक हो या समाज मूलक) नहीं था !समाज में उसे सम्पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी !स्वयं के विवाह हेतु उसे योग्यतम वर को वरन करने का अधिकार था! वह तब भी घर परिवार तथा समाज में ऐश्वर्य एवं इज्जत की प्रति मूर्ति मानी जाती थी !स्त्रियों के वजह से हुए यूद्धों में स्त्री को पाने की लालसा न होकर उसकी इज्जत -आबरू बचाने की जद्दोजहद ज्यादा थी ! महाभारत का  युद्ध द्रौपदी के कारण नहीं अपितु उसकी इज्जत की खातिर लड़ा गया था !भगवान् कृष्ण का उद्देश्य यही था कि "अगर कोई तुम्हारी बहु बेटी कि इज्जत से खिलवाड़ करे तो तुम्हे उसका प्रतिकार करना चाहिए! उसका विनाश भी कर दो तो अच्छा होगा.............
                                       सीता जी के वनवास और उनकी अग्नि परिच्छा को लोग भगवान् राम कि हठधर्मिता  ही मानते हैं जबकि वास्तविक सत्य यह था कि " यदि कोई स्त्री अपने पति पर विश्वाश न करे और उसकी आज्ञा का पालन न करे तो समाज में उसे कस्ट उठाना ही होगा !  और यह कस्ट जीते जी अग्नि में जलने के सामान होगा ! " अपनी पत्नी कि रक्चा के लिए युद्ध तो क्या पुरुष को समंदर से भी लड़ना पड़े तो उसे हार नहीं माननी चाहिए ।
                              स्त्री कि नैतिकता पुरुषों के सामान ही होती है! शारीरिक बनावट के आधार पर ही हम उसे इज्जत कि दुहाई देकर चाहदिवारी में कैद करने का वक्त बीत चुका है! अब उन्हें फिरसे वही स्वतन्त्रता चाहिए जो वैदिक सभ्यता में उन्हें प्राप्त थी ! ये स्वतन्त्रता उन्हें तभी प्राप्त हो सकती है जब उनको दहेज़ जैसे दानव से बचा लिया जाए!आज दहेज़ कि वजह से लोग लड़कियों को पैदा करने और पालने से घबराने लगे हैं ! पहले ऐसा नहीं था, किसी पिता को उसकी पुत्री कि शादी (कन्यादान) के लिए वर का चुनाव करना होता था किन्तु दहेज़ नहीं देना होता था ! वर पक्छ भी कभी दहेज़ के लिए अपने पुत्र का विवाह नहीं करते थे ! वह एक अति उन्नत समाज कि सामाजिक  परम्परा थी ! कई बार तो किन्ही विषिस्थ परिस्थितियों के अधीन होकर अन्य योग्य परुष से संसर्ग करके वीर पराक्रमी पुत्र अथवा योग्य पुत्री को जन्म देती और लालन पालन करती थी ।जैसे भगवान् शिव और गंगा के संसर्ग के फलस्वरूप कार्तिकेय का जन्म हुया और उन्होंने असुरों का संहार किया था । 
                                        वैसे भी समाज को आज योग्य और मानसिक रूप से समृद्ध लोगों कि आवश्यकता है जो समाज को नयी दिशा और गति प्रदान कर सकें !समाज को दहेज़ प्रथा से मुक्त करने में हम लोगों कि भागीदारी बेहद जरूरी है ! अपनी बेटियों और बहनों को घर आँगन में ख़ुशी से चहकते देखना है तो हमें दहेज़ को मिटाना ही होगा !आज समाज से स्त्रियों कि संख्या बेहद तेजी से घटती जा रही है, जिसका वास्तविक कारन दहेज़ है !पुत्री कि पैदाइश के साथ ही परिवार को उसकी शाति और दहेज़ कि चिंता सताने लगती है! यदि समानता लागो हो जाये और दहेज़ जैसी बीमारी समाज से समाप्त हो जाए तो कोई भी पुरुष ये नहीं चाहेगा कि उसके घर में बेटी न पैदा हो!हमें आज फिर से उसी वैदिक सभ्यता को लाना होगा जहाँ किसी से कोई दुराव छिपाव न हो और अब कोई भी लड़की पैदा होने से पहले ही ना मार दी जाए..............

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें