शनिवार, 15 अक्तूबर 2022

भूली बिसरी यादें भाग 07


अगले दिन सुबह ड्यूटी चला गया, शाम को ट्यूशन पढ़ाकर 9 बजे रात वापस आया, चौराहे पर ओ लडका खड़ा था अपने दोस्तो के साथ, मुझे देखा....
और आगे बढ़कर मेरे सायकल का हैंडल पकड़ लिया, तो मैं तुरंत सायकल से उतर कर सायकल को स्टैंड में लगा दिया और संभावित हमले के लिए पूर्ण सतर्क हो गया..पैर की पिंडलियों में इलास्टिक के सहारे बांध रखी करीब 8 इंची कटार को झुक कर तुरंत हाथ में पकड़ लिया और म्यान से बाहर निकाल लिया । चमचाती कटार हाथ में देखकर ओ लडका तुरंत करीब तीन फिट पीछे होकर खड़ा हो गया । उसके होस उड़ गए मेरे हाथ में चमचमाती  कटार देखकर । उसके जो दोस्त दुकान में खड़े थे उनमें से ज्यादातर खिसक लिए, जब उसने पलट  कर देखा तो दो तीन दोस्त खड़े थे, तो ओ लौटकर वापस दुकान के पास चला गया ।  किराने दुकान के मालिक श्री विश्राम सिंह जी तोमर (तब इनका नाम नही जानता था) ये सब देख रहे थे दुकान के अंदर से (चंदा वाली गैंग में ये भी सामिल थे) वे उस लड़के को बोला "वीरेंद्र जाओ यहां से", इतना सुनकर ओ लडका चला गया दोस्तो के साथ  । तोमर साहब दुकान से बाहर मेरे पास आए और बोले " बाघेल साहब इसे रख लो और अब आगे विवाद मत बढ़ाओ" । उनके  कहने पर कटार को कमर में दबा लिया ।  चूंकि तोमर साहब मेरे से बहुत बड़े है उम्र में, इस लिए उन्हें बोला "दद्दा अगर इनमे से किसी ने भी मुझे मारने के लिए हाथ उठाया तो इनका हाथ काट लूंगा,आप इन्हे समझा दीजिए" । तब तोमर साहब बहुत अपनत्व और स्नेह से  बोले "तू जा निश्चिंत होकर अब ये कोई भी तेरे तरफ देखेगे भी नही" । मैं उनका पांव छुआ और वापस घर आ गया । उनका पांव छूना ही, उन्हें मेरे पक्ष में लाकर खड़ा कर दिया ।
उस दिन से उन लडको की तरफ से कोई हरकत नही हुई, फिर भी मैं कटार लिए बिना निकलता ही नही । 
यह कटार एक मुस्लिम के पास से में मिली थी,उनके बच्चो को पढ़ाता था घर में, मेरी समस्या बताया तो उन्होंने कटार दिया आत्मरक्षा के लिए । बोले थे "सर जब तक कोई हमला नहीं करे, तब तक आगे होकर इसका उपयोग मत करना" । 
             नवरात्रि के 9 दिन बड़े आराम से निकल गए, इस दौरान एक दिन श्री प्रेमनाथ तिवारी जी खुल कर मेरे साथ आ गए । उन्होंने चौराहे पर आरती के समय सबके सामने लाउड स्पीकर में बोल दिया "जो हुआ ओ गलत हुआ, गलती चंदा मागने वालों की है, इस तरह से चंदा मागेगे तो विवाद तो होगा ही ।  नागेश्वर सिंह  शांत स्वभाव के है, उन्हे बचपन से जानता हूं,जो हो गया सो हो गया अब विवाद आगे मत बढ़ाओ नही तो हम सबके के लिए अच्छा नही होगा" । 
            जिस दिन माता जी का विसर्जन था, उस दिन वीरेंद्र सिंह  की मित्रमंडली के करीब 30 लडके विसर्जन के बाद करीब 4 बजे कालोनी के चौराहे पर शराब पीकर तलवार लहरा लहरा कर मुझे गाली दे रहे थे, मुझे मारने की बात कर रहे थे । उस दिन बासी दशहरा की छुट्टी थी मैं घर पर हो था । जब मुझे पता चला तो मैं भी तलवार की धार और ठीक से कर लिया । (इस दौरान मैंने एक अच्छी सी तलवार का इंतजाम कर लिया था) । मैं तो इंतजार में था को "अगर घर के सामने आए तो गाली दिया तो काट डालूंगा, भले ही जेल हो जाय" । पत्नी समझाती रही "कोई आयेगा तो आप अंदर ही रहना मैं सम्हाल लूंगा उन लोगो को, समझा लूंगी" । पर मैं नही माना ।। 
श्री मती जी का दिमाग चला, उन्होंने कालोनी में ही अपने रीवा के ही गांव के पास जवा के अनिल कुमार मिश्रा जी, जिन्हे पहले नही जानता था, उन्हे भोसले कालोनी, आदर्श नगर में रीवा वालो को सूचना भेजवा दिया और पूरा मामला बता दिया । क्योंकि इन दोनो कालोनियों में रीवा के बहुत से लोग रहते थे,11 साल में बहुत से लोग हो गए रीवा के और सभी से मेरे बहुत अच्छे संबंध बन गए थे । 
       करीब 5:30 तक रीवा के मित्र जिनमे ज्यादातर नवयुवक ही थे । सायकल में लाठी, डंडा बांधकर मेरे घर के सामने आने लगे, 6 बजते बजते करीब 120 के लगभग सशस्त्र मित्रगण मेरे घर के सामने आकर खड़े हो गए । कालोनी में सन्नाटा छा गया, सभी अपने अपने घर के अंदर हो गए । चौराहे में खड़े लडके जो मुझे गाली दे रहे थे सब गायब हो गए भीड़ देखकर । कुछ अति उत्साही मित्रगण वीरेंद्र  के घर पहुंच गए । मुझे पता चला तो तुरंत सभी को वापस लाया । सभी मित्रो को यथावत स्वागत सत्कार किया । करीब एक घंटे बाद सभी मित्रगण चले गये । 
               वीरेंद्र सिंह व उनके साथियों को समझ आ गया की अब कुछ किया तो ये रीवा वाले बहुत मारेंगे । वीरेंद्र सिंह ने समझौते की पहल किया तो मैंने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया । शिशुपाल सिंह जादौन जो कालेज में प्रोफेसर थे उनके घर में समझौता हुआ । जिसमे यह तय हुआ कि हम दोनो आजीवन कभी एक दूसरे पर प्रत्यक्ष या अप्रताक्ष्य वार नही करेंगे । जिसका पालन हम दोनो ने अभी तक किया । अब तो वीरेंद्र सिंह से अच्छे संबंध है ।
           मैं फिर मेरे काम से लग गया । ट्यूसन के बाद जो समय मिलता उसे ,नूतन मित्र मंडल सोसायटी के लिए देता   सोसायटी में कुल 50 सदस्य हो गए । जिम्मेदारी बढ़ गई । मित्रमंडली में मेरी उपयोगिता, मान सम्मान,धाक बढ़ने लगी । फेक्ट्री के सुपरवाइजर आदि सभी ज्यादा अदब से पेस आने लगे । 
           
       मैं रात्रि पाली करके सोया हुआ था, अचानक मेरे घर को कई पुलिस वालों ने घेर लिया । श्री मती जी मुझे नींद से उठाया और जानकारी दिया । मैं सोच में पड़ गया, ऐसा कौन सा अपराध किया है जो पुलिस मेरे घर इस तरह से घेर लिया । यह घटना शायद नवंबर 1997 की है ।
  
         
(शेष अगले भाग में)
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भूली बिसरी यादें (भाग 09)


मेरे फेक्ट्री के मालिक आई. एस.गजरा की असमय मृत्यु हो गई । फेक्ट्री उनके दामाद सुरेंद्र सिंह गढ़ा के हाथ में आ गई, हालाकि सुरेंद्र सिंह फेक्ट्री में कई साल से  कार्यरत थे । पर ससुर के मरने के बाद MD बन गए और बहुत जल्द फेक्ट्री अवनति की ओर अग्रसर हो गई । मुझे आभास हो गया कि फेक्ट्री बंद होने वाली है, मैने सोसायटी में GBGL के कर्मचारियों को  बड़े लोन देना बंद कर दिया । अक्टूबर 2005 में फेक्ट्री की बिजली कट गई बिल नही भरने से । 6 महीने डीजल जनरेटर से उत्पादन हुआ, इसके बाद फेक्ट्री अघोषित रूप से बंद हो गई । कर्मचारी जाते,फेक्ट्री के अंदर ड्यूटी टाइम तक बैठते और चले आते । 
     इस परिस्थिति को समझते हुए मैने एक रिस्की/ साहसी कदम उठाया । मुख्य मार्केट में 3500/ रू प्रतिमाह पर किराए से 4 रूम 30 दिसंबर 2005 में लिया और अच्छे फर्नीचर बनवाया और  2 फरवरी 2006 को कंप्यूटर सेंटर को शिफ्ट कर दिया,फेक्ट्री जाना बंद कर दिया और ट्यूशन भी कम कर दिया और ज्यादा से ज्यादा समय प्रचार,प्रसार में लगाने लगा । रात के 12 बजे से तो सुबह 6 बजे तक दीवारों पर पोस्ट चिपकाता, कभी घर घर में पैंपलेट डालता । भयंकर ठंड में भी मैं पसीना पसीना हो जाता । 2006 का फरवरी, मार्च,अप्रैल तक में पूरे देवास को पोस्टर,पैंपलेट से पाट दिया । हर किसी के दिमाग में High Tech Computer छा गया । जैसे ही स्टूडेंट्स की Exam खत्म हुई, मेरे यहां इनक्वायरी की लाइन लग गई । अप्रैल में ही 10 कंप्यूटर की बैच सुबह 8 बजे से रात के 9 बजे तक फुल हो गई । इसके बाद भी एडमिशन लेने वालो की कमी नही आई तो तुरंत दस कंप्यूटर के लिए फिर से फर्नीचर बनवाया और 10 कंप्यूटर "PG कम्प्यूटर" से उधार ले आया । ये दस कंप्यूटर भी एक महीने में ही फुल हो गए । फिर से 10, कंप्यूटर के लिए फर्नीचर बनवाया और फिर से दस कंप्यूटर उधार लाया PG कम्प्यूटर से, पहले की उधारी चुकता करके । इस तरह से एडमिशन की इनक्वायरी लगातार आती गई, मैं कंप्यूटर बढ़ाता गया और 50 कंप्यूटर की लैब बना दिया, थ्योरी के लिए 2 रूम फिर से ले लिया । धीरे धीरे करके कुल 12 कर्मचारी हो गए, जिसमे एक चौकीदार को बच्चो के सायकल की रखवाली करते थे, लाखो में फीस आने लगी और यह क्रम 2012 तक यथावत चलता रहा । इस दौरान एक मारुति वैन ले लिया स्टूडेंट्स को लाने, ले जाने ले लिए, अपने लिए अलग से कार खरीद लिया, श्री मती जी को आने जाने के लिए स्कूटी खरीद लिया । बच्चो को पढ़ाई चलती रही । बेटे को पुणे से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग करवा दिया । 
कुल मिलाकर बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा था । सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था । 
9 सितंबर 2013 को मेरे जीवन में फिर एक टर्निंग प्वाइंट आया जो लाखो का नुकसान कर दिया 😭😭😭😭😭 ।
(शेष अगले भाग में)
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