मंगलवार, 26 जून 2012

!!कुंठित मानसकिता के लोग और बलात्कार !!



आज सुबह सुबह ही फेसबुक में एक नागा साधू की फोटो दो लडकियों के साथ पोस्ट किया था ,,संघर्ष क्रांती नाम के किसी ब्यक्ति ने ...क्योकि इनकी मानसकिता कुंठित है ..ये क्या जाने दिगम्बर जैन सद्गुओ और नागा साधुओ की परम्परा ..बस वही से इस लेख का जन्म हुआ ...कुंठित और विकृत मानसिकता तो इस सामाजिक कलंक के मूल में प्रधान होती ही है,अन्यथा अबोध बच्चियां,प्रौढ़ महिलाएं ,मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाएं,खेतों ,खलिहानों और अन्य कार्यस्थलों पर काम करती हमारी बहिनें इस जघन्य जुर्म का शिकार क्यों बनती ?
यदि बलात्कार के कारकों पर हम विचार करें तो अशोभनीय वस्त्र विन्यास इस अपराध में वृद्धि करने वाला एक कारक अवश्य है,परन्तु केवल वस्त्र विन्यास को ही उत्तरदायी नहीं माना जा सकता. शराब और नशे से सम्बन्धित पदार्थ का अत्यधिक सेवन करने वाले लोग इस संदर्भ में संभवतः सर्वाधिक दोषी माने जाते हैं..क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपना विवेक खो बैठते हैं और उनको बच्ची ,प्रौढा या फिर युवती में अंतर नहीं दिखता.........

कुंठित मानसिकता का जहाँ तक प्रश्न है इस मानसिकता से ग्रस्त होने के पीछे भी कुछ कारण हो सकते हैं जिनमें ,………..

व्यक्ति के घर का वातावरण ,उसके संस्कार,मित्रमंडली ,दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली , निठल्ला होना आदि अन्य कारक भी व्यक्ति की मानसिकता को कुंठित करते हैं.अत्यधिक पैतृक सम्पत्ति आदि होने पर प्राय धनिक परिवारों के लड़के ऐसे ही अपराधों में प्रवृत्त हो जाते हैं.ऐसी मानसिकता से सम्पन्न लोगों पर अश्लील सिनेमा तथा अन्य भद्दे कार्यक्रम सदा नकारात्मक प्रभाव ही डालते हैं........

इतना मैं अवश्य कहना चाहुगा  कि नारी विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति है,जो पुत्री,,बहिन, प्रेमिका ,पत्नी ,माँ तथा अपने विविध रचनात्मक रूपों में समाज को नवीन दिशा प्रदान करती है,सृजन करती है,परन्तु आज पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के कारण (जिसमें चकाचौंध से प्रभावित होकर उस संस्कृति के दोषों को अपनाया जा रहा है) दूषित होते परिवेश के कारण नारी भी अपनी गरिमा खो रही है.आज तथाकथित आधुनिका बनने के प्रयासों में उसके अश्लील वस्त्र विन्यास,सिगरेट, शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन का आदि होना उसको पतन के गर्त में धकेल रहा है(महानगरों में ये स्थिति असाध्य रोग का रूप धारण करती जा रही है).हमारी ये तथाकथित आधुनिकाएँ इन दुष्प्रभावों से अभी आँखें मूंदे भले ही अपने हितैषियों को पिछडा मानती हों परन्तु कभी न कभी उनको पश्चाताप अवश्य होगा परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और ना जाने हमारी कितनी पीढ़ियों को ले डूबेंगी.क्योंकि नारी रचियता है.जैसी रचना होगी वही समाज का स्वरूप होगा.(इस समस्त विश्लेषण का अर्थ ये कदापि नहीं कि नारी मुक्ति आंदोलन के समर्थकों की भांति मैं भद्दे वस्त्रविन्यास की समर्थक हूँ .शालीन और सुसंस्कृत व्यक्तित्व नारी के सम्मान में सदा चार चाँद लगाता है.)
आज हमारा दायित्व है कि हम अपनी बहिनों,बेटियों को उत्तम संस्कार दें ,उनके सद्गुणों के विकास पर ध्यान केंद्रित कर उनके रचनात्मक गुणों के विकास में सहयोगी बनें .बाल्यावस्था से ही उनको उनके हित -अनहित के विषय में बताया जाए.इसी प्रकार लड़कों का भी संस्कारित वातावरण में पालन-पोषण उनको कुंठित होने से बचाया जा सकता है,साथ ही उनकी रूचि के अनुरूप उनके रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन देते हुए उनको व्यस्त रखने का प्रयास किया जाय और अवांछित संरक्षण न दिया जाय.
अंत में पुनः एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर भी ध्यान आकृष्ट करना चाहता हु ...........

 ,,आज ऐसे केसेस भी सामने आ रहे हैं,जिनमें प्राय महिलाएं भी किसी भी कारण से अपने अधिकारी ,सहकर्मी या अन्य किसी भी व्यक्ति से बदला लेने के लिए भी बलात्कार का आरोप उनपर लगाती हैं.ऐसी परिस्थिति में सम्बन्धित महिला को भी दण्डित किया जाना चाहिए ! ये कोई मनगढंत या कपोलकल्पित घटना नहीं वास्त्विकता है. .

1 टिप्पणी:

  1. बिल्कुल ऐसा ही होना चाहिए, धन्यवाद अच्छी प्रस्तुति

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