गुरुवार, 1 मार्च 2012

!! पुनर्जन्म की अवधारणा !!

नमस्कार दोस्तों,
धर्म मोक्ष सब बेकार की बाते है, अर्थ काम ही सब कुछ है.. जब तक जियो मस्त होकर जीओ, मस्त रहने के लिए अगर दूसरों से उधार भी लेना पड़े, तो लो.. मरे हुए लोगो के नाम का जो खाना निकलते है, उन्हें समझ लेना चाहिए कि इसका कोई फायदा नहीं है. वह खाना उन लोगो थक नहीं पहुँचता अगर ऐसा होता, तो एक बार बुझ लैम्प में तेल भर देने से ही जल उठता.... पुनर्जन्म सब बेकार की बातें है. एक बार जिस शरीर को जला दिया गया वह भला दोबारा लौटकर कैसे आ सकता है.. हवा, पानी, आग और पृथ्वी में जब चार तत्व मिलते है, तो शरीर बनता है और फिर शरीर में चेतना आती है ठीक इसी तरह जैसे पान-कत्था और चूना जब एक साथ चबाए जाते है तो लाल रंग पैदा करते है जबकि लाल रंग का गुण इन तीनों में से किसी के पास नहीं होता. जाहिर है शरीर से अलहदा चेतना का कोई अस्तित्व नहीं है . अगर किसी जीव की बलि देने से, वह स्वर्ग जाता है तो फिर बलि देने वाले लोग अपने माँ-बाप की बलि क्यूँ नहीं दे देते, ताकि वो सीधे स्वर्ग चले जाएँ.. जिंदगी में पाप और पुण्य जैसा कुछ नहीं होता.
उपरोक्त  टिपण्णी है मेरे मित्र विनोद जी की उन्ही टिप्पणी को आधार लेकर यह बाते है जो नीचे लिखी गयी है 
 
पुनर्जन्म या REINCARNIATION एक ऐसा शब्द है जिससे लोग REBIRTH के नाम से जानते है हिन्दू धर्म के लोग पुनर्जन्म मतलब जनम,मृत्यु,और पुनः जनम के चक्र में विश्वास करते है अध्यात्मिक कानून के आधार पर पुनर्जन्म का तात्पर्य है'' आत्माओ की पुर्नस्थापना'' ,संस्कृत में पुनः शब्द का अर्थ होता है 'अगला समय' या 'फिर से' और जनम का अर्थ होता है जिंदगी इस तरह पुनर्जन्म का अर्थ हुआ अगली ज़िन्दगी या आने वाली ज़िन्दगी पुनर्जन्म में हमारे पुराने कर्मो का बड़ा महत्व है वेदों में कहा गया कि अध्यात्मिक कानून के अनुसार पिछले जन्मों के बुरे कर्म हमें अपने नए जनम में भोगने पड़ते है जैसे एक परिवार मे एक बच्चा जन्म लेता है और वह पूरी तरह से स्वस्थ भी है मगर उसी दम्पति की दूसरी संतान अपंग है या मानसिक रूप से ठीक नहीं है तो यह उसके पिछले जन्म के बुरे कर्मो के कारण है पुनर्जन्म के इस बात को लोगो ने स्वीकार किया है कि हमें अपने पिछले जन्म के पुरे कर्म का फल अपने अगले जन्म में मिलता है
भगवत गीता के अनुसार जिस तरह से एक मनुष्य पुराने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहनता है ठीक हमारी आत्मा भी पुराने शरीर को छोड़ कर नया शरीर धारण करती है
स्वामी ज्योतिमयानान्दा ने संस्कृत में कर्म शब्द का अर्थ कार्य बताया है इनके अनुसार हमारे कार्य के भाव की छवि हमारे मस्तिस्क में दो प्रकार से रहती है
(१) पहले प्रकार में हमारे पिछले जन्म के कार्य की छवि के बारे मे हमारा मस्तिष्क बेहोश रहता है उससे कुछ भी याद नहीं रहता है
(२)और दूसरे प्रकार में हमारे कार्य यानि हमारे पिछले जनम की कहानी की हलकी हलकी सी छवि हमारे दिमाग के किसी कोने में संजोये रहती है

हमें कई ऐसे उद्धरण मिले है जहाँ लोगों ने अपने पुराने जन्म के बारे में बताया है मगर अधिकांश लोग मृत्यु के बाद जब नए योनी में प्रवेश करते है तो वो अपने पुराने जन्म के बारे में भूल जाते है
स्वामी ज्योतिमयानान्दा के अनुसार हमारे पीछे जन्म के कार्य बीज की तरह होती है अगर कार्य आछा हुआ तो हमें फल अच्छा मिलता है और अगर कार्य बुरा रहा तो फल भी बुरा मिलता है हमें पिछले जन्म की बातें तो याद नहीं होती मगर अपने उपस्थित जन्म में हम अच्छा कार्य करके अपने आने वाले जन्म को सुखमय बना सकते है

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक पुर्नजन्म के बारे में कई मान्यताएं चलती आई है मगर ऐसे भी कुछ प्रमाण मिले है जिससे प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल से ही लोग पुर्नजन्म की बातो पर विश्वास करते आये हैखासकर मिश्र के लोग जब किसी मृतक को दफनाते थे तो वे मृतक की शव के साथ उसकी पसंदीदा चीजे और ज़रूरी सामान दफना देते थे ताकि अगले जन्म में ये चीजे उनके काम आये

स्वामी विवेकानंद का कहना था की ''हमारे अन्दर वो शक्ति है की हम कुछ भी कर सकते है बस हमें उस शक्ति को पहचानने की ज़रूरत है हम क्या है या क्या करना चाहते है ये सब हम अपने अन्दर पा सकते है कहने का तात्पर्य ये है कि अपने अन्दर की शक्ति को जान कर अपने पिछले कार्यो को समझ सके और अपने वर्त्तमान और भविष्य की ज़िन्दगी मे सामंजस्य स्थापित कर सके

बुद्ध धर्म के के अनुयायी भी पुर्नजन्म पर विश्वास करते है '' THE TIBETIAN BOOK OF DEAD '' में हमें वर्णन मिलता है की १ आत्मा १ शरीर को छोड़ कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है

हिन्दू धर्म के अनुसार उस दिन पुर्नजन्म का चक्र समाप्त हो जायेगा जिस दिन हम इंसान कर्म करना छोड़ । जब हमारे बुरे या अच्छे कर्म ही नहीं होगे तो पुर्नजन्म भी नही होगा । वेदों के जानकर विद्वानों का मानना है कि पुर्नजन्म की पहली सीढ़ी कर्म है
फिर भी पुर्नजन्म के के पन्ने खुलने के बाद भी हमारे समाज में यह विषय एक गुत्थी की तरह है लोग तो अभी भी पुर्नजन्म की बातो पर विश्वास नही करते मगर वेदों में पुर्नजन्म को माना गया है। वेदों के अनुसार पुर्नजन्म में कर्म को प्राथमिकता दी गई है । कहने का सार यह है कि अपने लिए हीं सही अच्छे कर्मों को जीवन में प्राथमिक दर्जा दिया जाना चाहिए ।

1 टिप्पणी:

  1. पुनर्जन्म के मिथक के अलावा कुछ भी नहीं इस अवधारणा के जड़ में इन्शान की जीने की लालसा और म्रत्यु से छुटकारा पाने की तीव्र लालसा है | चलिए एक पल के लिए पुनर्जन्म को सच मान लेते है ... इसके अनुसार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर को धारण करती है | पहली बात तो ये ही कि आत्मा के अस्तित्व को ही इसके मानने वाले कभी सिद्ध नहीं कर पाए | वे ये बताने में असमर्थ है कि आत्मा का निवास शरीर के किस भाग में होता है ??? एक उदाहरण देखिये :- केचुए को तो हम सबने देखा ही होगा ना ...उसे काटिए ..कटे हुए दोनों भाग अलग अलग होकर भी अपना विकास जारी रखेगे | क्या आत्मा भी दो भागो में बट गयी?? परन्तु कोई भी धर्म ऐसा नहीं मानता उसके अनुसार आत्मा को काटा जलाया मिटाया नहीं जा सकता | केचुए के मामलो में सारे के सारे धर्म झूठे साबित हुए ...

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