मंगलवार, 30 मई 2017

शाकाहार क्यों ?

यह लेख मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण है। नैतिक या धार्मिक रूप से क्या सही है क्या नहीं का यह विश्लेषण नहीं। साथ ही लेख वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर है मेरी धारणाओं के आधार पर नहीं। लेख अंत तक पढ़ने पर ही समझ आएगा।
मनुष्य की जीभ में मात्र 5 स्वाद जानने की क्षमता होती है।
1.मीठा
2.कड़वा
3.खट्टा
4.नमकीन
5.माँस
मांस का स्वाद अजीनोमोटो से मिलता जुलता है।
और यह रिसेप्टर शाकाहारी मनुष्यों में और उनकी संतानों में भी होता है। और कई पीढ़ियों के शाकाहार के बावजूद मौज़ूद होते हैं।
6.उमामी...pungent..बेहद अज़ीब सा खट्टा स्वाद। टमाटर में होता है।
हमें जो अन्य सैकड़ों स्वाद मिलते हैं वे नाक,गले इत्यादि में मौज़ूद गंध के रिसेप्टर्स की वजह से मिलते हैं।
आप चाहेंगे मनुष्य के मांसाहार पर वैज्ञानिक लेख ??
मैं समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक गहरे अध्ययनों में ही देखता हूँ। शाकाहारी मांसाहारी को दुष्ट कहें और मांसाहारी शाकाहारी को कमज़ोर कहें इससे बात वहीँ रहती है। खुद को जान तो लें हम क्या हैं और क्यों हैं? ऐसे क्यों हैं? और क्या हमारे लिए सही होगा। होगा तो कैसे? क्या संभावित परिणाम होंगे बदलावों के...
लेकिन इस लेख को पढ़ना होगा खुले दिमाग से । पूर्व धारणाओं और मान्यताओं से कुछ देर के लिए दिमाग को खाली करके।
प्राकृतिक रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों,विकास क्रम के अध्ययनों से पता चलता है क़ि मनुष्य की सभी प्रजातियां कालांतर से Omnivorous रही हैं।(शाकाहार और मांस दोनों खाने वाली)।
मनुष्य जब विकसित हुए होमोसेपियंस से तब जो भी उर्ज़ा,प्रोटीन,फैट,विटामिन, मिनरल के लिए खाने योग्य मिलता खा जाते। आज के आधुनिक मनुष्यों के सभी पूर्वज मांसाहारी भी थे।
यही वजह है कि मनुष्य की जीभ में लाखों वर्षों के विकासक्रम  से पोषित मांस रिसेप्टर्स आज भी हैं। मनुष्य के अमाशय में मौजूद enzymes, आँतों की बनावट, आँतों में मौजूद पोषण सोखने वाले vili सभी में मांस से पोषण निकाल कर रक्त में डालने की क्षमता है। मनुष्य के canin एवं अन्य दांतों की बनावट शाकाहारी जीवों से भिन्न है और omnivoros से मिलती जुलती है।
मनुष्य के शरीर के लिए अत्यंत ज़रूरी कुछ तत्व आज भी सिर्फ पशु आहार में हैं। ज़ैसे,दूध,अंडा,चिकेन ,फिश इत्यादि में। वहीँ कुछ ज़रूरी तत्व सिर्फ शाकाहार में हैं। क्योंकि मानव omnivorous स्तनधारी पशु है जंगली सूअर की तरह। 
ज़ैसे विटामिन बी12, vitaminD, उच्च गुणवत्ता का आयरन, 
उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन इत्यादि सिर्फ पशु आहार में पाए जाते हैं। 
लेकिन इस बीच मनुष्य में नैतिकता और धार्मिकता का भी विकास हुआ। नैतिक रूप से मानवीय तर्क के रूप में किसी और जीव की हत्या पाप या गलत समझी जाने लगी। 
लेकिन उपरोक्त शारिरिक एवं भीतरी रसायनों की संरचना इस बात की व्याख्या है क़ि क्यों नैतिक भाषणों,नैतिक तर्कों, धार्मिक डर, पाप पुण्य की संभावना,मांसाहार पर उलाहना के बावजूद, संतों इत्यादि के बावजूद न सिर्फ पूरी दुनिया में वरन भारत ज़ैसे अहिंसा को मानने वाले देशों में तक ,बुद्ध के देशों में तक मांसाहारी मनुष्यों की तादात कहीं ज़्यादा है क्योंकि कोई भी मानवीय नियम कड़ी सजाओं के बावजूद प्राकृतिक नियमों से हमेशा हारते रहते हैं। 
लांतर में शारीरिक क्षमता के आधार पर देखें तो मांसाहारी
कौमों ने युद्ध ज़्यादा जीते हैं। हिंदुओं में भी राजा बनने वाले शक्तिशाली लोग मांसाहारी थे।
ओलंपिक में जीतने वाले ज़्यादातर लोग हों या नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सारे ज़्यादातर omnivorous थे।
साथ ही प्राकृतिक इकोसिस्टम के बैलेंस के लिए भी यह ज़रूऱी था। ज़ैसे शेर कुछ हिरनों को न खाये तो पूरे जंगल को बहुत से नुकसान होंगे। हिरनों के लिए ही घास न बचेगी।
लोगों को यह देखने की ज़रूरत है क़ि गाय या हिरन को शाकाहार सिखाने की ज़रूरत नहीं। वे नैतिक नहीं प्राकृतिक रूप से शाकाहारी हैं। शेर को कोई भी नैतिक भाषण दे शाकाहारी बना दे तो दरअसल प्रकृति के प्रति यह अनैतिक
बात ही होगी।
तो क्या मैं मांसाहार का समर्थक हूँ और मांसाहार को महिमामंडित कर रहा हूँ?
तो उत्तर है नहीं। मैं मात्र प्राकृतिक ,वैज्ञानिक सच आपको खुद अपने तन,मन,विकास और इतिहास के विषय में बताना चाहता हूँ।
और चाहता हूँ आज़ के परिवेश में लोग शाकाहार अपनाएं(दूध,अंडे छोड़ कर)।
क्यों अपनाएं?
आज मानव मूल्य, दया की भावना में प्रकृति प्रदत्त ही इज़ाफ़ा हुआ है। साथ ही मांस आज जीने के लिए खाना ज़रूरी नहीं प्रचुर मात्रा में अन्य खाद्य उपलब्ध होने की वजह से। साथ में सिर्फ मांसाहार में अच्छे से उपलब्ध शरीर के लिए आवश्यक तत्व ज़ैसे विटामिन B12, विटामिन डी,आयरन,प्रोटीन इत्यादि को ऊपरी तौर पर लिया जा सकता है शाकाहार में। ज़ैसे जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर शाकाहारी होकर भी बेहद फिट और मस्कुलर हैं।
फिर आज दूध और अण्डों का उत्पादन मनुष्य बेतहाशा बढ़ा पाया है। इनमें किसी प्राणी का क़त्ल और पीड़ा नहीं। साथ ही पोषक तत्व उच्च स्तर के हैं।
लेकिन दुनिया को साथ ही eco सिस्टम के बदलावों पर भी नज़र रखने होगी।
साथ ही एक महत्वपूर्ण आंकड़ा यह कि विकासशील और गरीब देशों में जब हम शाकाहार और मांसाहार की बहस कर रहे हैं हमारे 30 प्रतिशत बच्चे भूखे सो रहे हैं। अतः इतनी मात्रा में उच्च गुणवत्ता का शाकाहार हम कैसे पैदा करेंगे?
WHO ने आने वाले 30 वर्षों के बाद बढ़ती मानवीय जनसंख्या में खाद्दान्न की कमी से निपटने प्रोटीन युक्त कुछ कीड़ों की प्रजातियों पर काम करना शुरू किया है। सुनने में आज आपको यह अज़ीब लगेगा लेकिन क्या पता 100 वर्षों बाद इनके रेस्टॉरेंट खुल जाएं ,विज्ञापनों के साथ उन कीड़ों के।
मनुष्य ,ये धरती हमारे साथी जीव और पेड़ पौधे जीते रहेंगे अनवरत यही उम्मीद है और अगली पीढ़ियों को शुभकामनायें।

सोमवार, 29 मई 2017

पीपल , को सनातन संस्कृति में देववृक्ष क्यों माना जाता है !


पीपल , को सनातन संस्कृति में देववृक्ष माना जाता है !
स्कन्द पुराण में वर्णित है कि पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवता निवास करते हैं! आम प्रचलन में पीपल के मूल में ब्रह्मा , मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता रहा है ! सरल शब्दों में कहना हो तो आमजन के लिए पीपल भगवान विष्णु का स्वरूप है।श्री कृष्ण ने तो एक जगह यह भी कह दिया कि - समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ !शास्त्रों के जानकार से बात करे तो वो कहेंगे कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।इतने भारी भारी धार्मिक व्याख्यायों का ही कमाल था की गांव-देहात में कोई पीपल को काटने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ! ऐसा करके कौन पाप का भागीदार बनेगा ! अर्थात पीपल किसी भी सूरत में ना काटा जाये, इसके लिए भयंकर धार्मिक डर ,वो भी पुरातन काल से हरेक के मन में डाल दिया गया था ! ऊपर से आम लोक जीवन में यह भी कहलवा दिया गया कि पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी नष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति( मरणोपरांत मिलने वाली मुक्ति ) प्राप्त करते हैं। इन सब बातों का ही परिणाम था की हर कोई पीपल लगाने के चक्कर में रहता ! फलस्वरूप ये हुआ की हर गांव में एक नहीं अनेक पीपल होते ! यहाँ तक की पीपल से गांव की पहचान होती ! यही नहीं पीपल की नियमित पूजा होती ! जब अमावस्या (हिंदू कैलेंडर महीने के पन्द्रहवें दिन) हिन्दू कैलेंडर वर्ष में सोमवार को पड़ती , उस दिन सोमवती अमावस्या व्रत रखा जाता और पवित्र पीपल के पेड़ की १०८ बार परिक्रमा कर महिलाएं विशेष पूजन करती।ओफ्फ, कहाँ की ये सब पुराने ज़माने की बातें लेकर बैठ गया ,मैं भी ! ये सब ढकोसले हैं, मनुवादियों के चोचले ! कौन इन कर्मकांड में पड़े ! ये आधुनिक काल है ,अब इन मान्यतायों को कोई नहीं मानता ! किसके पास इतनी फुर्सत है ! आज की युवा जनरेशन ये सब नहीं जानती और जानना भी नहीं चाहती ! कुछ दिनों पहले तक तो पीपल का पेड़ सड़क निर्माण के बीच आ रहा होता तो उतना छोड़ कर सड़क आगे पीछे से निकाल ली जाती ! अब तो वो भी नहीं ! यूं तो अब पैसे लेकर पीपल काटने वाले भी मिल जाएंगे , और कुछ नहीं तो मशीन से काट दिया जाता है ! वैसे अब यह स्थिति आती ही नहीं , क्योंकि अब कोई पीपल लगाता ही नहीं और ना ही यह हमारे रास्ते में रोड़ा बन कर आता है ! कुछ एक जगह पर अगर कोई बूढ़ा पीपल आ भी गया तो उस की जड़ों को खोखला करने के कई नुस्खे हमे पता है ! धीरे से पीपल को मार कर पेड़ को गिरवा दिया जाता है ! क्या करें ,आजकल सीधी सड़क चाहिए , जिस पर हमारी तेज रफ़्तार गाडीयॉं सरपट दौड़ सकें ! वैसे भी शहरों में इतनी जगह कहाँ , जो इतना बड़ा पीपल लगाए , इतने में तो दो चार डुप्लेक्स बन जाएंगे ! गाड़ियों खड़ी करने की जगह नहीं बची और आप को पीपल के पेड़ की पडी है !  क्या कहा !! गाड़ीयों से प्रदूषण होता है ?? हाँ होता तो है , इसके समाधान के लिए अनेक विश्विद्यालय में शोध हो रहा है ! देश विदेश में पर्यावरण पर होने वाली अनेक कॉन्फ्रेंस में हमारे बड़े बड़े एक्सपर्ट हिस्सा ले रहे हैं ! सरकार सतर्क और सजग है ! हमारे मंत्री-अफसर कई विकसित देशो का दौरा कर रहे हैं, इस समस्या के हल को समझने के लिए !  अब ये सब बात करने वाली इस पीढ़ी को यह कौन बतलाये की हमारे पूर्वज , उन दिनों जब कोई गाड़ी नहीं होती थी कोई प्रदूषण भी नहीं था ,तब भी वो इस को लेकर जागरूक थे ! उन्हें पीपल की गुणों का पता था की पीपल ही एक ऐसा वृक्ष है, जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देता है,अर्थात वे बिना किसी किताबी शोध के जानते थे की पीपल एक प्रदूषण किलर है वो भी प्राकृतिक ! जिनका वर्णन उन्होंने अपने धार्मिक ग्रंथों में किया ! यही नहीं , इसके अनेक औषधीय गुण हैं जिन्हे विस्तार से समझाने के लिए श्लोको की रचना की गई ! वे यह भी जानते थे की अधिकांश आम जनता सूक्ष्म ज्ञान नहीं जानती और ना ही जानना चाहती है , उसे जैसा बता दिया जाये बस वही करती है, इसलिए उन्होंने पीपल को देवता बना कर पूजा करवा दी ! वैसे भी देवता कौन होते हैं, जो हमारे प्राणों की रक्षा करे, हमारे जीवनदाता हों ! अब पीपल से बड़ा जीवनदायक कौन हो सकता है और इसलिए पीपल हमारे विष्णु महेश बन गए ! पीपल प्राणवायु प्रदान कर वायु मण्डल को शुद्ध करता है सिर्फ इसी गुणवत्ता के कारण भारतीय शास्त्रों में इस वृक्ष को सम्मान मिला । हमारे पूर्वज जानते थे की पीपल के जितने ज्यादा वृक्ष होंगे,वायु मण्डल उतना ही ज्यादा शुद्ध होगा। इसलिए पीपल को काटने को धार्मिक रूप से निषेध करवाया गया , ऊपर से अधिक से अधिक लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया ! क्या कमाल की संस्कृति है, जहां हमारे देवता यूं सोचों तो काल्पनिक हो सकते हैं मगर हकीकत में देव गुण वाले ही हैं ! पीपल की तरह हमारे अनेक प्राकृतिक देवता आसमानी हवाहवाई नहीं हैं ना ही कोई अवतार या ईश्वर की संतान टाइप हैं बल्कि हकीकत में हमारे रक्षक हैं ! पीपल के गुणों को देखे तो यह वर्ण को उत्तम करने वाला, योनि को शुद्ध करने वाला और पित्त, कफ, घाव तथा रक्तविकार को नष्ट करने वाला है ! पीपल पूजने का प्रमुख कारण था की पीपल की छाया में ऐसा कुछ आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है, जिसके सेवन से शरीर स्वस्थ होता है और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है!  वृक्ष की अनेक परिक्रमा के पीछे कदाचित इसी सहज प्रेरणा का आग्रह है! पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया ! श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व श्रीकृष्ण इसी दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। बोधि वृक्ष बिहार राज्य के गया जिले में बोधगया स्थित महा बोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का वृक्ष ही है, जहां भगवान बुद्ध को बोध (ज्ञान) प्राप्त हुआ था ! 
                      जब प्रदूषण नहीं था तब भी प्रदूषण की इतनी चिंता थी और उसका जबरदस्त इंतजाम किया गया था ! उसके बारे में ग्रंथों कथाओं और परम्पराओं के माध्यम से संरक्षित किया गया ! इससे ठीक उलट , आज जब चारों और प्रदूषण ही प्रदूषण पैदा किया जा रहा है इस पर कोई बात नहीं करता ! अब कोई पीपल नहीं लगाता ! इसे लगाने के लिए किसी से कहे तो वो कहेगा की आज के बाजार के युग में इसे लगाने का क्या फायदा, कोई फल भी तो नहीं होता, ना ही इसकी लकड़ी किसी काम की , कोई भला ऐसा कोई काम कैसे कर सकता है जिसमे दो पैसे ना कमाया जा सके ! कितना अज्ञानी है आज का आदमी जिसे पीपल के अनमोल मोल का मूल्य ही नहीं पता ! वो उसकी पूजा क्यों करने लगा ! पीपल के गुणों को वो लोग क्यों पढ़ाना चाहेंगे जो इस देवभूमि को सपेरों का देश और यहां की समृद्ध संस्कृति को जंगली कहते नहीं थकते ! पी से पेप्सी के युग में पी से पीपल कौन पढ़ायेगा ! और अगर किसी ने अति उत्साह में आकर पढ़ाना चाहा तो उसे साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाएगा ! सेक्युलर देश में वेद ज्ञान पढ़ने से दूसरे धर्म खतरे में पड़ सकते हैं !यह सब बाते कितनी हास्यास्पद लगती है ! जबकि पीपल के पेड़ की ऑक्सीजन का कोई धर्म नहीं, ना ही उसके औषधीय गुण व्यक्ति में भेद कर सकता है ना ही उसकी छांव का कोई मजहब है ! लेकिन इस सांस्कृतिक जीवन दर्शन की महत्ता को ना तो वो लोग समझते हैं जिनका जीवन रेगिस्तान के सूखे में प्यासा भटकता रहा ना ही उनको जो बर्फ की भयंकर ठण्ड में जीवन की तलाश में इधर से उधर भागते रहे ! ये दोनों समूह इस देव् भूमि पर आये ही इसलिए की यहाँ भरपूर जीवन है जीवन का आनंद है धरती का यौवन है जिसका आनंद आदिकाल से आदिमानव लेता आया है ! जब तक इन बाहरी लूटेरों के आने के बाद भी हमने अपनी सभ्यता को बनाये रखा अपनी संस्कृति से जुड़े रहे अर्थात पीपल का पूजन करते रहे , तब तक चारो ओर खुशहाली थी और हम गुलाम होते हुए भी गुलाम नहीं थे ! जिसका फायदा हमारे साथ साथ ये बाहरी भी उठाते रहे ! आज जब हम राजनीतिक रूप से आजाद हैं मगर अपनी संस्कृति को छोड़ते ही हमारी हालात क्या हो चुकी है वो किसी से छिपी नहीं ! पेड़ को पूजने वाली संस्कृति जब से पेड़ काट कर क्रिसमस मनाने का उत्सव मानने लगी, हमारा पतन शुरू हुआ ! आज हमारे ऊपर पश्चिम की संस्कृति हावी है !अब हमारे साहित्य कला में पीपल नहीं होता, ना ही पीपल की पूजा के दृश्य किसी फिल्म में हो सकते हैं , ऐसा होने पर इनसे आधुनिक होने का सर्टिफिकेट छीन लिया जाता है ! 
ये कैसी आधुनिकता है, जहां जींस और टी शर्ट पहने युवक युवतियों को काला चश्मा पहनना तो समझ आता है मगर वे सड़क किनारे भरी दोपहरी में पेड़ की छावं जब नहीं पाते तो कही कुछ कमी है उसे जान नहीं पाते ! बिना पेड़ की छावं के , सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों मिनट में तप जाती है और उनकी आंखे किसी पीपल बरगद आम नीम जामुन के पेड़ को नहीं तलाशते ! इसके लिए क्या किसी विश्विद्यालय में पढ़ने की जरूरत है ? नहीं ! मगर यह जीवन ज्ञान अब घर परिवार में बाटने वाले बड़े बुजुर्ग भी नहीं रहे ! कोई जमाना था की सड़क किनारे पीपल के पेड़ अक्सर मिल जाते ! इन पेड़ो के पास अमूमन एक कुआ होता और साथ ही छोटा सा मंदिर ! यहां कोई थका हारा राहगीर छांव में दो पल सुस्ता लेता ! अब सड़क किनारे पेड़ लगाने का चलन नहीं है ! अब तो मॉल और ढाबे का कल्चर है ! इसलिए आज हर शहर प्रदूषित हैं !और जहां वातवरण ही प्रदूषित हो जाए वहा मानव जीवन कितना कष्टमय हो सकता है, किसी भी महानगर को देख ले ! हर शहर ने कैसे कैसे ओड इवन जैसे हास्यास्पद प्रयोग भी देखे मगर कोई हल नहीं निकला ! 
हमारी सारी समस्या का समाधान हमारी सनातन परम्परा से रचे बसे हमारी संस्कृति में है ! उसी के आधार पर अब एक साम्प्रदायिक सुझाव है ! शहर के चारो तरफ रिंग रोड बना कर सड़क के दोनों तरफ पीपल के पेड़ लगा दो। किसी किले की मजबूत दीवार की तरह ! और शहर वालो को कह दो की इन पेड़ों की पूजा करना ही उनका धर्म है ! और ऐसा करने पर जिसे अपना धर्म खतरे में नजर आये और जो सेक्युलर इस पर आपत्ति करे उसे हिन्दू ऑक्सीजन की जगह हिन्दू विरोधी जहरीली कार्बन डाई ऑक्साइड को निगलने का ऑप्शन दिया जा सकता है ! ऐसा करते ही उनका महान धर्म भी सुरक्षित रहेगा और वे भी दीर्घ आयु को प्राप्त होंगे !

--
https://www.youtube.com/watch?v=UPUINf__sp8