सोमवार, 30 सितंबर 2013

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण

राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं | यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था | जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने मूर्खतापूर्ण जन्मना व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं|

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण -

(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |

(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)

(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |

(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?

(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)

(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

! सावधान - सावधान बयान वीर अभी सो रहे है !

बयान वीर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले दंगे भड़काने वालों पर सख्त कार्रवाई करने का आह्वान कर रहे हों, भले राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में भाग लेने वाले पक्ष-विपक्ष के तमाम राजनेता और मुख्यमंत्री उसका एकमत से समर्थन कर दें, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि आखिर यह कार्रवाई करेगा कौन ? क्या यह कार्रवाई केन्द्र और राज्य की सरकारों को ही नहीं करनी है और यदि उन्हीं को करनी है, तो फिर यह आह्वान और समर्थन का ड्रामा किसके लिए ?

इन सभी राजनेताओं को ही तो ऎसे तत्वों पर कार्रवाई करनी है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से जारी ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में देश में हुए साम्प्रदायिक दंगों में ढाई हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं तथा लगभग 27 हजार लोग घायल हुए हैं। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह शर्मनाक बात है कि वहां साम्प्रदायिक दंगे हों।


उससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री को दंगों में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई के लिए कहना पड़े। इसके मायने साफ हैं कि अब तक ऎसा नहीं हो रहा था। यह कहने की नहीं, समझने की बात है कि साम्प्रदायिक दंगों के अधिकांश मामलों में राजनीतिक दलों की भूमिका ही अहम रहती है। जम्मू-कश्मीर में हुए दंगे अथवा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फैले साम्प्रदायिक दंगों की कहानी अलग है। साम्प्रदायिक दंगों की शुरूआत के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाद में इसमें राजनीतिक दल और राजनेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।


देश साम्प्रदायिक दंगों से निजात पाना चाहता है, क्या ऎसा संभव है। दिल्ली में हुए 1984 के सिख दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए, लेकिन आज तक एक भी शक्तिशाली दोषी को सजा नहीं मिल पाई। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और कोई भी राज्य सरकार अगर ठान ले, तो दंगा हो ही नहीं सकता और अगर हो भी गया, तो समय रहते उसे फैलने से रोका जा सकता है। मुजफ्फरनगर के ताजा दंगों के बाद वोट बैंक के लिए खेली जा रही तुच्छ राजनीति किसी से छिपी नहीं है।

जब तक वोट बैंक की राजनीति के मोह से उबरा नहीं जाएगा, तब तक दंगों को रोकना संभव ही नहीं है। दंगे बयानों या भाषणों से नहीं, दृढ़ इच्छाशक्ति और अपने-परायों के भेद से ऊपर उठ कर ही रोके जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को सच्चे मन से एक मंच पर आकर दिल से एक साथ खड़ा हो पाने का साहस दिखाना होगा।