सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

जातिवाद, छुआछूत नहीं है हिन्दू धर्म का हिस्सा ?? आपको क्या लगता है ....

धर्म की गलत व्याखाओं का दौर प्राचीन समय से ही जारी है। ऋषि वेद व्यास ब्राह्मण नहीं थे, जिन्होंने पुराणों की रचना की। तब से ही वेद हाशिये पर धकेले जाने लगे और समाज में जातियों की शुरुआत होने लगी। क्या हम शिव को ब्राह्मण कहें? विष्णु कौन से समाज से थे और ब्रह्मा की कौन सी जाति थी? क्या हम कालीका माता को दलित समाज का मानकर पूजना छोड़ दें?

आज के शब्दों का इस्तेमाल करें तो ये लोग दलित थे- ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।

अक्सर जातिवाद, छुआछूत और सवर्ण, दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर धर्मशास्त्रों को भी दोषी ठहराया जाता है, लेकिन यह बिल्कुल ही असत्य है। इस मुद्दे पर धर्म शस्त्रों में क्या लिखा है यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस मुद्दे को लेकर हिन्दू सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया गया है और किया जा रहा है।

पहली बात यह कि जातिवाद प्रत्येक धर्म, समाज और देश में है। हर धर्म का व्यक्ति अपने ही धर्म के लोगों को ऊंचा या नीचा मानता है। क्यों? यही जानना जरूरी है। लोगों की टिप्पणियां, बहस या गुस्सा उनकी अधूरी जानकारी पर आधारित होता है। कुछ लोग जातिवाद की राजनीति करना चाहते हैं इसलिए वह जातिवाद और छुआछूत को और बढ़ावा देकर समाज में दीवार खड़ी करते हैं और ऐसा भारत में ही नहीं दूसरे देशों में भी होता रहा है।

दलितों को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया। इसी तरह इससे पूर्व के जो भी नाम थे वह हिन्दू धर्म ने नहीं दिए। आज जो नाम दिए गए हैं वह पिछले 60 वर्ष की राजनीति की उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज है।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान है, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। यहां ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया।

भारत ने 900 साल मुगल और अंग्रेजों की गुलामी में बहुत कुछ खोया है खासकर उसने अपना मूल धर्म और संस्कृति खो दी है। खो दिए हैं देश के कई हिस्से। यह जो भ्रांतियां फैली है और यह जो समाज में कुरीरियों का जन्म हो चला है इसमें गुलाम जिंदगी का योगदान है। जिन लोगों के अधिन भारतीय थे उन लोगों ने भारतीयों में फूट डालने के हर संभव प्रयास किए और इसमें वह सफल भी हुए।

अब यह भी जानना जरूरी है कि हिन्दू धर्म के शास्त्र कौन से हैं। क्योंकि कुछ लोग उन शास्त्रों का हवाला देते हैं जो असल में हिन्दू शास्त्र नहीं है। हिन्दुओं का धर्मग्रंथ मात्र वेद है, वेदों का सार उपनिषद है जिसे वेदांत कहते हैं और उपनिषदों का सार गीता है। इसके अलावा जिस भी ग्रंथ का नाम लिया जाता है वह हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं है।

मनुस्मृति, पुराण, रामायण और महाभारत यह हिन्दुओं के धर्म ग्रंथ नहीं है। इन ग्रंथों में हिन्दुओं का इतिहास दर्ज है, लेकिन कुछ लोग इन ग्रंथों में से संस्कृत के कुछ श्लोक निकालकर यह बताने का प्रयास करते हैं कि ऊंच-नीच की बातें तो इन धर्मग्रंथों में ही लिखी है। असल में यह काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते समाज का चित्रण है। दूसरी बात कि इस बात की क्या ग्यारंटी की उक्त ग्रंथों में जानबूझकर संशोधन नहीं किया गया होगा। हमारे अंग्रेज भाई और बाद के कम्यूनिष्ट भाइयों के हाथ में ही तो था भारत के सभी तरह के साहित्य को समाज के सामने प्रस्तुत करना तब स्वाभाविक रूप से तोड़ मरोड़कर बर्बाद कर दिया।

कर्म का विभाजन- वेद या स्मृति में श्रमिकों को चार वर्गो- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र-में विभक्त किया गया है, जो मनुष्यों की स्वाभाविक प्रकृति पर आधारित है। यह विभक्तिकरण कतई जन्म पर आधारित नहीं है। आज बहुत से ब्राह्मण व्यापार कर रहे हैं उन्हें ब्राह्मण कहना गलत हैं। ऐसे कई क्षत्रिय और दलित हैं जो आज धर्म-कर्म का कार्य करते हैं तब उन्हें कैसे क्षत्रिय या दलित मान लें? लेकिन पूर्व में हमारे देश में परंपरागत कार्य करने वालों का एक समाज विकसित होता गया, जिसने स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट मानने की भूल की है तो उसमें हिन्दू धर्म का कोई दोष नहीं है। यदि आप धर्म की गलत व्याख्या कर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं तो उसमें धर्म का दोष नहीं है।

प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार के पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता। ऐसा ही उस काल में गुरुकुल से जो जैसी भी शिक्षा लेकर निकलता था उसे उस तरह की पदवी दी जाती थी।

इस तरह मिला जाति को बढ़ावा- दो तरह के लोग होते हैं- अगड़े और पिछड़े। यह मामला उसी तरह है जिस तरह की दो तरह के क्षेत्र होते हैं विकसित और अविकसित। पिछड़े क्षेत्रों में ब्राह्मण भी उतना ही पिछड़ा था जितना की दलित या अन्य वर्ग, धर्म या समाज का व्यक्ति। पीछड़ों को बराबरी पर लाने के लिए संविधान में प्रारंभ में 10 वर्ष के लिए आरक्षण देने का कानून बनाया गया, लेकिन 10 वर्ष में भारत की राजनीति बदल गई। सेवा पर आधारित राजनीति पूर्णत: वोट पर आधारित राजनीति बन गई।

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

600 BC इन हिन्दू सनातन धर्म

‎600 ईसा पूर्व तक यानि की उत्तर वैदिक काल तक हिन्दू धर्म में जात पात का कोई नाम नहीं था .............समाज में चार वर्ग होते थे.... ब्राह्मण भी पद था जाति नहीं ...इसी प्रकार से क्षत्रिय भी पद था जिसमे समाज का कोई भी इंसान अपनी सेवा दे सकता था ............. शांतिपूर्वक जीवन निर्वाह की इच्छा रखने वाले मनुष्य शुद्र वर्ग को चुनते थे ...और छोटे छोटे काम करके अपनी आजीविका चलाकर शांतिपूर्वक जीवन जीते थे .....................

इस बात के क्या प्रमाण है की उत्तर वैदिक काल तक कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था थी ..............

१. चारो वेद उत्तर वैदिक काल से पहले लिखे गए थ और उनमे कही भी ...जन्म आधारित जातिव्यवस्था का कही वर्णन नहीं मिलता..........(बाकि जिन पाखंडी ग्रंथो में ये जन्म प्रधान जाति आधारित समाज की बात की जाती है ..वे सभी उत्तर वैदिक काल के बहुत बाद में लिखे गए है .................
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२. हिन्दुओ में अधिकतर लोग भूरी चमड़ी के होते है.........ये भूरी चमड़ी आर्यों और मूलनिवासियों के आपसी वैवाहिक संबंधो से उपजी नस्ल है .............. यानि की हिन्दू संस्कृति केवल आर्यों की नहीं बल्कि आर्यों और मूलनिवासियों की साझा संस्कृति थी ................

३.चूँकि उत्तर वैदिक कल तक जाति व्यवस्था नहीं थी ..इसीलिए किसी भी मनुवादी भगवान या यु कहे की विशिष्ठ जाति में जन्म लेने वाले किसी भी देवता का उल्लेख नहीं मिलता है ......................

४. उत्तर वैदिक काल के बाद ही जैन और बुद्ध नामक हिन्दू विरोधी प्रतिक्रिया या धर्म ....उत्तर वैदिक काल के बाद ही पनपी ...........

५. उत्तर वैदिक काल के बाद ही जो जहाँ था वाही रुक गया यनी की जो जिस वर्ग में था उसी में रुक गया ................ उस समय में बहुत से लोगो के रिश्तेदार जो एक ही खून के थे .............अब अलग अलग जातियों में बटे हुए थे ......................

६. छुआ छूट बड़ने लगी ......... जाति पाती का अहंकार लोगो में पनपने लगा .................. मनुवादी ग्रंथो की रचना होने लगी ,अब भगवान की रचना की जाने लगी जो ब्रह्मण या क्षत्रिय वंश में जन्म लेते थे ...............ये काल्पनिक पत्र बहुत लोकप्रिय हो गए .................. ब्रह्मण कषत्रिया और वेश्या वर्ग आमिर बनाने लगा और शुद्रो की स्थति ख़राब होने लगी........................
कहने का मतलब है की हिन्दू धर्म की जो सबसे मजबूत नीव थी वो ..उत्तर वैदिक काल तक बहुत मजबूत थी ................."दलित आक्रोश"