शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

!! ये देश के तीन महान घोटालेबाज़ अब देश के लिए क़ानून बनएगे.!!

ये देश के तीन महान घोटालेबाज़ अब देश के लिए क़ानून बनएगे. मनमोहन सरकार ने इन तीनो महान घोटलेबाज़ो को स्थायी समितियों का सदस्य बना दिया है......

मनमोहन सरकार ने पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री एवं 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुख्य अभियुक्त ए. राजा और राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के अभियुक्त सुरेश कलमाड़ी को संसद की दो विभिन्न स्थायी समितियों का सदस्य बना दिया है. द्रमुक के लोकसभा सदस्य ए. राजा को ऊर्जा पर संसद की...
स्थायी समिति के लिए मनोनीत किया गया है, जबकि कांग्रेस के लोकसभा सदस्य कलमाड़ी को विदेशी मामलों की स्थायी समिति के लिए मनोनीत किया गया है... इनके अलावा 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कुछ मामलों की अभियुक्त द्रमुक सांसद कानिमोझी को भी गृह मामलों की स्थायी समिति के लिए मनोनीत किया गया है मालूम हो कि संसद की स्थायी समितियां विधेयकों का निरीक्षण कर संबंधित मंत्रालयों को प्रस्तावित कानून के बारे में सुझाव देती हैं...
वाह रे हिन्दुस्तान रोना आता है कहा ले जाएगे ये देश भाई अब तो छोड़ दो गद्दी पूरी तरीके से बर्बाद कर दोगे क्या देश को......

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

!! मानसिक चेतना !!

मनुष्य ने मानसिक चेतना को विकास के दौर में पा लिया है, पर वह चेतना के विकास की मूलभूत प्रक्रिया को विश्लेषण और हृदयंगम न कर पाने के कारण जानता ही नहीं कि मानसिक चेतना के आगे क्या है ?
हर जीवन-पदार्थ पर चेतना की विजय का एक चरण है... यह तब तक चलता रहेगा, जब तक पदार्थ को अनुशासित करके चेतना उसे पूर्ण आत्मा की अभिव्यक्ति का सीधा साधन और माध्यम नहीं बना देती..

मस्तिष्क मनुष्य के लिए सबसे बड़ी शक्ति है, पर अग्रिम विकास में वही सबसे बड़ी बाधा भी है कैसे ?

क्योंकि हमारा मानस यंत्र शरीर या भौतिक जगत और अतिमानसिक सत्ता के बीच सेतु नहीं बन सकता ? मस्तिष्क न तो ज्ञान का समुच्चय है और न उसका उत्पादक संयंत्र ही... यह तो मात्र ज्ञान को ढूंढ़ने का औजार है..सापेक्ष्य विचारों के रूप में जो कुछ भी यह पाता है उसका कुछ खास क्रियाओं में उपयोग भर करता रहता है....

मस्तिष्क की अपनी आदतें हैं .... वह हमारे शरीर के भीतर बेड़ियों में जकड़े शासक की तरह स्थित है... वह अदृश्य विराट को समुच्चय को कभी समझ नहीं सकता !!इसलिए वह खंडश: टुकड़े-टुकड़े करके, रूपाकार प्रदान करके चीजों को अलग-अलग करके समझने और समझाने की कोशिश करता है !!मानों यह चीजें अलग-अलग और खंडश: बिना आधार के भी विद्यमान हो सकती हैं, उसकी ये सीमाएं स्पष्ट हैं.........

मस्तिष्क कभी भी अनन्त को अधिकृत नहीं करता,वह अनन्त के द्वारा भुक्त और अधिकृत ही हो सकता है, बहुत कोशिश करके वह अधिक से अधिक अपनी पहुंच के परे ही सत्ता के लोगों को जो ज्योतिमय सत छाया है, उसके नीचे असहाय सा पड़ा रह सकता है,अतिमानस लोकों में, उनके स्तर पर आरोहण के बिना अनन्त पर अधिकार नहीं हो सकता और इस आरोहण के लिए अति मानसिक संदेशों के प्रति मस्तिष्क को निस्पंद बनाकर समर्पित कर देने के अलावा कोई रास्ता नहीं है...............