शुक्रवार, 15 जून 2012

!! स्त्री और बाजार !!

अभी कई दिनों से मई एक समाचार सुन रहा हु  राधे माँ को लेकर जो की अपने आप को माँ दुर्गा का अवतार कहती है और हजारो लोगो की भीड़ को आकर्षित करने की क्षमता रखती है बस वही से ऐसा  लगा की आखिर इस स्त्री में ऐसा क्या है जो राजर्षि विश्वामित्र जी लेकर आम हागारिक को विचलित कर रहे है ,आकर्षित कर रही है !
स्त्री हमेशा से पुरुष के लिए एक पहेली रही  है.वह कभी किसी रहस्य-सी लगती है,कभी लगता है कि उसके आर-पार सब कुछ दिखता  है.पुरुष स्वभावतः उसकी ओर खिंचा चला जाता है.यह आकर्षण आखिर किन वजहों से होता है ? क्या इसके लिए केवल विपरीतलिंगी होना ही महत्वपूर्ण कारण है ? पुरुष की स्त्री-मुग्धता केवल उसकी दैहिक सुन्दरता पर ही क्यों निर्भर होती है ? क्या हर जगह स्त्री के दिखने भर से वह मुख्य-धारा में आ गई है ?कुछ ऐसे ही प्रश्न हैं ,जिन पर हमें गंभीरता से विवेचन करने की ज़रुरत है.

अमूमन सुन्दर नाक-नक्श वाली स्त्री को देखकर पुरुष  सहजता से  उसकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं.प्रथम-द्रष्टया  यह कारक इतना प्रभावी होता है कि स्त्री की बाकी खूबियाँ या तो गौण हो जाती हैं या उन्हें  दिखाई नहीं देतीं ! स्त्री की इस 'उपयोगिता' को खुद स्त्री ने और आधुनिक बाज़ार ने बखूबी पहचाना है.यही वज़ह है कि वह  बकायदा एक उत्पाद के तौर पर देखी और परखी जा रही है.ऐसा नहीं है कि इस धारा के अलावा स्त्री की और कोई धारा या दिशा नहीं है पर जिस वज़ह से समाज का पूरा मनोविज्ञान और अर्थ शास्त्र बन-बिगड़ रहा है ,उसकी ही बात यहाँ पर हो रही है.


विपरीत-लिंग होने से स्त्री की ओर पुरुष का झुकाव सहज है और होना भी चाहिए,पर यहाँ गौर-तलब बात यह है कि इस प्रक्रिया में उसका मूल्यांकन गलत हो रहा है.कई बार दैहिक-सुन्दरता के मोह में हम बहुत गलत चुनाव कर लेते हैं.पहले भी सुदर्शन स्त्रियों का 'उपयोग' करके व्यक्तिगत हित साधे गए हैं और आज भी इसमें ज़्यादा अंतर नहीं आया है.इस सबके पीछे आख़िर कौन-सा मनोविज्ञान काम करता है ? यही कि कोई भी इससे आसक्त होकर मुख्य बात या काम को भूल जाये ,स्त्री के वास्तविक गुण गौण हो जाएँ ? उसे क्या एक मार्केट-टूल नहीं समझा गया है ?

एक स्त्री के लिए इससे अधिक पीड़ादायक बात क्या होगी जब  उसे उसकी सीरत नहीं सूरत के आधार पर पहचान मिले,जाना जाये !कई स्त्रियाँ जिनमें औरों से कहीं अधिक कौशल(स्किल) और बुद्धिमत्ता है,पर वे आधुनिक 'पहचान' से अनभिज्ञ या रहित हैं तो  इस नकली और बाजारू दुनिया में उनकी जगह आखिरी पंक्ति  में होती है. जिस स्वाभिमानी स्त्री को  इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता,उसके लिए  सारे दरवाजे बंद हों,ऐसा भी नहीं है. वह जीवन के हर क्षेत्र में अपनी निपुणता प्रमाणित कर चुकी है ! प्राचीन काल में 'कालिदास' और 'तुलसीदास' के बनने के पीछे विदुषी महिलाओं का ही हाथ रहा है और आज यह काम कहीं ज़्यादा हो रहा है ! एक सफल आदमी के पीछे औरत का हाथ होना यूँ ही नहीं स्वीकार किया गया है पर ऐसी स्त्रियों की चर्चा आज नहीं के बराबर है !

आख़िर, स्त्री आज बाज़ार की क्यों हर उस चीज़ को विज्ञापित करने पर अपना मौलिक और चिर-स्थाई गुण भुला दे रही है ?वह बाज़ार और समाज की माँग के आगे नत-मस्तक-सी हो गई है. इसमें केवल स्त्री भर का दोष नहीं है.हमने इतने सपने पाल लिए हैं,जिनको पूरा करने के लिए उनके पीछे आँख मूँदकर भागे जा रहे हैं . कारपोरेट सेक्टर  स्त्री का भरपूर इस्तेमाल  कर रहा है.औरत की देह हमेशा से आदमी की कमजोरी रही है और तात्कालिक लाभ के लिए इसे भुनाने पर कुछ को ज़रा भी हिचक नहीं होती. यह बात हमारा समाज,बाज़ार और यहाँ तक कि स्त्री भी समझती है !स्त्री का 'वह' तत्व जब चुक जाता है या ढल जाता है तो वह पुरुष और बाज़ार दोनों ले लिए बेकार हो जाती है.

स्त्री के दैहिक-रूप  से इतर उसके पास बहुत कुछ है.अगर इस बिना पर उसका साथ किसी पुरुष से होता है,तो स्त्री को उस रिश्ते पर गर्व होता है,उसका आत्मबल मज़बूत होता है.यह प्रक्रिया या रास्ता थोडा कठिन ज़रूर है पर चिर-स्थायी होता है.बाज़ार में वह देह के बजाय अपने आतंरिक गुणों के बल पर भी  छा सकती है.स्त्री जिस दिन पुरुष या बाज़ार की ज़रुरत के मुताबिक अपने को ढालना बंद कर देगी,वह उसका असली मुक्ति-दिवस होगा ! वह खिलौना या उत्पाद बनना पसंद करेगी अथवा एक अलहदा किरदार ?

गुरुवार, 14 जून 2012

!!हम अच्छे इंसानों को जानते है क्या ? पहचानते है क्या ?

हर गली में है दुर्योधन और दुशासन
 "क्या है इंसान की पहचान शारीरिक सुंदरता या मन की सुंदरता उसके स्वभाव और गुण " आपको क्या लगता है ?? एक बार जुलाई सन 1983 की बात बताता  हूँ मै अपने दोस्तों के साथ  के साथ बस में सफ़र कर रहा अथा...सफ़र क्या हम सभी लोग कॉलेज में दाखिले के लिए जा रहे थे मुझे भी मदद के लिए बुला लिया....तो मै भी उनके साथ चलने को तैयार हो गया  तमाशा तब शुरू हुआ जब मै उनके साथ बस में खिड़कीवाले शीट पर बैठा .बस में एक मोटी सी काली कलूटी लडकी भी खडी थी बस शुरू  - जानेवाले सभी  कमेंट करना चालू हो गया....पहला कमेंट्स  ....वो देख कितनी काली है एक तो काली है ऊपर से काला ड्रेस भी पहनी है......
दुसरा कमेंट्स ...देख कितनी काली और कितनी मोटी है ....तीसरा कमेंट्स ...कौन सी चक्की की आता खाती है जो इतनी मोटी है ? आदि आदि कई कमेंट्स आने लगी और ओ लडकी कुछ देर तक तो सूना फिर ओ जोर जोर से रोने लगी मैं ये सब नजारा देख रहा था ..मेरे से रहा नहीं गया और मैं पिल पडा उन लडको की तरफ ..पहले तो उन लडको को समझाया   नहीं समझे तो फिर हम कई दोस्त मिलकर धुनाई करने लगे ...ड्राइवर ने डर कर बस रोक दिया और ओ लड़के उतर कर भागे और हम भी उनके पीछे पीछे भागे और उनकी धुनाई करते रहे उस धुनाई में हमें भी कई लात घुसे पड़े बस वही बात आज याद आ गई और इस ब्लॉग का जन्म हुआ ......
“अच्छे इंसान की पहचान” बहुत मुश्किल है. यह पहचान हमेशा मुश्किल रही है, हर युग में, पर चुकी यह कलियुग है तो ये कठिनाई अपने चरम की कठिनाई है. कोई अगर यह पूछे की पहले तो सतयुग था फिर त्रेता, जिस युग में अवतार हुए हो वहां भला अच्छे इंसान क्यों नही मिलेंगे , पर उनके प्रश्नों का उत्तर उन्ही क उत्तरों में है. भगवान तब ही तो अवतार लेते है जबकि अच्छे लोग कम और बुरे जयादा हो जाते है!आज के युग में कुछ भी अच्छा ढूंढना मुश्किल होता है, ना शुद्ध वायु मिलती है, ना शुद्ध पानी, ना तो शुद्ध सब्जी मिलती है और ना ही शुद्ध फल सब में मिलावट. इतनी हेरा-फेरी देखकर इंसान के मन ने सोचा जब सबमै मैं ही मिलावट करता हूँ तो मैं शुद्ध रहकर क्यों इसी नयी दुनिया में शामिल ना होऊं … बस इसीलिए अब इंसान भी ‘मिलावटी’ हो गये है..............

मनुष्य एक ‘सामाजिक पशु’ है. पशु शब्द जुड़ने से ही उसकी ऐसी संकीर्ण सोच का कारण स्पष्ट होता है. पशुओ का मन भी ऐसी ही संकुचित व विकृत सोच रखता है. लेकिन सामाजिक शब्द जुड़ने से उसके मनुष्य होने का प्रमाण भी मिलता है. मनुष्य….. जिसके पास आत्मा है व चेतना है.

यही आत्मा और चेतना ही उसे यह एहसास दिलाती है की क्या सही है, क्या गलत है. आत्मा एक चीज़ है या गुण है या यूँ कहे की आत्मा, आत्मा ही है किसी से कोई सम्बन्ध नही है, यह मुक्त है. कहा जाता है कि आज का इंसान ज्यादा आस्थिर मन का है. इसका कारण यह है कि आज के आधुनिकतम परिवेश में कथित रूप से आधुनिक बनने या समय के आनुसार चलने कि जो शर्ते है, तरीके है व नियम है, वह हमारे मूल मनुष्य के स्वभाव को बहुत पीछे छोड़ने को कहते है.

आज झूट बोलना गलत नही वरन जरुरी समझा जाता है, सीधे व सरल लोगो को लोग अच्छा नही वरन बुद्धू मानते है, अपने हित को प्रमुखता व दूसरे कि चिंता ना करने वाले को लोग Smart मानते है, बनावटीपन ना दिखने वाले को पिछली व पुरानी पीढ़ी वाले कि नज़र से देखते है, झूटी कसीदे गढ़ने वालो को आधुनिक माना जाता है…

……जहाँ अच्छे इंसान कि परिभाषा में ऐसे लोग आते है, वहां वास्तव में अच्छे इंसान दूंढ़े तो कैसे ढूंढें.??

किसी दोस्त ने यह कविता कहा है ......कि....

बन बैठा इंसान दरिंदा, तौबा इसकी बुरी नज़र ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
नर्क बना रहे जीवन इनका, इज्जत को इनकी छीन कर ।
ये भी माँ, बहन, किसी कि बेटी है, खुद अपने घर में डाल नज़र ।।
ना भरोसा आस पड़ोस का, ना बचा यकीन किसी रिश्तेदार पर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
औरत के बदन मैं बस, उसकी इज्जत ही सांसे लेती है ।
दो मुक्ति भय से इसको भी, क्यों डरी डरी ये रहती है ।।
भय भरा है मन में दरिंदो का, स्वछंद भ्रमण अधिकार दो ।
ये विश्व सृजन की भागी है, इसे इज्जत दो सत्कार दो ।।
कोलेज , बस्ती में जीना मुश्किल, छेडी जाती है हर गाँव शहर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
उन्नति की ये पहचान है, इसे पढ़ना आगे बड़ना है ।
पापी इसके प्रतिकार से डर, बिन मौत तुझे क्यों मरना है ।।
ना इसका सीना छलनी कर, ऐसी ओछी दुराचारी कर ।
इसने ही रचा है तुझको भी, ना खुद ईश्वर से गद्दारी कर ।।
हर देश सदा आगे बड़ पाया, एक शुद्ध समाज की नीव पर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।



नोट ----आप किसी को कोई अच्छा इंसान मिले तो मुझे इस नंबर पर जरुर बताना ....09826656698  मैं उस अच्छे इंसान से मिलना  चाहुगा ..