शनिवार, 10 मार्च 2012

!! सावित्री जी फुले पुण्य तिथि पर विशेष।!


लड़कियों की शिक्षा और महिला अधिकारों की योद्धा: सावित्री बाई फुले। पति ज्योतिबा फुले के साथ मिल कर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लोहा लिया। देश की पहली शिक्षिका व कवयित्री हैं सावित्री।सावित्री बाई फुले एक समाज सुधारक थी, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लड़कियों की शिक्षा और महिला अधिकारों की अलख जगाई। वह देश के पहले बालिका विद्यालय की पहली महिला शिक्षिका है। उन्हें देश की प्रथम महिला शिक्षाविद््, प्रथम कवयित्री तथा महिलाओं की प्रथम मुक्तिदात्री होने का गौरव प्राप्त है। समाज की कुरीतियों के खिलाफ लोहा लेने के लिए उन्हें अनेक प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ी लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी मुख नहीं मोड़ा।
सावित्री बाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जि़ले में एक सम्पन्न किसान परिवार में 3 जनवरी 1831 को हुआ था। नौ वर्ष की उम्र में उनका विवाह ज्योतिबा फुले के साथ हुआ, जोकि समाज में फैली अज्ञानता के विरूद्ध संघर्ष करने के प्रति संकल्पबद्ध थे। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी को पढ़ाने और प्रशिक्षण दिलाने का निश्चय किया। अध्ययन पूरा हो जाने पर सावित्री बाई ने अपने पति के साथ मिलकर 1848 में पुणे में प्रथम बालिका विद्यालय स्थापित किया। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर पुरूष प्रधान समाज में स्त्री शिक्षा और स्त्री मुक्ति को सांस्कृतिक माध्यमों का प्रयोग करते हुए एक मिशन बना दिया। विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दिलाने और छूआछूत के खात्मे के लिए सामाजिक बुराईयों के साथ कड़ा संघर्ष किया। रूढि़वादी समाज स्त्री शिक्षा के लिए इस दुस्साहस को सहन करने के लिए तैयार नहीं था। जब वह घर से बाहर निकलती थी तो उसके ऊपर गोबर और पत्थर तक फेंके जाते थे और उसे गालियां दी जाती थी। लेकिन वह स्कूल पहुंच कर बालिकाओं को पढ़ाने में लग जाती थी। परम्परागत सामाजिक अवरोधों के बावजूद उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा और एक के बाद एक बालिकाओं के लिए कुल पांच स्कूल खोले। शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य करने के लिए 1852 में सावित्री बाई और ज्योतिबा फुले को ब्रिटिश शासन द्वारा भी सम्मानित किया।
सावित्री बाई के अन्य काम भी क्रांतिकारी थे। उस समय समाज में बाल विवाह और अनमेल विवाह की कुप्रथाएं भी प्रचलित थी। बड़े-बूढ़ों के साथ नन्हीं बालिकाओं की शादी कर दी जाती थी। बुढ़ापे और बिमारी के कारण पति की मृत्यु के बाद विधवा महिलाओं का जीवन किसी यातना से कम नहीं था। विधवाओं को सजने-संवरने का अधिकार नहीं था। उनके बलपूर्वक बाल काट दिए जाते थे। सावित्री और ज्योतिबा ने विधवा महिलाओं की दुर्दशा को देखते हुए नाईयों को लामबंद किया और नाईयों ने महिलाओं के बाल काटने से मना करते हुए हड़ताल कर दी। यह उस समय इस प्रकार की पहली हड़ताल थी। उन्होंने हर प्रकार के सामाजिक पूर्वाग्रहों और कुरीतियों से लोहा लिया। उस समय दलित समुदाय के लोगों को अछूत समझा जाता था और उन्हें सवर्णों के कूंओं व नलों से पानी लेने का अधिकार नहीं था। उन्होंने छूआछूत का विरोध करते हुए दलितों के पानी के अधिकार के लिए कड़ा संघर्ष किया। ब्रिटिश शासनकाल में सावित्री बाई ने लोकतंत्र की भावना के अनुकूल अन्य क्षेत्रों में भी लोगों का पथ प्रदर्शन किया। एक बार ज्योतिबा फुले ने गर्भवती महिला को आत्महत्या करने से रोका और जन्म के बाद उसके बच्चे को अपना नाम देने का आश्वासन दिया। सावित्रीबाई ने इस फैसले को सहर्ष स्वीकार किया और स्वेच्छा से महिला की प्रसूति में सहयोग देने का भरोसा दिलाया। ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने बाद में उस बच्चे को अपना बच्चा स्वीकार किया, जोकि बड़ा होकर डॉक्टर बना। बाद में उसी बच्चे ने ज्योतिबा की चिता को मुखाग्रि देकर बेटे का फर्ज निभाया। इस घटना ने विवाहित जोड़ों के सामने नया क्षितिज खोल दिया। उन्होंने हिन्दू समाज की महिलाओं की शोचनीय दशा को देखते हुए उनके लिए एक प्रसूति गृह स्थापित किया जिसका नाम उन्होंने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह रखा।
सावित्री बाई और ज्योतिबा ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और किसानों व मजदूरों के हितों की आवाज बुलंद की। उन्होंने उन लोगों के घातक हमले भी सहन किए जिनके भेदभाव और शोषणकारी व्यवहार पर उन्होंने सवाल उठाए थे। ज्योतिबा के देहांत के बाद सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज की जिम्मेदारी सम्भाल ली और बैठकों की अध्यक्षता करते हुए कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन प्रदान किया।
प्लेग की महामारी की चपेट में आए लोगों की सावित्रीबाई ने अनथक सेवा की। यह कहा जाता है कि वह महामारी के दौरान करीब दो हजार लोगों को हर रोज खाना खिलाती थी। बीमार बच्चों की सेवा करते हुए वह खुद भी प्लेग की चपेट में आ गई और 10 मार्च, 1887 को उनका देहांत हो गया। सावित्रीबाई अपने सामाजिक कार्यों के साथ-साथ कलम की भी धनी थी। उनकी लिखी कविताएं आज भी हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनकी कविताओं की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई। एक 1934 में ‘काव्य फुले’ और दूसरी 1982 में ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’। 10 मार्च 1998 को भारतीय डाक ने उनके योगदान को सम्मानित करते हुए उनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया। सावित्रीबाई शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए आज भी एक प्रेरणा स्रोत हैं।

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

!!मायावती जी की अपनी हार के लिए खुद जिम्मेदार !!

मायावती की हार पहले से अपेक्षित थी. मैं पहले से कहता रहा हूं कि बुद्ध से आंबेडकर तक की लड़ाई जातिविरोधी थी, मायावती ने इस परंपरा को जातिवादी बना दिया. जातियों का समीकरण बनाकर ही वह सत्ता में आई थीं. मायावती का उत्थान जातीय ध्रुवीकरण के आधार पर हुआ था और उसी ध्रुवीकरण ने मायावती को नेस्तनाबूद कर दिया है. जाति के मुद्दे से छेड़छाड़ करने वाले को यह परिणाम देखना ही पड़ेगा.
जाति एक बेहद खतरनाक अवधारणा है. इसके खिलाफ एक सतत संघर्ष की आवश्यकता है. बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन, क्षत्रीय सम्मेलन, बनिया सम्मेलन हों या स्वयं दलित जातियों के अलग-अलग सम्मेलन, इनसे जाति विनाश का नहीं, जातीय भावना भड़काकर जातिवाद बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हुआ. इसी प्रक्रिया में जातीय सत्ता की होड़ लगी. मायावती को अल्पकाल के लिए भले फायदा हुआ हो, लेकिन यह जातीय ध्रुवीकरण दूर तक चलने वाली चीज नहीं है.
इस समय देश में जो तीन समस्याएं सबसे बड़ी समस्या के रूप में जनतंत्र के सामने उभरकर आई हैं, वे हैं- जातिवाद, सांप्रदायिकतावाद और क्षेत्रीयतावाद. इन्हीं विचारधाराओं के चलते देश भर में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती जा रही है. मायावती की मुख्य गलती जातिविरोधी आंदोलनों को जातिवादी बनाना है. दूसरे, उन्होंने बुद्ध के नारे 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' को 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' में बदल दिया. यह कृत्रिम बदलाव जातिविरोधी आंदोलनों की मूलभूत विचारधारा के खिलाफ था.
मायावती ने घोषित कर दिया कि ब्राह्मण शोषित हैं, इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों को चुनाव में शामिल होने, जितवाने और सत्ता में लाने का खुलेआम निमंत्रण दिया. पहली बार ऐसा हुआ कि एक दलित नेता के मुंह से यह बात कही गई कि ब्राह्मण इस देश में शोषित हैं और हाशिए पर चले गए हैं. यह बिल्कुल गलत था, सौ प्रतिशत गलत. बसपा ने अपने चुनाव चिन्ह हाथी पर यह नारा भी बना डाला- 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है'. दलितों के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की अवधारणाओं को मायावती ने बिल्कुल उलट दिया था.
मायावती ने अगली गलती यह की कि एक तानाशाह के रूप में उभरकर आईं. दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को मायावती ने कभी भी उभरने का मौका नहीं दिया. आज के लोकतांत्रिक विकास के दौर में किसी भी राजनीतिक दल में ऐसी तानाशाही होने पर उसकी हार होना स्वाभाविक है. अपराधियों को नियंत्रण में करने के वायदे करने वाली मायावती ने बड़े-बड़े माफियाओं को टिकट देकर जिताया था. कैबिनेट में एक-तिहाई से ज्यादा मंत्री माफिया ही थे. अंतिम क्षणों में उन लोगों को हटाकर मायावती ने खुद अपने पैर में कुल्हाड़ी मारी. इससे उनका जनाधार बसपा से चला गया. कुल मिलाकर बसपा ने एक गैर-लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में खुद को स्थापित किया. उन्होंने अपनी और अपने परिवारजनों की मूर्तियां लगवाना शुरू किया. कांशीराम की अच्छी बातों को मायावती भूल गईं.
मायावती के तानाशाही रवैए का परिणाम मुलायम का विकल्प बनने में सहायक सिद्ध हुआ. इस चुनाव की अच्छी बात यह है कि भाजपा को इस चुनाव में धक्का लगा है. वह फिर से राममंदिर के मुद्दे को उठाकर अपने मूल चरित्र में सामने आ रही थी. कांग्रेस का भी पत्ता साफ ही कहा जाएगा. राहुल गांधी को उन्होंने भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया था. इसलिए सबसे बड़ी हार उन्हीं की है.
उत्तर प्रदेश के इस चुनाव का कई दिशाओं में दूरगामी परिणाम होने जा रहा है. मुलायम का जन-उभार कांग्रेस के लिए काफी परेशानियां खड़ी कर सकता है. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी का कांग्रेस को खड़ा करने का प्रोजेक्ट फ्लॉप हो चुका है. कांग्रेस को उदार हिंदुत्व की जगह अपनी पुरानी धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ओर लौटना चाहिए. जातिविरोधी राजनीति भी उन्हें अपनानी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश का यह चुनाव जातिगत ध्रुवीकरण पर ही आधारित था. मुलायम को मिला बहुमत जातिय ध्रुवीकरण का ही परिणाम है. बसपा के साथ रहने वाली जातियां सरक कर मुलायम के साथ आ गईं. यही इस चुनाव में सपा की जीत का आधार रहा.
( दैनिक भास्कर में छपे लेख में तुलसी राम ने बसपा के जीत की समीक्षा की है. मीनाक्षी मीणा से हुई बातचीत पर आधारित)