गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

!! अमीरी और गरीबी का पैमाना पैसा नहीं होता है !!

आर्थिक रूप से मोटे तौर पर दो तरह के लोग हमें दिखते हैं। एक धनी और दूसरे निर्धन। देशों के मामले में भी कमोबेश यही बात लागू होती है। इसी आधार पर उनका विकसित और विकासशील में बंटवारा किया गया है। पर क्या सचमुच व्यक्ति, समाज अथवा विभिन्न देशों की समृद्धि का सही मूल्यांकन हम इस तरह कर पाते हैं? क्या समृद्धि के आकलन का आधार सिर्फ पूंजी, उद्योग-धंधे, आमदनी या उपभोग के स्तर को माना जा सकता है? इसे समृद्धि का वास्तविक आकलन नहीं कहा जा सकता। किसी भी व्यक्ति या देश की समृद्धि के सही मूल्यांकन के लिए दूसरे महत्वपूर्ण तत्वों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसीलिए हमारे धर्म शास्त्र पैसे को इतनी अहमियत नहीं देते, जितनी कि आज के युग में दी जाने लगी है।

कुछ लोगों के पास धन-दौलत अथवा सुविधाओं की कमी नहीं होती, लेकिन वे फिर भी असंतुष्ट होते हैं। जीवन में आगे बढ़ना और ज्यादा से ज्यादा समृद्ध होना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन अपनी स्थिति से हमेशा असंतुष्ट ही रहना है, तो समृद्धि का क्या फायदा? ऐसे व्यक्ति को निर्धन की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। संतुष्टि के मामले में तो अवश्य ही निर्धन है वह। संतुष्टि को हमारे यहां परम धन माना गया है। ऐसे व्यक्ति के उलट, धन से रहित होने पर भी जो व्यक्ति संतुष्ट रहता है, वह किसी धनवान से कम नहीं है। इसका यह मतलब नहीं कि हम जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करना छोड़ दें। हम आगे बढ़ने का लगातार प्रयास करते रहें, लेकिन वर्तमान में जो कुछ भी हमारे पास है, उससे संतुष्ट रहना सीखें। हमारे अंदर असंतुष्टि का खालीपन नहीं हो।

समृद्धि का आधार पैसा अथवा पैसों से हासिल की गई वस्तु अथवा सेवा नहीं बन सकती। एक कप चाय की कीमत दो रुपये से लेकर दो सौ रुपये तक हो सकती है, लेकिन एक कप चाय से हमें जो ऊर्जा मिलेगी, वह दिए गए पैसों से नहीं नापी जा सकती। अगर कोई व्यक्ति अपनी चाय पर दो सौ रुपये खर्च नहीं कर सकता, तो क्या इसी कारण वह निर्धन की श्रेणी में आ जाएगा? इसी प्रकार अगर कम कीमत के खाद्य पदार्थों से हमें पूरा पोषण मिल जाता है, तो क्या हम उन लोगों के मुकाबले अभावग्रस्त कहलाएंगे जो महंगी वस्तुएं इस्तेमाल करते हैं? कदापि नहीं।

जो लोग बहुत अधिक सुख-सुविधाओं के आदी हो जाते हैं और अपना कोई काम खुद नहीं कर सकते, वे उसके मुकाबले में गरीब ही माने जाएंगे, जो मेहनती है और इसलिए सेहतमंद भी। अच्छा स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है, जिसे सिर्फ पैसों से नहीं खरीदा जा सकता।

धन जीवन में जरूरी है, लेकिन हमें और भी बहुत कुछ चाहिए। इनमें सबसे पहले आता है हमारा भौतिक शरीर। एक व्यक्ति भीख मांग कर अपना गुजारा करता था। पास से गुजरने वाले एक व्यक्ति ने उससे कहा कि तुम धनवान होते हुए भी क्यों भीख मांगते हो? 'नहीं, मैं तो बहुत गरीब हूं' भिखारी ने कहा। उस व्यक्ति ने भिखारी से कहा, तुम ऐसा करो कि अपनी दोनों आंखें मुझे दे दो। उसके बदले में मैं तुम्हें लाखों रुपये दे दूंगा। भिखारी ने कहा, ये कैसे हो सकता है कि तुम्हें पैसों के बदले अपनी आंखें दे दूं। इस पर उस आदमी ने कहा, तो फिर और दूसरा कोई अंग ही मुझे दे दो, जिसके बदले मैं तुम्हें मुंह मांगी कीमत दे दूंगा। लेकिन भिखारी कैसे मान लेता? उस सज्जन ने कहा, जब तुम्हारे शरीर के अंग-प्रत्यंग इतने कीमती हैं, तो फिर तुम गरीब कैसे हुए? वास्तव में हमारा शरीर सबसे कीमती वस्तु है। और उस पर अगर यह देह रोगों से मुक्त है, तो इस समृद्धि का क्या मोल लगाया जा सकता है?

हमारी मानसिक अवस्था भी हमारी समृद्धि अथवा अभाव की स्थिति के मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति तनाव से मुक्त जीवन जी रहा है, वह उस व्यक्ति के मुकाबले अधिक समृद्ध है, जो बहुत दौलतमंद तो है, लेकिन जिसका जीवन अनेक तनावों से भरा है। चिंता, काम का बोझ, कुंठा, क्रोध, चिड़चिड़ापन, असहनशीलता, लोभ, उतावलापन और घृणा ऐसे मनोभाव हैं, जो कैसी भी समृद्धि को दरिदता में बदल डालते हैं।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

!!इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म.!!

हमारी इच्छा की गहराई ही हमारे विचारों और संकल्पशक्तिकी गहराई होती है। इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म..
इच्छाएं कहां पैदा होती हैं? इनके पैदा होने का आदर्शतमस्थल मन ही है। मन की जमीन पर सबसे पहले इच्छा के बीज पडते हैं। अधिकांशत:ये बीज आसपास के वातावरण से ग्रहण किए जाते हैं। हम जब भी किसी दूसरे को कुछ होता हुआ या करता हुआ देखकर उससे प्रभावित होते हैं, तो हमारे अंदर भी यह इच्छा पैदा होती है कि हम भी वैसा ही करें। जैसे ही इच्छा का यह बीज मन की जमीन पर पडता है, वैसे ही धीरे-धीरे पनपना शुरू कर देता है। इसको पनपाने और बढाने का काम मन नहीं करता। यह काम विचार करता है।
           किसी व्यक्ति के मन में जैसे ही इच्छा होती है कि मैं एक धनी व्यक्ति बनूं, तो इच्छा का बीज पडते ही मन अशांत हो जाता है। यदि वह इस बीज को नष्ट या नियंत्रित नहीं करता, तो जैसे ही इच्छा को उपयुक्त वातावरण मिलता है, वह पनपने लगती है।
          मन केवल इच्छा करता है। इच्छा की पूर्ति करने का काम विचार करता है। यदि कोई धनी बनना चाहता है, तो यह उसके मन के अंदर पैदा हुई एक इच्छा है। अब यह दायित्व विचारों का है कि वह उसे यह बताए कि वह कैसे धनी बन सकेगा। इसके लिए उसे नौकरी करनी चाहिए, दुकान खोलनी चाहिए या कोई उद्योग लगाना चाहिए।लेकिन मन के अंदर जैसे ही कोई इच्छा उठती है, तो उससे जुडी न जाने कितनी इच्छाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसे आप ऐसा वृक्ष मान सकते हैं, जिसकी सैकडों टहनियां, हजारों डंठल और लाखों पत्तियां हैं। ये असंख्य इच्छाएं पैदा तो होती हैं मन में, लेकिन दिखाई देती हैं कल्पना के पर्दे पर। मैं धनी होना चाहता हूं यह मूल इच्छा है, जो मन में पैदा हुई, लेकिन धनी बनने के बाद मैं क्या-क्या करूंगा, इस तरह की छोटी-छोटी इच्छाएं कल्पना की स्क्रीन पर उभरने लगेंगी। एक बडा महल होगा, गाडी होगी, नौकर-चाकर होंगे आदि। कल्पना जगत के इन दृश्य-चित्रों का रंग जितना गाढा होगा, उतना ही अधिक यह इस बात का प्रमाण होगा कि धनी बनने की इच्छा कितनी गहरी है? जितनी गहरी इच्छा होगी, कल्पनाओं के रंग भी उतने ही स्पष्ट और चटख होंगे। कल्पनाओं के रंग जितने अधिक चटखदारहोंगे, उस इच्छा को पूरा करने वाले हमारे विचार भी उतने ही अधिक ठोस और मजबूत होंगे। हमारी इच्छा की गहराई ही हमारे विचारों और संकल्पशक्तिकी गहराई होती है। इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म बनते हैं। जब हम इन कर्र्मोको लगातार करते चले जाते हैं, तो ये ही कर्म हमारी आदत बन जाते हैं, हमारा व्यवहार बन जाते हैं और हमारी ये आदतें और व्यवहार हमारा व्यक्तित्व बन जाते हैं।
इच्छा के अनुकूल ही विचार पैदा होते हैं। यदि किसी में विद्वान बनने की इच्छा है, तो उसके विचार पुस्तकालयों, किताबों और विद्वानों के बारे में होंगे। यदि किसी की इच्छा अभिनेता बनने की है, तो वह अभिनय सीखने के स्कूलों, अभिनेताओंतथा उससे जुडी बातों के बारे में सोचेगा। उसका मस्तिष्क उसी का विचार करेगा, जो उसकी इच्छा होगी। ये इच्छाएं मन में उत्पन्न होती हैं, इसलिए मन ही व्यक्ति का प्रतिरूप होना चाहिए। कह सकते हैं कि मन का ही साकार रूप है मनुष्य।