इंसान की मानसिकता आज इतनी ज्यादा विकृत हो चुकी है कि अपने तुच्छ स्वार्थ और नापाक इरादों को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। इंसान की इसी घिनौनी मानसिकता का ताजा नमूना है बौद्ध संस्कृति के नाम पर भारतीय समाज में पाखंड का प्रचार करना। यह भारत के विरुद्ध एक बेहद ख़तरनाक अंतर्राष्टीय षणयंत्र है जिसमें शामिल हैं भारत के कुछ राष्ट्रद्रोही लालची लोग। इन लोगों का मक़सद है भारतीय समाज में नास्तिकता और पाखंड का ज़हर घोलकर, देश की अखंडता पर चोट करना। अपने इन्ही नापाक इरादों को पूरा करने के लिए इन लोगों ने बौद्ध संस्कृति को अपना प्रमुख हथियार बनाया है। हालांकि ये लोग बौद्ध संस्कृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। बहुत ही अफसोस की बात है कि ये लोग गौतम बुद्ध जैसे महापुरुष को उन्ही की जन्मभूमि भारत के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे हैं।
भारत एक हिन्दू बाहुल्य राष्ट्र है और यहाँ की अधिकतर जनसंख्या परमेश्वर तथा देवी देवताओं में आस्था रखती है। वैसे तो भारत विभिन्न संस्कृतियों का संगम है परन्तु हिन्दू संस्कृति यहाँ की मुख्य संस्कृत और पहचान है। भारत दुनिया की एक उभरती हुई ताकत है यह भी सभी जानते हैं। ऐसे में कुछ भारत विरोधी देश भारत को तोड़ने का षणयंत्र रच रहे हैं और इसके लिए वे तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं। उन्होने आतंकबाद रूपी हथियार का इस्तेमाल करके देख लिया लेकिन वे सफल नहीं हुए।
परन्तु इस बार उन्होने जो रणनीति बनाई है वह है कि अगर भारत को कमजोर करा है तो पहले उसकी संस्कृति को ख़त्म करो। इसीलिए उन्होने इस बार निशाना बनाया है भारत की सबसे प्राचीन और प्रमुख हिन्दू संस्कृति को। क्योंकि वे जानते हैं कि अगर भारत की हिन्दू संस्कृति को तोड़ने में वे सफल हो गए तो फिर इस देश को बर्बाद करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। उनके इस घृणित काम में उनका साथ दे रहे हैं भारत के ही कुछ लालची और देशद्रोही लोग। ये लोग बौद्ध संस्कृति को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हिन्दू समुदाय में एक बड़ा वर्ग पिछड़ों एवं दलितों का है। ये लोग मुख्य रूप से पिछड़ों एवं दलितों को ही अपना निशाना बनाते हैं। इनका मक़सद पिछड़ों एवं दलितों को को हिन्दू समाज से अलग करने का है जो कि देश को तोड़ने की दिशा में पहला कदम है। भारतीय समाज में छिपे ये गद्दार लोग छोटे छोटे सामाजिक संगठनों के रूप में काम करते हैं और अपने आप को बौद्ध संस्कृति का प्रचारक कहते हैं। ये लोग गावों में तथा आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुये क्षेत्रों में गोपनीय सभाएँ लगाते हैं। इन सभाओं में ये लोग खुदा-गॉड-परमेश्वर तथा हिन्दू देवी देवताओं के लिए बहुत ही अपमान जनक और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुये लोगों को हिन्दू संस्कृति को छोड़कर बौद्ध संस्कृति को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। लोगों को बौद्ध संस्कृति के बारे में बताने के बजाय ये लोग हिन्दू विरोधी मन गड़ंत बातों का प्रचार करते हैं तथा अपनी बातों को तरह तरह के हथकंडों द्वारा सिद्ध भी करते हैं।
प्रायः लोग इनकी बातों से संतुष्ट भी हो जाते हैं क्योंकि लोगों को धर्म व भगवान के बारे में वास्तविक जानकारी तो होती ही नहीं है। ये लोग वेद, पुराण, रामायण, गीता आदि धर्म ग्रंथों को झूठा तथा काल्पनिक बताते हैं और लोगों को बताते हैं कि ये धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा पिछड़ों एवं दलितों को भ्रमित करने के लिए रचे गए हैं। इस प्रकार ये लोग ब्राह्मणों और दलितों के बीच नफरत पैदा करने की कोशिश करते हैं। ये लोग हिन्दू विरोधी साहित्य को समाज में वितरित करते हैं। ये लोगों को बताते हैं कि हिन्दू संस्कृति को छोड़कर बौद्ध संस्कृति अपनाने से ही उनका उत्थान हो सकता है। बौद्ध संस्कृति का प्रचार तो सिर्फ एक बहाना है वास्तव में तो ये लोग हिन्दू विरोधी एक अलग समुदाय खड़ा करना चाहते हैं। इस प्रकार ये लोग पहले से ही जात-पात में बँटे हुये हिन्दू समाज को दो मुख्य वर्गों में बाँटना चाहते हैं।
अब रही बात बौद्ध संस्कृति को अपनाने की तो वास्तविकता तो यह है कि देश के ये गद्दार स्वयं ही गौतम बुद्ध के सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य करके बौद्ध संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। क्या बौद्ध संस्कृति यह कहती है कि परमेश्वर के लिए अभद्र और फूहड़ भाषा का प्रयोग करके करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहात किया जाए ? क्या बौद्ध संस्कृति यह कहती है कि मानव समाज में नास्तिकता फैलाकर उसमें नफरत पैदा की जाए ? कभी नहीं।
हालांकि गौतम बुद्ध परमेश्वर के विषय में कुछ भी नहीं जानते थे लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि वह नास्तिक थे। उनका पंचशील सिद्धांत तो आज भी मानवजाति के लिए अनुकरणीय है। आप चाहे हिन्दू बनें या बौद्ध बनें लेकिन जो भी बनें पूरी ईमानदारी के साथ बनें अन्यथा आप कुछ भी बन जाइए, आपका उत्थान नहीं हो सकता। वास्तव में सच्चा बौद्ध वह है जिसे ‘बोधिसत्व का सच्चा-सम्यक बोध’ हो और सच्चा हिन्दू वह है जो दूषित भावनाओं से हीन हो अर्थात जो दोष रहित, सत्य प्रधान, उन्मुक्त अमर जीवन विधान वाला हो। इस प्रकार जो सच्चा बौद्ध होगा वह सच्चा हिन्दू भी होगा और जो सच्चा हिन्दू होगा वह सच्चा बौद्ध भी होगा। फिर आपस में एक दूसरे के विरोधी कैसे हो सकते हैं ? सच्चाई तो यह है कि बौद्ध प्रचारकों का मुखौटा पहने इन शैतानों को न तो बौद्ध संस्कृति से कोई मतलब है और न ही इस देश से कोई मतलब है। ये लोग तो सिर्फ धन के लालच में विदेशी आकाओं के इशारों पर भारत विरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं।
अगर भारत सरकार समय रहते सचेत नहीं हुई और इन गद्दारों को देश विरोधी गतिविधियाँ चलाने से नहीं रोका गया तो इसके परिणाम भारत के लिए अच्छे नहीं होंगे। सरकार के साथ ही हर भारतीय, विशेष रूप से हिन्दू समुदाय को भी सचेत होने की जरूरत है। जहाँ कहीं भी इस प्रकार की हिन्दू विरोधी गतिविधियाँ चलती हुई देखें तो तुरंत उसका विरोध करके, उसे चलाने वाले देश के गद्दारों को समाज से बाहर खदेड़ दें। भारत को एक बार फिर धर्म गुरु बनकर दुनिया को रास्ता दिखाना है। आज दुनिया में जिस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा हो गई हैं उसमें हर कोई आज भारत की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहा है। इसलिए हर भारतीय को स्वयं धर्म का पालन करते हुये समस्त मानव जाति को जीवन जीने की राह दिखानी है लेकिन ऐसा तभी होगा जब इस प्रकार की धर्म विरोधी गतिविधियों को समाप्त करके भारत की अखंडता बरकरार रहेगी।
जो काम पहले पाखंडी और परजीवी करते आये थे आज वही काम बौध धर्म के भंते करते हैं. लाखों का वारा नारा करते हैं धर्म के नाम पर सच पूछो तो बुराई करके. अन्य धर्म की बुराई करके जितनी बुराइयां हिन्दू धर्म में उस जमाने से चली आ रही हैं वही बुराइयां इनमे अब आ रही हैं उधर पंडित जी लूटते हैं इधर भंते जी. बात तो एक ही है. हमें जरुरत है इन से दूर रहकर अपने अच्छे कर्म करने की और उस परम पिता परमेश्वर को खोजने की जिससे हमारा कल्याण हो. न की घंटी बजाने की ना ही माला फेरने की...
इस ब्रह्मांड में जीवन कब , और कैसे प्रारम्भ हुआ?अनंतकाल से यह प्रश्न सदा अनुतरित रहा है तथा सम्भवता भविष्य में भी इसका उत्तर कोई नही दे सकेगा/ सब कुछ अनुमान पर आधारित है तथा आने वाले समय में अनुमान ही लगाये जाते रहेंगे /कोई अंदाजा भी लगाये तो क्या लगाये /प्रश्न लाखों,करोड़ों बल्कि अरबों वर्षों का है/वैज्ञानिक,दार्शनिक,विचारिक,बड़े बड़े योगी तपस्वी तथा तत्वज्ञानी चिरकाल से इस गुत्थी को सुलझाने में लगे है,परन्तु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए अपुति रहस्य और भी गहरा होगया है/ऐसा दृष्टिगोचर होता है की मानव जो इस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटा सा अंशमात्र है,कभी भी उस अपरम्पार ईश्वर की अपार महिमा को नहीं जान सकेगा/
“आदमी मर कर बता सकता नहीं मरने का हाल, जीते जी वह ज़िन्दगी का राज़ पा सकता नही”
वैज्ञानिकों ने बड़ी बड़ी खोजें की,छानबीन की,उड़ाने भरी,चंद्रमा और मंगल ग्रह तक हो आये/विशाल पहाड़ों को चीर कर रख दिया,अबाध रूप से बहने वाली विशाल नदिओं को बांध दिया,अणु परमाणु के टुकड़े टुकड़े कर अमोघ शक्ति तथा सारे विश्व को कई बार नष्ट करने की शक्ति प्राप्त कर ली/ चिकित्सा शेत्र में चमत्कारिक उपलब्धियां प्राप्त कर ली किन्तु फिर भी मानव यही कहते सुना गया है की उसका अनुभव विशाल सागर के एक कतरे के समान है/वह अनुभव करता है की अभी उसने कुछ भी नहीं जाना/
ब्रह्मांड का जानना तो दूर उसका अनुमान लगाना भी मानुषी शक्ति से परे की बात है/ अभीतक की वैज्ञानिक खोजों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार यह सृष्टि आज से अरबों वर्ष पूर्व आस्तिव में आयी,हालांकि यह भी प्रामाणिक तथ्य नहीं है/सर्वप्रथम यह आग के जलते हुए लावे के तेजी से घूमते हुए एक विशाल गोले के रूप में थी/तदन्तर लावे के फटने,टूटने तथा विभिन्न भागों के रूप में ठंडा होने पर सितारों तथा अन्य ग्रहों का प्रादुभार्व हुआ/पूर्ववत यह पिंड घुमते रहे तथा अपने मूल के चारों और चक्कर लगाने लगे/पृथ्वी पर अत्यधिक उष्णता के कारण वर्षा हुई/प्रथम हरियाली उत्पन्न हुई फिर क्रमशाः धीरे धीरे अन्य जीव जंतु आस्तित्व में आये/आरम्भ में एक कोष वाले अमीबा इत्यादि की उत्पति हुई तथा पश्चात में बहुकोशीय जीव प्रगट हुए/निरंतर विकास और परिवर्तन के फलस्वरूप जीव अंत में मानुषी आकृति को प्राप्त हुए/ संषेप एवं सरल शब्दों में जीव के उत्पति एवं अन्य ग्रहों के निर्माण की यह अनुमानित कथा है/
विज्ञान के अनुसार हमारे तारापुंज या आकाशगंगा में एक अरब सितारेहै/सूर्य की परिक्रमा पृथ्वी सहित ११ ग्रह कर रहे हैं तथा वह हमारी पृथ्वी से लाखों गुना बड़ा है/हालांकि वह भी केवल एक मध्यमवर्ग का सितारा माना जाता है/हमारी आकाशगंगा की लम्बाई प्रकाश के एक लाख वर्ष और चौडाई दस हजार वर्ष है/प्रकाश एक सेकंड में १८६००० मील की दूरी तक पहुँच जाता है/इस गति से लगातार प्रकाश जितनी दूर पहुँच जाये,उसे प्रकाश का एक वर्ष मानते है/इससे हमारी आकाशगंगा की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है/यही ही नहीं वैज्ञानिकों के कथानुसार ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा समान करोड़ों आकाशगंगाएं और भी हैं/बुद्धि भ्रमित हो जाती है,सब कुछ अनुमान से परे प्रतीत होता है,कोई अंदाजा भी लगाये तो क्या? बड़े बड़े क्रांतदर्शी,योगिओं,तपस्विओं,ऋषि मुनिओं एवं विचारिकों ने भी आंतरिक योगसाधना एवं तप द्वारा सत्य तथा ज्ञान की चरमसीमा तक पहुचनेका प्रयास किया/भगवान को ढूंडत॓ ढूंडत॓ उन्हें भी ’नेति नेति ‘कह कर संतोष करना पड़ा है/ तर्क की परिधि से बाहर निकल कर उन्हें भी अपनी आत्मा के अनुभव के आधार पर श्रद्धा की ही शरण में जाना पड़ा है/ईश्वर
को पारब्रह्म, अपरम्पार ,अगोचर,सर्व अन्तर्यामी,असीम,अनादि,अजन्मा इत्यादि नामों से पुकारना इसी दृष्टिकोण का पोषक है/
ज्ञान हमें बताता है कि सृष्टि के अनेक व्यक्त पदार्थों में एक ही अव्यक्त मौलिक सत्ता है तथा विज्ञान हमें दर्शाता है कि किस प्रकार उस अव्यक्त सत्ता से सृष्टि की उत्पति हुई है/विज्ञान और ज्ञान की अंतिम सीमायें अन्ततःएक निर्विकल्प श्रद्धा पर परिणित हो जाती हैं तथा मानव ईश्वर के सम्मुख नतमस्तक हो जाता है/मनुष्य ने ईश्वर के असंख्य रूप देखे हैं तथा उसे हजारों नामों से पुकारा है/लेकिन ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं/ईश्वर उस सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान एवं सर्वान्तर्यामी सत्ता का प्रतीक है,जिसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड की सृष्टि की है,जो जगत का पालनपोषण करती है तथा जो इसे नित्य नए रूप देती है/हम ईश्वर को अन्यान्य नामों तथा रूपों में स्मरण करते है,केवल इस लिए कि निराकार की अपेक्षा साकार की पूजा हमें सहज व् सरल प्रतीत होती है/आधुनिक प्रगतिवादी,विकासवादी अथवा निरीश्वरवादी ईश्वर का नाम लेने से घबराए तो और बात है,परन्तु वह भी किसी असीम शक्ति द्वारा जगत के संचालन की बात करते हैं/वह भी उस शक्ति को ढूंड निकालने में असमर्थ है जितना कि कोई और साधारण मनुष्य/उन्होंने केवल प्राकृतिक नियमों को नए नए नाम दे रखे हैं,जिनके सहारे यह संसार स्वयं चल रहा है/उनकी अपेक्षा तो कर्मफल पर आश्रित ईश्वरवाद कहीं अधिक न्यायोचित और हृदयग्राही है/ सृष्टि की रचना के विषय में शास्त्रों ने “यथापूर्वमकल्पयत”के आगे कुछ नहीं कहा/अर्थात हम सर्वव्यापक भगवान् को अनुभव करते हुए भी उसे कोई विशेष रूप देने में असमर्थ हैं/सृष्टि के आदि और अंत को कोई भी नहीं जान सका/इसलिए हमारे लिए यही उचित व स्वीकार्य है कि हम ज्ञ॓य में विश्वास तथा अज्ञ॓य में श्रद्धा के पथ को अपनाये /वर्तमान स्तिथि के अनुसार सरल सत्य यही है कि यह परिवर्तनशील संसार सदा है और सदा रहेगा/इस सारी लीला के पीछे ईश्वरीय हाथ है तथा यह ज्ञान और तर्क के परे की बात है,यह अनुभव पर आधारित है और इसकी साक्षी केवल आत्मा ही दे सकती है/
बहुधा पूछनेवाले यह प्रश्न करते है कि भगवान् कहाँ है?उनसे पूछिए कि भगवान् कहाँ नहीं?क्या सृष्टिकर्ता के बिना इतनी सर्वांग सुंदर सृष्टि होना सम्भव है?यदि तथ्यों को तर्क की तुला पर तोला जाये तो ईश्वरीय सत्ता के सर्वव्यापक होने पर कुछ संदेह नहीं रह जाता/वैज्ञानिकों ने कुछ प्रमाणों के आधार पर बड़े बड़े सिद्धांत स्थापित किये है/ उदाहरण के रूप में ,जब न्यूटन ने देखा की प्रत्येक वस्तु ,वृक्षों के फल ,पते इत्यादि पृथ्वी की और खिचे चले आते हैं न कि आकाश की और तो वह इस निश्चय पर पहुंचे कि पृथ्वी में गुरुत्वाक॑षण शक्ति है/इसी प्रकार हम वायु को नहीं देख सकते,विद्युत् को नहीं पकड़ सकते,परन्तु उसके आस्तित्व से इनकार भी नहीं कर सकते/रेडियो,मोबाइल,टेलीविज़न एवं अन्य बेतार यंत्रों की तरंगों को किसी ने चलते नहीं देखा,परन्तु एक पल में चारों दिशाओं में फेल जाती हैं/उस असीम प्रभु की सत्ता वायु,विद्युत् एवं तरंगों से कहीं अधिक सूक्ष्म है/इसके बिना यह संसार चल ही नहीं सकता /भगवान् की बनाई प्रत्येक वस्तु,जड़ और चेतन में अनुपम व्यवस्था है,इसमें नियमितता है,उपयोगिता एवं आकर्षण है/सूर्य,चन्द्रमा एवं तारों की आभा से लेकर जल,थल,पृथ्वी और आकाश,सब स्थानों पर ज्योतिर्मय भगवान् ही दृष्टिगोचर होते है/कलकल करती स्वच्छ नदियाँ,गगनचुम्बी पर्वत,हरियाली,घने बन,विशाल रेगिस्तान,अथाह सागर,विभिन्न प्रकार के जीव जंतु सब उस परमपिता परमात्मा की कला के सुंदर कृतिया है/बीज में निहित शक्ति,जिस से वृक्ष ,फल और पुष्प उत्पन्न होते है,मनुष्य को चकित कर देते हैं/ बीज के तमाम गुणों का उपज में उपस्थित होना एक चमत्कार से कम नहीं/और तो और मनुष्य देह की बनावट शरीर में नस नाड़िया॓ का जाल,ह्रदय , अथवा रक्त की गति,विस्मित करने वाले चमत्कार है/हमारे मस्तिष्क में करोड़ों कोष हैं,इसके विभिन्न भागों में ताल मेल द्वारा हमारी शारीरिक गति नियंत्रित होती है/विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज भी चिंतनशक्ति के इस छोटे से ईश्वरीय यंत्र ही की उपज है/यह विचारणीय है कि यह मस्तिष्क किसकी देन है? फिर भी यदि कोई नेत्रहीन व्यक्ति सूर्य की प्रभा को न देख सके तो यह उसकी अपनी न्यूनता ,सूर्य के आस्तित्व पर किसी को संदेह नहीं हो सकता/
हम अपने दैनिक व्यक्तिगत जीवन में कई बार जीवन की छोटी मोटी समस्याओं में उलझ जाते है,छोटे छोटे प्रश्नों का हल करने के लिए घंटों पारिवारिक मित्रों से सलाह ,विचार विमर्श करते है,
मानसिक परिश्रम करते है,परन्तु जहाँ परमात्मा के आस्तित्व का प्रश्न आता है,हम अपनी सामयिक मानसिक स्थिति के अनुसार जो मुहं में आता है कह देते हैं/चलते चलाते किसी भी उपासना स्थल के पास से गुजरते हुए सर झुका कर,हाथ जोड़ कर ही, भगवान् की पूजा को ही पर्याप्त समझ लेते है/आखिर उस सर्वान्तर्यामी को समझने या पानेके लिए इतने ही प्रयास क्या काफी है?क्योंकी हमारी पूजा,आराधना सतही होती है,बिना किसी गंभीरता के होती है / कामचलाऊ ,औपचारिक ज्यादा होती है,इसलिए अपेक्षित फल कभी भी प्राप्त नहीं होता/हम भगवान् की इस सतही,झूटी,आडम्बर से भरी पूजा से कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते/ हमारे यह पूजा पाठ स्वार्थ से प्रेरित होते है,कुछ भौतिक,सांसारिक सुख प्राप्त करने इच्छा ही इसके मूल में होती है/भगवान् को पाना या उसके आस्तित्व को अनुभव करना कोई इतना सहज या सरल नहीं/ इसके लिए मन की अपूर्व एकाग्रता तथा पूर्ण श्रद्धा की आवश्यकता होती है/
आजकल का मनुष्य चाहता है कि जिस प्रकार बिजली का बटन दबाते ही विद्युत् प्रकाश हो जाता है,उसी प्रकार से अलादीन के चिराग अथवा जादुई छड़ी घुमाने मात्र से ईश्वर उनके सामने प्रगट हो जाये और जो कुछ उसे कहा जाये वह कर दिखाए/ईश्वर क्या हुआ एक आज्ञाकारी,निपुण सेवक हुआ जो अपने मानवीय स्वामी के संकेतों पर दिन रात नाचता रहे /इस से बढ कर हमारी अल्पज्ञता क्या हो सकती है/सर्वव्यापक,सर्वान्तर्यामी भगवान् संसार के हर कोने में विराजमान है/वह सदा हमारे अंग संग रहते हैं/उनकी निकटता तो हमारे श्वासों से भी अधिक है/हमारे चक्षु मार्मिक हो तो हम उसे देख सके/जो ज्ञानी भगवान् से सच्ची लगन और लौ लगा के बैठे हैं,उन्हें कण कण में भगवान् ही दृष्टिगोचर होते हैं/
हमारे परमात्मा को मानने या न मानने से भगवान् को कोई अंतर पड़ने से रहा/ईश्वर को हम स्मरण करते है तो अपने लिए/उसे विस्मरण कर के तो मनुष्य स्वयम अधोगति को प्राप्त होता है/परमात्मा से प्रेम,समीपत्व का आभास ,मनुष्य को प्रत्येक पाप से बचाता है एवं उसकी रक्षा करता है/उचित और अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा एवं शक्ति देता है/२४ घंटों के दिन रात में कम से कम १२ घंटे केवल ईश्वर ही हमारे साथ होता है/यदि ऐसे समय कभी हम कोई गलत बात सोचते है तो हमारी आत्मा की आवाज़ हमें निश्चित चेतावनी देगी/
जिस प्राणी को ईश्वर का भय ना हो तथा अपनी आत्मा को पापों के परदे से ढक रखा तो उसे फिर किस का डर? भगवान् से विमुख होकर मनुष्य कोंन सा पापकर्म नहीं कर रहा/ ऐसा भी नहीं है कि उसे पापों का दंड नहीं मिलेगा/दंड तो उसे अवश्य मिलेगा,इसके लिए ईश्वर के अटल नियम हैं/परन्तु यदि मनुष्य स्वच्छ ,निर्मल और सच्चे मन से ईश्वर की ईश्वरीय सर्वव्यापकता को माने तो वह पापमार्ग पर चलेगा ही नही/वर्तमान युग की व्यापक नास्तिकता एवं भौतिकवाद की अंधाधुंध नकल ही वास्तव में हमारे अधोपतन का मूल कारण है/