रविवार, 25 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 08)


सो कर उठा, और बाहर गेट के सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर खड़े थे बाकी चार पुलिस वाले घर के एक एक कोने में खड़े थे । चूंकि मैंने कोई अपराध नही किया था इस लिए बिना डरे इंस्पेक्टर से बात किया,और अंदर आने को बोला तो इंस्पेक्टर अंदर आ गए । 
इस तरह के घेराबंदी का कारण पूछा तो बोले "ये हमारी कार्यशैली है" । इसके बाद मूल मुद्दे पर आते हुए बोले "तुम्हारी  शिकायत मिली है, तुम ब्याज पर अवैध रूप से रू देते हो और सोना चांदी,जेवर गिरवी रखते हो और जबरन ब्याज वसूलते हो गुंडागर्दी करके" ।
मैने उन्हे बताया "ऐसा कुछ नही है साहब,आपको गलत सूचना मिली है" । 
तो बोले "तलासी लेना है घर की" । मैने बोला "बिलकुल ले लीजिए साहब" । इंस्पेक्टर ने दो पुलिस वालो को आवाज दिया और घर की,अलमारी, बाक्स आदि की तलासी लिया, श्रीमती जी के जेवर के सिवा कुछ नही मिला ।  किचेन के डिब्बों को भी उलट पलट के देखा कुछ नही मिला । चूंकि श्री मती जी के जेवर ज्यादा नही थे तो सवाल नही उठाया ।
फिर इंस्पेक्टर ने पूछा "नूतन सोसायटी क्या है" ? 
     तो उन्हे सोसायटी के बारे में विस्तृत जानकारी सभी रिकार्ड सहित बता दिया । संतुष्ट होकर चले गए । जाते जाते निर्देश दिया "कल इंड्रस्ट्रियल एरिया के पुलिस थाने में जाकर TI से मिल लेना" । 
अगले दिन TI से मिला,TI ने नेक सलाह दिया "सोसायटी को मध्यप्रदेश सहकारिता विभाग में रजिस्टर्ड करवा लो, क्योंकि इस तरह से पब्लिक से रू इकठ्ठे करना फिर ब्याज पर देना कानून गलत है" । बात समझ आ गई, मैने जानकारी निकाला और रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया । 13/2/1998 को हमारी सोसायटी सहकारिता विभाग में विधिवत रजिस्टर्ड जो गई । 

जिसने शिकायत किया था उसकी जानकारी निकाल लिया और सामने आए बिना ही उसे तीन महीने करीब हॉस्पिटल में आराम करवा दिया । 
  धीरे धीरे सोसायटी में सदस्य संख्या बढ़ती गई । कलेक्शन बढ़ गया । इसी दौरान मैंने अक्टूबर 1998 में "हीरो होंडा SS" बाइक खरीद लिया क्योंकि सायकल से ट्यूसन कवर नही हो रहे थे । मेरे बाइक खरीदते ही किसी ने अफवाह फैला दिया "सोसायटी के रुपया से बाघेल साहब  ने बाइक खरीद लिया" । सहकारिता विभाग में लिखित शिकायत के कारण MP Govt. का सहकारिता विभाग द्वारा सोसायटी की जांच हुई जिसमे मैं बेदाग निकला । अब मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ गई की सदस्य बनने की होड़ लग गई । करीब 500 सदस्य हो गए । एक महीने में रू का कलेक्कसन एक लाख से ऊपर तक पहुंच गया ।  मुझे एक मिनट का भी समय नही मिलता,ट्यूसन,सोसायटी से इतना व्यस्त हुआ की सुबह 7 बजे घर से निकलता तो रात के 11:30 पर घर आता । 9वी, 10वी, 11वी, 12वी के PCM रटा गई । मुंहमांगा ट्यूसन फीस मिलती । खूब कमाई हो गई । फेक्ट्री में जहां खड़ा हो जाऊं वही पर पांच सात लोग खड़े हो जाए, स्मोकिंग रूम में जाऊ तो वहा भी भीड़ लग जाए । फेक्ट्री के मैनेजर तक टोकने की हिम्मत नही करते । पर मैं मेरे काम में कोई लापरवाही नही करता, जो काम मिलता उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ करता ।
फेक्ट्री में बघेल एक ब्रांड नेम बन गया । सोसायटी में FD/RD (फिक्स/रेकरिंग डिपोजिट) लेने लगा, मकान बनाने के लिए रजिस्ट्री गिरवी कर  लोन देने लगा, तीन तीन लाख तक लोन देने लगा । एक एक रु के लिए तरसने वाला व्यक्ति नोट गिन गिन कर थकने लगा । 
पर मेरा ट्यूसन पढ़ाना बंद नही किया । लोगो को बड़ा आश्चर्य लगता, लोग मुझे कहने लगे "तू सोता कब है यार" । इसी दौरान घर में खाली पड़े प्लाट पर पूरा मकान बनवा लिया दो कमरे खाली पड़े थे तो एक में सोसायटी की आफिस और एक खाली ही पड़ा था ।  1998 से 2003 कैसे आ गया पता ही नही चला । मार्च 2003 में एक सेलरान 1.7Ghz कंप्यूटर और Epson एक प्रिंटर खरीदा और सोसायटी के अकाउंटिंग के लिए साफ्टवेयर बनवा लिया । 
          नवंबर 2003 में मेरे जीवन में एक बार फिर एक टर्निंग प्वाइंट आया । कालोनी में ही श्याम घारगे की किराने की दुकान थी, वहा सिगरेट पीने अधिकांसतह रुकता था । (सिगरेट 1984 से ही पी रहा था) । उन्होंने बताया की कालोनी के "बसरा साहब" अपना कंप्यूटर सेंटर बेच रहे है । अगले दिन उनके घर गया और उनके कंप्यूटर सेंटर में सिर्फ तीन कंप्यूटर थे तीनो कंप्यूटर सहित खरीद लिया और घर में आरंभ कर दिया । मुझे तो Computer का C भी नही पता था । जो लड़की बसरा के यहां पढ़ाती थी वही मेरे यहां भी पढ़ाने लगी, सिर्फ दो स्टूडेंट्स थे । अब दूर वाले ट्यूसन छोड़ने लगा और कंप्यूटर सेंटर के प्रचार प्रसार में लग गया नाम रखा ....
"High Tech Copmuter Education" । बड़े बड़े पोस्टर पैंपलेट छपवाया और रात में खुद ही पोस्टर लगाता दीवारों में । खुद ही पैंपलेट बाटता । रिस्पांस मिलने लगा तो और कंप्यूटर खरीदने लगा, इस तरह धीरे धीरे घर में ही 10 कंप्यूटर रख लिया  और जो लड़की पढ़ाती थी उसी से कंप्यूटर सीखने भी लगा । 
सोसायटी का सुरु से लेकर तो अभी तक मैं ही अध्यक्ष रहा क्योंकि मेरे सामने कोई चुनाव ( सहकारिता विभाग प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव करवाता है) जीत ही नही सका । 
(शेष अगले भाग में)

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