गुरुवार, 22 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 06) ।


अब मेरा जीवन इतना व्यस्त हो गया कि लाइब्रेरी जाना छूट गया । औलिया जी के यहां आना जाना बंद हो गया क्योंकि ड्यूटी, छोटा सा बिजनेस व,सोसायटी में व्यस्त हो गया । 
मकान मालिक का 9 बाय 8 फिट के कमरे से निकल कर फ्रंट का दो दो रूम ले लिया क्योंकि साड़ी के ग्राहक और सोसायटी के सदस्य अब रूम पर आने लगे तो जगह कम  पड़ने लगी ।।
सोसायटी से थोक में किराने का समान लाते और सभी सदस्यों को थोक भाव में ही 6% वार्षिक ब्याज में लोन पर देते और किस्तों में वापस लेते।  सोसायटी हम सभी सदस्यों के लिया वरदान साबित हो रही थी । इस तरह समय बीतता गया ।  सूरत से साड़ी लाता और सीधे 75% मुनाफे तक बेचता । आर्थिक समस्या पूर्णतः खत्म हो गई । व्यस्तता ऐसी हुई की दिन रात सिर्फ काम ही काम ही काम ।

        नवंबर 1995 में फिर मेरे जीवन का तीसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे यहां 20/11/95 को बालक का जन्म हुआ,  जिसे देखने के लिए, मेरे गांव के पास बरहुला गांव के प्रेमनाथ तिवारी जी प्रथम बार आए जो हायर सेकंडरी स्कूल चलते है । उन्होंने मुझे दो कमरे छोटे छोटे कमरे में रहते देख बोले.... "आपको मकान दिला देता हूं", और  इस तरह 9/12/95 को 70K लोन सेंसन हो गया और बाकी के 95K रू की व्यवस्था कर के मकान बन गया । 12/6/ 1996 को अपने मकान में रहने आ गया । कुछ कारणों से  यहां आकर साड़ी का बिजनेस बंद कर दिया ।  प्रेमनाथ तिवारी जी ने ट्यूसन पढ़ाने की सलाह दिया और कई जगह पर ट्यूसन दिला दिया । घर घर सायकल से घूम कर  ट्यूसन पढ़ाने लगा । एक साल में ही इतने ट्यूसन मिले को सेलरी से अधिक कमाई होने लगी ।  
नई नई जगह मकान लिया,  अपने काम से मतलब रखता, मुंडी नीचे किए सायकल से आता जाता, कालोनी में सिर्फ प्रेमनाथ जी से और गांव के पास के भीमसेन सिंह जी बैस संपर्क था ।

कालोनी वाले बुजुर्ग/लड़के नवरात्रि में कालोनी के चौराहे पर माता जी को बैठाते है । 2 अक्टूबर 1997 को करीब 30 लोग माता जी के लिए शाम को 7 बजे चंदा मागने आए, उस समय मैं व मेरे दोस्त स्व. मुद्रिका प्रसाद तिवारी और जयपाल दुबे के साथ खाना खा रहे थे । श्री मती जी किचेन की खिड़की से ही बोली "मेरे घर मेहमान आए हुए और अभी खाना खा रहे है, आप लोग बाद में आ जाइएगा" । कुछ लोग वापस होने के लिए मुड़े पर एक लड़के ने सभी को रोक लिया और बोला "अरे इसकी तो ऐसी की तैसी चंदा देने से मना कर रहा है,इससे तो चंदा ले कर ही जाएंगे" । ये बात श्री मती जी सुनकर बोली "भैया चंदा के लिए मना नहीं कर रहे, पर अभी खाना खा रहे है,इस लिए बाद में आने के लिए कह रही हूं" । इतने में ओ लडका जोर से चिल्लाया "अरे हम इतने फुरसत नहीं है की बार बार आऊ, और अधिक जोर से  चिल्ला कर बोला, ओय बाहर निकल" । चूंकि हम तीनो आगे के ही रूम में खाना खा रहे थे, इस लिए सारी बात सुनाई दे रही थी और समझ भी भी आ रही थी । उस लड़के की इस तरह की बदतमीजी से भरी आवाज से मुझे बहुत गुस्सा आया, पर गुस्से को कंट्रोल किया और जूठे हाथ ही बाहर निकला तो 30 के करीब अनजान लोगो की भीड़ खड़ी थी, उसी भीड़ में  ओ लडका बोला "क्यों बे क्या दिक्कत है तेरे को, चंदा देने में"। उसकी इस बदतमीजी पर मेरा खून खौल उठा, क्योंकि 11 साल हो गया था देवास में, किसी ने इस लहजे में मेरे से बात नही किया था,फिर भी कंट्रोल किया और उसे जूठा हाथ उठाकर दिखाया और बोला "खाने के बाद दूंगा, तब से आप लोग और घरों से लेकर आ जाइए" । भीड़ में से कुछ लोग बोले "टीक है" । पर उस लड़के ने मेरी बात को इग्नोर किया और अकड़ के साथ बोला "चंदा तो लेकर ही जायेंगे" । उसकी इस बात को इग्नोर करते हुए मैं वापस आने लगा तो उसने मेरा बाया हाथ पकड़ लिया । मैं तो पहले से ही गुस्सा कंट्रोल किए हुए था पर अब कंट्रोल नही हुआ गुस्सा । मैं घुमा और पूरी ताकत से एक घुसा उसके नाक पर मार दिया, ओ कटे पेड़ की तरह भर भरा का गिर पड़ा, और फिर मैं चढ़ गया उसके ऊपर और मारना सुरु कर दिया । भीड़ में भगदड़ मच गई, एक भी नही बचा, सभी भाग गए बस एक महेश मिश्रा मुझे पकड़ने लगा, इतने में स्व. मुद्रिका तिवारी जी ने महेश मिश्रा को मारना सुरु कर दिया तो ओ जान छुड़ाकर भाग खड़ा हुआ । फिर मैं और मुद्रिका भाई उस लड़के को रोड में घसीट घसीट कर इतना मारा की उसकी पूरी पीठ लहूलुहान हो गई । उसके कुर्ता पायजामा फाड़ दिया । इतने में  कालोनी में रहने वाले  मेरे गांव के पास के स्व.भीमसेन सिंह जी बैस जो  पुलिस में थे, आए और हम दोनो को छुड़ाया ओ लडका चढ्ढी बनियान में जान बचाकर भाग गया ।
मारपीट के बाद जब क्रोध कम हुआ तो लगा की ये तो गलत हो गया, पर परिस्थितियां ऐसी बनी की होनी को कौन टाल सकता है । पूरे कालोनी में तहलका मच गया "दरबार (दरबार यानी राजपूत) को मारा, दरबार को मारा,रोड में घसीट घसीट कर मारा" । ये चर्चा का विषय बन गया ।         अगले दिन सुबह ड्यूटी चला गया, शाम को ट्यूशन पढ़ाकर 9 बजे रात वापस आया, चौराहे पर ओ लडका खड़ा था अपने दोस्तो के साथ,मुझे देखा......
(शेष अगले भाग में)

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