मंगलवार, 20 सितंबर 2022

भूली बिसरी यादें (भाग 05)

भूली बिसरी यादें (भाग 05)
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मेरी प्रगति कैसे सुरु हुई ?

मनु के वे 59 रू मेरे जीवन का पहला टर्निंग प्वाइंट बना । मेरी आर्थिक समस्या तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए लगभग खत्म हो गई । मेरा हाथ जब काम के लायक हो गया तो मनु से खाना बनाने के लिए मना कर दिया । दिसंबर 1987 के आखिरी सप्ताह में मेरे रूम पार्टनर जगन्नाथ पटेल वापस देवास आ गए । अब मेरी दिनचर्या ठीक से चलने लगी । कंपनी में 500 रू महीने मिलने लगे । 6 माह बाद परमानेंट हो गया ।।

धीरे धीरे कम्पनी में दोस्ती हुई, मेरे सीनियर आपरेटर अशोक कुमार मिस्त्री ने मधुकर पाटिल से जान पहचान करवाया और हम तीनो ने मिलकर मार्च 1988 में एक सोसायटी बनाया "नूतन मित्र मंडल" । और एक महीने में ही 10 लोग जुड़ गए ।सोसायटी में  हर महीने 20 रू जमा करने लगे । जो राशि एकत्रित होती वह जिसे जरूरत पड़ती लोन के रूप में दे देते और बदले में 1% मासिक ब्याज लेते और मासिक किस्त में वापस लेते । सोसायटी का कैश व लेनदेन का पूरा हिसाब मेरे पास ही रहता । जो रू आते ओ मनु के पास रख देता क्योंकि मेरे रूम का दरवाजा ओपन मैदान तरफ था, चोरी का भय था ।जब जरूरत पड़ती मनु से वापस ले लेता । 
              कुछ महीने में मेरी विश्वसनीयता इतनी बढ़ी की सोसायटी में 30 लोग सामिल हो गए । मैं किसी समय दस रुपए के लिए तरसता था,अब मेरे पास हजार रु रहने लगे । जब जिम्मेदारी बढ़ी तो मनु के पास ज्यादा रू रखना रिस्की हो गया,क्योंकि मनु और अनिल स्कूल चले जाते, औलिया जी ड्यूटी चले जाते, मैं भी ड्यूटी चला जाता, इस लिए तीन लोगो के नाम से ज्वाइंट खाता खोल लिया और खाते में बैंक खाते में रू जमा करने लगे ।

मई 1989 में मेरी शादी हो गई  । शादी में अनिल भी चला था मेरे साथ ।  पत्नी को ले आने के पहले ही औलिया जी के यहां से रूम खाली करके पास ही में ठाकुर भवन में रहने लगा । क्योंकि फेमिली के लिए सुरक्षित मकान था । 16 मार्च 1990 को श्रीमती जी को देवास लाया तब मेरा मासिक वेतन 800/ रू के लगभग था । खर्च टीक से नही चलता था तब मेरे अजीज दोस्त रामेश्वर भार्गव से उधार रू लेता था । 
कुछ महीने बाद ठाकुर भवन छोड़कर "सुक्रवरिया हाट" के दरबार निवास में रहने लगा । सोसायटी को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करता रहा, खुद के आर्थिक विकास के लिए कुछ नही करता । इसी दौरान बेटी भी आ गई । खर्चे बढ़ते गए पर इनकम नही बढ़ रही थी । कुल मिलाकर परेशानी में ही दिन निकल रहे थे । 8 घंटा ड्यूटी और बचा समय लाइब्रेरी में बीतता, क्योंकि पुस्तके पढ़ने का बहुत सौख था । नई सायकल भी खरीद लिया कुछ बचत से । जब किसी को सायकल में LPG गैस का सिलेंडर बांधकर जाता देखता तो मुझे भी सोख लगता । मैं सोचता "क्या मेरे पास एलपीजी का सिलेंडर, चूल्हा होगा" । 1991 में कंपनी से 3200 रू एरियल मिला तो गैस कनेक्शन लिया ब्लैक में ।

       फिर मेरे जीवन का दूसरा टर्निंग प्वाइंट आया । मेरे दोस्त बृंदावन साहू जो मेरे साथ मेरी ही फेक्ट्री में थे, वे सूरत से साड़ी लाते और बेचते । उन्होंने मुझे भी इस व्यवसाय के लिए उत्साहित किया । सोसायटी के तीन मित्रो से उनके नाम का और मेरे नाम का लोन लिया और मैं भी साहू जी के साथ सूरत गया और साड़ी लाकर बेचने लगा ।  ड्यूटी टाइम के बाद सायकल के केरियर में साड़ी रखकर देवास के आसपास के गावों में साड़ी, फाल,ब्लाउज,के कपड़े बेचने लगा । शुक्रवार के दिन रूम के सामने ही बाजार लगता  तो ड्यूटी नही जाता और घर के सामने ही बाजार में जमीन पर प्लास्टिक बिछाकर उसी पर साड़ी आदि बेचता । साड़ी के बिजनेस में अच्छी कमाई होने लगी । मेहनत मेरी, मैनेजमेंट मेरी पत्नी का । हमारे खर्चे फेक्ट्री के वेतन से ही चलता, बिजनेस का एक रु भी खर्च के लिए नही निकालता । 6-6 /7-7  घंटे तक 15-20 kn दूर दूर गांवों में जाकर साड़ी बेचता, फिर ड्यूटी भी करता । पैसा आने लगा तो मेहनत करने का मन भी पड़ने लगा । जब कुछ रू बचा लिया तो मैं और मेरे दोस्त रामेश्वर भार्गव ने 1992 में 30 बाय 50 फिट का प्लाट 12000 रू में खरीदा और आधा आधा (15 बाय 50) प्लाट की रजिस्ट्री करवा लिया ।
शेष अगले भाग में ।।

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