मंगलवार, 30 मई 2017

मांसभक्षियों के कुतर्क :"पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।"



यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक "आत्मघाती" तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से "प्रोटीन" मिले या ना मिले, "तर्कक्षमता" तो अवश्य ही नहीं मिलती है।
वो इसलिए कि जब मांसभक्षियों से कहा जाता है कि वे अपने भोजन के लिए पशुओं की हत्या क्यों करते हैं, तिस पर जब वे प्रत्युत्तर देते हैं कि पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है, तो वे वास्तव में अपने पर लगाए आरोप को पहले ही स्वीकार कर लेते हैं, और अब केवल "प्रतिरक्षा" के तर्क दे रहे होते हैं!
तो अगर मांसभक्षियों पर लगाए गए आरोप के दो चरण हैं, पहला यह कि "क्या वे भोजन के लिए प्राणियों की हत्या करके अनैतिक कृत्य करते हैं" और दूसरा यह कि "प्राणी और हत्या जैसी श्रेणियों को सीमाएं और अतियां क्या हैं", तो वे दूसरे चरण की क़ीमत पर पहले चरण को स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद दूसरे चरण की विवेचना भर शेष रह जाता है। दरअसल, मांसभक्षी पहले ही जानते हैं कि वे एक घोर अनैतिक कृत्य कर रहे होते हैं, और वे भीतर तक ग्लानि से भरे होते हैं।

आप एक ऐसे अपराधी की कल्पना कीजिए, जिसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उससे कहा जाता है कि "तुमने चोरी की है।" ऐसे में वह अपने बचाव में यह नहीं कहता कि "यह झूठ है, मैंने चोरी नहीं की है।" वह "आत्मप्रवंचना" से भरा तर्क गढ़ते हुए कहता है कि "जज साहब, आप भी तो अपने अर्दली को उसकी योग्यता से कम तनख़्वाह देते हैं। यह भी मेरी नज़र में एक चोरी है।"
इसमें पेंच यह है कि चोर एक "तथ्य" के रूप में अपने अपराध को पहले ही स्वीकार कर चुका होता है, लेकिन अब उसकी रुचि दूसरों को भी चोर सिद्ध करने में होती है, जो कि चोरी नहीं चोरी की एक "हाइपोथीसिस" है। इससे न्यायाधीश का काम बहुत आसान हो जाता है। अब उसे यही सिद्ध करना है कि वह अपने अर्दली को जितनी और जैसी तनख़्वाह दे रहा है, वह चाहे जो हो, उसे चोरी की श्रेणी में तो क़तई नहीं रखा जा सकता।

तो स्थापना यह है कि : मनुष्यों में जीवन होता है। पशुओं में जीवन होता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।
इस आधार पर : अगर मनुष्य की हत्या अपराध है, अगर पशु की हत्या अपराध है, तो पेड़-पौधों की हत्या को भी अपराध माना जाना चाहिए।
यही ना, मांसभक्षी महोदय! आप यही सिद्ध करना चाहते हैं ना?
तो जब आप स्वयं ही यह मान रहे होते हैं कि पशु की हत्या मनुष्य की हत्या जितना बड़ा अपराध है, तब बहुत संभव है कि तर्कों के जंजाल में उलझने के बाद आपको यह जानकर अच्छा ना लगे कि पेड़-पौधों से फल और सब्ज़ी लेना पेड़-पौधों की हत्या करना उसी तरह से नहीं है, जिस तरह से गाय से दूध और भेड़ से ऊन लेना गाय और भेड़ की हत्या कर देने जैसा नहीं है। हां, यह उनका दोहन और शोषण अवश्य है। और शाकाहारी भी प्रकृति का शोषण करता है। किंतु मांसाहारी तो नृशंसता के साथ अपने पर्यावास की हत्या करता है।
मैं पेड़ से फल लेता हूं। पेड़ पर फिर फल उग आता है। मैं गाय की गर्दन काट देता हूं। गाय का जीवन समाप्त हो जाता है। कोई मूर्ख ही इन दोनों को समान बता सकता है। हां, आप यह अवश्य कह सकते हैं कि पेड़ को काट देना उसी तरह से अपराध है, जैसे पशुओं की हत्या कर देना। और मांसभक्षियों को यह जानकर ख़ुशी होना चाहिए कि लगभग सभी शाकाहारी ना केवल पेड़ काटने के विरोधी होते हैं, बल्क‍ि वे तो चाहते हैं कि पृथ्वी पर "वेजीटेशन" को ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बढ़ाया जाए।

पेड़-पौधों का अध्ययन "वनस्पति शास्त्र" के तहत किया जाता है। जीव-जंतुओं का अध्ययन "जीव विज्ञान" के तहत किया जाता है। ये दोनों विज्ञान ही अलग है। प्राणियों में "स्नायु तंत्र" होता है, पेड़-पौधों में नहीं होता। प्राणी "चर" होते हैं, पेड़-पौधे "अचर" होते हैं। प्राणि‍यों में रक्त-मांस-मज्जा की एक संपूर्ण संरचना होती है, पेड़-पौधों में यह कुछ नहीं होता। आपको संभवत: यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन अंशों में पेड़-पौधों में जीवन होता है, उससे न्यून अंशों में पत्थरों में भी जीवन होता है। हिमालय पर्वत भी अंतत: एक जीवित संरचना है और वह प्रतिवर्ष 6 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है। मेरे प्रिय मांसभक्षियो, क्या आप पर्वतों में सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों की तुलना भीड़भरे बाज़ारों में आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों से करना चाहते हैं, यह कहकर कि जीवन तो पत्थरों में भी होता है! आप चाहें तो कह लीजिए। आपकी मूर्खताओं का उपहास करने का अधिकार तब अवश्य हमारे पास सुरक्ष‍ित रहेगा।
इसी बात पर मुझे एक चुटकुला याद आया। आइए, फिर से न्यायालय परिसर में चलते हैं। एक व्यक्त‍ि ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। उस पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप लगाया गया। हत्यारे ने अपने बचाव में तर्क किया कि न्यायाधीश महोदय, आपको पता है जीवाणुओं में भी जीवन होता है। आप आज सुबह घर से न्यायालय तक चलकर आए, उसमें करोड़ों जीवाणुओं की मृत्यु हो गई। मैंने अगर सैकड़ों मनुष्यों को मारा है तो आप भी करोड़ों जीवाणुओं के हत्यारे हैं। न्यायाधीश ने दयनीय दृष्ट‍ि से उसकी ओर देखा और उसे उचित सज़ा सुना दी।
मेरे प्रिय मांसभक्षियो, यह चुटकुला आप हैं। आप एक भद्दा मज़ाक़ हैं।

प्रसंगवश, यह भी याद आया कि बहुधा मांसभक्षी कहते हैं कि एक गाय की हत्या के ऐवज़ में एक मनुष्य की हत्या कर देना कहां तक उचित है। क्या तब उन्हें उन्हीं का यह तर्क नहीं दिया जाना चाहिए कि जीवन तो गाय में भी होता है? और तब अगर वे कहेंगे कि गाय में जो जीवन था और मनुष्य में जो जीवन है, उन दोनों में चेतना के अंशों का बड़ा अंतर है, तो क्या यही बात पेड़-पौधों, पत्थरों, पर्वतों की चेतना के अंशों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?
जब शहर में प्लेग फैल जाता है तो लाखों की संख्या में चूहों की हत्या की जाती है। जब कोई बाघ आदमख़ोर हो जाता है तो उसे बंदूक़ की गोली से मार गिराया जाता है। जब आप पैदल चलते हैं तो आपके जाने-अनजाने ही कितने ही कीट-पतंगे कुचलकर मारे जाते हैं। इनमें से किसी की भी तुलना "फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग" के तहत पशुओं को अमानवीय रूप से पालकर, क़त्लख़ानों में भयावह मशीनों से उनकी हत्या कर आपकी तश्तरी में भोजन की तरह प्रस्तुत किए जाने से नहीं की जा सकती, जबकि जीवन तो चूहों में भी था, आदमख़ोर बाघ में भी था, कीट-पतंगों में भी था और पेड़-पौधों में तो था ही। हत्या की मंशा, हत्या का प्रकार, ये सभी "न्यायशास्त्र" के अध्ययन का विषय होते हैं, जबकि मांसभक्षियों के तर्कों की तो पूरी बुनियाद ही अन्याय की लंपट लालसा के आधार पर टिकी होती है।

किसी बुद्धिमान व्यक्त‍ि ने एक बार कहा था कि आप किसी अबोध बच्चे को एक सेब और एक ख़रग़ोश दीजिए। अगर वह सेब के साथ खेलने लगे और ख़रग़ोश को मारकर खाने लगे तो मैं मान लूंगा कि मांसाहार स्वाभाविक है।
इसी पर मैं आगे यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अगर पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, जैसे पशुओं में होता है तो आप जिस तरह से अपने बच्चों को आम के बाग़ में ले जाते हैं, उसी तरह से उन्हें कभी क़त्लख़ानों में क्यों नहीं लेकर जाते?

शाकाहार क्यों ?

यह लेख मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण है। नैतिक या धार्मिक रूप से क्या सही है क्या नहीं का यह विश्लेषण नहीं। साथ ही लेख वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर है मेरी धारणाओं के आधार पर नहीं। लेख अंत तक पढ़ने पर ही समझ आएगा।
मनुष्य की जीभ में मात्र 5 स्वाद जानने की क्षमता होती है।
1.मीठा
2.कड़वा
3.खट्टा
4.नमकीन
5.माँस
मांस का स्वाद अजीनोमोटो से मिलता जुलता है।
और यह रिसेप्टर शाकाहारी मनुष्यों में और उनकी संतानों में भी होता है। और कई पीढ़ियों के शाकाहार के बावजूद मौज़ूद होते हैं।
6.उमामी...pungent..बेहद अज़ीब सा खट्टा स्वाद। टमाटर में होता है।
हमें जो अन्य सैकड़ों स्वाद मिलते हैं वे नाक,गले इत्यादि में मौज़ूद गंध के रिसेप्टर्स की वजह से मिलते हैं।
आप चाहेंगे मनुष्य के मांसाहार पर वैज्ञानिक लेख ??
मैं समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक गहरे अध्ययनों में ही देखता हूँ। शाकाहारी मांसाहारी को दुष्ट कहें और मांसाहारी शाकाहारी को कमज़ोर कहें इससे बात वहीँ रहती है। खुद को जान तो लें हम क्या हैं और क्यों हैं? ऐसे क्यों हैं? और क्या हमारे लिए सही होगा। होगा तो कैसे? क्या संभावित परिणाम होंगे बदलावों के...
लेकिन इस लेख को पढ़ना होगा खुले दिमाग से । पूर्व धारणाओं और मान्यताओं से कुछ देर के लिए दिमाग को खाली करके।
प्राकृतिक रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों,विकास क्रम के अध्ययनों से पता चलता है क़ि मनुष्य की सभी प्रजातियां कालांतर से Omnivorous रही हैं।(शाकाहार और मांस दोनों खाने वाली)।
मनुष्य जब विकसित हुए होमोसेपियंस से तब जो भी उर्ज़ा,प्रोटीन,फैट,विटामिन, मिनरल के लिए खाने योग्य मिलता खा जाते। आज के आधुनिक मनुष्यों के सभी पूर्वज मांसाहारी भी थे।
यही वजह है कि मनुष्य की जीभ में लाखों वर्षों के विकासक्रम  से पोषित मांस रिसेप्टर्स आज भी हैं। मनुष्य के अमाशय में मौजूद enzymes, आँतों की बनावट, आँतों में मौजूद पोषण सोखने वाले vili सभी में मांस से पोषण निकाल कर रक्त में डालने की क्षमता है। मनुष्य के canin एवं अन्य दांतों की बनावट शाकाहारी जीवों से भिन्न है और omnivoros से मिलती जुलती है।
मनुष्य के शरीर के लिए अत्यंत ज़रूरी कुछ तत्व आज भी सिर्फ पशु आहार में हैं। ज़ैसे,दूध,अंडा,चिकेन ,फिश इत्यादि में। वहीँ कुछ ज़रूरी तत्व सिर्फ शाकाहार में हैं। क्योंकि मानव omnivorous स्तनधारी पशु है जंगली सूअर की तरह। 
ज़ैसे विटामिन बी12, vitaminD, उच्च गुणवत्ता का आयरन, 
उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन इत्यादि सिर्फ पशु आहार में पाए जाते हैं। 
लेकिन इस बीच मनुष्य में नैतिकता और धार्मिकता का भी विकास हुआ। नैतिक रूप से मानवीय तर्क के रूप में किसी और जीव की हत्या पाप या गलत समझी जाने लगी। 
लेकिन उपरोक्त शारिरिक एवं भीतरी रसायनों की संरचना इस बात की व्याख्या है क़ि क्यों नैतिक भाषणों,नैतिक तर्कों, धार्मिक डर, पाप पुण्य की संभावना,मांसाहार पर उलाहना के बावजूद, संतों इत्यादि के बावजूद न सिर्फ पूरी दुनिया में वरन भारत ज़ैसे अहिंसा को मानने वाले देशों में तक ,बुद्ध के देशों में तक मांसाहारी मनुष्यों की तादात कहीं ज़्यादा है क्योंकि कोई भी मानवीय नियम कड़ी सजाओं के बावजूद प्राकृतिक नियमों से हमेशा हारते रहते हैं। 
लांतर में शारीरिक क्षमता के आधार पर देखें तो मांसाहारी
कौमों ने युद्ध ज़्यादा जीते हैं। हिंदुओं में भी राजा बनने वाले शक्तिशाली लोग मांसाहारी थे।
ओलंपिक में जीतने वाले ज़्यादातर लोग हों या नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सारे ज़्यादातर omnivorous थे।
साथ ही प्राकृतिक इकोसिस्टम के बैलेंस के लिए भी यह ज़रूऱी था। ज़ैसे शेर कुछ हिरनों को न खाये तो पूरे जंगल को बहुत से नुकसान होंगे। हिरनों के लिए ही घास न बचेगी।
लोगों को यह देखने की ज़रूरत है क़ि गाय या हिरन को शाकाहार सिखाने की ज़रूरत नहीं। वे नैतिक नहीं प्राकृतिक रूप से शाकाहारी हैं। शेर को कोई भी नैतिक भाषण दे शाकाहारी बना दे तो दरअसल प्रकृति के प्रति यह अनैतिक
बात ही होगी।
तो क्या मैं मांसाहार का समर्थक हूँ और मांसाहार को महिमामंडित कर रहा हूँ?
तो उत्तर है नहीं। मैं मात्र प्राकृतिक ,वैज्ञानिक सच आपको खुद अपने तन,मन,विकास और इतिहास के विषय में बताना चाहता हूँ।
और चाहता हूँ आज़ के परिवेश में लोग शाकाहार अपनाएं(दूध,अंडे छोड़ कर)।
क्यों अपनाएं?
आज मानव मूल्य, दया की भावना में प्रकृति प्रदत्त ही इज़ाफ़ा हुआ है। साथ ही मांस आज जीने के लिए खाना ज़रूरी नहीं प्रचुर मात्रा में अन्य खाद्य उपलब्ध होने की वजह से। साथ में सिर्फ मांसाहार में अच्छे से उपलब्ध शरीर के लिए आवश्यक तत्व ज़ैसे विटामिन B12, विटामिन डी,आयरन,प्रोटीन इत्यादि को ऊपरी तौर पर लिया जा सकता है शाकाहार में। ज़ैसे जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर शाकाहारी होकर भी बेहद फिट और मस्कुलर हैं।
फिर आज दूध और अण्डों का उत्पादन मनुष्य बेतहाशा बढ़ा पाया है। इनमें किसी प्राणी का क़त्ल और पीड़ा नहीं। साथ ही पोषक तत्व उच्च स्तर के हैं।
लेकिन दुनिया को साथ ही eco सिस्टम के बदलावों पर भी नज़र रखने होगी।
साथ ही एक महत्वपूर्ण आंकड़ा यह कि विकासशील और गरीब देशों में जब हम शाकाहार और मांसाहार की बहस कर रहे हैं हमारे 30 प्रतिशत बच्चे भूखे सो रहे हैं। अतः इतनी मात्रा में उच्च गुणवत्ता का शाकाहार हम कैसे पैदा करेंगे?
WHO ने आने वाले 30 वर्षों के बाद बढ़ती मानवीय जनसंख्या में खाद्दान्न की कमी से निपटने प्रोटीन युक्त कुछ कीड़ों की प्रजातियों पर काम करना शुरू किया है। सुनने में आज आपको यह अज़ीब लगेगा लेकिन क्या पता 100 वर्षों बाद इनके रेस्टॉरेंट खुल जाएं ,विज्ञापनों के साथ उन कीड़ों के।
मनुष्य ,ये धरती हमारे साथी जीव और पेड़ पौधे जीते रहेंगे अनवरत यही उम्मीद है और अगली पीढ़ियों को शुभकामनायें।