मंगलवार, 30 मई 2017

मांसभक्षियों के कुतर्क :"पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।"



यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक "आत्मघाती" तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से "प्रोटीन" मिले या ना मिले, "तर्कक्षमता" तो अवश्य ही नहीं मिलती है।
वो इसलिए कि जब मांसभक्षियों से कहा जाता है कि वे अपने भोजन के लिए पशुओं की हत्या क्यों करते हैं, तिस पर जब वे प्रत्युत्तर देते हैं कि पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है, तो वे वास्तव में अपने पर लगाए आरोप को पहले ही स्वीकार कर लेते हैं, और अब केवल "प्रतिरक्षा" के तर्क दे रहे होते हैं!
तो अगर मांसभक्षियों पर लगाए गए आरोप के दो चरण हैं, पहला यह कि "क्या वे भोजन के लिए प्राणियों की हत्या करके अनैतिक कृत्य करते हैं" और दूसरा यह कि "प्राणी और हत्या जैसी श्रेणियों को सीमाएं और अतियां क्या हैं", तो वे दूसरे चरण की क़ीमत पर पहले चरण को स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद दूसरे चरण की विवेचना भर शेष रह जाता है। दरअसल, मांसभक्षी पहले ही जानते हैं कि वे एक घोर अनैतिक कृत्य कर रहे होते हैं, और वे भीतर तक ग्लानि से भरे होते हैं।

आप एक ऐसे अपराधी की कल्पना कीजिए, जिसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उससे कहा जाता है कि "तुमने चोरी की है।" ऐसे में वह अपने बचाव में यह नहीं कहता कि "यह झूठ है, मैंने चोरी नहीं की है।" वह "आत्मप्रवंचना" से भरा तर्क गढ़ते हुए कहता है कि "जज साहब, आप भी तो अपने अर्दली को उसकी योग्यता से कम तनख़्वाह देते हैं। यह भी मेरी नज़र में एक चोरी है।"
इसमें पेंच यह है कि चोर एक "तथ्य" के रूप में अपने अपराध को पहले ही स्वीकार कर चुका होता है, लेकिन अब उसकी रुचि दूसरों को भी चोर सिद्ध करने में होती है, जो कि चोरी नहीं चोरी की एक "हाइपोथीसिस" है। इससे न्यायाधीश का काम बहुत आसान हो जाता है। अब उसे यही सिद्ध करना है कि वह अपने अर्दली को जितनी और जैसी तनख़्वाह दे रहा है, वह चाहे जो हो, उसे चोरी की श्रेणी में तो क़तई नहीं रखा जा सकता।

तो स्थापना यह है कि : मनुष्यों में जीवन होता है। पशुओं में जीवन होता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।
इस आधार पर : अगर मनुष्य की हत्या अपराध है, अगर पशु की हत्या अपराध है, तो पेड़-पौधों की हत्या को भी अपराध माना जाना चाहिए।
यही ना, मांसभक्षी महोदय! आप यही सिद्ध करना चाहते हैं ना?
तो जब आप स्वयं ही यह मान रहे होते हैं कि पशु की हत्या मनुष्य की हत्या जितना बड़ा अपराध है, तब बहुत संभव है कि तर्कों के जंजाल में उलझने के बाद आपको यह जानकर अच्छा ना लगे कि पेड़-पौधों से फल और सब्ज़ी लेना पेड़-पौधों की हत्या करना उसी तरह से नहीं है, जिस तरह से गाय से दूध और भेड़ से ऊन लेना गाय और भेड़ की हत्या कर देने जैसा नहीं है। हां, यह उनका दोहन और शोषण अवश्य है। और शाकाहारी भी प्रकृति का शोषण करता है। किंतु मांसाहारी तो नृशंसता के साथ अपने पर्यावास की हत्या करता है।
मैं पेड़ से फल लेता हूं। पेड़ पर फिर फल उग आता है। मैं गाय की गर्दन काट देता हूं। गाय का जीवन समाप्त हो जाता है। कोई मूर्ख ही इन दोनों को समान बता सकता है। हां, आप यह अवश्य कह सकते हैं कि पेड़ को काट देना उसी तरह से अपराध है, जैसे पशुओं की हत्या कर देना। और मांसभक्षियों को यह जानकर ख़ुशी होना चाहिए कि लगभग सभी शाकाहारी ना केवल पेड़ काटने के विरोधी होते हैं, बल्क‍ि वे तो चाहते हैं कि पृथ्वी पर "वेजीटेशन" को ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बढ़ाया जाए।

पेड़-पौधों का अध्ययन "वनस्पति शास्त्र" के तहत किया जाता है। जीव-जंतुओं का अध्ययन "जीव विज्ञान" के तहत किया जाता है। ये दोनों विज्ञान ही अलग है। प्राणियों में "स्नायु तंत्र" होता है, पेड़-पौधों में नहीं होता। प्राणी "चर" होते हैं, पेड़-पौधे "अचर" होते हैं। प्राणि‍यों में रक्त-मांस-मज्जा की एक संपूर्ण संरचना होती है, पेड़-पौधों में यह कुछ नहीं होता। आपको संभवत: यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन अंशों में पेड़-पौधों में जीवन होता है, उससे न्यून अंशों में पत्थरों में भी जीवन होता है। हिमालय पर्वत भी अंतत: एक जीवित संरचना है और वह प्रतिवर्ष 6 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है। मेरे प्रिय मांसभक्षियो, क्या आप पर्वतों में सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों की तुलना भीड़भरे बाज़ारों में आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों से करना चाहते हैं, यह कहकर कि जीवन तो पत्थरों में भी होता है! आप चाहें तो कह लीजिए। आपकी मूर्खताओं का उपहास करने का अधिकार तब अवश्य हमारे पास सुरक्ष‍ित रहेगा।
इसी बात पर मुझे एक चुटकुला याद आया। आइए, फिर से न्यायालय परिसर में चलते हैं। एक व्यक्त‍ि ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। उस पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप लगाया गया। हत्यारे ने अपने बचाव में तर्क किया कि न्यायाधीश महोदय, आपको पता है जीवाणुओं में भी जीवन होता है। आप आज सुबह घर से न्यायालय तक चलकर आए, उसमें करोड़ों जीवाणुओं की मृत्यु हो गई। मैंने अगर सैकड़ों मनुष्यों को मारा है तो आप भी करोड़ों जीवाणुओं के हत्यारे हैं। न्यायाधीश ने दयनीय दृष्ट‍ि से उसकी ओर देखा और उसे उचित सज़ा सुना दी।
मेरे प्रिय मांसभक्षियो, यह चुटकुला आप हैं। आप एक भद्दा मज़ाक़ हैं।

प्रसंगवश, यह भी याद आया कि बहुधा मांसभक्षी कहते हैं कि एक गाय की हत्या के ऐवज़ में एक मनुष्य की हत्या कर देना कहां तक उचित है। क्या तब उन्हें उन्हीं का यह तर्क नहीं दिया जाना चाहिए कि जीवन तो गाय में भी होता है? और तब अगर वे कहेंगे कि गाय में जो जीवन था और मनुष्य में जो जीवन है, उन दोनों में चेतना के अंशों का बड़ा अंतर है, तो क्या यही बात पेड़-पौधों, पत्थरों, पर्वतों की चेतना के अंशों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?
जब शहर में प्लेग फैल जाता है तो लाखों की संख्या में चूहों की हत्या की जाती है। जब कोई बाघ आदमख़ोर हो जाता है तो उसे बंदूक़ की गोली से मार गिराया जाता है। जब आप पैदल चलते हैं तो आपके जाने-अनजाने ही कितने ही कीट-पतंगे कुचलकर मारे जाते हैं। इनमें से किसी की भी तुलना "फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग" के तहत पशुओं को अमानवीय रूप से पालकर, क़त्लख़ानों में भयावह मशीनों से उनकी हत्या कर आपकी तश्तरी में भोजन की तरह प्रस्तुत किए जाने से नहीं की जा सकती, जबकि जीवन तो चूहों में भी था, आदमख़ोर बाघ में भी था, कीट-पतंगों में भी था और पेड़-पौधों में तो था ही। हत्या की मंशा, हत्या का प्रकार, ये सभी "न्यायशास्त्र" के अध्ययन का विषय होते हैं, जबकि मांसभक्षियों के तर्कों की तो पूरी बुनियाद ही अन्याय की लंपट लालसा के आधार पर टिकी होती है।

किसी बुद्धिमान व्यक्त‍ि ने एक बार कहा था कि आप किसी अबोध बच्चे को एक सेब और एक ख़रग़ोश दीजिए। अगर वह सेब के साथ खेलने लगे और ख़रग़ोश को मारकर खाने लगे तो मैं मान लूंगा कि मांसाहार स्वाभाविक है।
इसी पर मैं आगे यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अगर पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, जैसे पशुओं में होता है तो आप जिस तरह से अपने बच्चों को आम के बाग़ में ले जाते हैं, उसी तरह से उन्हें कभी क़त्लख़ानों में क्यों नहीं लेकर जाते?

शाकाहार क्यों ?

यह लेख मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण है। नैतिक या धार्मिक रूप से क्या सही है क्या नहीं का यह विश्लेषण नहीं। साथ ही लेख वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर है मेरी धारणाओं के आधार पर नहीं। लेख अंत तक पढ़ने पर ही समझ आएगा।
मनुष्य की जीभ में मात्र 5 स्वाद जानने की क्षमता होती है।
1.मीठा
2.कड़वा
3.खट्टा
4.नमकीन
5.माँस
मांस का स्वाद अजीनोमोटो से मिलता जुलता है।
और यह रिसेप्टर शाकाहारी मनुष्यों में और उनकी संतानों में भी होता है। और कई पीढ़ियों के शाकाहार के बावजूद मौज़ूद होते हैं।
6.उमामी...pungent..बेहद अज़ीब सा खट्टा स्वाद। टमाटर में होता है।
हमें जो अन्य सैकड़ों स्वाद मिलते हैं वे नाक,गले इत्यादि में मौज़ूद गंध के रिसेप्टर्स की वजह से मिलते हैं।
आप चाहेंगे मनुष्य के मांसाहार पर वैज्ञानिक लेख ??
मैं समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक गहरे अध्ययनों में ही देखता हूँ। शाकाहारी मांसाहारी को दुष्ट कहें और मांसाहारी शाकाहारी को कमज़ोर कहें इससे बात वहीँ रहती है। खुद को जान तो लें हम क्या हैं और क्यों हैं? ऐसे क्यों हैं? और क्या हमारे लिए सही होगा। होगा तो कैसे? क्या संभावित परिणाम होंगे बदलावों के...
लेकिन इस लेख को पढ़ना होगा खुले दिमाग से । पूर्व धारणाओं और मान्यताओं से कुछ देर के लिए दिमाग को खाली करके।
प्राकृतिक रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों,विकास क्रम के अध्ययनों से पता चलता है क़ि मनुष्य की सभी प्रजातियां कालांतर से Omnivorous रही हैं।(शाकाहार और मांस दोनों खाने वाली)।
मनुष्य जब विकसित हुए होमोसेपियंस से तब जो भी उर्ज़ा,प्रोटीन,फैट,विटामिन, मिनरल के लिए खाने योग्य मिलता खा जाते। आज के आधुनिक मनुष्यों के सभी पूर्वज मांसाहारी भी थे।
यही वजह है कि मनुष्य की जीभ में लाखों वर्षों के विकासक्रम  से पोषित मांस रिसेप्टर्स आज भी हैं। मनुष्य के अमाशय में मौजूद enzymes, आँतों की बनावट, आँतों में मौजूद पोषण सोखने वाले vili सभी में मांस से पोषण निकाल कर रक्त में डालने की क्षमता है। मनुष्य के canin एवं अन्य दांतों की बनावट शाकाहारी जीवों से भिन्न है और omnivoros से मिलती जुलती है।
मनुष्य के शरीर के लिए अत्यंत ज़रूरी कुछ तत्व आज भी सिर्फ पशु आहार में हैं। ज़ैसे,दूध,अंडा,चिकेन ,फिश इत्यादि में। वहीँ कुछ ज़रूरी तत्व सिर्फ शाकाहार में हैं। क्योंकि मानव omnivorous स्तनधारी पशु है जंगली सूअर की तरह। 
ज़ैसे विटामिन बी12, vitaminD, उच्च गुणवत्ता का आयरन, 
उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन इत्यादि सिर्फ पशु आहार में पाए जाते हैं। 
लेकिन इस बीच मनुष्य में नैतिकता और धार्मिकता का भी विकास हुआ। नैतिक रूप से मानवीय तर्क के रूप में किसी और जीव की हत्या पाप या गलत समझी जाने लगी। 
लेकिन उपरोक्त शारिरिक एवं भीतरी रसायनों की संरचना इस बात की व्याख्या है क़ि क्यों नैतिक भाषणों,नैतिक तर्कों, धार्मिक डर, पाप पुण्य की संभावना,मांसाहार पर उलाहना के बावजूद, संतों इत्यादि के बावजूद न सिर्फ पूरी दुनिया में वरन भारत ज़ैसे अहिंसा को मानने वाले देशों में तक ,बुद्ध के देशों में तक मांसाहारी मनुष्यों की तादात कहीं ज़्यादा है क्योंकि कोई भी मानवीय नियम कड़ी सजाओं के बावजूद प्राकृतिक नियमों से हमेशा हारते रहते हैं। 
लांतर में शारीरिक क्षमता के आधार पर देखें तो मांसाहारी
कौमों ने युद्ध ज़्यादा जीते हैं। हिंदुओं में भी राजा बनने वाले शक्तिशाली लोग मांसाहारी थे।
ओलंपिक में जीतने वाले ज़्यादातर लोग हों या नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सारे ज़्यादातर omnivorous थे।
साथ ही प्राकृतिक इकोसिस्टम के बैलेंस के लिए भी यह ज़रूऱी था। ज़ैसे शेर कुछ हिरनों को न खाये तो पूरे जंगल को बहुत से नुकसान होंगे। हिरनों के लिए ही घास न बचेगी।
लोगों को यह देखने की ज़रूरत है क़ि गाय या हिरन को शाकाहार सिखाने की ज़रूरत नहीं। वे नैतिक नहीं प्राकृतिक रूप से शाकाहारी हैं। शेर को कोई भी नैतिक भाषण दे शाकाहारी बना दे तो दरअसल प्रकृति के प्रति यह अनैतिक
बात ही होगी।
तो क्या मैं मांसाहार का समर्थक हूँ और मांसाहार को महिमामंडित कर रहा हूँ?
तो उत्तर है नहीं। मैं मात्र प्राकृतिक ,वैज्ञानिक सच आपको खुद अपने तन,मन,विकास और इतिहास के विषय में बताना चाहता हूँ।
और चाहता हूँ आज़ के परिवेश में लोग शाकाहार अपनाएं(दूध,अंडे छोड़ कर)।
क्यों अपनाएं?
आज मानव मूल्य, दया की भावना में प्रकृति प्रदत्त ही इज़ाफ़ा हुआ है। साथ ही मांस आज जीने के लिए खाना ज़रूरी नहीं प्रचुर मात्रा में अन्य खाद्य उपलब्ध होने की वजह से। साथ में सिर्फ मांसाहार में अच्छे से उपलब्ध शरीर के लिए आवश्यक तत्व ज़ैसे विटामिन B12, विटामिन डी,आयरन,प्रोटीन इत्यादि को ऊपरी तौर पर लिया जा सकता है शाकाहार में। ज़ैसे जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर शाकाहारी होकर भी बेहद फिट और मस्कुलर हैं।
फिर आज दूध और अण्डों का उत्पादन मनुष्य बेतहाशा बढ़ा पाया है। इनमें किसी प्राणी का क़त्ल और पीड़ा नहीं। साथ ही पोषक तत्व उच्च स्तर के हैं।
लेकिन दुनिया को साथ ही eco सिस्टम के बदलावों पर भी नज़र रखने होगी।
साथ ही एक महत्वपूर्ण आंकड़ा यह कि विकासशील और गरीब देशों में जब हम शाकाहार और मांसाहार की बहस कर रहे हैं हमारे 30 प्रतिशत बच्चे भूखे सो रहे हैं। अतः इतनी मात्रा में उच्च गुणवत्ता का शाकाहार हम कैसे पैदा करेंगे?
WHO ने आने वाले 30 वर्षों के बाद बढ़ती मानवीय जनसंख्या में खाद्दान्न की कमी से निपटने प्रोटीन युक्त कुछ कीड़ों की प्रजातियों पर काम करना शुरू किया है। सुनने में आज आपको यह अज़ीब लगेगा लेकिन क्या पता 100 वर्षों बाद इनके रेस्टॉरेंट खुल जाएं ,विज्ञापनों के साथ उन कीड़ों के।
मनुष्य ,ये धरती हमारे साथी जीव और पेड़ पौधे जीते रहेंगे अनवरत यही उम्मीद है और अगली पीढ़ियों को शुभकामनायें।

सोमवार, 29 मई 2017

पीपल , को सनातन संस्कृति में देववृक्ष क्यों माना जाता है !


पीपल , को सनातन संस्कृति में देववृक्ष माना जाता है !
स्कन्द पुराण में वर्णित है कि पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवता निवास करते हैं! आम प्रचलन में पीपल के मूल में ब्रह्मा , मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता रहा है ! सरल शब्दों में कहना हो तो आमजन के लिए पीपल भगवान विष्णु का स्वरूप है।श्री कृष्ण ने तो एक जगह यह भी कह दिया कि - समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ !शास्त्रों के जानकार से बात करे तो वो कहेंगे कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।इतने भारी भारी धार्मिक व्याख्यायों का ही कमाल था की गांव-देहात में कोई पीपल को काटने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ! ऐसा करके कौन पाप का भागीदार बनेगा ! अर्थात पीपल किसी भी सूरत में ना काटा जाये, इसके लिए भयंकर धार्मिक डर ,वो भी पुरातन काल से हरेक के मन में डाल दिया गया था ! ऊपर से आम लोक जीवन में यह भी कहलवा दिया गया कि पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी नष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति( मरणोपरांत मिलने वाली मुक्ति ) प्राप्त करते हैं। इन सब बातों का ही परिणाम था की हर कोई पीपल लगाने के चक्कर में रहता ! फलस्वरूप ये हुआ की हर गांव में एक नहीं अनेक पीपल होते ! यहाँ तक की पीपल से गांव की पहचान होती ! यही नहीं पीपल की नियमित पूजा होती ! जब अमावस्या (हिंदू कैलेंडर महीने के पन्द्रहवें दिन) हिन्दू कैलेंडर वर्ष में सोमवार को पड़ती , उस दिन सोमवती अमावस्या व्रत रखा जाता और पवित्र पीपल के पेड़ की १०८ बार परिक्रमा कर महिलाएं विशेष पूजन करती।ओफ्फ, कहाँ की ये सब पुराने ज़माने की बातें लेकर बैठ गया ,मैं भी ! ये सब ढकोसले हैं, मनुवादियों के चोचले ! कौन इन कर्मकांड में पड़े ! ये आधुनिक काल है ,अब इन मान्यतायों को कोई नहीं मानता ! किसके पास इतनी फुर्सत है ! आज की युवा जनरेशन ये सब नहीं जानती और जानना भी नहीं चाहती ! कुछ दिनों पहले तक तो पीपल का पेड़ सड़क निर्माण के बीच आ रहा होता तो उतना छोड़ कर सड़क आगे पीछे से निकाल ली जाती ! अब तो वो भी नहीं ! यूं तो अब पैसे लेकर पीपल काटने वाले भी मिल जाएंगे , और कुछ नहीं तो मशीन से काट दिया जाता है ! वैसे अब यह स्थिति आती ही नहीं , क्योंकि अब कोई पीपल लगाता ही नहीं और ना ही यह हमारे रास्ते में रोड़ा बन कर आता है ! कुछ एक जगह पर अगर कोई बूढ़ा पीपल आ भी गया तो उस की जड़ों को खोखला करने के कई नुस्खे हमे पता है ! धीरे से पीपल को मार कर पेड़ को गिरवा दिया जाता है ! क्या करें ,आजकल सीधी सड़क चाहिए , जिस पर हमारी तेज रफ़्तार गाडीयॉं सरपट दौड़ सकें ! वैसे भी शहरों में इतनी जगह कहाँ , जो इतना बड़ा पीपल लगाए , इतने में तो दो चार डुप्लेक्स बन जाएंगे ! गाड़ियों खड़ी करने की जगह नहीं बची और आप को पीपल के पेड़ की पडी है !  क्या कहा !! गाड़ीयों से प्रदूषण होता है ?? हाँ होता तो है , इसके समाधान के लिए अनेक विश्विद्यालय में शोध हो रहा है ! देश विदेश में पर्यावरण पर होने वाली अनेक कॉन्फ्रेंस में हमारे बड़े बड़े एक्सपर्ट हिस्सा ले रहे हैं ! सरकार सतर्क और सजग है ! हमारे मंत्री-अफसर कई विकसित देशो का दौरा कर रहे हैं, इस समस्या के हल को समझने के लिए !  अब ये सब बात करने वाली इस पीढ़ी को यह कौन बतलाये की हमारे पूर्वज , उन दिनों जब कोई गाड़ी नहीं होती थी कोई प्रदूषण भी नहीं था ,तब भी वो इस को लेकर जागरूक थे ! उन्हें पीपल की गुणों का पता था की पीपल ही एक ऐसा वृक्ष है, जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देता है,अर्थात वे बिना किसी किताबी शोध के जानते थे की पीपल एक प्रदूषण किलर है वो भी प्राकृतिक ! जिनका वर्णन उन्होंने अपने धार्मिक ग्रंथों में किया ! यही नहीं , इसके अनेक औषधीय गुण हैं जिन्हे विस्तार से समझाने के लिए श्लोको की रचना की गई ! वे यह भी जानते थे की अधिकांश आम जनता सूक्ष्म ज्ञान नहीं जानती और ना ही जानना चाहती है , उसे जैसा बता दिया जाये बस वही करती है, इसलिए उन्होंने पीपल को देवता बना कर पूजा करवा दी ! वैसे भी देवता कौन होते हैं, जो हमारे प्राणों की रक्षा करे, हमारे जीवनदाता हों ! अब पीपल से बड़ा जीवनदायक कौन हो सकता है और इसलिए पीपल हमारे विष्णु महेश बन गए ! पीपल प्राणवायु प्रदान कर वायु मण्डल को शुद्ध करता है सिर्फ इसी गुणवत्ता के कारण भारतीय शास्त्रों में इस वृक्ष को सम्मान मिला । हमारे पूर्वज जानते थे की पीपल के जितने ज्यादा वृक्ष होंगे,वायु मण्डल उतना ही ज्यादा शुद्ध होगा। इसलिए पीपल को काटने को धार्मिक रूप से निषेध करवाया गया , ऊपर से अधिक से अधिक लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया ! क्या कमाल की संस्कृति है, जहां हमारे देवता यूं सोचों तो काल्पनिक हो सकते हैं मगर हकीकत में देव गुण वाले ही हैं ! पीपल की तरह हमारे अनेक प्राकृतिक देवता आसमानी हवाहवाई नहीं हैं ना ही कोई अवतार या ईश्वर की संतान टाइप हैं बल्कि हकीकत में हमारे रक्षक हैं ! पीपल के गुणों को देखे तो यह वर्ण को उत्तम करने वाला, योनि को शुद्ध करने वाला और पित्त, कफ, घाव तथा रक्तविकार को नष्ट करने वाला है ! पीपल पूजने का प्रमुख कारण था की पीपल की छाया में ऐसा कुछ आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है, जिसके सेवन से शरीर स्वस्थ होता है और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है!  वृक्ष की अनेक परिक्रमा के पीछे कदाचित इसी सहज प्रेरणा का आग्रह है! पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया ! श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व श्रीकृष्ण इसी दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। बोधि वृक्ष बिहार राज्य के गया जिले में बोधगया स्थित महा बोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का वृक्ष ही है, जहां भगवान बुद्ध को बोध (ज्ञान) प्राप्त हुआ था ! 
                      जब प्रदूषण नहीं था तब भी प्रदूषण की इतनी चिंता थी और उसका जबरदस्त इंतजाम किया गया था ! उसके बारे में ग्रंथों कथाओं और परम्पराओं के माध्यम से संरक्षित किया गया ! इससे ठीक उलट , आज जब चारों और प्रदूषण ही प्रदूषण पैदा किया जा रहा है इस पर कोई बात नहीं करता ! अब कोई पीपल नहीं लगाता ! इसे लगाने के लिए किसी से कहे तो वो कहेगा की आज के बाजार के युग में इसे लगाने का क्या फायदा, कोई फल भी तो नहीं होता, ना ही इसकी लकड़ी किसी काम की , कोई भला ऐसा कोई काम कैसे कर सकता है जिसमे दो पैसे ना कमाया जा सके ! कितना अज्ञानी है आज का आदमी जिसे पीपल के अनमोल मोल का मूल्य ही नहीं पता ! वो उसकी पूजा क्यों करने लगा ! पीपल के गुणों को वो लोग क्यों पढ़ाना चाहेंगे जो इस देवभूमि को सपेरों का देश और यहां की समृद्ध संस्कृति को जंगली कहते नहीं थकते ! पी से पेप्सी के युग में पी से पीपल कौन पढ़ायेगा ! और अगर किसी ने अति उत्साह में आकर पढ़ाना चाहा तो उसे साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाएगा ! सेक्युलर देश में वेद ज्ञान पढ़ने से दूसरे धर्म खतरे में पड़ सकते हैं !यह सब बाते कितनी हास्यास्पद लगती है ! जबकि पीपल के पेड़ की ऑक्सीजन का कोई धर्म नहीं, ना ही उसके औषधीय गुण व्यक्ति में भेद कर सकता है ना ही उसकी छांव का कोई मजहब है ! लेकिन इस सांस्कृतिक जीवन दर्शन की महत्ता को ना तो वो लोग समझते हैं जिनका जीवन रेगिस्तान के सूखे में प्यासा भटकता रहा ना ही उनको जो बर्फ की भयंकर ठण्ड में जीवन की तलाश में इधर से उधर भागते रहे ! ये दोनों समूह इस देव् भूमि पर आये ही इसलिए की यहाँ भरपूर जीवन है जीवन का आनंद है धरती का यौवन है जिसका आनंद आदिकाल से आदिमानव लेता आया है ! जब तक इन बाहरी लूटेरों के आने के बाद भी हमने अपनी सभ्यता को बनाये रखा अपनी संस्कृति से जुड़े रहे अर्थात पीपल का पूजन करते रहे , तब तक चारो ओर खुशहाली थी और हम गुलाम होते हुए भी गुलाम नहीं थे ! जिसका फायदा हमारे साथ साथ ये बाहरी भी उठाते रहे ! आज जब हम राजनीतिक रूप से आजाद हैं मगर अपनी संस्कृति को छोड़ते ही हमारी हालात क्या हो चुकी है वो किसी से छिपी नहीं ! पेड़ को पूजने वाली संस्कृति जब से पेड़ काट कर क्रिसमस मनाने का उत्सव मानने लगी, हमारा पतन शुरू हुआ ! आज हमारे ऊपर पश्चिम की संस्कृति हावी है !अब हमारे साहित्य कला में पीपल नहीं होता, ना ही पीपल की पूजा के दृश्य किसी फिल्म में हो सकते हैं , ऐसा होने पर इनसे आधुनिक होने का सर्टिफिकेट छीन लिया जाता है ! 
ये कैसी आधुनिकता है, जहां जींस और टी शर्ट पहने युवक युवतियों को काला चश्मा पहनना तो समझ आता है मगर वे सड़क किनारे भरी दोपहरी में पेड़ की छावं जब नहीं पाते तो कही कुछ कमी है उसे जान नहीं पाते ! बिना पेड़ की छावं के , सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों मिनट में तप जाती है और उनकी आंखे किसी पीपल बरगद आम नीम जामुन के पेड़ को नहीं तलाशते ! इसके लिए क्या किसी विश्विद्यालय में पढ़ने की जरूरत है ? नहीं ! मगर यह जीवन ज्ञान अब घर परिवार में बाटने वाले बड़े बुजुर्ग भी नहीं रहे ! कोई जमाना था की सड़क किनारे पीपल के पेड़ अक्सर मिल जाते ! इन पेड़ो के पास अमूमन एक कुआ होता और साथ ही छोटा सा मंदिर ! यहां कोई थका हारा राहगीर छांव में दो पल सुस्ता लेता ! अब सड़क किनारे पेड़ लगाने का चलन नहीं है ! अब तो मॉल और ढाबे का कल्चर है ! इसलिए आज हर शहर प्रदूषित हैं !और जहां वातवरण ही प्रदूषित हो जाए वहा मानव जीवन कितना कष्टमय हो सकता है, किसी भी महानगर को देख ले ! हर शहर ने कैसे कैसे ओड इवन जैसे हास्यास्पद प्रयोग भी देखे मगर कोई हल नहीं निकला ! 
हमारी सारी समस्या का समाधान हमारी सनातन परम्परा से रचे बसे हमारी संस्कृति में है ! उसी के आधार पर अब एक साम्प्रदायिक सुझाव है ! शहर के चारो तरफ रिंग रोड बना कर सड़क के दोनों तरफ पीपल के पेड़ लगा दो। किसी किले की मजबूत दीवार की तरह ! और शहर वालो को कह दो की इन पेड़ों की पूजा करना ही उनका धर्म है ! और ऐसा करने पर जिसे अपना धर्म खतरे में नजर आये और जो सेक्युलर इस पर आपत्ति करे उसे हिन्दू ऑक्सीजन की जगह हिन्दू विरोधी जहरीली कार्बन डाई ऑक्साइड को निगलने का ऑप्शन दिया जा सकता है ! ऐसा करते ही उनका महान धर्म भी सुरक्षित रहेगा और वे भी दीर्घ आयु को प्राप्त होंगे !

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https://www.youtube.com/watch?v=UPUINf__sp8

शनिवार, 20 मई 2017

मोदी भक्तो और बिरोधियो दोनों धैर्य रखो

चाणक्य ने पहली बार जब मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर हमला किया (मतलब उनकी सेना ने) तो बुरी तरह मुंह की खायी और बामुश्किल जान बचाकर भागे। भागते भागते एक बुढ़िया की झोपडी में पनाह मिली और चूंकि वो भूखे थे तो वो गरमा गर्म खिचड़ी बना कर लायी। चाणक्य ने खिचड़ी में हाथ डाला और चिल्लाने लगे, खिचड़ी गर्म थी और अंगुलियाँ जल गयी थीं। बुढ़िया ने उन्हें धिक्कारते हुए कहा अरे मूर्ख तूने भी वही गलती करी है जो उस मूर्ख चाणक्य ने करी थी (बुढ़िया चाणक्य को जानती नहीं थी)। चाणक्य दंग रह गए और उस बुढ़िया से पुछा की माँ चाणक्य ने क्या गलती करी थी। बुढ़िया ने बताया कि उसने बिना आस पास के राज्यों को जीते हुए सीधे राजधानी पर हमला कर दिया और क्योंकि वो नन्द का सबसे सुरक्षित किला था इसलिए उसे हार देखनी पड़ी तो बेटा खिचड़ी पहले ठन्डे भाग यानि किनारों से खाओ। सीधे गर्म भाग में हाथ डालोगे तो मुंह की खाओगे। मतलब साफ़ है कि पहले अच्छी तरह घेर बंदी करो, कमजोर भाग अपने कब्जे में करो, खुद को मजबूत करो, दुश्मन को कमजोर करो और तब उसे अपने कब्जे में करो।
आज जब मैं इन so called भक्तों को देखता हूँ तो ये कहानी याद आती है। JNU ढहा दो, नक्सलियों को मारने में क्या प्रॉब्लम है? काश्मीर के आतंकवादियों को एकदम से क्यों नहीं मार देते? जैसे की नक्सली और आतंकवादी सामने से आकर कहते हैं कि लो मुझे मार दो!! जो लोग देश के खिलाफ नारे लगाते हैं उन्हें गोली से उड़ाने में क्या प्रॉब्लम है? जनाब संविधान के अनुसार किसी को भी सिर्फ इसलिए देशद्रोही नहीं माना जा सकता कि उसने देश के खिलाफ नारे लगाए हैं जब तक की उन नारों की वजह से हिंसा या पब्लिक disorder ना हो। काश्मीर के पत्थर बाजों को क्यों नहीं गोली मार देते? तो जनाब सुप्रीम कोर्ट का आर्डर है कि किसी भी तरह की मौत के लिए जो कि मिलिट्री फायरिंग से होती है उसमे FIR फाइल करी जायेगी और जांच local police करेगी। अब मुझे बताओ कि अगर आप के हाथ में बन्दूक दे दें तो क्या आप गोली चला पाओगे? ध्यान रहे किसी भी मौत के लिए आप को prove करना होगा कि आप क़ी गलती नहीं है। वैसे पिछली सरकार एक कानून भी बनाकर गयी है कि अगर सामने वाले के हाथ में हथियार है तब भी आप उसका उपयोग नहीं कर सकते जब तक कि सामने वाला आतंकवादी गोली न चलाये!! तो क्या करना चाहिए? अब सरकार पैलेट गन का विकल्प लायी (ध्यान रहे ये इसी सरकार ने किया है) तो माननीय न्यायालय ने पानी की बौछार का विकल्प सुझाया... आगे आप खुद समझदार हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि JNU को बंद करने में क्या प्रॉब्लम है? भारत के खिलाफ बोलने वाले पत्रकारों को जेल में क्यों नहीं डाल देते? तो जनाब JNU और ये दल्ले पत्रकार प्रॉब्लम नहीं हैं ये सिर्फ mouth piece हैं जिनका काम लोगों को और सरकार को सिर्फ उलझाना है असली प्रॉब्लम है चाइना, पकिस्तान का nexus, अरब देशों और वेस्टर्न कन्ट्रीज से आ रहा धन जो कि conversion, terrorism और naxalite activities में use होता है और देश के विकास ने बाधक बनता है। इसीलिए सरकार ने पहला कदम इन NGOs को बंद करने का लिया जिनके मार्फ़त ये धन आता था। आप की समझ में ना आये तो अलग बात है वैसे नोट बंदी भी उसी योजना का एक हिस्सा भर थी।
हमारे यहाँ कुछ शूरवीर ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि विकास होता रहेगा पहले पाकिस्तान को सबक सिखाओ। ये वो ही शूरवीर हैं जो कि 4 एटीएम withdrawl के बाद 20 रुपया शुल्क लगने से चिल्लाने लगते हैं कि हाय हाय हम मर गए हमें नहीं चाहिए ऐसी सरकार जो गरीबों के पेट पर लात मारती हो। ये लड़ेंगे युद्ध? वैसे इन समझदारों को पता नहीं कि युद्ध लड़ने से पहले बहुत तैय्यारी करनी पड़ती है, देश में गोलाबारी का पर्याप्त स्टॉक होना चाहिए, अच्छे टैंक, विमान और सैनिकों के पास अच्छी गन होनी चाहिए जो कि पिछली सरकार की कृपा से न्यूनतम से भी नीचे पहुँच गया था। कुछ लोग कहते हैं की फोड़ दो पाकिस्तान पर परमाणु बम जो होगा देखा जाएगा। ये वो महानुभाव हैं जो की बैंक की लाइन ने अगर 4 घंटे खड़े रहें तो इन्हें चक्कर आ जाते हैं और परमाणु युद्ध इन्हें बच्चों का खेल लगता है। वैसे इन्हें ये भी नहीं पता कि अगर हिन्दुस्तान पाकिस्तान आपस में परमाणु युद्ध लड़कर तबाह हो गए तो चाइना कितनी आसानी से हमारे ऊपर कब्ज़ा कर लेगा। खैर फेसबुक पर शूरवीर बनने में क्या जाता है इसमें तो ATM withdrawl का 20 रुपया भी नही लगता और अगर लगने लग जाए तो ये शूरवीर यहाँ से भी गायब हो जायेंगे और बोलेंगे नहीं चाहिये युद्ध मुझे मेरे 20 रूपये वापस दो!!
खैर ये तो हुई problem अब solution क्या है और इस सरकार और पिछली सरकार में फर्क क्या है? फर्क है नीयत का और कार्यान्वन का। ये सरकार देश में अवैध धन लाने वाले 13000 NGO को बंद करती है। ये सरकार देश में राफेल विमानों को लाती है जो की दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमान (या उनमे से एक है), डिफेन्स procurement को फ़ास्ट ट्रैक करती है। सैनिकों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट, नाईट विज़न और बढ़िया क्वालिटी के हेलमेट खरीदती है, उनके लड़ने के लिए लेज़र और बेहतर क्वालिटी की गन खरीदती है। नयी तोपें खरीदी जाती हैं जो कि पिछ्ले 30 सालों में नहीं हुआ था। इजराइल से समझोते किये जाते हैं ताकि युद्ध की स्थिति में गोला बारूद की आपूर्ति निर्बाध जारी रहे। इरान और अफगानिस्तान में बेस बनाए जाते हैं कि जिससे युद्ध की स्थिति में दूसरा मोर्चा खोला जा सके। चाइना बॉर्डर पर ब्रहोस (परमाणु क्षमता वाली) नियुक्त की जाती है और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाता है। चाइना के खिलाफ उसके पड़ोसी देशो से समझोते किये जाते हैं ताकि युद्ध की स्थिति में उसे बाँधा जा सके। श्रीलंका में favorite govt लाई जाती है (ये नहीं समझ सकते कि कैसे तो जाने दो)। और हाँ देश में तेल रिज़र्व भी बनाया जा रहा है जिससे कि किसी भी आपात स्थिति का सामना करा जा सके क्योंकि देश तेल के लिए अरब कन्ट्रीज पर निर्भर है जो कि अभी तक पाकिस्तान के साथ रहे हैं। मोदी इन्हें भी अपने साथ लाने का प्रयास कर रहा है और इसीलिए विदेश भी जाता है। एक बात और,इन सब चीज़ों के पैसे लगते हैं फ्री में नहीं आतीं और इसीलिए तेल के दाम भी अभी कम नहीं होंगे और ना ही टैक्स अभी कम होंगे।
पोस्ट बहुत लम्बी हो गयी है तो संक्षेप में मोदी खिचडी खाने वाला वयक्ति है, जो ठंडा करके खा रहा है क्योंकि हमें गलती करने पर दुबारा मौका नहीं मिलेगा इसलिए पहली बार में ही लडाई जीतनी है। और हाँ सीधी लड़ाई से बचा जाएगा और पकिस्तान को टुकड़ों में बांटा जाएगा लेकिन सीधी लड़ाई की तैय्यारी भी पूरी रखेगा और जब तक तैयारी पूरी न हो कुछ बड़ा नहीं होने वाला। सीमा पर छोटीमोटी मुठभेड़ जारी रहेंगी। हमारे कुछ सैनिकों को वीरगति भी प्राप्त होगी और कश्मीर भी सुलगता रहेगा। ये दल्ले पत्रकार भी गला फाड़कर चिल्लाते रहेंगे, JNU की झोला छाप intellectual class भी शोर मचाएगी यानी कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा (बल्कि ज्यादा चिल्लायेंगे)। लेकिन मोदी पर कोई असर नहीं पड़ेगा वो बिलकुल चुपचाप रहेगा और अपना काम करता रहेगा। इन सब की चिल्ली पौं का काम तमाम एक झटके में होगा तब तक आप की मर्ज़ी है कि आप भी इनकी तरह से शोर मचाएंगे या चुपचाप बैठकर तमाशा देखेंगे (क्योंकि ना मेरे ना आप के हाथ ने कुछ है और ना ही इन लोगों के)।
हाँ एक बात और आप अपना वोट 2019 में किसी भी पप्पू, टीपू, केजरीवाल या ममता बनर्जी को देने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन मेरा वोट सिर्फ मोदी को है क्योंकि ना मैं देश को बंगाल बनते देखना चाहता हूँ, ना आज का UP, ना बिहार और ना ही आज के जैसी दिल्ली। मैं देखना चाहता हूँ एक सशक्त भारत और उसके लिए मैं इंतज़ार करने को तैयार हूँ। मेरे लिए पकिस्तान के दस, सौ या फिर हज़ार सैनिको के सर से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी सम्पूर्ण हार है और मैं उस बड़ी जीत के लिए इंतज़ार करने को तैयार हूँ। मैं एक बहुत modest background से हूँ और मुझे पता है कि जब अपनी नींव कमजोर होती है तो उसे भरने में कितना समय लगता है और कमजोर नींव पर बने महल कैसे भरभरा कर गिर जाते हैं, तो मैं ये समय मोदी को देने के लिए तैयार हूँ।
- जय हिन्द

मंगलवार, 16 मई 2017

मोदी जी आपने तीन साल में क्या किया ?

ढाई साल में 66 वर्ष का युवा  ,8000 किमी के हाइवे बनवाकर,50 लाख मकान बनवाकर
करोडो शौचालय बनवाकर 6 नए एम्स बनवाकर 3 नयी पनडुब्बियां बनवाकर तेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवाकर धनुष तोप दिलाकर Orop देकर सर्जिकल स्ट्राइक करके तीनो सेना को मजबूत बना कर
65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बनाकर चीन को पीछे छोड़कर विकास दर 7.5के ऊपर ले जाकर
महगाई 5 से नीचे लाकर फसल बीमा देकर 12 रु में 2 लाख का बीमा देकर नोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करके राफेल विमान का सौदा करके सऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा के
बुरहान वानी को ऊपर पहुचा के अलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके। बस सब की गालियाँ खाता है।
जो काम करता है, वो कभी ये नहीं कहता कि काम बोलता है क्योंकि काम दिखता है।
 मोदी जी आप को "शर्म" आनी चाहिए कि आपने  "अपने परिवार" और  अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई" !!
*"मोदी जी"* आप को "शासन चलाने" की कला *"मुलायम सिंह"* से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज *"उत्तर प्रदेश"* में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही *"मुलायम सिंह"* जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज *"करोडपति"* ही नहीं *"अरबपति"* हैं !!
"30 वर्ष" पहले *"बहन मायावती"* का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज *"मायावती के भाई"* का "बंगला" सुन्दरता में *"ताज महल"* को भी "मात" दे रहा है !!
*"देवगोडा"* अपने "पोते" को *"100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म"* में बतौर *"सुपर हीरो"* उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन *"देवगोडा परिवार"* की है !!
*"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया"* का "बेटा" जो "सरकारी अस्पताल" में *"मुख्य चिकित्सक"* है और *"छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं*
*"सोनिया का दामाद"* जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज *"पांच सितारा होटल" का "मालिक"* है, उसका *"शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है* !!
जबकि *"आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है* !!
*"मोदी जी"* देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के *"जीजा",* "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, *आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं* "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और *"प्रधानमंत्री"* का "आधा कार्यकाल", *"दिल्ली"* में बिताने के बाद भी आप *"लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती"* से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं !!

उपरोक्त बातो से हमे *"शर्मिंदा"* तो होना पड़ा लेकिन उतना ही *"गर्व"* भी है कि हमने अपने जीवन का *"पहला वोट" , "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तब्यनिष्ठा" की "पराकाष्ठा" है*