सोमवार, 19 जून 2017

RSS और स्वतंत्रता संग्राम : तथ्य एवं मिथ्या प्रचार


जिस तरह नई दुल्हन चूड़ी की आवाज़ अधिक करती है, नए नए मुल्ले या पंडित की आवाज़ तेज ही होती है, उसी तरह हाल ही में बुद्धिजीवी होने का एक नया चलन पैदा हो गया है, और वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके नेताओं के बारे में झूठ फैलाना, झूठा प्रचार करना!
अक्सर सेकुलर बुद्धिजीवियों के मुँह और कलम से आपने सुना-पढ़ा होगा कि, “बताओ, RSS ने आज़ादी के आन्दोलन में क्या किया?”... “अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में RSS तो चुप्पी साधे बैठा था...” इत्यादि.
कहा गया है कि “हेडगेवार, स्वतंत्रता सेनानी, एक स्वयंसेवक थे और उन्हें खिलाफत आन्दोलन में उनकी भूमिका के लिए एक वर्ष की सजा हुई थी, और वे आख़िरी बार स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए थे. (1919-1924) जबकि वर्ष 1930 में, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शुरुआत करने के पांच वर्ष के बाद महात्मा गांधी द्वारा आरम्भ किए गए वन सत्याग्रह के चित्रों में उन्हें देखा जा सकता है. वर्ष 1930 में जब संघ केवल पांच वर्ष का ही था, तो कॉंग्रेस ने घोषणा की कि वह 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाएगी, क्योंकि एक ही वर्ष पहले कॉंग्रेस ने वर्ष 1929 तक पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने का संकल्प पारित किया था. इसके बाद डॉ. हेडगेवार ने सभी संघ पदाधिकारियों को लिखा था:
“....कॉंग्रेस ने स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया है और कॉंग्रेस कार्यकारी समिति ने घोषणा की है कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा. हम सबके लिए आह्लादित होना बहुत ही स्वाभाविक है क्योंकि यह अखिल भारतीय राष्ट्रीय इकाई अपने स्वतंत्रता के लक्ष्य के एकदम नज़दीक आ गयी है. इसलिए यह हमारा उत्तरदायित्व है कि उस संस्था के साथ कार्य करें, जो उद्देश्य को हासिल करने की तरफ कदम उठा रही हैं..”. आरएसएस की सभी शाखाओं को शाम को छः बजे इकट्ठा होने के लिए आदेश दिए गए और राष्ट्रीय ध्वज को नमन किया, जो उस समय केसरिया रंग का ध्वज था. स्वतंत्रता क्या है? और कैसे इसके लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है? शाखाओं में चर्चा का मूल बिंदु यही था. चूंकि हमने कॉंग्रेस के इस लक्ष्य को स्वीकार कर लिया है, तो पार्टी को इसके लिए बधाई देनी चाहिए. इस कार्यक्रम की रिपोर्ट हमें भेजी जानी चाहिए”.... (सन्दर्भ :- डॉ. हेडगेवार का 21 जनवरी 1930 को लिखा गया पत्र, राकेश सिन्हा, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, प्रकाशन विभाग, 2015 पृष्ठ 95)
जो सेकुलर बुद्धिजीवी केसरिया ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज पुकारे जाने की आलोचना करते हैं, उन्हें याद दिला जरूरी है कि एक ही वर्ष उपरांत अर्थात अप्रेल 1931 में, कॉंग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति को नियुक्त किया था, जिसमें मौलाना आज़ाद भी सम्मिलित थे, और इसी समिति ने निम्न शब्दों के साथ राष्ट्रीय ध्वज के रूप में केसरिया ध्वज को स्वीकारने की अनुशंसा की थी. “....हमें लगता है कि ध्वज को विशेष, कलात्मक, आयताकार और असाम्प्रदायिक होना चाहिए. इस बारे में हमारा विचार एकदम स्पष्ट है कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज का एक ही रंग होना चाहिए. अगर कोई एक ऐसा रंग है जो भारत को एक पूर्ण रूप से बाँध सकता है, जो सभी भारतवासियों में एकता के भाव को उत्पन्न कर सकता है और जो एक प्राचीन परम्परा से जुड़ा हुआ है तो वह है केसरिया रंग....”. लेकिन जैसे-जैसे गांधी-नेहरू का प्रभाव कांग्रेस पर बढ़ता गया, केसरिया ध्वज तिरंगे में बदलता चला गया.
यह बात सही है कि एक संगठन के रूप में संघ ने कभी भी खुद को आन्दोलनकारी राजनीति से बहुत अधिक नहीं जोड़ा. कॉंग्रेस के अधिकतर आन्दोलन से संघ दूर ही रहा, बल्कि साथ ही संघ ने हिन्दू महासभा के आन्दोलन में भाग नहीं लिया. यहाँ तक कि जब हिन्दू महासभा ने निज़ाम के खिलाफ आन्दोलन की शुरुआत की तो, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस आन्दोलन में भाग लेने से इनकार कर दिया. पुणे से हिन्दू महासभा के एक सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस कदम से बहुत ही क्रोधित हुए. उनका नाम था नाथूराम विनायक गोडसे. वे आरएसएस को हिन्दू ऊर्जा को गलत दिशा में मोड़ने के लिए हमेशा कोसते थे. हालांकि उनके मन में संघ के लिए, और वीर सावरकर के लिए मन में बहुत आदर था. 8 अप्रेल 1940 को पुणे में आरएसएस के एक प्रमुख नेता भानुराव देशमुख ने हिन्दू महासभा के अतिवादी तत्वों को जबाव दिया कि :- “सबसे पहले तो मैं इन खुराफाती हिन्दुओं को यह कहना चाहूंगा, कि आरएसएस न तो हिन्दुओं की कोई सेना है और न ही हिन्दू महासभा की सैन्य शाखा है. संघ का कार्य हिन्दू राष्ट्रवादियों को सही अर्थों में बनाना है....”. यह नोट करना बहुत ही रोचक होगा कि हालांकि कॉंग्रेस और हिन्दू महासभा के व्यक्तिगत नेता, आरएसएस के अनुशासन, उसमें अस्पृश्यता के न होने और इसके द्वारा दी जा रही सेवाओं के लिए उसकी प्रशंसा करते थे और दोनों ही संगठन संघ को अपने नियंत्रण में करना चाहते थे. जब संघ ने कांग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों के ही इशारे पर चलने से इंकार कर दिया, तो दोनों ही संगठनों ने संघ पर साम्प्रदायिक और हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगा दिया.
बोस और हेडगेवार संघ के राजनीतिक रूप से सीधे न जुड़े होने के बावजूद संघ किसी भी राजनीतिक आन्दोलन की मदद करने को हमेशा तैयार रहता था, बशर्ते यदि भारत के कल्याण के लिए कार्य कर रहा हो, और वह उनकी मदद अपने कैडर देकर या उन्हें तमाम सुविधाएं प्रदान करने के द्वारा करता था. त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती (1889–1970) एक बंगाली क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्रामी थे. वे हेडगेवार जी से मिले जिन्होंने उनसे वादा किया कि संघ उन्हें भविष्य के आंदोलनों के लिए अपने कैडर प्रदान करेगा. (सन्दर्भ :- सत्यव्रत घोष, रेमेम्बरिंग अवर रेवोल्युश्नरीज़, मार्क्सिस्ट स्टडी फोरम 1994 पृ.57). संघ ने क्रांतिकारी राजगुरु की भी मदद की थी जब वे निर्वासन में थे. छिछले स्तर की राजनीति करने वाले कई कांग्रेसी नेताओं ने वर्ष 1934 में यह संकल्प पारित किया कि उनके सदस्य, आरएसएस के सदस्य नहीं बन सकते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. कंचनमोय मजूमदार बताते हैं कि कांग्रेस के द्वारा इस प्रकार की घोषणा जारी होने के बाद सुभाष बोस ने हेगडेवार को कई बार सन्देश भेजा और शायद यह सशस्त्र विद्रोह के लिए था. ‘मॉडर्न रिव्यू’ (मार्च 1941) के अनुसार डॉ. हेगडेवार की मृत्यु 51 वर्ष की आयु में हाई ब्लड प्रेशर के कारण नागपुर में हुई थी. उनकी मृत्यु से एक दिन पहले ही सुभाष चन्द्र बोस उनसे मिलना चाहते थे.
हेडगेवार के बाद आए गुरूजी गोलवलकर राजनीति में हेगडेवार से अलग प्रवृत्ति के थे. जहां एक तरफ डॉ. हेगडेवार कलकत्ता आधारित क्रांतिकारी समूह अनुशीलन समिति से आए थे, तो वहीं गोलवलकर ने आध्यात्मिक प्रेरणा स्वामी अखंडानन्द से ली थी. स्वामी जी को मानवता के प्रति उनकी सेवाओं के लिए जाना जाता है. गोलवलकर जी के गुरु श्री रामकृष्ण के सीधे शिष्य थे. वे अकाल में एक मुस्लिम लड़की की स्थिति से बहुत ही विचलित हो गए थे और उन्होंने अपनी तीर्थयात्रा छोड़कर उसी गाँव में सेवा करने का प्रण ले लिया था. गोलवलकर ने राजनीति छोड़ दी थी. वे संघठन निर्माण में विश्वास रखते थे. यह वह समय था जब देश के परिदृश्य की राजनीति बदल रही थी. विभाजन की धमकी अब हकीकत बनने लगी थी. भारत छोडो आन्दोलन के साथ ही पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल के क्षेत्रों के हिन्दुओं और सिक्खों के भाग्य भी खटाई में पड़ गए थे.
विभाजन की स्थिति में, जिसमें कांग्रेस के तमाम नेताओं के प्रयासों के बावजूद पश्चिमी पंजाब के हिन्दू और सिख और पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं और सिखों की स्थिति बहुत ही दुखदायी होने वाली थी और उनकी रक्षा करना बहुत जरूरी था. तो गुरूजी गोलवलकर को संगठन के विस्तार की आवश्यकता महसूस हुई. चूंकि संघ की निंदा करने वाले यह बात करते हुए नहीं थकते, कि गोलवलकर यह मानते थे कि अंग्रेजों के पास संघ पर प्रतिबन्ध लगाने का कोई कारण नहीं होना चाहिए. गुरूजी गोलवलकर के एक वक्तव्य को तोड़ मरोड़ कर 1942 के आन्दोलन के संबंध में न केवल पहले, बल्कि आज तक लिखा जा रहा है, जैसे द वायर में लिखा है “वर्ष 1942 में कई लोगों के दिल में यह था कि संघ निष्क्रिय लोगों का एक संघठन है, उनकी बातें बेकार हैं... न केवल बाहरी बल्कि हमारे वोलंटियर भी इसी तरह की बात करते हैं...” मगर यह वाक्य दो महत्वपूर्ण वाक्यों को छोड़ देता है, कि “इस समय भी संघ का नियमित कार्य चालू है. संघ ने सीधे तौर पर कुछ न करने का फैसला किया है.” संघ की परिचालन टीम ने कुछ भी सीधे न करने का फैसला लिया था. ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट का भी यह कहना था कि उन्हें कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि संघ संघटन के रूप में 1942 के आन्दोलन में जुड़ा था. और न ही पुलिस को कोई ऐसा सबूत मिला जिससे यह पता चला कि संघ कार्यालय में अंग्रेजों के खिलाफ कोई भाषण दिया जाता है. संघ की शुरू से यही कार्यशैली थी, कि वे जनता के बीच चुपचाप काम करते थे और कभी भी खुलकर सामने नहीं आते थे. जनता के बीच से निकलने वाले जन-नायकों की मदद करना और उन्हें हरसंभव संसाधन उपलब्ध करवाना संघ की पहचान तब भी था, और आज भी स्थिति वही है.
ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पुणे में संघ के एक प्रशिक्षण शिविर में 27 अप्रेल 1942 को गोलवलकर ने उन लोगों की निंदा की, जो निहित स्वार्थवश अंग्रेजी सरकार की मदद कर रहे थे. 28 अप्रेल 1942 को उन्होंने घोषणा की कि चाहे कुछ भी हो जाए, संघ अपने क़दमों से पीछे नहीं हटेगा और उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे देश की सेवा करने के लिए हमेशा तैयार रहें और देश हित में कुर्बानी भी दें. (सन्दर्भ :- No.D. Home Pol. (Intelligence) Section F. No. 28 Pol). गृह विभाग की एक और रिपोर्ट जबलपुर में होने वाले संघ के सम्मेलन में अंग्रेज विरोधी माहौल को दिखाती है, जिसमें यह दावा किया गया है कि संघ का उद्देश्य था अंग्रेजों को भारत से बाहर करने का और इस बात को कई वक्ताओं द्वारा दोहराया गया. अच्युत पटवर्धन, नाना पाटिल और अरुणा आसफ अली भारत छोडो आन्दोलन के कुछ मुख्य चेहरे थे जो अपने संघर्ष के दौरान संघ के महत्वपूर्ण नेताओं के घरों में रुके थे. कई क्रांतिकारियों को संघ से बहुत जरूरी संसाधन सहायता मिली थी. अरुणा आसफ अली ने, लाला हंसराज गुप्ता के घर पर शरण ली थी और नाना पाटिल की रक्षा पंडित दामोदर सत्वलकर ने की थी... जबकि गुरूजी भाऊसाहेब देशमुख और बाबासाहेब आप्टे के घर पर रुके थे.
16 अगस्त 1942 को महाराष्ट्र में चिमूर में संघ के कई नेताओं ने प्रत्यक्ष रूप से भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया था जिसका परिणाम अंग्रेजों द्वारा दमन था. दादा नायक जो चिमूर की संघ की शाखा के प्रमुख भी थे, उन्हें अंग्रेजों द्वारा मृत्यु दंड दिया गया था. हिन्दू महासभा नेता डॉ. एनबी खरे ने इस मामले को अधिकारियों के समक्ष उठाया. रामदास रामपुरे एक और संघ के नेता को अंग्रेजों के द्वारा गोली मारी गया थी. गोपनीय रिपोर्ट में इन दोनों नेताओं को इन विद्रोहों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. जिनमें से एक थे दादा नायक जो हालिया अवरोधों के पीछे काफी हद तक थे और दूसरे थे संत तुकडोजी महाराज जो संघ से जुड़े थे, और जिन्हें चिमूर में हिंसा के लिए जिम्मेदार माना गया था. बाद में संत तुकडोजी महाराज विश्व हिन्दू परिषद के एक सह संस्थापक बन गए थे. संत तुकडोजी महाराज को, संत गाडगे महाराज के साथ देखा जा सकता है... दोनों ही सामाजिक सुधारक थे. तुकडोजी महाराज संघ के साथ जुड़े हुए थे और उन्हें अंग्रेजों ने निशाना बनाया था, वे न केवल भक्ति गीत गाते थे बल्कि वे अंग्रेजों के खिलाफ भी एक आन्दोलन का हिस्सा थे. वे स्वच्छता की आवश्यकता के लिए भी भजन गाते थे. यदि कोई इसे संघ का योगदान नहीं माने, तो न सही.
एक और झूठ बहुत ही ज्यादा फैलाया जाता है, कि अंग्रेजों को गुरु गोलवलकर ने कभी भी भारत की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया. जबकि हकीकत में संघ के प्रमुख के रूप में, उन्होंने हिन्दू समाज की समस्याओं के लिए बाहरी संस्थाओं और यहाँ तक कि संघ पर सीधे आरोप नहीं लगाया. उदाहरण के लिए, धर्मांतरणों के मामलों में उन्होंने मुस्लिमों और ईसाइयों पर आरोप लगाने से मना किया. इस संदर्भ में उनका कहना था कि हमारे कई स्वयंसेवक अपनी कमियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार मानते हैं. कुछ राजनीतिक स्थितियों पर तो कुछ ईसाइयों और मुस्लिमों की गतिविधियों पर आरोप लगाते हैं. मैं अपने कार्यकर्ताओं से आग्रह करूंगा कि वे अपने दिमाग से ये सभी बातें हटाएं और अपने लोगों और धर्मों के लिए सही रूप में कार्य करें, जरूरतमंदों की मदद करें और जहाँ भी वे किसी को गिरा हुआ देखें, उनकी मदद करें. [Bunch Of Thoughts, P.277]
जब नेहरु के द्वारा संघ पर लगाया हुआ प्रतिबन्ध टिक नहीं पाया, और उसे उठा लिया गया तो गुरूजी ने नेहरू से क्रोधित अपने कार्यक्रताओं से कहा “अपने मन में उन लोगों के लिए कडवाहट न आने दो, जिन्होनें तुम्हारे साथ अन्याय किया है. अगर दांत जीभ को काटेंगे तो क्या हम दांतों को बाहर खींच लेंगे? यहाँ तक कि जिन्होनें अन्याय किया है वे भी हमारे ही लोग हैं, तो हमें भुलाना आना चाहिए. वायर के लेख ने गुरु गोवलकर के विचारों को बंगाल के अकाल से जोड़ा है. यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि बंगाल के अकाल के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो हिन्दू महासभा के नेता और संघ के नज़दीकी थे, वे कई राहत केन्द्रों के माध्यम से अकाल से लड़ रहे थे. मधुश्री मुखर्जी ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की दर्द को बहुत ही मुखर रूप में बताया है. अंग्रेजी इतिहासकार जेम्स हार्टफील्ड ने इस बात को इंगित किया है कि मुखर्जी ने किसानों को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे अपनी फसल को सरकारी दलालों को न भेजें, और कहा कि अधिकारियों ने सारा अनाज सेना के लिए और निर्यात के लिए ले लिया है. उन्होंने यह भी बताया कि बोस के कई समर्थक श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा संचालित राहत केन्द्रों में काम कर रहे थे.
राजनीति से आगे बढ़कर काम करने की उनकी क्षमता तब शिखर पर पहुँची जब चीनी आक्रमण के दौरान उन्होंने सरकार की आलोचना के स्थान पर उनके साथ खड़े होने की घोषणा की. महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा “हम सौ और पांच हैं.” चीनी हमले पर नेहरू की गलतियों को बताने वाले धारावाहिक को रोकने से बुद्धिजीवी और इतिहासकार सीताराम गोयल, संघ के आलोचक बन गए. हालांकि चीन से युद्ध के समय और उसके बाद RSS ने जो सेवाएं भारतीय सेना को दीं, उसने नेहरू को संघ के प्रति विचार बदलने पर विवश कर दिया. प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वे अपने देश की एक अंगुल भर जमीन भी नहीं देंगे, और उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में बुलाया था.
संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान RSS ने अपना अधिकाँश कार्य स्वतन्त्र रूप से और परदे के पीछे रहकर चलाया. क्रांतिकारियों को मानव संसाधन की आपूर्ति की तथा हिन्दू महासभा के अतिवादी रवैये से खुद को दूर रखा. यह कहना एकदम साफ़ झूठ है कि संघ ने अंग्रेजों के खिलाफ तटस्थता बनाए रखी, ऐसा कोई सबूत या तथ्य कहीं नहीं मिलता है. 1930 में ही हेडगेवार जी द्वारा स्वतंत्रता की तारीख संबंधी कांग्रेस के प्रस्ताव को खुला समर्थन दिया गया... परन्तु वास्तविकता यह थी कि कांग्रेस और उसके तत्कालीन नेता, संघ की, सुभाषचंद्र बोस की, गुरूजी गोलवलकर की बढ़ती शक्ति से घबराए हुए थे, इसलिए मिथ्या प्रचार करके इन्हें बदनाम करना जरूरी था... आज भी ऐसा ही हो रहा है... लेकिन तमाम षड्यंत्रों के बावजूद उस समय भी संघ आगे बढ़ता गया... आज भी ऐसा ही हो रहा है.
Written by मूल लेखक : अरविन्दन नीलकंदन
अनुवाद - सोनाली मिश्र
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संदर्भ:
- Dina Nath Mishra, RSS: Myth and Reality, Vikas Publishing House, 1980
- Kavita Narawane, The Great Betrayal, 1966-1977, Popular Prakashan, 1980
- C.P.Bhishikar, Shri Guruji, Pioneer of a new era, Sahitya Sindhu Prakashana, Bangalore, 1999
- Kanchanmoy Mojumdar, Saffron versus green: communal politics in the Central --Provinces and Berar, 1919-1947, Manohar, 2003
- James Heartfield, Unpatriotic History of the Second World War , London, Zer0 Books, 2012
- Rakesh Sinha, Builders of Modern India: Dr. Keshav Baliram Hedgewar, Publications Division, 2015
साभार -- desiCNN

भारतीय मुस्लिमों के हिन्दू पूर्वज : इस्लामी अत्याचारों की गाथा


हाल ही में एक फोरम पर किसी युवा मित्र ने पूछा कि कश्मीर में मारे जा रहे आतंकियों का उपनाम "भट", "बट", "वानी", "गुरू" किस तरह से है? इसी प्रकार देश के कई भागों में मुस्लिम गुर्जर, मुस्लिम जाट तथा "पटेल" उपनाम वाले मुसलमान कैसे पाए जाते हैं? असल में उसे यह जानकारी नहीं थी कि 99 प्रतिशत "भारतीय मुसलमानों" के पूर्वज हिन्दू थे।
आज भी उनके उपनाम और व्यवसाय वही हैं, जो वे चार-पाँच-दस पीढी पहले किया करते थे, इसीलिए कई स्थानों पर मुस्लिमों के केवल उपनाम ही नहीं, बल्कि नाम भी हिन्दुओं से मिलते-जुलते देखे गए हैं... फिर सवाल उठता है कि ये लोग स्वधर्म को छोड़ कर कैसे मुसलमान हो गये? अधिकांश हिन्दू मानते हैं कि उनको तलवार की नोक पर मुसलमान बनाया गया अर्थात् वे स्वेच्छा से मुसलमान नहीं बने। मुसलमान इसका प्रतिवाद करते हैं। उनका कहना है कि इस्लाम का तो अर्थ ही शांति का धर्म है, बलात धर्म परिवर्तन की अनुमति नहीं है। यदि किसी ने ऐसा किया अथवा करता है तो यह इस्लाम की आत्मा के विरुद्ध निंदनीय कृत्य है। अधिकांश हिन्दू मुसलमान इस कारण बने कि उन्हें अपने दम घुटाऊ धर्म की तुलना में समानता का सन्देश देने वाला इस्लाम उत्तम लगा।
इस लेख में हम इस्लमिक आक्रान्ताओं के अत्याचारों को सप्रमाण देकर यह सिद्ध करेंगे की भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे एवं उनके पूर्वजों पर इस्लामिक आक्रान्ताओं ने अनेक अत्याचार कर उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया था। अनेक मुसलमान भाइयों का यह कहना हैं कि भारतीय इतिहास मूलत: अंग्रेजों द्वारा रचित हैं। इसलिए निष्पक्ष नहीं है। यह असत्य है। क्यूंकि अधिकांश मुस्लिम इतिहासकार आक्रमणकारियों अथवा सुल्तानों के वेतन भोगी थे। उन्होंने अपने आका की अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखना एवं बुराइयों को छुपाकर उन्होंने अपनी स्वामी भक्ति का भरपूर परिचय दिया हैं। तथापि इस शंका के निवारण के लिए हम अधिकाधिक मुस्लिम इतिहासकारों के आधार पर रचित अंग्रेज लेखक ईलियट एंड डाउसन द्वारा संगृहीत एवं प्रामाणिक समझी जाने वाली पुस्तकों का इस लेख में प्रयोग करेंगे।
भारत पर 7वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन क़ासिम से लेकर 18वीं शताब्दी में अहमद शाह अब्दाली तक करीब 1200 वर्षों में अनेक आक्रमणकारियों ने हिन्दुओं पर अनगिनत अत्याचार किये। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक रूप से असंगठित होते हुए भी हिन्दू समाज ने मतान्ध अत्याचारियों का भरपूर प्रतिकार किया। सिंध के राजा दाहिर और उनके बलिदानी परिवार से लेकर वीर मराठा पानीपत के मैदान तक अब्दाली से टकराते रहे। आक्रमणकारियों का मार्ग कभी भी निष्कंटक नहीं रहा अन्यथा सम्पूर्ण भारत कभी का दारुल इस्लाम (इस्लामिक भूमि) बन गया होता। आरम्भ के आक्रमणकारी यहाँ आते, मारकाट -लूटपाट करते और वापिस चले जाते। बाद की शताब्दियों में उन्होंने न केवल भारत को अपना घर बना लिया अपितु राजसत्ता भी ग्रहण कर ली। इस लेख में हम कुछ आक्रमणकारियों जैसे मौहम्मद बिन कासिम,महमूद गजनवी, मौहम्मद गौरी और तैमूर के अत्याचारों की चर्चा करेंगे।
मौहम्मद बिन कासिम
भारत पर आक्रमण कर सिंध प्रान्त में अधिकार प्रथम बार मुहम्मद बिन कासिम को मिला था।उसके अत्याचारों से सिंध की धरती लहूलुहान हो उठी थी। कासिम से उसके अत्याचारों का बदला राजा दाहिर की दोनों पुत्रियों ने कूटनीति से लिया था।
1. प्रारंभिक विजय के पश्चात कासिम ने ईराक के गवर्नर हज्जाज को अपने पत्र में लिखा-'दाहिर का भतीजा, उसके योद्धा और मुख्य मुख्य अधिकारी कत्ल कर दिये गये हैं। हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित कर लिया गया है, अन्यथा कत्ल कर दिया गया है। मूर्ति-मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं। अजान दी जाती है। [i]
2. वहीँ मुस्लिम इतिहासकार आगे लिखता है- 'मौहम्मद बिन कासिम ने रिवाड़ी का दुर्ग विजय कर लिया। वह वहाँ दो-तीन दिन ठहरा। दुर्ग में मौजूद 6000 हिन्दू योद्धा वध कर दिये गये, उनकी पत्नियाँ, बच्चे, नौकर-चाकर सब कैद कर लिये (दास बना लिये गये)। यह संख्या लगभग 30 हजार थी। इनमें दाहिर की भानजी समेत 30 अधिकारियों की पुत्रियाँ भी थी[ii]।
महमूद गजनवी
मुहम्मद गजनी का नाम भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान को युद्ध में हराने और बंदी बनाकर अफगानिस्तान लेकर जाने के लिए प्रसिद्द है। गजनी मजहबी उन्माद एवं मतान्धता का जीता जागता प्रतीक था।
1. भारत पर आक्रमण प्रारंभ करने से पहले इस 20 वर्षीय सुल्तान ने यह धार्मिक शपथ ली कि वह प्रति वर्ष भारत पर आक्रमण करता रहेगा, जब तक कि वह देश मूर्ति और बहुदेवता पूजा से मुक्त होकर इस्लाम स्वीकार न कर ले। अल उतबी इस सुल्तान की भारत विजय के विषय में लिखता है-'अपने सैनिकों को शस्त्रास्त्र बाँट कर अल्लाह से मार्ग दर्शन और शक्ति की आस लगाये सुल्तान ने भारत की ओर प्रस्थान किया। पुरुषपुर (पेशावर) पहुँचकर उसने उस नगर के बाहर अपने डेरे गाड़ दिये[iii]।
2. मुसलमानों को अल्लाह के शत्रु काफिरों से बदला लेते दोपहर हो गयी। इसमें 15000 काफिर मारे गये और पृथ्वी पर दरी की भाँति बिछ गये जहाँ वह जंगली पशुओं और पक्षियों का भोजन बन गये। जयपाल के गले से जो हार मिला उसका मूल्य 2 लाख दीनार था। उसके दूसरे रिश्तेदारों और युद्ध में मारे गये लोगों की तलाशी से 4 लाख दीनार का धन मिला। इसके अतिरिक्त अल्लाह ने अपने मित्रों को 5 लाख सुन्दर गुलाम स्त्रियाँ और पुरुष भी बख्शे [iv]।
3. कहा जाता है कि पेशावर के पास वाये-हिन्द पर आक्रमण के समय महमूद ने महाराज जयपाल और उसके 15 मुख्य सरदारों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया था। सुखपाल की भाँति इनमें से कुछ मृत्यु के भय से मुसलमान हो गये। भेरा में, सिवाय उनके, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, सभी निवासी कत्ल कर दिये गये। स्पष्ट है कि इस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वालों की संखया काफी रही होगी[v]।
4. मुल्तान में बड़ी संख्या में लोग मुसलमान हो गये। जब महमूद ने नवासा शाह पर (सुखपाल का धर्मान्तरण के बाद का नाम) आक्रमण किया तो उतवी के अनुसार महमूद द्वारा धर्मान्तरण का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ[vi]। काश्मीर घाटी में भी बहुत से काफिरों को मुसलमान बनाया गया और उस देश में इस्लाम फैलाकर वह गजनी लौट गया[vii]।
5. उतबी के अनुसार जहाँ भी महमूद जाता था, वहीं वह निवासियों को इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर करता था। इस बलात् धर्म परिवर्तन अथवा मृत्यु का चारों ओर इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि अनेक शासक बिना युद्ध किये ही उसके आने का समाचार सुनकर भाग खड़े होते थे। भीमपाल द्वारा चाँद राय को भागने की सलाह देने का यही कारण था कि कहीं राय महमूद के हाथ पड़कर बलात् मुसलमान न बना लिया जाये जैसा कि भीमपाल के चाचा और दूसरे रिश्तेदारों के साथ हुआ था[viii]।
6. 1023 ई. में किरात, नूर, लौहकोट और लाहौर पर हुए चौदहवें आक्रमण के समय किरात के शासक ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और उसकी देखा-देखी दूसरे बहुत से लोग मुसलमान हो गये। निजामुद्दीन के अनुसार देश के इस भाग में इस्लाम शांतिपूर्वक भी फैल रहा था, और बलपूर्वक भी`[ix]। सुल्तान महमूद कुरान का विद्वान था और उसकी उत्तम परिभाषा कर लेता था। इसलिये यह कहना कि उसका कोई कार्य इस्लाम विरुद्ध था, झूठा है।
7. हिन्दुओं ने इस पराजय को राष्ट्रीय चुनौती के रूप में लिया। अगले आक्रमण के समय जयपाल के पुत्र आनंद पाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के राजाओं की सहायता से एक बड़ी सेना लेकर महमूद का सामना किया। फरिश्ता लिखता है कि 30,000 खोकर राजपूतों ने जो नंगे पैरों और नंगे सिर लड़ते थे, सुल्तान की सेना में घुस कर थोड़े से समय में ही तीन-चार हजार मुसलमानों को काट कर रख दिया। सुल्तान युद्ध बंद कर वापिस जाने की सोच ही रहा था कि आनंद पाल का हाथी अपने ऊपर नेपथा के अग्नि गोले के गिरने से भाग खड़ा हुआ। हिन्दू सेना भी उसके पीछे भाग खड़ी हुई[x]।
8. सराय (नारदीन) का विध्वंस- सुल्तान ने (कुछ समय ठहरकर) फिर हिन्द पर आक्रमण करने का इरादा किया। अपनी घुड़सवार सेना को लेकर वह हिन्द के मध्य तक पहुँच गया। वहाँ उसने ऐसे-ऐसे शासकों को पराजित किया जिन्होंने आज तक किसी अन्य व्यक्ति के आदेशों का पालन करना नहीं सीखा था। सुल्तान ने उनकी मूर्तियाँ तोड़ डाली और उन दुष्टों को तलवार के घाट उतार दिया। उसने इन शासकों के नेता से युद्ध कर उन्हें पराजित किया। अल्लाह के मित्रों ने प्रत्येक पहाड़ी और वादी को काफिरों के खून से रंग दिया और अल्लाह ने उनको घोड़े, हाथियों और बड़ी भारी संपत्ति मिली[xi]।
9. नंदना की विजय के पश्चात् सुल्तान लूट का भारी सामान ढ़ोती अपनी सेना के पीछे-पीछे चलता हुआ, वापिस लौटा। गुलाम तो इतने थे कि गजनी की गुलाम-मंडी में उनके भाव बहुत गिर गये। अपने (भारत) देश में अति प्रतिष्ठा प्राप्त लोग साधारण दुकानदारों के गुलाम होकर पतित हो गये। किन्तु यह तो अल्लाह की महानता है कि जो अपने महजब को प्रतिष्ठित करता है और मूति-पूजा को अपमानित करता है[xii]।
10. थानेसर में कत्ले आम- थानेसर का शासक मूर्ति-पूजा में घोर विश्वास करता था और अल्लाह (इस्लाम) को स्वीकार करने को किसी प्रकार भी तैयार नहीं था। सुल्तान ने (उसके राज्य से) मूर्ति पूजा को समाप्त करने के लिये अपने बहादुर सैनिकों के साथ कूच किया। काफिरों के खून से, नदी लाल हो गई और उसका पानी पीने योग्य नहीं रहा। यदि सूर्य न डूब गया होता तो और अधिक शत्रु मारे जाते। अल्लाह की कृपा से विजय प्राप्त हुई जिसने इस्लाम को सदैव-सदैव के लिये सभी दूसरे मत-मतान्तरों से श्रेष्ठ स्थापित किया है, भले ही मूर्ति पूजक उसके विरुद्ध कितना ही विद्रोह क्यों न करें। सुल्तान, इतना लूट का माल लेकर लौटा जिसका कि हिसाब लगाना असंभव है। स्तुति अल्लाह की जो सारे जगत का रक्षक है कि वह इस्लाम और मुसलमानों को इतना सम्मान बख्शता है[xiii]।
11. अस्नी पर आक्रमण- जब चन्देल को सुल्तान के आक्रमण का समाचार मिला तो डर के मारे उसके प्राण सूख गये। उसके सामने साक्षात मृत्यु मुँह बाये खड़ी थी। सिवाय भागने के उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था। सुल्तान ने आदेश दिया कि उसके पाँच दुर्गों की बुनियाद तक खोद डाली जाये। वहाँ के निवासियों को उनके मल्बे में दबा दिया अथवा गुलाम बना लिया गया। चन्देल के भाग जाने के कारण सुल्तान ने निराश होकर अपनी सेना को चान्द राय पर आक्रमण करने का आदेश दिया जो हिन्द के महान शासकों में से एक है और सरसावा दुर्ग में निवास करता है[xiv]।
12. सरसावा (सहारनपुर) में भयानक रक्तपात- सुल्तान ने अपने अत्यंत धार्मिक सैनिकों को इकट्ठा किया और द्गात्रु पर तुरन्त आक्रमण करने के आदेश दिये। फलस्वरूप बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये अथवा बंदी बना लिये गये। मुसलमानों ने लूट की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जब तक कि कत्ल करते-करते उनका मन नहीं भर गया। उसके बाद ही उन्होंने मुर्दों की तलाशी लेनी प्रारंभ की जो तीन दिन तक चली। लूट में सोना, चाँदी, माणिक, सच्चे मोती, जो हाथ आये जिनका मूल्य लगभग तीस लाख दिरहम रहा होगा। गुलामों की संख्या का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक को 2 से लेकर 10 दिरहम तक में बेचा गया। द्गोष को गजनी ले जाया गया। दूर-दूर के देशों से व्यापारी उनको खरीदने आये। मवाराउन-नहर ईराक, खुरासान आदि मुस्लिम देश इन गुलामों से पट गये। गोरे, काले, अमीर, गरीब दासता की समान जंजीरों में बँधकर एक हो गये[xv]।
13. सोमनाथ का पतन- अल-काजवीनी के अनुसार 'जब महमूद सोमनाथ के विध्वंस के इरादे से भारत गया तो उसका विचार यही था कि (इतने बड़े उपसाय देवता के टूटने पर) हिन्दू (मूर्ति पूजा के विश्वास को त्यागकर) मुसलमान हो जायेंगे[xvi]।दिसम्बर 1025 में सोमनाथ का पतना हुआ। हिन्दुओं ने महमूद से कहा कि वह जितना धन लेना चाहे ले ले, परन्तु मूर्ति को न तोड़े। महमूद ने कहा कि वह इतिहास में मूर्ति-भंजक के नाम से विखयात होना चाहता है, मूर्ति व्यापारी के नाम से नहीं। महमूद का यह ऐतिहासिक उत्तर ही यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि सोमनाथ के मंदिर को विध्वंस करने का उद्देश्य धार्मिक था, लोभ नहीं। मूर्ति तोड़ दी गई। दो करोड़ दिरहम की लूट हाथ लगी, पचास हजार हिन्दू कत्ल कर दिये गये[xvii]। लूट में मिले हीरे, जवाहरातों, सच्चे मोतियों की, जिनमें कुछ अनार के बराबर थे, गजनी में प्रदर्शनी लगाई गई जिसको देखकर वहाँ के नागरिकों और दूसरे देशों के राजदूतों की आँखें फैल गई[xviii]।
यह लेख आप तक desicnn.com के सौजन्य से पेश किया जा रहा है... आगे जारी...
मौहम्मद गौरी
मुहम्मद गौरी नाम नाम गुजरात के सोमनाथ के भव्य मंदिर के विध्वंश के कारण सबसे अधिक कुख्यात है। गौरी ने इस्लामिक जोश के चलते लाखों हिन्दुओं के लहू से अपनी तलवार को रंगा था।
1. मुस्लिम सेना ने पूर्ण विजय प्राप्त की। एक लाख नीच हिन्दू नरक सिधार गये (कत्ल कर दिये गये)। इस विजय के पश्चात् इस्लामी सेना अजमेर की ओर बढ़ी-वहाँ इतना लूट का माल मिला कि लगता था कि पहाड़ों और समुद्रों ने अपने गुप्त खजानें खोल दिये हों। सुल्तान जब अजमेर में ठहरा तो उसने वहाँ के मूर्ति-मंदिरों की बुनियादों तक को खुदावा डाला और उनके स्थान पर मस्जिदें और मदरसें बना दिये, जहाँ इस्लाम और शरियत की शिक्षा दी जा सके[xix]।
2. फरिश्ता के अनुसार मौहम्मद गौरी द्वारा 4 लाख 'खोकर' और 'तिराहिया' हिन्दुओं को इस्लाम ग्रहण कराया गया[xx]।
3. इब्ल-अल-असीर के द्वारा बनारस के हिन्दुओं का भयानक कत्ले आम हुआ। बच्चों और स्त्रियों को छोड़कर और कोई नहीं बक्शा गया[xxi]।स्पष्ट है कि सब स्त्री और बच्चे गुलाम और मुसलमान बना लिये गये।
Islam in India
तैमूर लंग
तैमूर लंग अपने समय का सबसे अत्याचारी हमलावर था। उसके कारण गांव के गांव लाशों के ढेर में तब्दील हो गए थे।लाशों को जलाने वाला तक बचा नहीं था।
1. 1399 ई. में तैमूर का भारत पर भयानक आक्रमण हुआ। अपनी जीवनी 'तुजुके तैमुरी' में वह कुरान की इस आयत से ही प्रारंभ करता है 'ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सखती बरतो।' वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है। 'हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें[xxii]।
2. कश्मीर की सीमा पर कटोर नामी दुर्ग पर आक्रमण हुआ। उसने तमाम पुरुषों को कत्ल और स्त्रियों और बच्चों को कैद करने का आदेश दिया। फिर उन हठी काफिरों के सिरों के मीनार खड़े करने के आदेश दिये। फिर भटनेर के दुर्ग पर घेरा डाला गया। वहाँ के राजपूतों ने कुछ युद्ध के बाद हार मान ली और उन्हें क्षमादान दे दिया गया। किन्तु उनके असवाधान होते ही उन पर आक्रमण कर दिया गया। तैमूर अपनी जीवनी में लिखता है कि 'थोड़े ही समय में दुर्ग के तमाम लोग तलवार के घाट उतार दिये गये। घंटे भर में दस हजार लोगों के सिर काटे गये। इस्लाम की तलवार ने काफिरों के रक्त में स्नान किया। उनके सरोसामान, खजाने और अनाज को भी, जो वर्षों से दुर्ग में इकट्ठा किया गया था, मेरे सिपाहियों ने लूट लिया। मकानों में आग लगा कर राख कर दिया। इमारतों और दुर्ग को भूमिसात कर दिया गया[xxiii]।
3. दूसरा नगर सरसुती था जिस पर आक्रमण हुआ। 'सभी काफिर हिन्दू कत्ल कर दिये गये। उनके स्त्री और बच्चे और संपत्ति हमारी हो गई। तैमूर ने जब जाटों के प्रदेश में प्रवेश किया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि 'जो भी मिल जाये, कत्ल कर दिया जाये।' और फिर सेना के सामने जो भी ग्राम या नगर आया, उसे लूटा गया।पुरुषों को कत्ल कर दिया गया और कुछ लोगों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया[xxiv]।'
4. दिल्ली के पास लोनी हिन्दू नगर था। किन्तु कुछ मुसलमान भी बंदियों में थे। तैमूर ने आदेश दिया कि मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी हिन्दू बंदी इस्लाम की तलवार के घाट उतार दिये जायें। इस समय तक उसके पास हिन्दू बंदियों की संखया एक लाख हो गयी थी। जब यमुना पार कर दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी हो रही थी उसके साथ के अमीरों ने उससे कहा कि इन बंदियों को कैम्प में नहीं छोड़ा जा सकता और इन इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र कर देना भी युद्ध के नियमों के विरुद्ध होगा। तैमूर लिखता है- 'इसलिये उन लोगों को सिवाय तलवार का भोजन बनाने के कोई मार्ग नहीं था। मैंने कैम्प में घोषणा करवा दी कि तमाम बंदी कत्ल कर दिये जायें और इस आदेश के पालन में जो भी लापरवाही करे उसे भी कत्ल कर दिया जाये और उसकी सम्पत्ति सूचना देने वाले को दे दी जाये। जब इस्लाम के गाजियों (काफिरों का कत्ल करने वालों को आदर सूचक नाम) को यह आदेश मिला तो उन्होंने तलवारें सूत लीं और अपने बंदियों को कत्ल कर दिया। उस दिन एक लाख अपवित्र मूर्ति-पूजक काफिर कत्ल कर दिये गये[xxv]।
इसी प्रकार के कत्लेआम, धर्मांतरण का विवरण कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्लतुमिश, ख़िलजी,तुगलक से लेकर तमाम मुग़लों तक का मिलता हैं। अकबर और औरंगज़ेब के जीवन के विषय में चर्चा हम अलग से करेंगे। भारत के मुसलमान आक्रमणकारियों बाबर, मौहम्मद बिन-कासिम, गौरी, गजनवी इत्यादि लुटेरों को और औरंगजेब जैसे साम्प्रदायिक बादशाह को गौरव प्रदान करते हैं और उनके द्वारा मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों व दरगाहों को इस्लाम की काफिरों पर विजय और हिन्दू अपमान के स्मृति चिन्ह बनाये रखना चाहते हैं। संसार में ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिलेगा जब एक कौम अपने पूर्वजों पर अत्याचार करने वालों को महान सम्मान देते हो और अपने पूर्वजों के अराध्य हिन्दू देवी देवताओं, भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा के प्रति उसके मन में कोई आकर्षण न हो।
(नोट- इस लेख को लिखने में "भारतीय मुसल्मानों के हिन्दु पूर्वज मुसलमान कैसे बने" नामक पुस्तक, लेखक पुरुषोत्तम, प्रकाशक हिन्दू राइटर फोरम, राजौरी गार्डन, दिल्ली का प्रयोग किया गया है।)

प्रखर राष्ट्रवादी साईट desiCNN  से साभार ...आदरणीय Suresh Chiplunkar जी...
18 जून. 1576 को हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के मध्य घमासान युद्ध मचा हुआ था| युद्ध जीतने को जान की बाजी लगी हुई. वीरों की तलवारों के वार से सैनिकों के कटे सिर से खून बहकर हल्दीघाटी रक्त तलैया में तब्दील हो गई| घाटी की माटी का रंग आज हल्दी नहीं लाल नजर आ रहा था| इस युद्ध में एक वृद्ध वीर अपने तीन पुत्रों व अपने निकट वंशी भाइयों के साथ हरावल (अग्रिम पंक्ति) में दुश्मन के छक्के छुड़ाता नजर आ रहा था| युद्ध में जिस तल्लीन भाव से यह योद्धा तलवार चलाते हुए दुश्मन के सिपाहियों के सिर कलम करता आगे बढ़ रहा था, उस समय उस बड़ी उम्र में भी उसकी वीरता, शौर्य और चेहरे पर उभरे भाव देखकर लग रहा था कि यह वृद्ध योद्धा शायद आज मेवाड़ का कोई कर्ज चुकाने को इस आराम करने वाली उम्र में भी भयंकर युद्ध कर रहा है| इस योद्धा को अपूर्व रण कौशल का परिचय देते हुए मुगल सेना के छक्के छुड़ाते देख अकबर के दरबारी लेखक व योद्धा बदायूंनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली| बदायूंनी ने देखा वह योद्धा दाहिनी तरफ हाथियों की लड़ाई को बायें छोड़ते हुए मुग़ल सेना के मुख्य भाग में पहुँच गया और वहां मारकाट मचा दी| अल बदायूंनी लिखता है- “ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान के पोते रामशाह ने हमेशा राणा की हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहता था, ऐसी वीरता दिखलाई जिसका वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है| उसके तेज हमले के कारण हरावल में वाम पार्श्व में मानसिंह के राजपूतों को भागकर दाहिने पार्श्व के सैयदों की शरण लेनी पड़ी जिससे आसफखां को भी भागना पड़ा| यदि इस समय सैयद लोग टिके नहीं रहते तो हरावल के भागे हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार हो जाती|" 

राजपूती शौर्य और बलिदान का ऐसा दृश्य अपनी आँखों से देख अकबर के एक नवरत्न दरबारी अबुल फजल ने लिखा- "ये दोनों लश्कर लड़ाई के दोस्त और जिन्दगी के दुश्मन थे, जिन्होंने जान तो सस्ती और इज्जत महंगी करदी|"


हल्दीघाटी (Haldighati Battle) के युद्ध में मुग़ल सेना के हृदय में खौफ पैदा कर तहलका मचा देने वाला यह वृद्ध वीर कोई और नहीं ग्वालियर का अंतिम तोमर राजा विक्रमादित्य का पुत्र रामशाह तंवर Ramshah Tomar था| 1526 ई. पानीपत के युद्ध में राजा विक्रमादित्य के मारे जाने के समय रामशाह तंवर Ramsa Tanwar मात्र 10 वर्ष की आयु के थे| पानीपत युद्ध के बाद पूरा परिवार खानाबदोश हो गया और इधर उधर भटकता रहा| युवा रामशाह (Ram Singh Tomar) ने अपना पेतृक़ राज्य राज्य पाने की कई कोशिशें की पर सब नाकामयाब हुई| आखिर 1558 ई. में ग्वालियर पाने का आखिरी प्रयास असफल होने के बाद रामशाह चम्बल के बीहड़ छोड़ वीरों के स्वर्ग व शरणस्थली चितौड़ की ओर चल पड़े|


मेवाड़ की वीरप्रसूता भूमि जो उस वक्त वीरों की शरणस्थली ही नहीं तीर्थस्थली भी थी पर कदम रखते ही रामशाह तंवर का मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने अतिथि परम्परा के अनुकूल स्वागत सत्कार किया. यही नहीं महाराणा उदयसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह रामशाह तंवर के पुत्र शालिवाहन के साथ कर आपसी सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता प्रदान की| कर्नल टॉड व वीर विनोद के अनुसार उन्हें मेवाड़ में जागीर भी दी गई थी| इन्हीं सम्बन्धों के चलते रामशाह तंवर मेवाड़ में रहे और वहां मिले सम्मान के बदले मेवाड़ के लिए हरदम अपना सब कुछ बलिदान देने को तत्पर रहते थे|


कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी के युद्ध में रामशाह तोमर, उसके पुत्र व 350 तंवर राजपूतों का मरना लिखा है| टॉड ने लिखा- "तंवरों ने अपने प्राणों से ऋण (मेवाड़ का) चूका दिया|" तोमरों का इतिहास में इस घटना पर लिखा है कि- "गत पचास वर्षों से हृदय में निरंतर प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा का अंतिम प्रकाश-पुंज दिखकर, अनेक शत्रुओं के उष्ण रक्त से रक्तताल को रंजित करते हुए मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के निमित्त धराशायी हुआ विक्रम सुत रामसिंह तोमर|" लेखक द्विवेदी लिखते है- "तोमरों ने राणाओं के प्रश्रय का मूल्य चुका दिया|" भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी व इतिहासकार सज्जन सिंह राणावत एक लेख में लिखते है- "यह तंवर वीर अपने तीन पुत्रों शालिवाहन, भवानीसिंह व प्रताप सिंह के साथ आज भी रक्त तलाई (जहाँ महाराणा व अकबर की सेना के मध्य युद्ध हुआ) में लेटा हल्दीघाटी को अमर तीर्थ बना रहा है| इनकी वीरता व कुर्बानी बेमिसाल है, इन चारों बाप-बेटों पर हजार परमवीर चक्र न्योछावर किये जाए तो भी कम है|"


तेजसिंह तरुण अपनी पुस्तक "राजस्थान के सूरमा" में लिखते है- "अपनों के लिए अपने को मरते तो प्राय: सर्वत्र सुना जाता है, लेकिन गैरों के लिए बलिदान होता देखने में कम ही आता है| रामशाह तंवर, जो राजस्थान अथवा मेवाड़ का न राजा था और न ही सामंत, लेकिन विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में इस वीर पुरुष ने जिस कौशल का परिचय देते हुए अपना और वीर पुत्रों का बलिदान दिया वह स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है|"


जाने माने क्षत्रिय चिंतक देवीसिंह, महार ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा- "हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप यदि अनुभवी व वयोवृद्ध योद्धा रामशाह तंवर की सुझाई युद्ध नीति को पूरी तरह अमल में लेते तो हल्दीघाटी के युद्ध के निर्णय कुछ और होता| महार साहब के अनुसार रामशाह तंवर का अनुभव और महाराणा की ऊर्जा का यदि सही समन्वय होता तो आज इतिहास कुछ और होता|"


धन्य है यह भारत भूमि जहाँ रामशाह तंवर Ramshah Tanwar जिन्हें रामसिंह तोमर Ramsingh Tomar, रामसा तोमर Ramsa Tomar आदि नामों से भी जाना जाता रहा है, जैसे वीरों ने जन्म लिया और मातृभूमि के लिए उच्चकोटि के बलिदान देने का उदाहरण पेश कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श प्रेरक पैमाना पेश किया| 

साभार..... ज्ञान दर्पण ब्लॉग 

शनिवार, 17 जून 2017

सोनिया गांधी का सच: सोनिया गांधी को कितना जानते है ?

सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का "धर्मनिरपेक्षता", या "हिन्दू राष्ट्रवाद" या "भारत की बहुलवादी संस्कृति" से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये कैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि "अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ", बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!

(प्रस्तुत लेख सुश्री कंचन गुप्ता द्वारा दिनांक २३ अप्रैल १९९९ को रेडिफ़.कॉम पर लिखा गया है, बेहद मामूली फ़ेरबदल और कुछ भाषाई जरूरतों के मुताबिक इसे मैंने संकलित, संपादित और अनुवादित किया है। डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखे गये कुछ लेखों का संकलन पूर्ण होते ही अनुवादों की इस कडी़ का तीसरा भाग पेश किया जायेगा।) मित्रों जनजागरण का यह महाअभियान जारी रहे, अंग्रेजी में लिखा हुआ अधिकतर आम लोगों ने नहीं पढा़ होगा इसलिये सभी का यह कर्तव्य बनता है कि महाजाल पर स्थित यह सामग्री हिन्दी पाठकों को भी सुलभ हो, इसलिये इस लेख की लिंक को अपने इष्टमित्रों तक अवश्य पहुँचायें, क्योंकि हो सकता है कि कल को हम एक विदेशी द्वारा शासित होने को अभिशप्त हो जायें !

अनमास्किंग सोनिया गाँधी

अमिताभ शर्मा जी जरा अपनी मेडम जी की सच्चाई अपढ़ लीजिये.....
जब इंटरनेट और ब्लॉग की दुनिया में आया तो सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ पढने को मिला । पहले तो मैंने भी इस पर विश्वास नहीं किया और इसे मात्र बकवास सोच कर खारिज कर दिया, लेकिन एक-दो नहीं कई साईटों पर कई लेखकों ने सोनिया के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है जो कि अभी तक प्रिंट मीडिया में नहीं आया है (और भारत में इंटरनेट कितने और किस प्रकार के लोग उपयोग करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है) । यह तमाम सा
मग्री हिन्दी में और विशेषकर "यूनिकोड" में भी पाठकों को सुलभ होनी चाहिये, यही सोचकर मैंने "नेहरू-गाँधी राजवंश" नामक पोस्ट लिखी थी जिस पर मुझे मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली, कुछ ने इसकी तारीफ़ की, कुछ तटस्थ बने रहे और कुछ ने व्यक्तिगत मेल भेजकर गालियाँ भी दीं (मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः) । यह तो स्वाभाविक ही था, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि कुछ विद्वानों ने मेरे लिखने को ही चुनौती दे डाली और अंग्रेजी से हिन्दी या मराठी से हिन्दी के अनुवाद को एक गैर-लेखकीय कर्म और "नॉन-क्रियेटिव" करार दिया । बहरहाल, कम से कम मैं तो अनुवाद को रचनात्मक कार्य मानता हूँ, और देश की एक प्रमुख हस्ती के बारे में लिखे हुए का हिन्दी पाठकों के लिये अनुवाद पेश करना एक कर्तव्य मानता हूँ (कम से कम मैं इतना तो ईमानदार हूँ ही, कि जहाँ से अनुवाद करूँ उसका उल्लेख, नाम उपलब्ध हो तो नाम और लिंक उपलब्ध हो तो लिंक देता हूँ) । पेश है "आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।"अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था । सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे ("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी । जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था । राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का
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सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का "धर्मनिरपेक्षता", या "हिन्दू राष्ट्रवाद" या "भारत की बहुलवादी संस्कृति" से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये क
ैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि "अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ", बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!
(प्रस्तुत लेख सुश्री कंचन गुप्ता द्वारा दिनांक २३ अप्रैल १९९९ को रेडिफ़.कॉम पर लिखा गया है, बेहद मामूली फ़ेरबदल और कुछ भाषाई जरूरतों के मुताबिक इसे मैंने संकलित, संपादित और अनुवादित किया है। डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखे गये कुछ लेखों का संकलन पूर्ण होते ही अनुवादों की इस कडी़ का तीसरा भाग पेश किया जायेगा।) मित्रों जनजागरण का यह महाअभियान जारी रहे, अंग्रेजी में लिखा हुआ अधिकतर आम लोगों ने नहीं पढा़ होगा इसलिये सभी का यह कर्तव्य बनता है कि महाजाल पर स्थित यह सामग्री हिन्दी पाठकों को भी सुलभ हो, इसलिये इस लेख की लिंक को अपने इष्टमित्रों तक अवश्य पहुँचायें, क्योंकि हो सकता है कि कल को हम एक विदेशी द्वारा शासित होने को अभिशप्त हो जायें !
गतांक (सोनिया...भाग-३) से आगे जारी...
राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श
्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।
जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।
भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।
इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।
[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, , यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती),? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि... मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं.... राजनीति शायद इसी का नाम है...

मंगलवार, 6 जून 2017

मांगने की आदत छोड़िये, आत्म निर्भर बनिए

पोस्ट थोड़ी लम्बी है पर आग्रह करूंगा पढियेगा जरूर
हम इंडियन लोगो में एक बहुत ही गन्दी आदत है ''मांगने'' की, ज़रा सी बात पर पडोसी के यहाँ पहुंच गए,कभी चाय की पत्ती,तो कभी शक़्कर, तो कभी बेसन, तो कभी आलू -प्याज आदि आदि
अब राजीव गाँधी जी तो 200 % इंडियन थे,तभी तो विदेशी मेम पसंद किया ! इसी आदत के चलते राजीव जी चल दिए कटोरा लेकर अमेरिका के पास की हमे सुपर कम्पुटर और क्रायोजेनिक इंजन (अन्तरिक्ष रॉकेट मे काम आने वाला इंजन) दे दो। तो रोनाल्ड रीगन ने कहा हम सोचेंगे और राजीव जी वापस भारत लौट आये। कुछ महीनों बाद फिर राजीव गांधी अमेरिका पहुँच गए और पूछा क्या सोचा आपने ?
रोनाल्ड रीगन ने उन्हें उत्तर दिया ''न तो हम आपको सुपर कंप्यूटर न ही उसे बनाने वाली तकनीक देंगे और ना ही हम आपको क्रायोजेनिक इंजन सोपेंगे''। राजीव अपना मुह लटकाए भारत वापिस लौट आये, वाशिंगटन मे बेईज्ज़ती हुयी वो अलग। भारत वापिस आने के बाद उनहोने CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) के वैज्ञानिको की मीटिंग बुलाई, यकीन मानियेगा हमारे देश का प्रधानमंत्री उस मीटिंग मे रो पड़ा। और रोते हुए कहा की ''में अमेरिका गया था सुपर कंप्यूटर और क्रायोजेनिक इंजन मांगने पर उन्होंने सीधा मन कर दिया''।
उस वक्त CSIR के डायरेक्टर SK Joshi थे, इन्होने कहा की हमने तो आपको पहले ही मना किया था, फिर क्यू गए अपनी और देश की बेईज्ज़ती करवाने। राजीव जी ने कह कोई तो रास्ता होगा इस समस्या के हल का? जोशी जी ने कह रूस से क्रायोजेनिक इंजन का समझोता कर लीजिये। भारत ने रूस के साथ समझोता कर लिया लेकिन जैसे ही डिलीवरी का समय आया अमेरिका ने टांग बीच मे डालदी। अमेरिका ने रूस को ब्लैकलिस्टेड कर दिया। रूस इस बात से घबरा गया और उसने भी भारत को इंजन देने से मना कर दिया। इस बात से आहत भारतीय वैज्ञानिको ने कहा की क्यू आप बार बार दुसरे देशो से मांगने पहुच जाते हैं..क्यू आप अपने वैज्ञानिको पर भरोसा नहीं करते ?
सभी वैज्ञानिको ने भरोसा दिलाया की भारत के वैज्ञानिक भी उतने ही प्रतिभाशाली हैं जितने के वो सब हैं बशर्ते उन्हें काम देने की ज़रुरत हैं और साथ मे प्रोटेक्शन भी। ये सब सुनने के बाद राजीव जी ने बड़ी देर बाद मन बनाया के अब कंप्यूटर भारत के वैज्ञानिक ही बनायेंगे। CSIR का सहयोगी CDAC पुणे मे दिन रात एक करके जितना समय और पैसा दिया गया था उसकी बचत करके देश को पहला सुपर कंप्यूटर दे दिया जिसे नाम दिया गया “परम 10000″। इसके बाद परम युवा 1, परम युवा 2, और अन्य सुपर कंप्यूटर भारत को सोंपे गए। आज भारत सुपर कंप्यूटर को निर्यात करने में सबसे अग्रणी देश बन गया !
इसी तरह DRDO (Defense Research and Development Organisation) के वैज्ञानिको ने क्रायोजेनिक इंजन भी बना डाला बिना किसी देश से इसकी तकनीक लिए हुए। 5 जनवरी 2014 को, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण कर लिया !
''क्रायो’ यूनानी शब्द ‘क्रायोस’ से बना है, जिसका अर्थ ‘बर्फ जैसा ठण्डा’ होता है। क्रायोजेनिक तकनीक का मुख्य प्रयोग रॉकेटों में किया जाता है, जहाँ ईधनों को क्रायोजेनिक तकनीक से तरल अवस्था में प्राप्त कर लिया जाता है। इस तकनीक में द्रव हाइड्रोजन एवं द्रव ऑक्सीजन का प्रयोग किया जाता है। बेहद कम ताप उत्पन्न करने का विज्ञान क्रायोजेनिक्स कहलाता है ! प्रायः 0 डिग्री सेल्सियस से माइनस 253 डिग्री सेल्सियस तापमान को क्रायोजेनिक कहते है''।
मैं विज्ञान के मामले में अनपढ़ अज्ञानी ही हूँ.। .लेकिन कल के स्वदेशी लांच पे वही अनपढ़ों वाली बाते करना चाहता हूँ । भारत अभी तक रक्षा उत्पाद में आत्मनिर्भर नही हो पा रहा था. क्योंकि इसके 50 से ज्यादा क्रायोजेनिक इंजिन सफल नही हुए । अमेरिका हो या रसिया यहाँ तक की इज़राइल ,फ्रांस,ब्रिटेन और इटली की मुँह हम सदैव इसके लिए ताकते थे. अपना लड़ाकू विमान हो या मिसाइल सिस्टम .फेल सिर्फ इस इंजिन के लिए हो रहा था । क्रायोजेनिक इंजन के टरबाइन और पंप जो ईंधन और ऑक्सीकारक दोनों को दहन कक्ष में पहुंचाते हैं, को भी खास किस्म के मिश्रधातु से बनाया जाता है। द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन को दहन कक्ष तक पहुंचाने में जरा सी भी गलती होने पर कई करोड़ रुपए की लागत से बना जीएसएलवी रॉकेट रास्ते में जल सकता है। पर कल भारतीय वैज्ञनिको ने सिद्ध कर दिया की ''हम किसी से कम नहीं'' कल की सफलता एक माइल स्टोन है जो टेक्नोलॉजी भारत को ये अहंकारी देश नही दे रहे थे वो डेवलप हो गया । जीएसएलवी रॉकेट सिर्फ़ क्रायोजेनिक इंजन से ही प्रक्षेपित किया जा सकता है । दरअसल सैटेलाइट तो बस बहाना है .अब हमे कोई रोक नही सकता ''सुपर पावर'' बनने से । बस अब देखते रहिये कैसी कैसी मिसाइल अब हम बनाएंगे की इस अमेरिका, चीन की नींद हराम कर देंगे ।
तो मित्रो बार बार पास पड़ोस से मांगने की आदत छोड़िये और आत्म निर्भर बनिए, नहीं तो हमेसा ही हॅसी के पात्र बने रहेगें । जय जय श्री राम ......

मंगलवार, 30 मई 2017

मांसभक्षियों के कुतर्क :"पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।"



यह मांसभक्षियों का सबसे प्रिय तर्क है। और मज़े की बात यह है कि मांसभक्षियों को यह भी नहीं पता कि यह एक "आत्मघाती" तर्क है, यानी यह तर्क स्वयं की ही काट करता है। ज़ाहिर है, मांसभक्षण से "प्रोटीन" मिले या ना मिले, "तर्कक्षमता" तो अवश्य ही नहीं मिलती है।
वो इसलिए कि जब मांसभक्षियों से कहा जाता है कि वे अपने भोजन के लिए पशुओं की हत्या क्यों करते हैं, तिस पर जब वे प्रत्युत्तर देते हैं कि पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है, तो वे वास्तव में अपने पर लगाए आरोप को पहले ही स्वीकार कर लेते हैं, और अब केवल "प्रतिरक्षा" के तर्क दे रहे होते हैं!
तो अगर मांसभक्षियों पर लगाए गए आरोप के दो चरण हैं, पहला यह कि "क्या वे भोजन के लिए प्राणियों की हत्या करके अनैतिक कृत्य करते हैं" और दूसरा यह कि "प्राणी और हत्या जैसी श्रेणियों को सीमाएं और अतियां क्या हैं", तो वे दूसरे चरण की क़ीमत पर पहले चरण को स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद दूसरे चरण की विवेचना भर शेष रह जाता है। दरअसल, मांसभक्षी पहले ही जानते हैं कि वे एक घोर अनैतिक कृत्य कर रहे होते हैं, और वे भीतर तक ग्लानि से भरे होते हैं।

आप एक ऐसे अपराधी की कल्पना कीजिए, जिसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। उससे कहा जाता है कि "तुमने चोरी की है।" ऐसे में वह अपने बचाव में यह नहीं कहता कि "यह झूठ है, मैंने चोरी नहीं की है।" वह "आत्मप्रवंचना" से भरा तर्क गढ़ते हुए कहता है कि "जज साहब, आप भी तो अपने अर्दली को उसकी योग्यता से कम तनख़्वाह देते हैं। यह भी मेरी नज़र में एक चोरी है।"
इसमें पेंच यह है कि चोर एक "तथ्य" के रूप में अपने अपराध को पहले ही स्वीकार कर चुका होता है, लेकिन अब उसकी रुचि दूसरों को भी चोर सिद्ध करने में होती है, जो कि चोरी नहीं चोरी की एक "हाइपोथीसिस" है। इससे न्यायाधीश का काम बहुत आसान हो जाता है। अब उसे यही सिद्ध करना है कि वह अपने अर्दली को जितनी और जैसी तनख़्वाह दे रहा है, वह चाहे जो हो, उसे चोरी की श्रेणी में तो क़तई नहीं रखा जा सकता।

तो स्थापना यह है कि : मनुष्यों में जीवन होता है। पशुओं में जीवन होता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।
इस आधार पर : अगर मनुष्य की हत्या अपराध है, अगर पशु की हत्या अपराध है, तो पेड़-पौधों की हत्या को भी अपराध माना जाना चाहिए।
यही ना, मांसभक्षी महोदय! आप यही सिद्ध करना चाहते हैं ना?
तो जब आप स्वयं ही यह मान रहे होते हैं कि पशु की हत्या मनुष्य की हत्या जितना बड़ा अपराध है, तब बहुत संभव है कि तर्कों के जंजाल में उलझने के बाद आपको यह जानकर अच्छा ना लगे कि पेड़-पौधों से फल और सब्ज़ी लेना पेड़-पौधों की हत्या करना उसी तरह से नहीं है, जिस तरह से गाय से दूध और भेड़ से ऊन लेना गाय और भेड़ की हत्या कर देने जैसा नहीं है। हां, यह उनका दोहन और शोषण अवश्य है। और शाकाहारी भी प्रकृति का शोषण करता है। किंतु मांसाहारी तो नृशंसता के साथ अपने पर्यावास की हत्या करता है।
मैं पेड़ से फल लेता हूं। पेड़ पर फिर फल उग आता है। मैं गाय की गर्दन काट देता हूं। गाय का जीवन समाप्त हो जाता है। कोई मूर्ख ही इन दोनों को समान बता सकता है। हां, आप यह अवश्य कह सकते हैं कि पेड़ को काट देना उसी तरह से अपराध है, जैसे पशुओं की हत्या कर देना। और मांसभक्षियों को यह जानकर ख़ुशी होना चाहिए कि लगभग सभी शाकाहारी ना केवल पेड़ काटने के विरोधी होते हैं, बल्क‍ि वे तो चाहते हैं कि पृथ्वी पर "वेजीटेशन" को ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बढ़ाया जाए।

पेड़-पौधों का अध्ययन "वनस्पति शास्त्र" के तहत किया जाता है। जीव-जंतुओं का अध्ययन "जीव विज्ञान" के तहत किया जाता है। ये दोनों विज्ञान ही अलग है। प्राणियों में "स्नायु तंत्र" होता है, पेड़-पौधों में नहीं होता। प्राणी "चर" होते हैं, पेड़-पौधे "अचर" होते हैं। प्राणि‍यों में रक्त-मांस-मज्जा की एक संपूर्ण संरचना होती है, पेड़-पौधों में यह कुछ नहीं होता। आपको संभवत: यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिन अंशों में पेड़-पौधों में जीवन होता है, उससे न्यून अंशों में पत्थरों में भी जीवन होता है। हिमालय पर्वत भी अंतत: एक जीवित संरचना है और वह प्रतिवर्ष 6 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है। मेरे प्रिय मांसभक्षियो, क्या आप पर्वतों में सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों की तुलना भीड़भरे बाज़ारों में आतंकवादियों द्वारा किए जाने वाले विस्फोटों से करना चाहते हैं, यह कहकर कि जीवन तो पत्थरों में भी होता है! आप चाहें तो कह लीजिए। आपकी मूर्खताओं का उपहास करने का अधिकार तब अवश्य हमारे पास सुरक्ष‍ित रहेगा।
इसी बात पर मुझे एक चुटकुला याद आया। आइए, फिर से न्यायालय परिसर में चलते हैं। एक व्यक्त‍ि ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। उस पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप लगाया गया। हत्यारे ने अपने बचाव में तर्क किया कि न्यायाधीश महोदय, आपको पता है जीवाणुओं में भी जीवन होता है। आप आज सुबह घर से न्यायालय तक चलकर आए, उसमें करोड़ों जीवाणुओं की मृत्यु हो गई। मैंने अगर सैकड़ों मनुष्यों को मारा है तो आप भी करोड़ों जीवाणुओं के हत्यारे हैं। न्यायाधीश ने दयनीय दृष्ट‍ि से उसकी ओर देखा और उसे उचित सज़ा सुना दी।
मेरे प्रिय मांसभक्षियो, यह चुटकुला आप हैं। आप एक भद्दा मज़ाक़ हैं।

प्रसंगवश, यह भी याद आया कि बहुधा मांसभक्षी कहते हैं कि एक गाय की हत्या के ऐवज़ में एक मनुष्य की हत्या कर देना कहां तक उचित है। क्या तब उन्हें उन्हीं का यह तर्क नहीं दिया जाना चाहिए कि जीवन तो गाय में भी होता है? और तब अगर वे कहेंगे कि गाय में जो जीवन था और मनुष्य में जो जीवन है, उन दोनों में चेतना के अंशों का बड़ा अंतर है, तो क्या यही बात पेड़-पौधों, पत्थरों, पर्वतों की चेतना के अंशों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?
जब शहर में प्लेग फैल जाता है तो लाखों की संख्या में चूहों की हत्या की जाती है। जब कोई बाघ आदमख़ोर हो जाता है तो उसे बंदूक़ की गोली से मार गिराया जाता है। जब आप पैदल चलते हैं तो आपके जाने-अनजाने ही कितने ही कीट-पतंगे कुचलकर मारे जाते हैं। इनमें से किसी की भी तुलना "फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग" के तहत पशुओं को अमानवीय रूप से पालकर, क़त्लख़ानों में भयावह मशीनों से उनकी हत्या कर आपकी तश्तरी में भोजन की तरह प्रस्तुत किए जाने से नहीं की जा सकती, जबकि जीवन तो चूहों में भी था, आदमख़ोर बाघ में भी था, कीट-पतंगों में भी था और पेड़-पौधों में तो था ही। हत्या की मंशा, हत्या का प्रकार, ये सभी "न्यायशास्त्र" के अध्ययन का विषय होते हैं, जबकि मांसभक्षियों के तर्कों की तो पूरी बुनियाद ही अन्याय की लंपट लालसा के आधार पर टिकी होती है।

किसी बुद्धिमान व्यक्त‍ि ने एक बार कहा था कि आप किसी अबोध बच्चे को एक सेब और एक ख़रग़ोश दीजिए। अगर वह सेब के साथ खेलने लगे और ख़रग़ोश को मारकर खाने लगे तो मैं मान लूंगा कि मांसाहार स्वाभाविक है।
इसी पर मैं आगे यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अगर पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, जैसे पशुओं में होता है तो आप जिस तरह से अपने बच्चों को आम के बाग़ में ले जाते हैं, उसी तरह से उन्हें कभी क़त्लख़ानों में क्यों नहीं लेकर जाते?

शाकाहार क्यों ?

यह लेख मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण है। नैतिक या धार्मिक रूप से क्या सही है क्या नहीं का यह विश्लेषण नहीं। साथ ही लेख वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर है मेरी धारणाओं के आधार पर नहीं। लेख अंत तक पढ़ने पर ही समझ आएगा।
मनुष्य की जीभ में मात्र 5 स्वाद जानने की क्षमता होती है।
1.मीठा
2.कड़वा
3.खट्टा
4.नमकीन
5.माँस
मांस का स्वाद अजीनोमोटो से मिलता जुलता है।
और यह रिसेप्टर शाकाहारी मनुष्यों में और उनकी संतानों में भी होता है। और कई पीढ़ियों के शाकाहार के बावजूद मौज़ूद होते हैं।
6.उमामी...pungent..बेहद अज़ीब सा खट्टा स्वाद। टमाटर में होता है।
हमें जो अन्य सैकड़ों स्वाद मिलते हैं वे नाक,गले इत्यादि में मौज़ूद गंध के रिसेप्टर्स की वजह से मिलते हैं।
आप चाहेंगे मनुष्य के मांसाहार पर वैज्ञानिक लेख ??
मैं समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक गहरे अध्ययनों में ही देखता हूँ। शाकाहारी मांसाहारी को दुष्ट कहें और मांसाहारी शाकाहारी को कमज़ोर कहें इससे बात वहीँ रहती है। खुद को जान तो लें हम क्या हैं और क्यों हैं? ऐसे क्यों हैं? और क्या हमारे लिए सही होगा। होगा तो कैसे? क्या संभावित परिणाम होंगे बदलावों के...
लेकिन इस लेख को पढ़ना होगा खुले दिमाग से । पूर्व धारणाओं और मान्यताओं से कुछ देर के लिए दिमाग को खाली करके।
प्राकृतिक रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों,विकास क्रम के अध्ययनों से पता चलता है क़ि मनुष्य की सभी प्रजातियां कालांतर से Omnivorous रही हैं।(शाकाहार और मांस दोनों खाने वाली)।
मनुष्य जब विकसित हुए होमोसेपियंस से तब जो भी उर्ज़ा,प्रोटीन,फैट,विटामिन, मिनरल के लिए खाने योग्य मिलता खा जाते। आज के आधुनिक मनुष्यों के सभी पूर्वज मांसाहारी भी थे।
यही वजह है कि मनुष्य की जीभ में लाखों वर्षों के विकासक्रम  से पोषित मांस रिसेप्टर्स आज भी हैं। मनुष्य के अमाशय में मौजूद enzymes, आँतों की बनावट, आँतों में मौजूद पोषण सोखने वाले vili सभी में मांस से पोषण निकाल कर रक्त में डालने की क्षमता है। मनुष्य के canin एवं अन्य दांतों की बनावट शाकाहारी जीवों से भिन्न है और omnivoros से मिलती जुलती है।
मनुष्य के शरीर के लिए अत्यंत ज़रूरी कुछ तत्व आज भी सिर्फ पशु आहार में हैं। ज़ैसे,दूध,अंडा,चिकेन ,फिश इत्यादि में। वहीँ कुछ ज़रूरी तत्व सिर्फ शाकाहार में हैं। क्योंकि मानव omnivorous स्तनधारी पशु है जंगली सूअर की तरह। 
ज़ैसे विटामिन बी12, vitaminD, उच्च गुणवत्ता का आयरन, 
उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन इत्यादि सिर्फ पशु आहार में पाए जाते हैं। 
लेकिन इस बीच मनुष्य में नैतिकता और धार्मिकता का भी विकास हुआ। नैतिक रूप से मानवीय तर्क के रूप में किसी और जीव की हत्या पाप या गलत समझी जाने लगी। 
लेकिन उपरोक्त शारिरिक एवं भीतरी रसायनों की संरचना इस बात की व्याख्या है क़ि क्यों नैतिक भाषणों,नैतिक तर्कों, धार्मिक डर, पाप पुण्य की संभावना,मांसाहार पर उलाहना के बावजूद, संतों इत्यादि के बावजूद न सिर्फ पूरी दुनिया में वरन भारत ज़ैसे अहिंसा को मानने वाले देशों में तक ,बुद्ध के देशों में तक मांसाहारी मनुष्यों की तादात कहीं ज़्यादा है क्योंकि कोई भी मानवीय नियम कड़ी सजाओं के बावजूद प्राकृतिक नियमों से हमेशा हारते रहते हैं। 
लांतर में शारीरिक क्षमता के आधार पर देखें तो मांसाहारी
कौमों ने युद्ध ज़्यादा जीते हैं। हिंदुओं में भी राजा बनने वाले शक्तिशाली लोग मांसाहारी थे।
ओलंपिक में जीतने वाले ज़्यादातर लोग हों या नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सारे ज़्यादातर omnivorous थे।
साथ ही प्राकृतिक इकोसिस्टम के बैलेंस के लिए भी यह ज़रूऱी था। ज़ैसे शेर कुछ हिरनों को न खाये तो पूरे जंगल को बहुत से नुकसान होंगे। हिरनों के लिए ही घास न बचेगी।
लोगों को यह देखने की ज़रूरत है क़ि गाय या हिरन को शाकाहार सिखाने की ज़रूरत नहीं। वे नैतिक नहीं प्राकृतिक रूप से शाकाहारी हैं। शेर को कोई भी नैतिक भाषण दे शाकाहारी बना दे तो दरअसल प्रकृति के प्रति यह अनैतिक
बात ही होगी।
तो क्या मैं मांसाहार का समर्थक हूँ और मांसाहार को महिमामंडित कर रहा हूँ?
तो उत्तर है नहीं। मैं मात्र प्राकृतिक ,वैज्ञानिक सच आपको खुद अपने तन,मन,विकास और इतिहास के विषय में बताना चाहता हूँ।
और चाहता हूँ आज़ के परिवेश में लोग शाकाहार अपनाएं(दूध,अंडे छोड़ कर)।
क्यों अपनाएं?
आज मानव मूल्य, दया की भावना में प्रकृति प्रदत्त ही इज़ाफ़ा हुआ है। साथ ही मांस आज जीने के लिए खाना ज़रूरी नहीं प्रचुर मात्रा में अन्य खाद्य उपलब्ध होने की वजह से। साथ में सिर्फ मांसाहार में अच्छे से उपलब्ध शरीर के लिए आवश्यक तत्व ज़ैसे विटामिन B12, विटामिन डी,आयरन,प्रोटीन इत्यादि को ऊपरी तौर पर लिया जा सकता है शाकाहार में। ज़ैसे जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर शाकाहारी होकर भी बेहद फिट और मस्कुलर हैं।
फिर आज दूध और अण्डों का उत्पादन मनुष्य बेतहाशा बढ़ा पाया है। इनमें किसी प्राणी का क़त्ल और पीड़ा नहीं। साथ ही पोषक तत्व उच्च स्तर के हैं।
लेकिन दुनिया को साथ ही eco सिस्टम के बदलावों पर भी नज़र रखने होगी।
साथ ही एक महत्वपूर्ण आंकड़ा यह कि विकासशील और गरीब देशों में जब हम शाकाहार और मांसाहार की बहस कर रहे हैं हमारे 30 प्रतिशत बच्चे भूखे सो रहे हैं। अतः इतनी मात्रा में उच्च गुणवत्ता का शाकाहार हम कैसे पैदा करेंगे?
WHO ने आने वाले 30 वर्षों के बाद बढ़ती मानवीय जनसंख्या में खाद्दान्न की कमी से निपटने प्रोटीन युक्त कुछ कीड़ों की प्रजातियों पर काम करना शुरू किया है। सुनने में आज आपको यह अज़ीब लगेगा लेकिन क्या पता 100 वर्षों बाद इनके रेस्टॉरेंट खुल जाएं ,विज्ञापनों के साथ उन कीड़ों के।
मनुष्य ,ये धरती हमारे साथी जीव और पेड़ पौधे जीते रहेंगे अनवरत यही उम्मीद है और अगली पीढ़ियों को शुभकामनायें।